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‘अगोरा’: एक अद्भुत महिला ‘हिपेशिया’ की कहानी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 21, 2022
in पुस्तक / फिल्म समीक्षा
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'अगोरा': एक अद्भुत महिला 'हिपेशिया' की कहानी
‘अगोरा’: एक अद्भुत महिला ‘हिपेशिया’ की कहानी

‘कोपरनिकस’ और ‘गैलिलिओ’ से लगभग 1000 साल पहले मिश्र [Egypt] के ‘अलेक्जेंड्रिया’ [ALEXANDRIA] शहर में एक महिला हुआ करती थी. उसका कहना था कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है और वह भी अंडाकार वृत्त में. बिना किसी आधुनिक उपकरण और दूरबीन की सहायता के उसने उस वक़्त स्थापित टालेमी [Ptolemy] मॉडल को चुनौती दी. इस अद्भुत महिला दार्शनिक, गणितज्ञ व वैज्ञानिक का नाम ‘हिपेशिया’ [Hypatia] था.

2009 में आयी फिल्म ‘अगोरा’ [Agora] हिपेशिया की कहानी के बहाने उस दौर में धर्म, विवेक, विज्ञान के खूनी टकराव को इस तरह प्रस्तुत करती है कि यह हमें आज के दौर पर भी सोचने को बाध्य करती है.

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हिपेशिया अलेक्जेंड्रिया में अभिजात्य वर्ग के युवकों को पढ़ाती है. उसका पिता अलेक्जेंड्रिया लाइब्रेरी में ही काम करता है. उसकी भी रूचि वही है जो हिपेशिया की है. दोनों अलेक्जेंड्रिया लाइब्रेरी में दुनिया भर से एकत्र की गयी किताबों के बीच बैठ कर विज्ञान, गणित, दर्शन के गूढ़ सवालों पर चर्चा करते हैं. पिता-पुत्री के बीच का यह सम्बन्ध फिल्म में बहुत ही प्रभावी है.

हिपेशिया के महत्त्व को आप इस तथ्य से भी समझ सकते हैं कि अरस्तू का यह कथन उस वक़्त के समाज का ‘कॉमन सेंस’ था कि औरतों और गुलामों में रूह नहीं होती. सार्वजनिक जीवन में महिलायें न के बराबर थी.

बहरहाल, युवकों को पढ़ाते हुए ही एक छात्र युवक हिपेशिया की सुन्दरता पर मोहित होकर उससे प्रेम निवेदन कर बैठता है. दूसरे दिन हिपेशिया अपनी कक्षा में अपने पीरियड के खून से सने रूमाल को पूरी कक्षा के सामने उसे देते हुए कहती है – ‘मै यह भी हूं.’ संकेत साफ़ है कि किसी औरत से प्यार करना है तो उसे सम्पूर्णता में करो, महज बाहरी सौन्दर्य के आधार पर नहीं.

उसका अंगरक्षक उसका गुलाम भी मन ही मन उसे चाहता है, लेकिन गुलाम होने के कारण उसे व्यक्त नहीं कर पाता. उस गुलाम की भी अपनी समानांतर कहानी पूरी फिल्म में अंत तक चलती है.

यहीं पर यह बताना महत्वपूर्ण है कि हिपेशिया का किरदार जीने वाली ‘रसेल वीज़’ [Rachel Weisz] सच में बहुत खूबसूरत है लेकिन उन्होंने अपने अभिनय में कहीं भी अपनी सुन्दरता का ‘शोषण’ नहीं किया है. अगर ऐसा होता तो उनका किरदार फीका पड़ सकता था, जैसा की आम एतिहासिक फिल्मों में होता है.

जिस समय हिपेशिया अलेक्जेंड्रिया में पढ़ा रही है और अपने दार्शनिक, वैज्ञानिक जूनून का अनुसरण कर रही है, ठीक उसी समय रोम में ‘ईसाइयत’ राज्य धर्म बन चुका है. ‘यहूदियों’ और ‘मूर्तिपूजकों’ [Pagan] को निशाना बनाया जा रहा है. इस समय अलेक्जेंड्रिया रोम का हिस्सा है इसलिए यहां भी राज्य-धर्म बन चुके ईसाइयत का कट्टरपन बढ़ता जा रहा है.

हिपेशिया के ही कुछ छात्र सत्ता की सीढ़ी में ऊपर जाने के लिए ईसाई बन चुके हैं. हिपेशिया के लिए स्वतंत्र माहौल में पढ़ाना अब मुश्किल होता जा रहा है. सच तो यह है कि अब हिपेशिया के लिए सार्वजनिक रूप से पहले की तरह बाहर निकलना भी दूभर होता जा रहा है.

उसके वे छात्र जो अब ईसाई बनकर सत्ता में ऊंची जगहों पर बैठे हैं वे भी दबाव बना रहे हैं कि हिपेशिया ईसाई धर्म ग्रहण कर ले. ऐसे ही एक दिलचस्प वार्तालाप में हिपेशिया कहती है कि मेरा धर्म दर्शन है और मै ईसाई कभी नहीं बनूंगी.

‘पागान’ [Pagan] धर्म से जुड़े विशालकाय ‘देवताओं’ को ईसाई कट्टरपंथी गिरा रहे है. यह दृश्य बरबस तालिबान द्वारा विशालकाय बौद्ध प्रतिमाओं को गिराए जाने की याद दिला देता है. तालिबानी कुछ नया नहीं कर रहे थे, वे महज इतिहास को दोहरा रहे थे.

बाइबिल में जो ‘ज्ञान’ है, उसके अलावा सभी ज्ञान पर अब पाबंदी लगा दी जाती है. बाइबिल है तो फिर विश्व प्रसिद्ध अलेक्जेंड्रिया की लाइब्रेरी की क्या जरूरत है, जहां विश्व का विविध ज्ञान भरा हुआ है. लाइब्रेरी को जलाने के लिए ईसाई कट्टरपंथियों की भीड़ निकल पड़ती है.

जब यह बात हिपेशिया और उसके चंद उन छात्रों को पता चलती है जो अभी भी विवेक को धर्म से ऊपर रखते हैं और स्वतंत्र चिंतन में विश्वास रखते हैं, तो ये लोग लाइब्रेरी से जितनी जल्दी, जितनी महत्वपूर्ण किताबें [scrolls] निकाल सकते हैं, निकाल कर दूसरी जगह पंहुचा देते हैं. शायद यही बची किताबों ने बाद में दुनिया को रोशन करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

यह फिल्म का बहुत ही सशक्त दृश्य है. ‘एरियल शाट’ का इस्तेमाल करते हुए पूरी इमेज को उलट दिया गया है. सन्देश साफ़ है कि इसके बाद सब कुछ उलट गया. दुनिया अन्धकार युग में प्रवेश कर गयी. यहां निर्देशक इस ‘विजुअल’ से यह साफ़ संकेत देता है कि जहां विज्ञान चीजों को पैरों के बल खड़ा करता है, वहीं धर्म उसे सर के बल खड़ा कर देता है.

लेकिन ‘क्लाइमेक्स’ अभी बाकी है, क्योकि हिपेशिया अभी बाकी है. और जब तक हिपेशिया बाकी है, तब तक विवेक और विज्ञान बाकी है. घने अन्धकार में दिया बाकी है. बिना इस दिए को बुझाए अन्धकार की पूर्ण विजय कैसे हो सकती है.

हिपेशिया पर ‘हबीब तनवीर’ का एक प्रसिद्ध नाटक है- ‘एक औरत हिपेशिया भी थी. उसकी यह पंक्ति देखिये- ‘हिपेशिया को रास्तों से घसीटते हुए गिरजा के अंदर ले गए. गिरजा खपरैलों से खुरच-खुरच कर उसकी खाल नोची. फिर देखा कि उसकी आंखों में जान बाकी है, तो आंखें नोच लीं. फिर उसके जिस्म का एक-एक अज्व काट कर टुकड़े-टुकड़े किया और बाहर ले जाकर उसे जला दिया.’

फिल्म में हिपेशिया की मौत को थोड़ा दूसरे तरीके से दिखाया गया है लेकिन बर्बरता वही है. इस फिल्म के निर्देशक ‘Alejandro Amenábar’ हैं जो खुद घोषित नास्तिक हैं शायद इसीलिए वे धर्म की बर्बरता को इतने सशक्त तरीके से दिखा सके.

यह फिल्म बनाते हुए उनकी नज़र आज के समाज में बढ़ती धार्मिक कट्टरता और राज्य का बहुसंख्यक धर्म से अपने को जोड़ते चले जाने पर है. यानी राज्य के बर्बर बनते चले जाने पर है.

एक तरह से यह ‘एतिहासिक सेटिंग’ की फिल्म होने के साथ ही आज के समाज की भी एक तीखी आलोचना है. आज धार्मिक राज्यों की भी वही स्थिति है, जो उस समय रोम और अलेक्जेंड्रिया की थी. चाहे वह इस्लामिक देश हों, बौद्ध धर्म वाला राज्य म्यांमार हो या हिन्दू धर्म वाला [भले ही अघोषित तौर पर] भारत हो. हर जगह हिपेशिया को चुन चुन कर मारा जा रहा है. गौरी-लंकेश, पानसारे, दाभोल जैसे लोग हिपेशिया नहीं तो और कौन हैं ?

यह फिल्म हमे सचेत करती है कि हमें एक बार फिर अन्धकार युग में जाना है या लाखों करोड़ों ‘हिपेशिया’ बनकर इस अन्धकार को चीर देना है. फैसला पूरी तरह हमारा है…

  • मनीष आज़ाद

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