Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home पुस्तक / फिल्म समीक्षा

‘NAZARIYA’ : Land Struggles in India

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 5, 2023
in पुस्तक / फिल्म समीक्षा
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
'NAZARIYA' : Land Struggles in India
‘NAZARIYA’ : Land Struggles in India
मनीष आजाद
'NAZARIYA' : Land Struggles in India

सोशल मीडिया / इंटरनेट और तेज़ी से बदलते दौर में लघु-पत्रिकाओं के सामने एक बड़ा संकट यह खड़ा हो गया है कि वे पाठकों के हाथ में पहुंचने से पहले ही बासी हो जा रही हैं. ऐसे चुनौतीपूर्ण दौर में वही पत्रिकाएं अपनी प्रासंगिकता बनाये रख सकती हैं, जो न्यूज़ (news) से ज्यादा व्यूज़ (views) पर जोर दे. और वह व्यूज़ / विश्लेषण आपको इंगेज भी करे, जमीनी संघर्ष में उतरने को प्रेरित भी करे. ऐसी ही एक शानदार पत्रिका है- ‘Nazariya’

‘नज़रिया’ अपने संपादकीय में लिखता भी है- ‘प्यारे पाठक, हम यह उम्मीद करते हैं कि आप भी इस भावना को आत्मसात करेंगे व जन संघर्षों में हिस्सेदारी करते हुए शहर और गांव के बीच की खाई को पाटने में मदद करेंगे.’

You might also like

‘कास्ट एंड रिवोलुशन’ : जाति उन्मूलन का एक क्रान्तिकारी नज़रिया

‘नो अदर लैंड’, तब जाएं तो जाएं कहां ?

‘Coup pour Coup’ (Blow for Blow) : फ्रांस के टेक्सटाइल महिला मजदूरों की कहानी

इस पत्रिका को बहुत ही कम संसाधनों में कुछ जुनूनी छात्र/नौजवान निकाल रहे है. इस पत्रिका के महत्वपूर्ण दूसरे अंक ‘Land struggles in India’ को जब ‘Jindal Global Law School’ में वहां के छात्रों ने डिस्प्ले के लिए लगाया तो जिंदल प्नशासन द्वारा न सिर्फ इसकी प्रतियां ज़ब्त कर ली बल्कि सम्बंधित छात्र को भी निलंबित कर दिया. आखिर यह कानून की कौन सी शिक्षा छात्रों को देते होंगे जहां एक पत्रिका निकलना भी गुनाह हो ? आइये, सरसरी निगाह डालते है कि इस पत्रिका में आखिर है क्या ?

पहला लेख ‘BRAHMANISM’s CHAINS ON THE LAND STRUGGLE’ है. इसमें खैरलांजी, करमचेडू, हाथरस, किल्वेंनमानी, लक्ष्मणपुर बाथे, सलवा-जुडूम जैसे जनसंहारों के विश्लेषण के बहाने यह स्थापित किया गया है कि भारत में अर्ध-सामंती अर्थव्यवस्था किस तरह दलितों को ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था के चंगुल में अभी तक बनाये हुए है, और दलितों में जमीन का बटवारा करके ही इस चंगुल को तोड़ा जा सकता है और समाज के जनवादीकरण की ओर बढ़ा जा सकता है.

इस लेख में तथाकथित धर्मगुरुओं और मंदिरों के कितनी जमीन है, इसका आंकड़ा दिया हुआ है. यह आंकड़ा आश्चर्यचकित करने वाला है- पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पास सिर्फ सात राज्यों में ही कुल 60 हजार एकड़ जमीन है. तिरुपति बालाजी ट्रस्ट के पास 8800 एकड़ जमीन है. इसके अलावा एक मजेदार तथ्य यह भी है कि भगवान बालाजी के पास DEMAT एकाउंट भी है, जिसमे वे भक्तों से स्टॉक्स और बांड्स भी स्वीकार करते हैं.

दूसरा महत्वपूर्ण लेख ‘WOMEN IN LAND STRUGGLE: HOLDING UP HALF SKY’ है. इसमें कृषि कार्यों में और जल-जंगल-जमीन के लिए चल रहे संघर्षों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया है. ओक्सफेम के एक आंकडे के माध्यम से बताया गया है कि कृषि-कार्यों का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा महिलायें निपटाती हैं, लेकिन जमीन पर उनका मालिकाना महज 13 प्रतिशत है. इस 13 प्रतिशत में भी बड़ा हिस्सा ‘बेनामी’ ही होगा.

ब्राह्मणवादी संस्कृति कैसे आदिवासियों के अंदर भी घर कर गयी है, इसका एक उदाहरण यह है कि कुछ आदिवासी समूहों में औरतों के ‘अनाज घर’ में जाने की मनाही है. माहवारी के समय भी बहुत से अपमानजनक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है. लेकिन नक्सलवाड़ी/माओवादी आंदोलनों में इन्हीं महिलाओं की शानदार भूमिका है और जहां इस आन्दोलन की जड़ें गहरी हैं, वहां, महिलाओं को बराबर बराबर जमीन बांटी गयी है और उन्हें उसका पट्टा भी दिया गया है.

कृषि में पूंजीवाद मानने वाली सीपीआई/सीपीएम से जुड़े बुद्धिजीवियों के लिए यह तथ्य पचाना मुश्किल होता है कि कृषि संबंधों में बंधुआ मजदूरी कितनी व्यापक है. तीसरा लेख ‘MAALIKANA HAQ: BONDAGE IN AGRARIAN RELATIONS कृषि में पूंजीवाद के मिथक को ध्वस्त करता है.

NSO के एक आंकड़े के अनुसार 2016 से 2021 के बीच कृषि ऋण 58 प्रतिशत बढ़ा है. प्रति ‘हॉउसहोल्ड’ इस वक़्त 74121 रूपये का ऋण है. आगे इसका विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि कैसे ऋण का यह बोझ कृषि-उत्पादकता को बाधित किये हुए है और अर्ध-सामंती जकड़न को मजबूत बनाये हुए है.

एक अन्य आंकड़े के हवाले से कहा गया है कि भारत में दलितों का 71 प्रतिशत हिस्सा भूमिहीन है. लेकिन ये दलित किसी पूंजीवादी-प्रक्रिया में भूमिहीन नहीं हुए है, बल्कि ब्राह्मणवादी-सामंतवाद ने इन्हें कभी भी जमीन नहीं दी और इसे मनुस्मृति में संहिताबद्ध करके उन्हें लम्बे समय तक भूमिहीन बनाये रखा और उनसे क्रूर तरीके से बेगार कराते रहे.

एक अन्य लेख में इससे सम्बंधित चौकाने वाला आंकड़ा दिया है कि हरियाणा जैसे समृद्ध राज्य में (कृषि में पूंजीवाद मानने वाले हरियाणा-पंजाब का ही उदाहरण देते हैं) 3 लाख से ज्यादा ‘नौकर’ (naukars) हैं, जो किसी भी पैमाने पर बंधुआ मजदूर ही हैं.

अगला महत्वपूर्ण लेख ‘GREEN REVOLUTION: IMPERIALISM’s NEW LEASE OF LIFE’ है. यह लेख इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है कि ‘उत्सा पटनायक’ जैसे कृषि में पूंजीवाद मानने वाले बुद्धिजीवी ‘ग्रीन रेवोलुशन’ को ही वह निर्णायक कारक मानते हैं, जिसके कारण कृषि में पूंजीवाद आ गया. यहां लेखक ‘ग्रीन रेवोलुशन’ के पीछे के राजनीतिक-अर्थशास्त्र को उद्घाटित करते हुए बताता है कि कैसे यह ‘रेड रेवोलुशन’ के खतरे का मुकाबला करने के लिए साम्राज्यवादियों द्वारा शुरू किया गया था.

इस लेख की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ‘हरित क्रांति’ ने पर्यावरण और जीवन को जो भारी नुकसान पहुंचाया है, उसको बखूबी दर्ज करती है. इसी क्रम में पंजाब से राजस्थान को जाने वाली उस ‘कैंसर ट्रेन’ का भी जिक्र है, जिसमें करीब 60 प्रतिशत लोग या तो कैंसर के मरीज होते हैं या उन मरीजों के सम्बन्धी.

यह लेख पढ़ते हुए मुझे भी एक सम्बंधित तथ्य याद आ गया. द्वितीय विश्व युद्ध में जो कम्पनियां युद्ध के लिए जहरीली गैस का उत्पादन करती थी, विश्व युद्ध खत्म होने के बाद उनके स्टाक में बहुत सी जहरीली गैसे बची हुई थी, जिन्हें उन्होंने ‘शान्ति काल’ में पेस्टिसाइड व सम्बंधित अन्य चीजे बनाने में खर्च की. इस लेख को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि दरअसल यह भी एक तरह का युद्ध ही है, जहां जनता धीमे-धीमे कष्ट के साथ मरती है.

हाल में आई चर्चित किताब ‘India Is Broken’ में लेखक अशोक मोदी कहते हैं कि भारत में भूमि सुधार में जो ‘लूप-होल्स’ थे वे इतने बड़े थे कि उसमें से एक ट्रैक्टर भी गुजर सकता था. इस पत्रिका का अगला लेख इसी विषय पर है- ‘BOGUS LAND REFORM AND FEUDALISM’s OFFENCIVE’

इसमें सर्वोदयी आन्दोलन ‘भूदान-ग्रामदान’ की असफलता का भी विश्लेषण किया गया है. भारतीय समाज में जमीन अभी भी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, यह इसी से पता चल जाता है कि सुप्रीम कोर्ट में 25 प्रतिशत और भारत में सभी सिविल केसों का 66 प्रतिशत जमीन से जुड़े मुद्दे हैं.

यहां भी मंदिरों के कब्ज़े में जमीन का आंकड़ा चौकाता है. सिर्फ तमिलनाडु में 36,000 मंदिरों के पास कुल 4,78,272 एकड़ जमीन है. ‘जमीन जोतने वाले को’ का नारा अभी प्रासंगिक है और समाज के जनवादीकरण की प्रक्रिया का केंद्र क्रन्तिकारी भूमि-सुधार ही है.

अगला महत्वपूर्ण लेख ‘DEVELOPMENT OF PRODUCTIVE FORCES IN INDIA’ है. इसमें लेखक ने मार्क्सवादी स्थापनाओं के आधार पर इस बात की पड़ताल की है कि भारत में उत्पादक शक्तियों के विकास में कौन-कौन सी बाधाएं हैं. इसमें ब्राह्मणवाद की विचारधारा की क्या भूमिका है और इस बंधन को कैसे ध्वस्त किया जा सकता है.

अगला लेख ‘UNCHANGING CHANGE: LOANS AND CREDIT IN AGRICULTURE’ भी काफी महत्वपूर्ण और सूचनात्मक है. लेख यह बताता है कि खेती से पैदा होने वाले अतिरिक्त का महज 10 प्रतिशत ही वापस निवेश होता है, फसल दर फसल साल दर साल इसका 90 प्रतिशत हिस्सा सूद-ब्याज, मुनाफे के रूप में खेती से बाहर निकल जाता है. और खेती अर्ध-सामंती चंगुल से बाहर नहीं निकल पाती.

इसके अलावा ‘उत्सा पटनायक’ और ‘सामीर आमीन’ की राजनीति का मूल्यांकन करता दो शानदार लेख है जो इस पत्रिका को एक नया आयाम दे देते हैं. पत्रिका अर्थपूर्ण चित्रों से सजी हुई है. शायद यह सभी चित्र बंगाल के मशहूर कलाकार ‘चित्त प्रसाद’ के हैं. चित्रकार का नाम देने से अच्छा रहता.

पत्रिका का यह अंक उन सभी के लिए एक जरूरी और संग्रहणीय अंक है, जो बेहतर भविष्य की उम्मीद लिए वर्तमान से टकराना चाहते हैं और उसे बदलना चाहते हैं. इस अंक का मूल्य महज 40 रूपये है. इसे आप इन नंबरों (8800424105, 9999945765) पर संपर्क करके प्राप्त कर सकते हैं.

पत्रिका की टीम को बहुत बहुत बधाई……!

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

आखिर राज्य में कितनी चीटियां है … ?

Next Post

गुडबाय जेलेंस्की और नाटो

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

पुस्तक / फिल्म समीक्षा

‘कास्ट एंड रिवोलुशन’ : जाति उन्मूलन का एक क्रान्तिकारी नज़रिया

by ROHIT SHARMA
June 9, 2025
पुस्तक / फिल्म समीक्षा

‘नो अदर लैंड’, तब जाएं तो जाएं कहां ?

by ROHIT SHARMA
April 16, 2025
पुस्तक / फिल्म समीक्षा

‘Coup pour Coup’ (Blow for Blow) : फ्रांस के टेक्सटाइल महिला मजदूरों की कहानी

by ROHIT SHARMA
April 2, 2025
पुस्तक / फिल्म समीक्षा

दि फर्स्ट ग्रेडर : एक मर्मस्पर्शी फिल्म

by ROHIT SHARMA
March 23, 2025
पुस्तक / फिल्म समीक्षा

‘No Other Land’: A moment of hope and solidarity

by ROHIT SHARMA
March 4, 2025
Next Post

गुडबाय जेलेंस्की और नाटो

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

IGIMS से हटाये गये सभी आऊटसोर्सिंग कर्मचारी को अविलंब वापस बहाल करो – जन अभियान, बिहार

August 1, 2022

किसान कहीं नहीं जा रहे शासकों

December 13, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.