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मोहब्बत और इंक़लाब के प्रतीक कैसे बने फ़ैज़ ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 8, 2022
in पुस्तक / फिल्म समीक्षा
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मोहब्बत और इंक़लाब के प्रतीक कैसे बने फ़ैज़ ?
मोहब्बत और इंक़लाब के प्रतीक कैसे बने फ़ैज़ ?
मोहब्बत और इंक़लाब के प्रतीक कैसे बने फ़ैज़ ?

प्रकाशन : दिनकर पुस्तकालय

मूल्य : ₹450

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सम्पर्क नं. – 9939737304

20वीं सदी के कई ऐसे कवि और शायर हुए जो देखते-देखते एक मिथक में बदल गये और प्रतिरोध के प्रतीक बन गये – चाहे निराला हों या मुक्तिबोध या पाब्लो नेरुदा या नाजिम हिकमत. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक ऐसे ही शायर थे जो भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया मे इंक़लाब के शायर बन गये.

पाकिस्तान के लायलपुर के एक जमींदार परिवार में जन्में एक शर्मीले युवक के बारे में भला कौन जानता था कि वह एक दिन दुनिया में मोहब्बत औऱ इंक़लाब का इतना बड़ा शायर हो जाएगा ! उसकी शायरी ने उसे धीरे-धीरे दुनिया के महान कवियों पाब्लो नेरुदा, नाजिम हिकमत, ब्रेख्त और लोर्का की पंक्ति में खड़ा कर दिया और वह मुखालफत तथा इंक़लाब का मसीहा बन गया.

अगर लियाकत अली को सत्ता से बेदखल करनेवाले रावलपिंडी कॉन्सपिरेसी केस में उस शायर को फंसाया नहीं गया होता तो उसकी शायरी में वह दर्द और इंकलाब नहीं आता लेकिन इस जेल यात्रा ने उसकी शख्सियत में भी एक नया आयाम जोड़ा और जेल से निकलने के बाद एक नये फ़ैज का जन्म हुआ. इसी जेल में उनके दूसरे नज़्म संग्रह के प्रकाशन की खुशी मनायी गयी और नज़्मों का एक मजमुआ ‘ज़िंदा नामा’ इसी जेल की सौगात के रूप में सामने आया.

यह अजीम शायर आज हर किसी की जुबान पर हैं और जितना वह पाकिस्तान में मशहूर हैं, उससे कहीं अधिक भारत में लोकप्रिय हैं. मीर, ग़ालिब और इक़बाल के बाद अगर कोई शायर लोगों की जुबान पर है तो वह फ़ैज़. भारत के लोग तो उन्हें अपने वतन का ही शायर मानने लगे हैं क्योंकि उनकी शायरी में बयां दुख-दर्द, कशमकश, क्रांति की अकुलाहट भारतीय यथार्थ की मिट्टी से मेल खाती है. फ़ैज़ 1946 में दिल्ली में रहे और बाद में भी भारत आए. इलाहाबाद में फ़ैज़ महादेवी और फ़िराक़ की ऐतिहासिक मुलाकत भी हुई थी।

फ़ैज़ में मोहब्बत और क्रांति का रंग ऐसा है कि यह कहना मुश्किल है कि वह मोहब्बत के शायर हैं या फिर प्रतिरोध के. फ़ैज़ के नाती अली मदीह हाशमी ने फ़ैज़ साहब की एक अधिकृत जीवनी कुछ साल पहले अंग्रेजी में लिखी थी, अब उस अंग्रेजी जीवनी का हिंदी में अनुवाद आया है और यह अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार ने किया है. फ़ैज़ के हिंदी पाठकों को पहली बार इस शायर की जिंदगी के अफसानों से रूबरू होने का मौका मिलेगा. 415 पेज की जीवनी में फ़ैज़ की जिंदगी और उनकी शायरी के सभी पहलुओं पर तफसील से लिखा गया है.

इस जीवनी की खासियत यह है कि इसमें एक युग को समेटा गया है. फ़ैज़ अहमद ख़ान का फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ बनना अपने आप में एक इतिहास है. पाकिस्तान की हुकूमत से उनके टकराव ने उनके अंदर एक बागी व्यक्तित्व का विकास किया और उनके जीवन संघर्ष ने उनको एक बड़ा शायर बना दिया. इसमें उनके वामपंथी दोस्तों का भी हाथ है जिनकी सोहबत में आकर वह मार्क्सवाद की ओर झुके और प्रगतिशील लेखक संघ के आंदोलन से जुड़ने के बाद उनकी शख्सियत में एक नया आयाम जुड़ा.

आज फ़ैज़ की ‘मेरी पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग’, ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’ तथा ‘यह दाग दाग उजला शबग जीदा शहर, वह इंतजार था जिसका यह वह सहर तो नहीं’ या और ‘खून के धब्बे धुलेंगे, न जाने कितनी बरसातों के बाद’, ‘हम जो तारीक राहों में मारे गए’, ‘आज बाजार में पा ब जौलां चलो’ जैसी पंक्तियां सबकी जुबान पर हैं.

बीते जमाने की मशहूर गायिका नूरजहां से लेकर मेहंदी हसन और आज की मशहूर ग़ज़ल गायिका राधिका चोपड़ा की आवाज़ ने फ़ैज़ की नज़्मों को घर-घर पहुंचा दिया और यह लोगों की रूह को छू गयी। अब तो युवा लड़के अपने बैंड बनाकर फ़ैज़ को गाते हैं. लंदन में फ़ैज़ की जिस तरह जन्मशती मनायी गयी उससे पता चलता है फ़ैज़ की शायरी सात समंदर पार कर विदेशों तक पहुंच गयी है.

लेकिन जब उर्दू के अज़ीम शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने ‘मेरे महबूब मेरी पहली सी मोहब्बत न मांग’ जैसी नज़्म लिखी तो उनके कद्रदानों और पाठकों के मन में यह सवाल उठा कि आखिर फ़ैज़ साहब की यह महबूब कौन है ? इस जीवनी से पता चलता है कि फ़ैज़ को अपनी ज़िंदगी में मोहब्बत का पहली बार अहसास 17 साल की उम्र में हुआ और वह भी एक अफगान लड़की से, हालांकि इस मोहब्बत की कहानी का कोई अंजाम नहीं निकला. मोहब्बत की यह आग उनके सीने में दब कर रह गयी. बाद में उनकी एकतरफा मोहब्बतें कई लड़कियों से हुईं लेकिन जब एक विदेशी महिला एलिस से मोहब्बत हुई तो वह उनकी शरीके हयात ही बन गयी.

फ़ैज़ साहब एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार में जन्मे थे लेकिन ब्रिटेन की इस गोरी खातून से निकाह, उस ज़माने में बहुत बड़ा तरक़्क़ीपसंद फैसला था. शायद यह उनकी किस्मत में लिखा था या जीवन में कुछ ऐसा संयोग बना जिसके कारण उनकी मोहब्बत की दास्तां अमर हो गयी. शायद इस इश्क ने उन्हें मोहब्बत और इंकलाब का सबसे बड़ा शायर बना दिया क्योंकि उनकी मोहब्बत रूमान की बुनियाद पर नहीं टिकी थी बल्कि विचारों की बुनियाद पर टिकी थी. एलिस ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की मेंबर थी. शायद यह भी कारण रहा होगा कि दोनों एक दूसरे के बहुत नज़दीक आए, इतने नज़दीक कि एक दूसरे के होकर रह गये.

जीवनी में एलिस के व्यक्तित्व पर भी काफी रौशनी डाली गयी है. उनके बारे में दुनिया को अभी कम पता है कि वह कितनी साहसी और धैर्यवान महिला थी. शौहर के साये में उनका साया दब कर रह गया जबकि वह खुद एक रंगकर्मी, पत्रकार, शायरा थीं जो कभी कृष्ण मेनन की सेक्रेटरी भी रह चुकी थीं और बाद में वह संयुक्त राष्ट्र की अधिकारी भी बन गयी. उन्होंने हर मुसीबत में फ़ैज़ का साथ दिया. फ़ैज़ जब लियाकत अली ख़ान को सत्ता को हटाने के रावलपिंडी कॉन्सपिरेसी केस में गिरफ्तार हुए तब एलिस ने बड़ी हिम्मत दिखायी.

जीवनी के अनुसार फ़ैज़ और एलिस की मुलाक़ात मोहम्मद दीन तासीर के घर पहली बार हुई थी. तासीर साहब अमृसर के एक कॉलेज में प्रिंसिपल थे. वह अल्लामा इकबाल के शागिर्द थे तथा सज्जाद जहीर के दोस्त भी थे. वह भारतीय महाद्वीप में पहले शख्स थे जिन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड से पीएचडी की थी. ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई के दौरान ही उनकी शादी क्रिस्टनबेल से हुई जो एलिस की बड़ी बहन थी. शादी के बाद एलिस भी उनसे मिलने पाकिस्तान आयी थी. उनका पूरा नाम एलिस कैथरिन इवी जॉर्ज था. वह किताबों की बिक्री करनेवाले परिवार में 1913 में जन्मी थीं और उनके तीन भाई थे. उनकी मां एलिस गार्टन क्रूसीफिक्स ने 1910 में उनके पिता ज्योफ़्रे जॉर्ज से शादी की थी.

फ़ैज़ की बीवी एलिस गणित में पूरे लन्दन में टॉप आयी थीं लेकिन आर्थिक हालात के कारण मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ सकी. बाद में वह स्टेनोग्राफर का कोर्स करने लगीं और भारत की आज़ादी के आंदोलन में ब्रिटेन में इंडिया लीग बना तो एलिस वी. के. कृष्ण मेनन की सचिव बन गयी. वह सोलह साल की उम्र में ही ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गयी. लन्दन में दोनों बहनें भारतीय छात्रों के संपर्क में आयीं. इन छात्रों में मुल्कराज आनंद, सज्जाद जहीर, रजनी पाम दत्त आदि शामिल थे. इन्हीं छात्रों में डॉ. तासीर भी थे जिनसे एलिस की बड़ी बहन ने शादी कर ली.

इक़बाल ने निकाहनामा तैयार किया था और वे काज़ी बने थे. 1936 में तासीर भारत आ गये और अमृसर के. एम. ए. ओ. कॉलेज में प्रिंसिपल बन गये. इसी कॉलेज में फ़ैज़ साहब अंग्रेज़ी के लेक्चरर थे. यहीं दोनों की मुलाकात हुई और यह मुलाकात मोहब्बत में बदल गयी लेकिन उन दोनों ने अपनी मोहब्बत को छिपाये रखा. एलिस तो छुट्टियां मनाने अपनी बहन के घर आयी थीं लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण फंस गयी. तासीर साहब को फ़ैज़ और एलिस की दोस्ती शुरू में पसंद नहीं थी और वह फ़ैज़ को एलिस के योग्य नहीं मानते थे लेकिन बाद में उन्होंने फ़ैज़ को अपना साढ़ू कबूल कर लिया.

एलिस को अमृतसर के रोजमेरी इंटर गर्ल्स कॉलेज में अंग्रेजी और फ्रेंच पढ़ाने की नौकरी मिल गयी और वह टीचर्स हॉस्टल में रहने लगीं जबकि तासीर साहब कश्मीर में एक कॉलेज के प्रिंसिपल बनकर कश्मीर चले गये. फ़ैज़ की मुलाकातें एलिस से अधिक होने लगीं और मोहब्बत परवान चढ़ने लगी. एलिस ने कहा है कि ‘अमृतसर ही मेरे लिए हिंदुस्तान था और फ़ैज़ साहब ही मेरे लिए वह हिन्दुस्तान थे.’

फ़ैज़ की अम्मी और बहनों की ख्वाहिश थी कि फ़ैज़ साहब एक समृद्ध परिवार में शादी करें, मगर फ़ैज़ एलिस से निकाह करने का मन बना चुके थे. फैज़ का परिवार मुश्किलों के दौर से गुजर रहा था क्योंकि फ़ैज़ के वालिद के इंतक़ाल के समय इस परिवार पर ₹80,000 का कर्ज़ था और परिवार की ज्यादातर जमीन बिक चुकी थी और बाकी जमीन मुकदमे में फंसी थी. फ़ैज़ ने एलिस को यह सब पहले से बता दिया था.

एलिस भी जानती थीं कि वह केवल फ़ैज़ से नहीं बल्कि उनके पूरे परिवार से शादी कर रही हैं जो उनके ऊपर ही आश्रित था. लंबे इंतजार के बाद आखिर फ़ैज़ की अम्मी राजी हुईं तो फ़ैज़ ने एलिस से कहा अगर तासीर और क्रिस्टिना बेल तैयार हों तो वह उसी साल सादे ढंग से शादी कर सकते हैं. एलिस की बड़ी बहन तथा उनके पति भी काफी खुश हुए क्योंकि इसका मतलब था दोनों बहनें भारत में ही रहेंगी. तब तक डॉक्टर तासीर अपनी पत्नी के समझाने पर एलिस की फ़ैज़ से शादी के लिए राजी हो गये थे.

फ़ैज़ और एलिस की शादी 28 अक्टूबर 1941 को हुई. फ़ैज़ ने एलिस के लिए शादी की जो अंगूठी ली वह भी उन्होंने अपने दोस्त मियां इफ्तिखार उद्दीन से ₹300 उधार लेकर ली थी. शेख अब्दुल्ला ने फैज की शादी में काजी की भूमिका निभायी थी. नये जोड़े ने दो दिन श्रीनगर में हनीमून मनाया और फिर लाहौर लौट आया.

एलिस ने लाहौर में अपनी मेहनत से कई औरतों के लिए एक मिसाल पेश की. लाहौर आर्ट काउंसिल में पहला कठपुतली थिएटर, चिल्ड्रंस एंड सोसाइटी, पाकिस्तान टीवी एसोसिएशन के गठन के लिए उन्होंने खूब काम किया और इस सब के लिए वह प्रेरणास्रोत ही बनी रही. वह पाकिस्तान की पहली महिला पत्रकार थी. उन्होंने पाकिस्तान टाइम्स में महिलाओं और बच्चों के लिए एक पन्ना शुरू कराया था.

फ़ैज़ की जब रावलपिंडी कॉन्सपिरेसी केस में गिरफ्तारी हुई तो शुरू में एलिस को बताया नहीं गया कि वह किस जेल में बंद हैं. बाद में जब वह जेल में फ़ैज़ से मिलीं तो यह वाकया एक फिल्मी किस्से की तरह दर्द भरा था. भारत पाकिस्तान के बीच दोस्ती का एक पुल बने मक़बूल शायर फैज़ अहमद फैज़ का असली नाम फ़ैज़ अहमद ख़ान था लेकिन बाद में ख़ान मिट गया और उन्होंने अपना तखल्लुस भी फ़ैज़ ही रख लिया. इस तरह वे पूरी दुनिया में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के नाम से मशहूर हो गये.

फ़ैज़ साहब के वालिद सुल्तान मोहमद अफगानिस्तान के अमीर के दुभाषिये और राजदूत रहे तथा उनकी जीवनी भी लिखी. वे 1901 से 1905 तक लन्दन में रहे. उन्होंने ऑक्सफोर्ड से कानून की डिग्री भी ली. 1905 में इक़बाल ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ने आए. इक़बाल के वह दोस्त भी बने. फ़ैज़ के वालिद पाकिस्तान लौटकर बड़े वकील बने. उनकी कई बीवियां थी और रखैलें भीं. फ़ैज़ की मां सलमा फातिमा, जिसे बेबे के नाम से पुकारा जाता था, का निकाह 18 साल में हुआ जब फ़ैज़ के वालिद की उम्र 50 साल के करीब थी. फ़ैज़ चार भाई थे. बड़े भाई तुफैल जो जज बने, दूसरे खुद फ़ैज़, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के शायर बने, तीसरे इनायत, जो फौज में मेजर हुए, और चौथे बशीर, जो पैदाइशी विकलांग थे.

इस जीवनी में पता चलता है कि फ़ैज़ ने जब विभाजन के हालात से दुःखी होकर ‘ये दाग़ दाग़ उजाला’ लिखा तो उन्हें सरदार जाफरी जैसे तरक्कीपसंद लोगों की आपत्तियों और विरोध को भी सहना पड़ा क्योंकि उन्होंने इस आज़ादी की आलोचना की थी. फ़ैज़ के बारे में यह बात कम लोगों को पता है कि उन्होंने जागो हुआ सवेरा नामक फ़िल्म की कहानी लिखी थी. रोमियो जूलियट और दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म मजदूर में उनकी नज्म का इस्तेमाल हुआ था.

जीवनी में फ़ैज़ को दुनिया में शांति दूत के रूप में भी पेश किया गया है. फ़ैज़ ने पूरी दुनिया की यात्रा की थी क्योंकि वह एक अंतरराष्ट्रीय हस्ती बन गए थे. वह अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए सांस्कृतिक राजदूत भी थे. उनकी मुलाकात पाब्लो नेरुदा और नाजिम हिकमत से हुई. एशियाई-अफ्रीकी लेखक संगठन के जरिये उन्होंने तीसरी दुनिया के लेखकों को एकजुट किया और फिलीस्तीन के पक्ष में आवाज़ उठायी.

लोटस पत्रिका के प्रकाशन के सिलसिले में बेरुत में रहे और वहां चलती गोलियों में घिरकर बाल बाल बचे. यासिर अराफात से भी उनकी एक ऐतिहासिक मुलाक़ात रही. फ़ैज़ का जीवन घटनाओं से भरा हुआ था और उनके व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं कि इस किताब की समीक्षा के बहाने उन्हें समेटना बहुत मुश्किल है. इस जीवनी से फ़ैज़ के मुरीदों को बहुत कुछ नया जानने को मिलेगा. यह जीवनी बताती है कि एक साधारण मनुष्य असाधारण इंसान और एक विश्व कवि कैसे बन गया.

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