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Home पुस्तक / फिल्म समीक्षा

आउशवित्ज – एक प्रेम कथा : युद्ध, स्त्री और प्रेम का त्रिकोण

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 6, 2023
in पुस्तक / फिल्म समीक्षा
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पुस्तक : आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा
लेखक : गरिमा श्रीवास्तव
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्‍ली
मूल्य : 399 रुपए

‘आउशवित्ज : एक प्रेम कथा’ गरिमा श्रीवास्तव का पहला उपन्यास है, जो अभी कुछ ही दिनों पहले प्रकाशित हुआ है. इस उपन्यास को पढ़ते हुए बार-बार लेखिका की क्रोएशिया प्रवास डायरी ‘देह ही देश’ की याद आती है. दोनों के मूल विषय एक-से हैं- युद्ध और स्त्री, लेकिन विधागत ट्रीटमेंट भिन्‍न है-एक डायरी और दूसरा उपन्यास. लेकिन ये दोनों ही रचनाएं विधागत सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं या कहें एक तरह का फ्यूजन करती हैं. ‘देह ही देश’ डायरी है, मगर उसमें औपन्यासिकता भी है. ‘आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा’ उपन्यास है, मगर यह डायरी, रिपोर्ट, पत्र, इंटरव्यू, आत्मकथात्मकता आदि का एक खास औपन्यासिक संयोजन है.

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‘युद्ध और स्त्री’ विषय लेखिका का अपना शोधक्षेत्र है. इस विषय पर अलग-अलग ढंग का लेखन लेखिका लगातार कर रही हैं. नस्लवाद, कट्टर राष्ट्रवाद या अन्य किस्म की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं या स्वार्थों के कारण होने वाले युद्धों में आमजन और खासकर स्त्रियों की भीषण त्रासदी पर हिंदी में बहुत कम लिखा गया है. गरिमा का लेखन इस लिहाज से एक बड़े अभाव की पूर्ति कर रहा है.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर की नात्सी सेना द्वारा यूरोपीय यहूदियों के कत्लेआम के लिए कई यातना शिविर बनाए गए, जिसमें से एक बड़ा और प्रमुख यातना शिविर जर्मनी द्वारा अधिकृत पोलैंड के आउशवित्ज़ में बनाया गया. ‘आउशवित्जः एक प्रेम कथा’ उपन्यास में लेखिका उसी आउशतवित्ज के हवाले से नात्सी यातना शिविरों और यूरोप के युद्ध कैंपों में होने वाले नृशंस नरसंहारों और दुर्दात घटनाओं की सूचनाओं को अनुभूति बनाकर पेश करती हैं.

इस उपन्यास से गुजरते हुए पाठक उन नरसंहारों और देह के साथ-साथ आत्मा तक को छलनी कर देने वाले यातना के तमाम रूपों को केवल सूचना और विवरण के तौर पर ग्रहण नहीं करता, बल्कि उनको जीने लगता है. यह उपन्यास होलोकास्ट (हिटलर की नात्सी सेना द्वारा यूरोपीय यहूदियों के कत्लेआम की घटना) के ढ़ेरों सूक्ष्म ऐतिहासिक विवरणों से भरा हुआ है.

उपन्यास में दो मुख्य कथा केन्द्र है – आउशवित्ज और बंगलादेश (हसनपुर). उपन्यास एक तरफ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यूरोपीय यहूदियों की त्रासदी से जुड़ता है तो दूसरी तरफ बंगलादेश के मुक्ति संग्राम से. इन दोनों युद्धों की परिस्थितियां, समय और मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन आमजन और खासकर स्त्री की त्रासदी एक जैसी है.

सारे युद्ध स्त्री की देह पर ही लड़े जाते हैं-गरिमा श्रीवास्तव की क्रोएशिया प्रवास डायरी ‘देह ही देश’ की इस बात को यह उपन्यास भी प्रमाणित करता है. हिटलर के यातना शिविर हों या बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम-इन सब में स्त्रियों ने सर्वाधिक दैहिक और सामाजिक शोषण झेला. स्त्रियों के शारीरिक उत्पीड़न के ऐसे-ऐसे विवरण इस उपन्यास में हैं कि मनुष्यता हजार बार शर्मसार हो जाए ! इसी उपन्यास में कथा की सूत्रधार प्रतीति सेन की नानी द्रौपदी देवी से रहमाना खातून बनने को मजबूर हो जाती है- ‘झड़प और संघर्ष पुरुषों ने शुरू किए और उसका खामियाजा भुगता औरतों ने. औरतें हिंदू बंगाली घरों की हों या बांग्लादेशी, देह उघड़ी उनकी, पहचानें बदल दी गईं, शारीरिक शोषण हर जगह-बस तरीके अलग-अलग…’.

इस उपन्यास में स्त्री-उत्पीड़न के कई प्रसंगों को पढ़ते हुए यशपाल के उपन्यास ‘झूठा सच’ और मंटो की कहानी ‘खोल दो’ की याद आती है. उपन्यास के लगभग आखिर में प्रतीति सेन की मां टिया की कहानी है. बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी कैंप में टिया और उस जैसी भूख से बिलबिलाती सैकड़ों लड़कियां जूठे भात के एक कौर के लिए, बिस्कुट और लेमनचूस के लिए अपना शरीर पाकिस्तानी फौजियों को सौंप देती थीं. उनके पास और कोई विकल्प नहीं था. इधर मैंने मिजो विद्रोह से संबंधित कुछ संस्मरणों का अनुवाद अपनी मिजो छात्राओं के साथ मिलकर किया है. उन संस्मरणों में भी ठीक इसी तरह के स्त्री-उत्पीड़न के प्रसंग मिलते हैं, जहां मिजो स्त्रियां एक मुट्ठी चावल के लिए भारतीय सेना के सिपाहियों को अपना शरीर सौंप देती हैं.

यह उपन्यास दो भिन्‍न ऐतिहासिक समयों और दो भिन्‍न भूगोल की त्रासदियों को स्त्री के उत्पीड़न और उस उत्पीड़न के प्रति भयंकर उपेक्षा के धरातल पर एक करता है. युद्ध में स्त्री की नियति जैसे सार्वभौमिक है, देशकाल की तमाम सीमाओं से परे !

इस उपन्यास में कई प्रेम कथाएं हैं, सभी अधूरी या शायद अपने अधूरेपन में भी पूरी. इन सभी प्रेम कथाओं के तार कहीं-न-कहीं युद्ध और उसमें स्त्री के दैहिक उत्पीड़न के प्रसंग से जुड़ते हैं. प्रेम-प्रसंगों के अधूरेपन की वजह असल में युद्ध और उसमें स्त्री का दैहिक उत्पीड़न ही है. दूसरे पुरुषों की भोगी हुई स्त्री, बलात्कृत स्त्री किसी तथाकथिक भद्र पुरुष की पत्नी या प्रेमिका कैसे हो सकती है !रहमाना खातून के बिराजित सेन से प्रेम और रहमाना खातून की नातिन होने के कारण प्रतीति सेन के अभिरूप से प्रेम की ट्रेजडी यही है.

उपन्यास के स्त्री-पक्ष की एक और विशेषता है. उपन्यास की सभी प्रमुख स्त्री पात्र आत्म-सम्मान के प्रति अत्यंत सजग हैं. उनके प्रेम में भी ऐन इसी कारण एक दृढ़ता है. वे प्रेम तो करती हैं और खूब शिद्दत से करती हैं, लेकिन उस प्रेम के लिए अपने आत्म-सम्मान और स्वाभिमान से कतई समझौता नहीं करतीं. ये प्रेम के बदले प्रेम चाहती हैं, महज आश्रय या ठिकाना नहीं. ये तो चाहती हैं ‘तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करती हूं.’ (कवि शमशेर के प्रति आदर के साथ उनकी पंक्ति का जेंडर बदलते हुए) रहमाना खातून हो या उसी की नातिन प्रतीति या फिर प्रतीति की पोलिश मित्र सबीना- सभी ने अपने प्रेमी के आश्रय के बदले आत्म-सम्मान और स्वाभिमान को चुना, बावजूद इसके कि वे प्रेम भी टूट कर करती रहीं, कभी भुला नहीं पाईं अपने प्रेम को. प्रेम के बदले प्रेम न मिल पाने ने उन्हें व्यथित तो बहुत किया लेकिन उन्होंने इसे अपने जीवन की सार्थकता का अंत नहीं मान लिया. अभिरूप के साथ अपने पुराने प्रेम को याद करती हुई प्रतीति कहती है- ‘अपने मन का आवरण उठाकर देखूं तो अकेलेपन ने मुझे व्यधित नहीं किया, यह कहना मिथ्या होगा. लेकिन साथ ही अकेलेपन ने मुझे वो रोशनी दी जिसमें बुझ चुकी आंखों के सपने पढ़ पाई.’ (पृ. 20) रहमाना खातून का व्यक्तित्व भयंकर परिस्थितियों के बीच से, दैहिक-मानसिक-सामाजिक पीड़ा को झेलते हुए और अपने पति बिराजित सेन द्वारा छोड़ दी जाने के बावजूद जिस तरह विकसित होता है, वह स्त्री के संघर्ष और स्वाभिमान का बेजोड़ उदाहरण है. निश्चित रूप से इस उपन्यास की कथा गहरे में स्त्री के स्वाभिमान की भी कथा है.

इस उपन्यास के संदर्भ में लेखिका के गहन शोध और इतिहास-बोध को निश्चित तौर पर रेखांकित किया जाना चाहिए. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर की नात्सी सेना का अत्याचार और 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के बिल्कुल भिन्‍न ऐतिहासिक संदर्भों को एक साथ कथा के सूत्र से जोड़ सकना और सूक्ष्म व नीरस ऐतिहासिक विवरणों को कथानक में पिरोते हुए उसे उपन्यास के शिल्प में ढालना कोई आसान काम नहीं है. लेखिका ने यह जोखिम उठाया है और बहुत हद तक इसमें सफल भी रही हैं.

उपन्यास का उत्तरार्द्ध औपन्यासिक रूप से ज्यादा प्रभावशाली बन पड़ा है. इस हिस्से में कथात्मकता भी ज्यादा है. पूर्वार्द्ध में थोड़ी विवरणात्मकता है जिससे कथात्मकता बाधित हुई है-विशेषकर नात्सी यातना शिविरों के वर्णन वाला हिस्सा और यहूदी धर्म एवं फिलिस्तीन के इतिहास वाला हिस्सा कुछ ज्यादा विवरणात्मक हो गया है. इस हिस्से में होलोकास्ट से जुड़े शोध-रिपोर्ट, यातना के शिकार लोगों के इंटरव्यू, डायरी, पत्र, संस्मरण आदि के सहारे उस पूरे परिदृश्य को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है. यद्यपि यह उपन्यास के कथानक को ठीक से समझने और उस ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ने में पाठक की मदद करता है, लेकिन इसे थोड़ी और कथात्मकता के साथ प्रस्तुत किया गया होता तो कलात्मक रूप से भी उपन्यास और अधिक प्रभावशाली हो सकता था.

इस उपन्यास के शिल्प की एक विशेषता है अतीत और वर्तमान के बीच लगातार आवाजाही. लेखिका उपन्यास में भिन्‍न-भिन्‍न नैरेटरों के जरिए लगातार इतिहास के अंधेरे कोनों में झांकती हैं और फिर बहुत बारीकी से सधे कदमों से वर्तमान में लौट आती हैं. पाठक अतीत और वर्तमान के बीच की इस यात्रा को तो महसूस करता है लेकिन इससे कथा में कहीं भी क्रम-भंग जैसी स्थिति पैदा नहीं होती. उपन्यास में एक प्रसंग ऐसा है जिसकी शब्दशः पुनरावृत्ति कुछ आगे के पृष्ठ पर हुई है. पृष्ठ संख्या 161 पर रहमाना खातून के एक मेल का प्रसंग है. उस मेल में जो बातें लिखी गई हैं, वे हू-ब-हू उपन्यास के पृष्ठ संख्या 207 पर दर्ज हैं, लेकिन यहां मेल के रूप में नहीं, रहमाना खातून के आत्मालाप के रूप में. लेखिका का ध्यान बाद में जरूर इस बात की तरफ गया होगा. उम्मीद है अगले संस्करण में इसे अवश्य ठीक कर दिया जाएगा.

यह उपन्यास अपने ढंग का एक अलग और महत्वपूर्ण उपन्यास है. हिंदी में इस तरह के उपन्यास बहुत कम हैं. ‘होलोकास्ट’ को लेकर लिखा गया संभवतः यह हिंदी का पहला उपन्यास है. लेखिका की यह बात एकदम दुरुस्त है कि ‘आउशवित्ज की कहानी को याद रखा जाना जरूरी है, हर उस आदमी के लिए जो लोकतांत्रिक मूल्यों-समता, बराबरी, न्याय में विश्वास रखना चाहता है. (पृष्ठ 217) नस्लवाद और कट्टर राष्ट्रवाद के नाम पर फैला युद्धोन्माद कितना अमानवीय और जीवन-विरोधी हो सकता है, इसे समझना और महसूस करना आज बहुत जरूरी हो गया है. उम्मीद है यह उपन्यास पाठकों की युद्ध-विरोधी संवेदना का विस्तार करेगा और तमाम संकीर्णताओं से ऊपर ‘मानुष सत्य’ में हमारी आस्था को मजबूत करेगा.

  • अमिष वर्मा 
    (पहली बार ‘हंस’ में प्रकाशित और साभार)
    संपर्क : हिंदी विभाग,
    मिजोरम विश्वविद्यालय,
    आइजोल-796004 (मिजोरम)
    मो. 9436334432

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