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नगरीकरण और पूंजीवाद के कारण भाषाओं का अस्तित्व खतरे में

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 14, 2024
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नगरीकरण और पूंजीवाद के कारण भाषाओं का अस्तित्व खतरे में
नगरीकरण और पूंजीवाद के कारण भाषाओं का अस्तित्व खतरे में
जगदीश्वर चतुर्वेदी

आज 14 सितम्बर है. सारे देश में केन्द्र सरकार के दफ्तरों में हिन्दी दिवस का दिन है. सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती. सरकार की नज़र प्रचार पर होती है. वह जितना हिन्दीभाषा में काम करती है, उससे ज्यादा ढ़ोल पीटती है. सरकार को भाषा से कम प्रचार से ज्यादा प्रेम है. हम लोग प्रचार को हिंदी प्रेम और हिंदी सेवा समझते हैं.

सवाल यह है दफ्तरी हिन्दी को प्रचार की जरूरत क्यों है ? जलसे की जरूरत क्यों है ? भाषा हमारे जीवन में रची-बसी होती है. अंग्रेजी पूरे शासनतंत्र में रची-बसी है, उसको कभी प्रचार की या हिन्दी दिवस की तरह अंग्रेजी दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई. भाषा को जब हम जलसे का अंग बनाते हैं तो राजनीतिक बनाते हैं. छद्म भाषायी उन्माद पैदा करने की कोशिश करते हैं.

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हिन्दी दिवस की सारी मुसीबत यहीं पर है. यही वह बिन्दु है जहां से भाषा और राजनीति का खेल शुरू होता है. भाषा में भाषा रहे, जन-जीवन रहे, लेकिन अब उलटा हो गया है. भाषा से जन-जीवन गायब होता जा रहा है. हम सबके जन-जीवन में हिन्दी भाषा धीरे धीरे गायब होती जा रही है, दैनंदिन लिखित आचरण से हिन्दी कम होती जा रही है.

भाषा का लिखित आचरण से कम होना चिन्ता की बात है. हमारे लिखित आचरण में हिन्दी कैसे व्यापक स्थान घेरे यह हमने नहीं सोचा, उलटे हम यह सोच रहे हैं कि सरकारी कामकाज में हिन्दी कैसे जगह बनाए. यानी हम हिन्दी को दफ्तरी भाषा के रूप में देखना चाहते हैं ! मीडिया भाषा के रूप में देखना चाहते हैं.

हिन्दी सरकारी भाषा या दफ्तरी भाषा नहीं है. हिन्दी हमारी जीवनभाषा है, वैसे ही जैसे बंगला हमारी जीवनभाषा है. हम जिस संकट से गुजर रहे हैं, बंगाली भी उसी संकट से गुजर रहे हैं. अंग्रेजी वाले भी संभवतः उसी संकट से गुजर रहे हैं. आज सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं. हमने विलक्षण खांचे बनाए हुए हैं. हम हिन्दी का दर्द तो महसूस करते हैं लेकिन बांग्ला का दर्द महसूस नहीं करते. भाषा और जीवन में अलगाव बढ़ा है. इसने समूचे समाज और व्यक्ति के जीवन में व्याप्त तनावों और टकरावों को और भी सघन बना दिया है.

इन दिनों हम सब अपनी-अपनी भाषा के दु:खों में फंसे हुए हैं. यह सड़े हुए आदमी का दु:ख है. नकली दु:ख है. यह भाषा प्रेम नहीं, भाषायी ढ़ोंग है. यह भाषायी पिछड़ापन है. इसके कारण हम समग्रता में भाषा के सामने उपस्थित संकट को देख ही नहीं पा रहे.

हमारे लिए आज महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भाषा और समाज का अलगाव कैसे दूर करें, हमारे लिए जरूरी हो गया है कि सरकारी भाषा की सूची में अपनी भाषा को कैसे बिठाएं. सरकारी भाषा का पद जीवन की भाषा के पद से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है और यही वह बुनियादी घटिया समझ है, जिसने हमें अंधभाषा प्रेमी बना दिया है. हिन्दीवाला बना दिया है. यह भावबोध सबसे घटिया भावबोध है. यह भावबोध भाषा विशेष के श्रेष्ठत्व पर टिका है.

हम जब हिन्दी को या किसी भी भाषा को सरकारी भाषा बनाने की बात करते हैं तो भाषाय़ी असमानता की हिमायत कर रहे होते हैं. हमारे लिए सभी भाषाएं और बोलियां समान हैं और सबके हक समान हैं. लेकिन हो उलटा रहा है. तेरी भाषा-मेरी भाषा के क्रम में हमने भाषायी विद्वेष को पाला-पोसा है. प्रतिस्पर्धा पैदा की है. बेहतर यही होगा कि हम भाषायी विद्वेष से बाहर निकलें.

जीवन में भाषा प्रेम पैदा करें. सभी भाषाओं और बोलियों को समान दर्जा दें. किसी भी भाषा की निंदा न करें, किसी भी भाषा के प्रति विद्वेष पैदा न करें. दुःख की बात है हमने भाषा विद्वेष को अपनी संपदा बना लिया है.

हम सारी जिन्दगी अंग्रेजी भाषा से विद्वेष करते हैं और अंग्रेजी का ही जीवन में आचरण करते हैं. हमने कभी सोचा नहीं कि विद्वेष के कारण भाषा समाज में आगे नहीं बढ़ी है. प्रतिस्पर्धा के आधार पर कोई भी भाषा अपना विकास नहीं कर सकती. भाषा का विकास शिक्षा से होता है. शिक्षा में हिंदी पिछड़ गयी है. फलत: समाज में भी पिछड़ गयी है.

मेरे लिए हिन्दी जीवन की भाषा है. इसके बिना मैं जी नहीं सकता. मैं सब भाषाओं और बोलियों से वैसे ही प्यार करता हूं जिस तरह हिन्दी से प्यार करता हूं. हिन्दी मेरे लिए रोजी-रोटी की और विचारों की भाषा है. भाषा का संबंध आपके आचरण और लेखन से है, राजनीति से नहीं. भाषा में विचारधारा नहीं होती. भाषा किसी एक समुदाय, एक वर्ग, एक राष्ट्र की नहीं होती, वह तो पूरे समाज की सृष्टि होती है. यहां मुझे रघुवीर सहाय की कविता ‘भाषा का युद्ध’ याद आ रही है. उन्होंने लिखा –

जब हम भाषा के लिये लड़ने के वक़्त
यह देख लें कि हम उससे कितनी दूर जा पड़े हैं
जिनके लिये हम लड़ते हैं
उनको हमको भाषा की लड़ाई पास नहीं लाई
क्या कोई इसलिये कि वह झूठी लड़ाई थी
नहीं बल्कि इसलिए कि हम उनके शत्रु थे
क्योंकि हम मालिक की भाषा भी
उतनी ही अच्छी तरह बोल लेते हैं
जितनी मालिक बोल लेता है
वही लड़ेगा अब भाषा का युद्ध
जो सिर्फ़ अपनी भाषा बोलेगा
मालिक की भाषा का एक शब्द भी नहीं
चाहे वह शास्त्रार्थ न करे जीतेगा
बल्कि शास्त्रार्थ वह नहीं करेगा
वह क्या करेगा अपने गूंगे गुस्से को वह
कैसे कहेगा ? तुमको शक है
गुस्सा करना ही
गुस्से की एक अभिव्यक्ति जानते हो तुम
वह और खोज रहा है तुम जानते नहीं.

जब बाजार में कम्प्यूटर आया तो मैंने सबसे पहले उसे खरीदा. संभवतः बहुत कम हिन्दी शिक्षक और हिन्दी अधिकारी थे, जो उस समय कम्प्यूटर इस्तेमाल करते थे. मैंने कम्प्यूटर की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली. मैं कम्प्यूटर के तंत्र को नहीं जानता, लेकिन मैंने अभ्यास करके कम्प्यूटर पर लिखना सीखा. अपनी लिखने की आदत बदली, कम्प्यूटर पर पढ़ने का अभ्यास डाला.

कम्प्यूटर आने के बाद से मैंने कभी हाथ से नहीं लिखा. अधिकांश समय किताबें भी डिजिटल में ही पढ़ता हूं. जब आरंभ में लिखना शुरू किया, तो उस समय यूनीकोड फॉण्ट नहीं था, कृति फॉण्ट था, उसमें ही लिखता था. बाद में जब पहली बार ब्लॉग बनाया तो पता चला कि इंटरनेट पर यूनीकोड फॉण्ट में ही लिख सकते हैं और फिर मंगल फॉण्ट लिया. फिर लिखने की आदत बदली और आज मंगल ही मंगल है.

कहने का आशय यह कि हिन्दी या किसी भी भाषा को विकसित होना है तो उसे लेखन के विकसित तंत्र का इस्तेमाल करना चाहिए. भाषा लेखन से बदलती है, समृद्ध होती है. भाषा बोलने मात्र से समृद्ध नहीं होती. भाषा समृद्ध होती है लिखने से, लिखो और खासकर यूनीकोड फॉण्ट के जरिए हिन्दी पढ़ो-लिखो, तब हिंदी का प्रसार होगा.

हिन्दी के अधिकांश मास्टर और हिन्दी अधिकारी हिन्दी में एसएमएस तक नहीं करते. मोबाइल में आधार भाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग तक नहीं करते. मोबाइल का भाषा सिस्टम बदलो, हिन्दी को ताकतवर बनाओ.

हिन्दी के 11 कटु सत्य

  1. हिन्दीभाषी अभिजन की हिन्दी से दूरी बढ़ी है.
  2. राजभाषा हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है लेकिन उसका भाषायी, सांस्कृतिक, अकादमिक और प्रशासनिक रिटर्न बहुत कम है.
  3. इस दिन केन्द्र सरकार के ऑफिसों में मेले-ठेले होते हैं और उनमें यह देखा जाता है कि कर्मचारियों ने साल में कितनी हिन्दी लिखी या उसका व्यवहार किया. हिन्दी अधिकारियों में अधिकतर की इसके विकास में कोई गति नजर नहीं आती. संबंधित ऑफिस के अधिकारी भी हिन्दी के प्रति सरकारी भाव से पेश आते हैं. गोया, हिन्दी कोई विदेशी भाषा हो.
  4. केन्द्र सरकार के ऑफिसों में आधुनिक कम्युनिकेशन सुविधाओं के बावजूद हिन्दी का हिन्दीभाषी राज्यों में भी न्यूनतम इस्तेमाल होता है.
  5. हिन्दीभाषी राज्यों में और 10 वीं और 12वीं की परीक्षाओं में अधिकांश हिन्दीभाषी बच्चों के असंतोषजनक अंक आते हैं. हिन्दी भाषा अभी तक उनकी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है.
  6. राजभाषा संसदीय समिति और उसके देश-विदेश में हिन्दी की निगरानी के लिए किए गए दौरे भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े अपव्ययों में से एक है.
  7. विगत 74 सालों में हिन्दी में पठन-पाठन, अनुसंधान और मीडिया में हिन्दी के बौद्धिक स्तर में तेजी से गिरावट आई है.
  8. राजभाषा संसदीय समिति की सालाना रिपोर्ट अपठनीय और बोगस होती हैं.
  9. केन्द सरकार के किसी भी मंत्रालय में मूल बयान कभी हिन्दी में तैयार नहीं होता. सरकारी दफ्तरों में हिन्दी मूलतः अनुवाद की भाषा है.
  10. हिन्दी दिवस के बहाने भाषायी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिला है इससे भाषायी समुदायों में तनाव पैदा हुआ है. हिन्दी भाषी क्षेत्र की अन्य बोलियों और भाषाओं की उपेक्षा हुई है.
  11. सारी दुनिया में आधुनिकभाषाओं के विकास में भाषायी पूंजीपतिवर्ग या अभिजनवर्ग की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. हिन्दी की मुश्किल यह है कि हिन्दीभाषी पूंजीपतिवर्ग का अपनी भाषा से प्रेम ही नहीं है जबकि यह स्थिति बंगला, मराठी, तमिल. मलयालम, तेलुगू आदि में नहीं है. वहां का पूंजीपति अपनी भाषा के साथ जोड़कर देखता है. हिन्दी में हिन्दी भाषी पूंजीपति का परायी संस्कृति और भाषा से याराना है.

हमारी हिंदी शीर्षक में रघुवीर सहाय लिखते हैं –

हमारी हिंदी एक दुहाजू की नई बीबी है
बहुत बोलने वाली बहुत खानेवाली बहुत सोनेवाली
गहने गढ़ाते जाओ
सर पर चढ़ाते जाओ
वह मुटाती जाए
पसीने से गन्धाती जाए घर का माल मैके पहुंचाती जाए
पड़ोसिनों से जले कचरा फेंकने को लेकर लड़े
घर से तो ख़ैर निकलने का सवाल ही नहीं उठता
औरतों को जो चाहिए घर ही में है
एक महाभारत है एक रामायण है तुलसीदास की भी राधेश्याम की भी
एक नागिन की स्टोरी बमय गाने
और एक खारी बावली में छपा कोकशास्त्र
एक खूसट महरिन है परपंच के लिए
एक अधेड़ खसम है जिसके प्राण अकच्छ किये जा सकें
एक गुचकुलिया-सा आँगन कई कमरे कुठरिया एक के अंदर एक
बिस्तरों पर चीकट तकिए कुरसियों पर गौंजे हुए उतारे कपड़े
फ़र्श पर ढंनगते गिलास
खूंटियों पर कुचैली चादरें जो कुएं पर ले जाकर फींची जाएंगी
घर में सबकुछ है जो औरतों को चाहिए
सीलन भी और अंदर की कोठरी में पांच सेर सोना भी
और संतान भी जिसका जिगर बढ गया है
जिसे वह मासिक पत्रिकाओं पर हगाया करती है
और ज़मीन भी जिस पर हिंदी भवन बनेगा
कहनेवाले चाहे कुछ कहें
हमारी हिंदी सुहागिन है सती है खुश है
उसकी साध यही है कि खसम से पहले मरे
और तो सब ठीक है पर पहले खसम उससे बचे
तब तो वह अपनी साध पूरी करे

मोदी सरकार का नकली हिन्दी प्रेम

लेखकों-बुद्धिजीवियों में एक बड़ा तबका है, जो हिन्दी के नाम पर सरकारी मलाई खाता रहा है. इनमें वे लोग भी हैं जो कहने को वाम हैं, इनमें वे भी हैं जो सोशलिस्ट हैं, ये सब मोदी के हिन्दीप्रेम के बहाने सरकारी मलाई के आनंद-विनोद में ‘मोदी ही हिन्दी है और हिन्दी ही मोदी है’, कहकर मोदी के हिन्दीराग में शामिल होने जा रहे हैं.

सब जानते हैं कि मोदी को हिन्दी से कोई लगाव नहीं है. संघ को भी हिन्दी से कोई खास लेना-देना नहीं है. अधिकांश समर्थ संघियों के बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने जाते हैं. संघ और उनके नेताओं के लिए हिन्दी का जनता के सामने प्रतीकात्मक महत्व है. हिन्दी उनके हिन्दू राष्ट्रवाद के पैकेज का हिस्सा है. अब इस राष्ट्रवाद को विकास के नाम से बेचा जा रहा है. यहां सोवियत अनुभव को समझने की जरुरत है.

सोवियत संघ आज अनेक देशों में विभाजित हो चुका है. इस विभाजन के अनेक कारणों की चर्चा हुई है लेकिन एक कारण की ओर कम ध्यान गया है. सोवियत संघ में स्टालिन के जमाने में समूचे देश में रुसी भाषा को अन्य जातियों पर थोपा गया और अन्य जातीय भाषाओं की उपेक्षा की गयी. इसके कारण अंदर ही अंदर भाषायी तनाव बना रहा. हमारे बहुत सारे विचारक यह मान रहे थे कि सोवियत संघ में जातीय समस्या हल कर ली गयी लेकिन असल में रुसी भाषा को सभी जातीयताओं पर थोपकर जो क्षति अन्य भाषाओं की हुई उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया.

भारत में आजादी मिलने के बाद यह समस्या सामने आई कि देश किस भाषा में काम करे और केन्द्र किस भाषा में काम करे. इसका समाधान त्रिभाषा फार्मूले के आधार पर निकाला गया. मोदी सरकार यदि त्रिभाषा फार्मूले को नहीं मानती है तो उसे पहले संसद में जाकर त्रिभाषा फार्मूले का विकल्प पेश करके पास कराके लाना चाहिए.

नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दफ्तर के सभी काम हिन्दी में करने का फैसला लिया है. यह हिंदी प्रेमी के नाते स्वागतयोग्य कदम है लेकिन इसके राजनीतिक परिणामों पर भी हमें नजर रखनी होगी. रुसी भाषा के दुष्परिणामों को सोवियत संघ भोग चुका है और कई देशों में विभाजित हो चुका है. प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज की हिन्दी यदि मुख्य भाषा होगी तो फिर देश की अन्य भाषाओं का क्या होगा ? उन गैर हिंदी भाषाओं का क्या होगा जिनके लोगों ने भाजपा और उनके सहयोगियों को वोट दिया है ?

सवाल यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में हिन्दी में कामकाज पर मुख्यबल देने के पीछे राजनीतिक मकसद क्या है ? प्रधानमंत्री कार्यालय कोई व्यक्तिगत दफ्तर नहीं है. यह मोदीजी का निजी दफ्तर भी नहीं है. यह प्रधानमंत्री कार्यालय है. किस भाषा में काम होगा या होना चाहिए यह प्रचार की नहीं व्यवहार की चीज है. नीति की चीज है. यदि हिन्दी में काम होता है तो यह जरुरी है कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों के साथ प्रधानमंत्री का पत्राचार उनकी भाषा में ही हो. सिर्फ हिंदी में नहीं.

मसलन, प्रधानमंत्री की कोई चिट्ठी आंध्र या तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को भेजी जानी है तो वह संबंधित मुख्यमंत्रियों की भाषा में जाए, तब तो भाषाओं के बीच में समानता पैदा होगी. लेकिन यदि पत्र हिंदी में जाएगा तो तनाव पैदा होगा. देश में विभाजन के स्वर मुखर होंगे. फिलहाल मीडिया में जिस तरह प्रधानमंत्री कार्यालय की कामकाजी भाषा हिंदी किए जाने की खबरें जारी की गयी हैं, उसमें बहुसंख्यकवाद के भाषायी मॉडल के लक्षण अभिव्यंजित हो रहे हैं.

बहुसंख्यकवाद और हिंदी एक-दूसरे के सहज ही जुडवां भाई भी बन जाते हैं और वह सहज ही अपने आप में विभाजनकारी दिशा ग्रहण कर सकते हैं. हम चाहते हैं कि मोदी सरकार पहले यह तय करे कि वह त्रिभाषा फार्मूले को मानती है या नहीं ? भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इस बावत कुछ भी साफ नहीं है. मोदी सरकार यदि त्रिभाषानीति को नहीं मानती तो नया विकल्प सुझाए. देश में आम राय बनाए.

मोदी-भक्त प्रतीकों और उन्मादी तर्कों के जरिए हिन्दी भाषा को लेकर सतही बहसों को उछाल रहे हैं. हिन्दी पर बातें विद्वानों के आप्तवचनों के जरिए न करके व्यवहार में देखकर करें. मोदी-भक्त नेट पर भाषा के सवाल को नेता की अभिव्यक्ति की भाषा का सवाल बनाकर पेश कर रहे हैं.

भाषा का सवाल नेता की अभिव्यक्ति का सवाल नहीं है. भाषा हमारे सामाजिक जीवन की प्राणवायु है. नेता किस भाषा में बोलते हैं, आईएएस किस भाषा में बोलते हैं, इससे भाषा समृद्ध नहीं होती. भाषा समृद्ध होती है तब जब उसकी शिक्षा लेते हैं. हिन्दी की दशा सबसे ज्यादा हिन्दी भाषी राज्यों में खराब है. सबसे खराब ढांचा है शिक्षा-दीक्षा का.

देश को कौन चला रहा है ? व्यापारी या बाजार की शक्तियां चला रही हैं या केन्द्र सरकार ? कमाल के तर्कशास्त्री हैं हिंदी में. वे मोदी से हिंदी के उत्थान की उम्मीद कर रहे हैं. मित्रों ! पहले देश के व्यापारियों को खासकर हिन्दी व्यापारियों को हिन्दी में व्यापार के खाते-वही लिखने के लिए राजी कर लो. इन व्यापारियों में बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा का लंबे समय से वोटर भी है.

हिन्दी राष्ट्रोन्माद पैदा करने की भाषा नहीं है. यह दैनंदिन जीवन की भाषा है लेकिन हिन्दी भाषी व्यापारी लंबे समय से हिन्दी में काम करना बंद कर चुके हैं. कब से उन लोगों ने हिन्दी में काम करना बंद किया यह पता करें. क्यों बंद किया यह भी पता करें. हिंदी का सबसे पहले बाजार की शक्तियों के बीच में व्यवहार होना चाहिए. व्यापारी के कामकाज में व्यवहार होना चाहिए. पता करें जिस दुकान से सामान खरीद रहे हैं, उसका बिल किस भाषा में है ?

सवाल यह है व्यापारियों ने अपनी भाषा में काम करना क्यों बंद कर दिया ? कारपोरेट घराने नौकरी के लिए देशज भाषाओं की उपेक्षा क्यों करते हैं ? क्या यहां पर देशभक्ति की मांग करना नाजायज है ? ध्यान रहे पूंजीवाद भाषाओं का शत्रु है. पूंजीपतिवर्ग का देशज भाषाओं के साथ बैर है. ऐसे में कारपोरेट घरानों के नुमाइंदे चाहे मोदी हों या मनमोहन हों, इनसे देशज भाषाओं की रक्षा की उम्मीद करना बेमानी है. भाषा उनके लिए प्रतीकात्मक कम्युनिकेशन से ज्यादा महत्व नहीं रखती.

मोदी एंड कंपनी यदि हिंदी से प्यार करती है और हिंदी को यदि सम्मान दिलाना चाहते हैं तो हिंदी भाषी शिक्षित मध्यवर्ग और व्यापारी-पूंजीपतिवर्ग के कार्य व्यापार की भाषा बनाओ. हिंदी में असभ्यता प्रदर्शन बंद करो.

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