
25 वर्ष की अवधि तक राज कर रही माकपा की हार हो गई विधानसभा चुनाव में. इनकी हार और उनकी जीत पर बहस हो सकती है और हो रही है. बहस इस पर भी जारी है कि कम्युनिस्ट पार्टी के लोग अपेक्षाकृत ज्यादा ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह होते हैं. भ्रष्टाचार, परिवारवाद जैसे गंभीर आरोपों से लगभग अलग भारत जैसे देश में जहां गरीबों की संख्या ज्यादा है, कम्युनिस्ट पार्टी के लोग सदा इनके पक्ष में खड़े रहते हैं, जनता के मुद्दों को मुखर रूप से उठाते रहते हैं, फिर भी व्यापक जनसमुदाय से कटते जा रहे हैं. इस पर कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को गंभीरता से सोचने की जरूरत है. कम्युनिस्ट पार्टी शासनवाले राज्य एक-एक कर इनसे छीनते चले जा रहे हैं.
बहरहाल, त्रिपुरा में माकपा का राज चला गया. वहां का नया राजा अभी गद्दीनसीं हुआ भी नहीं था कि अतातईयों ने अपने बहसीपन का नजारा पेश करना शुरू कर दिया. सर्वहारा के महान शिक्षक लेनिन की आदमकमद प्रतिमा को बुलडोजर लगाकर ध्वस्त कर दिया गया. उसी कड़ी में पेरियार व अम्बेडकर की मूर्ति को भी क्षतिग्रस्त किया गया. मैं माकपा के संसदीय क्रांति के विचार और पश्चिम बंगाल व त्रिपुरा में उसके प्रयोग से पूरी तरह असहमत हूं लेकिन त्रिपुरा में जिस तरह से हिन्दुत्व की फासीवादी ताकतों के नेतृत्व में लेनिन की मूर्ति तोड़ी जा रही है, माकपा के दफ्तरों को जलाया जा रहा है, उनके नेताओं व कार्यकर्ता को मारा-पीटा जा रहा है, उसकी जितनी भी निंदा की जाए, वह काफी कम होगा. लेनिन की प्रतिमा को तोड़कर साम्राज्यवाद अपने को बाहुबली होने को प्रमाणित करना चाह रहा है तो पेरियार, अम्बेडकर की प्रतिमा को खंडित कर ब्रह्मणवादी सामंती तत्व अपने नंगई की उपस्थिति दर्शाना चाह रहा है. यह साबित करने के लिए काफी है कि भारत एक अर्द्ध सामंती-अर्द्ध औपनिवेशिक देश है.
त्रिपुरा में जिस तरह की नंगई की गई और माकपा (सीपीएम) चुप्पी लगा गई, उससे तमाम संसदीय वामपंथियों से एक सवाल पूछा जा रहा है कि क्या सचमुच 25 साल तक तुमने सत्ता-सुख का लाभ उठाया और अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण तक नहीं दिया. लोकतंत्र के सहारे फासीवाद को हरा देने के मुगालते में रहने का नतीजा सामने है, इसलिए कायरता छोड़िए और जनता का भरोसा जीतने की पुनः शुरूआत कीजिए. एक बात याद रखिए – मौत की दया पर जीने से बेहतर है लड़ते हुए साहस के साथ मारे जाना. खुले हृदय से फासीवाद विरोधी अभियान में सबका साथ लीजिए, भले ही वह गैर-वामपंथी हो या गैर-संसदीय. आरामतलबी और फैशनेबुल क्रांतिकारी बने रहने का दिखावा करना छोड़िए. फिर से लड़ने का साहस दिखाइयें. टोकनिज्म और ऊपर की कमिटी के आदेश को नीचे किसी भी सूरत में लागू कर देने की नियति जो लंबे समय से अपनाकर रखे हुए है, उसे अब तत्काल परित्याग करना सीख जाईए. आत्मरक्षा के लिए भीख मांगना छोड़िए. फिर से लड़ने का साहस दिखाइए. जो लड़ रहे हैं, उनके साथ आईए. सड़कों पर जूझारू प्रतिरोध विकसित करने के लिए जनता को संगठित कीजिए.
– संजय श्याम
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Better said than done. मूलभूत प्रश्न है कि क्या CPIM का नीति निर्धारक कर्ता आत्म चिंतन आत्म अन्वेषण आत्म समीक्षा करेंगे और आर एस एस रूपी अजगर का मुकाबला सब के साथ मिलकर आगे बढेंगे।
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