Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

नीतीश कुमार अपने अतीत की छाया नहीं, वर्तमान की त्रासदी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 25, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
नीतीश कुमार अपने अतीत की छाया नहीं, वर्तमान की त्रासदी
नीतीश कुमार अपने अतीत की छाया नहीं, वर्तमान की त्रासदी
हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

जिस दिन नीतीश कुमार ने विधान सभा में स्कूलों की टाइमिंग को लेकर घोषणा की और एक बेलगाम नौकरशाह ने उनके इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया, उसी दिन तय हो गया कि अब वे और चाहे जो कुछ हों, नीतीश कुमार तो कतई नहीं रह गए हैं. अब वे अपने अतीत के प्रतापी व्यक्तित्व की आड़ी तिरछी छाया मात्र रह गए हैं, जो राजनीतिक जटिलताओं की वजह से फिलहाल भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने हुए हों लेकिन उनका प्रताप खत्म हो चुका है.

विश्लेषक कयास लगा रहे हैं कि इस आम चुनाव में बिहार में एनडीए की सीटें 2019 के मुकाबले घटेंगी. उनमें जद यू भाजपा के मुकाबले अधिक घटेगा. जद यू की इस सिकुड़न में नीतीश कुमार के निस्तेज होने की बड़ी भूमिका होगी. जद यू तो नीतीश कुमार के आभा मंडल और उनके द्वारा रचे गए राजनीतिक-जातीय समीकरणों के इर्द गिर्द सांस लेता एक कृत्रिम राजनीतिक दल है, जिसकी कोई वैचारिकता कभी नहीं रही. लालू विरोध के नाम पर संघ और भाजपा की छाया में पनपा, कभी मोदी विरोध के नाम पर लालू की छतरी तले आशियाना बनाता.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

पिछडावाद के दबंग यादववाद में तब्दील होने पर अन्य शक्तिशाली पिछड़ी जमातों की राजनीतिक कुंठाओं और अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति नीतीश कुमार के राजनीतिक विकास के माध्यम से हुई, जिसे अति पिछड़ी जातियों के समर्थन ने विस्तार दिया. इस तरह नीतीश के नेतृत्व में बिहार ने लालू राज के दुःस्वपनों से आगे बढ़ते हुए एक नए दौर का आगाज देखा और क्या खूब देखा.

नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा अदभुत रही. किसी पतली रस्सी पर चलते हुए गजब का संतुलन साधते जिस तरह उन्होंने भाजपा और राजद नामक दो ध्रुवों के बीच अपनी अपरिहार्यता स्थापित की वह राजनीति की बिसात पर उन्हें माहिर खिलाड़ी बनाता है. बिहार की जाति आधारित राजनीति में उन्होंने साबित किया कि अपनी छवि, अपनी क्षमता और अपनी गोटियों का सही समय पर सही इस्तेमाल करके कोई ऐसा नेता भी राज्य के शीर्ष पर काबिज हो सकता है, न सिर्फ काबिज हो सकता है बल्कि शासन करने की अवधि का रिकार्ड कायम कर सकता है जिसकी अपनी जाति की भागीदारी महज दो ढाई प्रतिशत हो. यह तथ्य बिहार की जड़ जातीय छवि को तोड़ता यहां की राजनीति का एक प्रगतिशील चेहरा सामने लाता है.

अपने दौर में नीतीश कुमार किसी दंतकथा के नायक की तरह चमक बिखेरते थे. बेहतरीन प्रशासक, विजनरी विकास पुरुष, राजनीतिक शतरंज के माहिर गोटीबाज, व्यक्तिगत तौर पर असंदिग्ध रूप से ईमानदार. वह दौर ऐसा था जब बिहार ऐसे किसी नेता की प्रतीक्षा में था. नीतीश ने इस स्पेस को भरा. न सिर्फ भरा, बल्कि इतिहास का निर्माण किया. बिहार के इतिहास में इक्कीसवीं सदी के शुरुआती ढाई दशकों को भविष्य में ‘नीतीश युग’ की संज्ञा दी जाएगी.

अब जब, इतिहास किसी ‘युग’ का नीर क्षीर विवेचन करेगा तो कई अप्रिय स्थापनाएं भी सामने आएंगी जिन्हें लेकर वैचारिक कोलाहल होगा. मसलन, नीतीश कुमार इस बात के जिम्मेदार ठहराए जाएंगे कि बिहार की राजनीति में हाशिए पर रही भाजपा को उन्होंने केंद्र में आने का और व्यापक होने का बेहतरीन मौका दिया, नौकरशाही को लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अतिक्रमण कर मनबढू बनने की नाजायज छूट दी,

नीतीश राज में भले ही संगठित अपराध पर लगाम लगा लेकिन संगठित भ्रष्टाचार इतना बढ़ा जिसकी मिसाल नहीं मिलती. नौकरशाही के तलवों तले शिक्षा का तंत्र पहले मशीनी बना फिर जर्जर होते ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच गया आदि-आदि.

नीतीश कुमार का अतीत गौरवमय रहा है, वर्तमान त्रासद और कई मायनों में उनकी गरिमा के प्रतिकूल रहा है और भविष्य में इतिहास उन्हें किस तरह विश्लेषित करेगा यह इस पर निर्भर करेगा कि इतिहासकार अपने नजरिए का सिरा किधर से पकड़ता है.

कभी टीवी के स्क्रीन पर नीतीश के ऊर्जावान व्यक्तित्व की आभा उनके भाषणों को उत्साहपूर्ण बनाती थी, उम्मीदों से जोड़ती थी, भरोसा पैदा करती थी. आज उनकी निस्तेज छवि उनके प्रशंसकों के मन को तोड़ती है, उनकी उम्मीदों को खत्म करती है. पटना में मोदी के रोड शो में बुझे हुए चेहरे के साथ किसी झुनझुने की तरह कमल छाप वाले स्टिकर को बेमन से पकड़े, झुलाते नीतीश अपने अतीत की छाया भी नहीं, वर्तमान की त्रासदी बयान करते प्रतीत हो रहे थे.

नीतीश कुमार की इस हालत ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि बावजूद राजनीतिक अवसरवाद के बोलबाले के, वैचारिकता आज भी राजनीति के लिए एक ठोस चीज है और अगर आप बड़े राजनेता हैं तो यह आपके व्यक्तित्व के लिए और अधिक अपरिहार्य है. सुशासन अपने आप में नारा तो हो सकता है, वोट पाने का आधार भी हो सकता है लेकिन यह वैचारिकता का स्थानापन्न नहीं हो सकता.

यही वह बिंदु है जहां अपनी तमाम कमियों के बावजूद लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसों से अलग दिखते हैं और निश्चित रूप से इतिहास में उनसे एक बड़ा स्थान घेरते हैं. हर राजनेता जो कभी सूर्य की तरह चमकता है वह एक दिन अस्त भी होता है लेकिन अस्त होने की भी अपनी गरिमामयी प्रक्रिया होती है. नीतीश कुमार भी अस्त होने की अपरिहार्य प्रक्रिया से गुजर रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य से वे उस गरिमा को मिस कर रहे हैं, जो उन्हें मिस नहीं करनी चाहिए थी.

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

इजरायल द्वारा फिलिस्तीनी जनता पर किये जा रहे हमलों से उत्पन्न मानवीय त्रासदी

Next Post

पीयूसीएल की प्रेस कॉन्फ्रेंस : चौसा के सैकड़ों किसानों के ऊपर पुलिसिया हिंसा की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच हो !

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

पीयूसीएल की प्रेस कॉन्फ्रेंस : चौसा के सैकड़ों किसानों के ऊपर पुलिसिया हिंसा की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच हो !

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

जैसे-जैसे लोकतंत्र खत्म किया जा रहा है, नेहरू और ज्यादा प्रासंगिक होते जा रहे हैं

November 18, 2021

भीषण गर्मी में एयर वॉशर न चलाए जाने के कारण बेलसोनिका में प्लांट के अंदर मज़दूरों का विरोध प्रदर्शन

April 15, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.