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भगवानों में आपस में काफी मतभेद है…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 22, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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भगवानों में आपस में काफी मतभेद है. धरती, सौर मंडल, गैलेक्सिज के पार, जहां कॉस्मॉस और विज्ञान की सीमाएं खत्म हो जाती है, उसके बाद भगवानों का इलाका शुरू हो जाता है. वहां विभिन्न प्रकार के ईश्वर रहते हैं. उनके अपने-अपने दायरे हैं, और अपनी-अपनी प्रशासनिक व्यवस्था है.

कुछ भगवान जैसे अल्लाह और परमपिता परमेश्वर, अकेले ही अपनी पूरी व्यवस्था चलाते है. इसे धरती पर ‘एकोहम द्वितीयो नास्ति वाली’ डिक्टेटररियल गवर्नमेंट से समझ सकते हैं.

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कुछ धर्म में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर वाली व्यवस्था है, जिसमें अलग-अलग कार्य करने के लिए अलग-अलग देवता डेजिग्नेटेड हैं. कैबिनेट टाइप, सब मिलकर सिस्टम एडमिनिस्टर करते हैं. हिन्दूओं की भगवानी व्यवस्था में यह सिस्टम देखा जा सकता है. ये देवता एक दूसरे का काम में दखल नहीं देते. यह भी डिक्टेटररियल ही है क्योंकि प्रशासित से कुछ नहीं पूछा जाता. एकतरफा कानून बता दिए जाते हैं.

भगवान किसी भी प्रकार के हो, उनका पूरा फोकस सौर मंडल के 9 ग्रहों में से 3 नम्बर के गोले पर 84 लाख स्पीशीज में से एक, याने ‘होमो सेपियन’ को कंट्रोल करने में रहता है. इस स्पीशीज से सभी भगवानों को खास लगाव है. डिक्टेटररियल भगवान कभी खुद सामने नहीं आये, और अपने पुत्र या मैसेंजर को अपना सेक्ट बनाने भेजा. कभी यह सुनने में नहीं आया कि उन्होंने तितलियों, वनभैसों, चित्तीदार अजगरों या सी अर्चिन को समझाने अपना पुत्र अथवा मैसेंजर भेजा हो.

बोर्ड व्यवस्था वाले भगवान थोड़े लिबरल हैं. वे स्वयं इस गोले पर आते हैं, पेंटिंग तस्वीरें बनवाते हैं. सन्देश वगैरह देते हैं, बुक्स, कमंडमेन्ट आदि लिखवाते हैं. पूरा सेक्ट तैयार करने के बाद, कंट्रोल रूम में वापस जाकर इन लोगों की निगरानी करते हैं. सभी भगवानों का निगरानी का सिस्टम बहुत तगड़ा है. वे अहर्निश, सब कुछ देखते हैं.

  • उपवास निर्जला था या फलाहार वाला- नोटेड.
  • इफ्तार में खजूर खाया, या पपीता- नोटेड. जिंदगी में आपने मांसाहारी थे, वेजिटेरियन इस पर काफी फोकस है.
  • छुपकर चिकन खाया, शराब पी- नोटेड.
  • क्या कपडे पहने, भजन के समय दिमाग में क्या बदमाशी सोच रहे थे- नोटेड.
  • अपने धर्म-जात-गोत्र वाली/वाले से प्रेम अथवा विवाह किया कि नहीं- नोटेड.
  • बूढों को सम्मान, फकीर को दान दिया या नहीं-नोटेड.
  • किसी को रुलाया, हंसाया या नहीं-नोटेड.
  • देशभक्त थे या नहीं, दूसरे धर्म, देश अथवा जाति वालों को सबक सिखाया अथवा नहीं- नोटेड.

24 घण्टे, 86400 सेकेंड ये सभी ईश्वर मनुष्य की कर्म और विचार की निगरानी करते हैं. कर्मों का हिसाब रखते हैं, अच्छे और बुरे कामों के प्लस माइनस से नेट गुड की बैलेंस शीट तैयार करते हैं. औऱ सोचते हैं- ‘ठीक है बेटा. मर एक बार, फिर तुझे बताता हूं.’ बीइंग गॉड इज रियली ए टफ जॉब.

पहले कुछ करोड़ आबादी थी. तब भगवान ने बहुत से बेकार के काम ले रखे थे. जैसे पत्तों का खड़कना, सूर्य को उगाना, हवा का चलना, धरती चांद तारों को यथास्थान रखना.

फिर आबादी बढ़ गयी तो ईश्वर ने दुनिया के व्यवस्थापन के काम ग्रेविटी, रैलेटिविटी, फिजिक्स केमिस्ट्री और सरकारों को प्राइवेटाइज कर दिये. रिसेंटली डीएनए और जीन में चेंज वगैरह भी काम से भी भगवानी नियंत्रण हटा लिया गया है. अब भगवान मोस्टली निगरानी, और पुलिसिंग का ही काम करते हैं. वे प्रार्थना करने वालों और चढ़ावा देने वालों की मनोकामना पूर्ण करते हैं.

ऐसा न करने वालों या ठीक विधि और उच्चारण के साथ न करने वालों को सजा देते हैं. सजा इमिडीएट भी होती है- जैसे चोट का लगना, एग्जाम में फेल हो जाना, व्यापार में नुकसान, नौकरी में प्रमोशन न होना, वांछित स्त्री पुरुष का प्यार न मिलना, अथवा उसका बेवफा हो जाना. लेकिन कभी-कभी नेट बैलेंस शीट के हिसाब से ऑन द स्पॉट सजा नही हो पाती. तब ईश्वर उसके लिए अलग व्यवस्था करते हैं.

उन्होंने नाजियों की तरह बकायदा यातना गृह, कॉन्सन्ट्रेशन कैम्प बना रखे हैं. उनके नाम अपने-अपने समर्थकों की पसन्द से, उन्हीं की भाषा में रखे हैं, जिससे उन्हें ट्रांसलेशन की दिक्कत न हो. वहां उपलब्ध यातनाएं, सजाएं एग्जेक्टली वही हैं, जो धरती पर उन्हें पहले ही प्रीस्ट, साधु और इमाम ने बताया हुआ है.

तो अगर बैलेंस शीट नेगेटिव हुई तब दुष्ट ईसाई मरकर हेल में जाएगा, परन्तु दुष्ट हिन्दू नरक में जायेगा. वहां 26 तरह के उपनरक है. बदमाश मुसलमान दोजख में जाता है.क्षदोजख की मेरे पास ज्यादा डिटेल नहीं है. पता होता भी, तो न कहता. पता नहीं कौन मुझे 72 अप्सरा प्राप्त करने का जरिया बना ले.

यातना सिस्टम में सिमिलरिटी देखकर लगता है कि सभी प्रकार के यातना गृहों का निर्माण एक ही बिल्डर ने किया है. सभी धर्म के भगवानों ने पूरी एक कॉलोनी बनाई हुई है. कभी आप वहां भटक जाएं, तो किसी से पूछ लें –

– कौन धर्म हो ??

– हिन्दू,

– ओके.. यहां से सीधे जाओ, राइट में दोजख पड़ेगा, उसमें तुम्हें नहीं जाना. वहां से बाएं मुड़ो, वहां इंग्लिश में ‘ओनली फ़ॉर क्रिश्चियन’ का बोर्ड लगा है, वो हेल है, उसमे मत जाना. सीधे दो किलोमीटर चलना. उस रोड पर शिंतो, बुन्तु, कम्बाला यहूदी वगैरह धर्मों के छोटे-छोटे नर्क हैं.

लास्ट में एक विशाल पंडाल मिलेगा. धोती जनेऊ में एक बन्दा बाहर हिसाब कर रहा होगा. फोटो तो देखा होगा न, यू कैन ईजिली रिकॉनॉइज चित्रगुप्त जी. तुम्हारा वाला नर्क वही है.

भगवानो में मतभेद हैं. कुछ ने आत्मा का सिस्टम रखा है, कुछ ने नहीं. आत्मा एक इनोवेटिव कॉन्सेप्ट है. इसमें फायदा यह है कि नर्क ओवरक्राउड नहीं होती. अब आप दुष्ट, पापी हो, तो आपकी आत्मा को कुत्ता बनाकर वापस अर्थ पर भेज देंगे. आप नीची जाति के मनुष्य भी बनाये जा सकते हैं, करते रहो उच्च जाति का मैला साफ…!

जिन्होंने आत्मा का सिस्टम नहीं रखा, उन्हें हर बार एक नया मनुष्य क्रिएट करना पड़ता है. वापस आयों का हिसाब करना पड़ता है. रिसाइकिलिंग के अभाव में भीड़ और मुकदमे इतने इकट्ठे हो जाते हैं कि फैसला लंबित होता जाता है. शायद इसलिए क्रिश्चियन गॉड ने अभी नर्क स्वर्ग का सिस्टम मुल्तवी रखा हुआ है. वो जजमेंट डे पर इकट्ठे ही सबका डिसाइड करेंगे.

पाप और पुण्य का सिस्टम भी डिफरेंट है. कुछ भगवान पाप और पुण्य का ट्रान्सफ़र एलाउ नहीं करते. कभी-कभी एवरेज मेंटेन करवा देते हैं, जैसे पति पापी और पत्नी पुण्यात्मा हो तो फल एवरेज होंगे. क्रिश्चियन्स में पाप का ट्रांसफर हो सकता है. ईश्वर के पुत्र ने ह्यूमैनिटी के तमाम पाप अपने सर लिए और अपने खून से उसे धोया. उन्हें सजा हमारे पापों की वजह से मिली.

भगवान को मनुष्य की जरूरत हो या नहीं. पर मनुष्य भगवान की जरूरत अवश्य है. जैसे- बौद्ध और जैन लोगों में बेसिकली ईश्वर नहीं होते. बुद्ध ने कहा- न आत्मा है, न ईश्वर है, न नर्क है, न स्वर्ग. जो है, इस धरती पर है. यही बात जैनियों में कही गई. तो हुआ क्या ? बुद्ध स्वयं ईश्वर हो गए. अवतार हो गए.

जैनियों ने तो महावीर को, उनकी शिक्षाओं को नकार दिया. कड़क रामजादे हो गए हैं. इससे व्यापार, लोन, लन्दन में फायदा होता है. वैसे तो भगवानों में कुछ बेसिक सहमति भी है. जैसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ तथा ‘भोजन के पहले घर से 40 घर दाएं और 40 घर बायें देखो, कोई भूखा न हो, तब ही भोजन करो.’

किसी को दु:ख न दो, सबसे प्रेम का व्यवहार करो. सत्य बोलो, प्रिय बोलो, किसी को मारो मत, रुलाओ मत, आह मत लो. ऐसी और भी सैकड़ों समानताएं हैं. इन समानताओं के बीच ही स्वर्ग है. भगवानों ने नर्क जरूर सेपरेट बनाए, मगर स्वर्ग साझे हैं.

स्वर्ग, जन्नत, हैवन में मोहब्बत करने वाले लोग हैं, हंसते हुए बच्चे, संतुष्ट मुस्कुराते वृद्ध है. भरपेट अन्न, करने को काम है. काम का दाम है. मीठा बोलते नेता हैं, न्याय देने वाली कोर्ट है. रहने को घर, पीने को पानी, हगने को शौचालय, नरम शय्या, एयरकंडीशनर, मच्छरदानी है.

चलने को रोड, उड़ने को जहाज है, गैस का सब्सिडाइज सिलेंडर है. कर्णप्रिय, दिल को छूने वाला संगीत है, बेहतरीन किताबें हैं, देखने को नजारे हैं. चूमने को पुत्र का माथा, बेटी के हाथ हैं. फेसबुक है, इंस्टा है, चैट और इनबॉक्स हैं. लार्जर सोसायटी है, बोलने को शब्द है, नज्म और कविताऐं है. शैम्पेन है, कैवियार है, बारिश में पकौड़े है.

अहा, मुस्कुराती हुई बीवी कॉफी बनाकर ला रही है. मगर फिर पड़ोस के टीवी से किसी की वाणी गूंजती है. ये दुनिया तो बेकार है, माया है, असत्य है. सत्य तो सिर्फ ईश्वर है और उससे भी बड़ा सत्य यह बताया जा रहा है … सारे भगवानों में आपस में काफी मतभेद है.

  • मनीष सिंह

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