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झारखंड उच्च न्यायालय में केंद्र ने माना कि संथाल परगना में हाल के ज़मीन विवाद के मामलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का जुड़ाव नहीं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 14, 2024
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झारखंड उच्च न्यायालय में केंद्र ने माना कि संथाल परगना में हाल के ज़मीन विवाद के मामलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का जुड़ाव नहीं
झारखंड उच्च न्यायालय में केंद्र ने माना कि संथाल परगना में हाल के ज़मीन विवाद के मामलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का जुड़ाव नहीं

झारखंड जनाधिकार महासभा सिमडेगा जिला संयोजक सह ठेठईटांगर जिप सदस्य अजय एक्का ने आज प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठ मामले में झारखंड उच्च न्यायलय में केंद्र सरकार ने 12 सितम्बर 2024 को दर्ज हलफ़नामा में माना है कि हाल के ज़मीन विवाद के मामलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का जुड़ाव स्थापित नहीं हुआ है. उच्च न्यायलय में भाजपा कार्यकर्ता द्वारा दर्ज PIL में दावा किया गया था कि बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा आदिवासियों से शादी कर ज़मीन लूटी जा रही है और बंग्लादेशियों की घुसपैठ हो रही है.

हाल के दिनों में भाजपा लगातार प्रचार कर रही है कि संथाल परगना में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए आ रहे हैं, जो आदिवासियों की ज़मीन हथिया रहे है, आदिवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं और आदिवासियों की जनसंख्या कम हो रही है. क्षेत्र में कई हिंसा व ज़मीन विवाद की घटनाओं को भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ जोड़ा. केंद्र सरकार के हलफनामे ने भाजपा द्वारा इन स्थानीय विवादों को बांग्लादेशी घुसपैठ का रंग देने के खेल को उजागर कर दिया है. झारखंड जनाधिकार महासभा व लोकतंत्र बचाओ अभियान ने इन सभी मामलों के विस्तृत तथ्यांवेंशन में भी यही पाया था कि स्थानीय ज़मीन व परिवारों/समुदायों के निजी विवाद के मामलों को भाजपा बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ जोड़ कर फैला रही थी.

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केंद्र ने हलफनामे में यह भी कहा है कि पश्चिम बंगाल से सटे पाकुड़ व साहिबगंज से घुसपैठ होने की आशंका है, लेकिन इस सम्बन्ध में किसी प्रकार का प्रमाण नहीं दिया है. साथ ही, हलफनामे में आंकड़ों को गलत व्याख्यान कर के यह बताया गया है कि संथाल परगना में हिन्दुओं की संख्या में व्यापक गिरावट हुई है. यह कहा गया है कि 1951 में क्षेत्र की कुल जनसंख्या 23.22 लाख थी जिसमें हिन्दुओं की आबादी 90.37% थी, मुसलमानों की 9.43% व ईसाईयों की 0.18%. कुल 23.22 लाख आबादी में आदिवासी 44.67% थे. यह कहा गया है कि 2011 में हिन्दुओं की जनसंख्या का अनुपात घट के 67.95% हो गया.

मज़ेदार बात है कि हलफ़नामे में यह नहीं बताया गया है कि 1951 जनगणना में केवल 6 धर्म कोड में जनगणना की गयी थी (हिंदू, इस्लाम, सिख, ईसाई, जैन व बुद्धिस्ट) एवं आदिवासियों को हिंदू में ही डाल दिया गया था. जबकि 2011 में अनेक आदिवासियों ने अपने को ‘अन्य/सरना’ में लिखित रूप में दर्ज किया था.

हलफ़नामे में आदिवासियों, जो मुसलमान या इसाई नहीं हैं, उन्हें चुपके से हिंदू मान लिया गया है. आदिवासियों के स्वतंत्र धार्मिक पहचान को न मान के उन्हें हिंदू बनाने की भाजपा व केंद्र सरकार की राजनीति इसमें झलकती है. तथ्य यह है कि अगर केवल गैर-आदिवासी हिन्दुओं की संख्या लें, तो वे 1950 में 1011396 (43.56%) थे जो 2011 में बढ़ के 3425679 (49.16%) हो गए थे.

जनगणना आंकड़ों के अनुसार 1951 से 2011 के बीच हिन्दुओं की आबादी 24 लाख बढ़ी है, मुसलमानों की 13.6 लाख और आदिवासियों की 8.7 लाख. कुल जनसंख्या के अनुपात में आदिवासियों का अनुपात 46.8% से घटकर 28.11% हुआ है, मुसलमानों का अनुपात 9.44% से बढ़कर 22.73% व हिंदू 43.5% से बढ़कर 49% हुए हैं. आदिवासियों में प्रमुख गिरावट 1951-91 के बीच हुई है. इसके तीन प्रमुख कारण हैं:

  1. दशकों से आदिवासियों की जनसंख्या वृद्धि दर अपर्याप्त पोषण, अपर्याप्त स्वास्थ्य व्यवस्था, आर्थिक तंगी के कारण गैर-आदिवासी समूहों से कम है,
  2. संथाल परगना क्षेत्र में झारखंड के अन्य ज़िलों, बंगाल व बिहार से मुसलमान और हिंदू आकर बसते गए और आदिवासियों से ज़मीन अनौपचारिक दान-पत्र व्यवस्था से खरीदते गए,
  3. संथाल परगना समेत पूरे राज्य के आदिवासी दशकों से लाखों की संख्या में पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं जिसका सीधा असर उनकी जनसंख्या वृद्धि दर पर पड़ता है. केंद्र के हलफ़नामे में आदिवासियों की कम जनसंख्या वृद्धि दर का ज़िक्र है.

संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठी का सांप्रदायिक अजेंडा का खोखलापन लगातार उजागर हो रहा है. जैसे

  1. स्थानीय प्रशासन ने उच्च न्यायलय में कहा है कि क्षेत्र में बांग्लादेशी घुसपैठिये नहीं हैं,
  2. स्थानीय लोग कह रहे हैं कि बांग्लादेशी घुसपैठिये नहीं है,
  3. राष्ट्रीय पत्रकारों द्वारा भाजपा द्वारा आदिवासी महिलाओं (जिनसे कथित रूप से बांग्लादेशी मुसलमान शादी किये हैं) की जारी की गई सूची की जांच कर पाया गया है कि स्पष्ट झूठ है,
  4. चुनाव आयोग द्वारा बनी टीम (जिसमें भाजपा के सदस्य भी थे) ने जांच में कुछ नहीं पाया,
  5. महासभा की तथ्यान्वेषण रिपोर्ट में यही बात सामने आई और अब
  6. केंद्र सरकार भी बोल रही है कि मामलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ कोई जुड़ाव नहीं मिला है. इसके बावजूद भाजपा लगातार बांग्लादेशी घुसपैठिये, लैंड जिहाद, लव जिहाद आदि के नाम पर साम्प्रदायिकता व झूठ फैला रही है.

झारखंड जनाधिकार महासभा फिर से राज्य सरकार से मांग करता है कि किसी भी नेता या सामाजिक-राजनैतिक संगठन द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठिये, लैंड जिहाद, लव जिहाद जैसे शब्दों का प्रयोग कर साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश होती है, तो उनके विरुद्ध न्यायसंगत कार्यवाई हो. साथ ही, संथाल परगना टेनेंसी एक्ट का कड़ाई से पालन हो एवं किसी भी परिस्थिति में आदिवासी ज़मीन किसी भी हिंदू अथवा मुसलमान गैर-आदिवासी को बेचा न जाए. साथ ही, केंद्र सरकार तुरंत लंबित जनगणना व जाति जनगणना करवाए.

ज्ञात हो कि विगत दिनों ‘झारखंड जनाधिकार महासभा व लोकतंत्र बचाओ अभियन’ कि ओर से 6 सितम्बर, 2024 को एक तथ्यान्वेषी रिपोर्ट जारी किया गया था, जिसमें पूरी तरह से भाजपा के इस झूठ का पर्दाफाश किया गया था. उसमें जारी रिपोर्ट की संक्षिप्त जानकारी हम अपने पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं. और विस्तृत रिपोर्ट नीचे दिये गए लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं. इस रिपोर्ट में कहा गया था –

हाल के दिनों में भाजपा लगातार प्रचार कर रही है कि संथाल परगना में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए आ रहे हैं जो आदिवासियों की ज़मीन हथिया रहे है, आदीवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं और आदिवासियों की जनसंख्या कम हो रही है. क्षेत्र में हाल की कई हिंसा की घटनाओं को जोड़ते हुए इन दावों पर सामाजिक व राजनैतिक माहौल बनाया जा रहा है. ज़मीनी सच्चाई समझने के लिए झारखंड जनाधिकार महासभा व लोकतंत्र बचाओ अभियान के एक प्रतिनिधिमंडल ने संथाल परगना जाकर हर सम्बंधित मामले का तथ्यान्वेषण किया. पाए गए तथ्यों को आज प्रेस क्लब, रांची में प्रेस वार्ता में साझा किया गया. तथ्यान्वेषण रिपोर्ट संलग्न है.

तथ्यान्वेषण दल ने पाकुड़ व साहिबगंज के हाल के प्रमुख मामलों जैसे गायबथान, गोपीनाथपुर, तारानगर-इलामी, केकेएम कॉलेज आदि के छात्रों, पीड़ितों, आरोपियों, दोनों पक्षों के ग्रामीणों, ग्राम प्रधानों व स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं से विस्तृत बात की. मामलों में दर्ज प्राथमिकियों व संबंधित दस्तावेजों का अध्ययन किया. 1901 से अब तक की जनगणना के आंकड़ों, संबंधित सेन्सस रिपोर्ट, गज़ेटियर व क्षेत्र के डेमोग्राफी से जुड़े शोध पत्रों का भी आंकलन किया गया. दल ने पाया कि ज़मीनी हक़ीकत भाजपा के संप्रदायीक दावों से कोसो दूर है.

मामले निम्न हैं – गायबथान गांव में एक आदिवासी परिवार और मुसलमान परिवार में लगभग 30 सालों से एक ज़मीन पर विवाद चल रहा था. इसी विवाद में मुसलमान परिवार ने आदिवासी की ज़मीन को जबरन कब्ज़ा करने की कोशिश की जिसके बाद 18 जुलाई को दोनों पक्षों के बीच मारपीट हुई. इसके विरुद्ध केकेएम कॉलेज के आदिवासी छात्र संघ के छात्र 27 जुलाई को विरोध प्रदर्शन किये.

इसके एक रात पहले पुलिस ने कॉलेज की हॉस्टल में छात्रों की व्यापक पिटाई की. तारानगर-इलामी में सोशल मीडिया पर एक हिंदू लड़की की फ़ोटो तथाकथित शेयर करने के लिए हिंदू परिवारों ने एक मुसलमान युवा और उसकी मां को पीटा. इसके बाद मुसलमान महिला के मृत्यु की अफ़वाह फैलने के बाद मुसलमानों ने बड़ी संख्या में हिंदू टोले में तोड़-फोड़ मारपीट की. गोपीनाथपुर में बकरीद में क़ुरबानी के विवाद में संटे मुर्शिदाबाद के गांव के मुसलमानों और गोपीनाथपुर के हिन्दुओं व पुलिस के बीच हिंसा हुई.

भाजपा के राज्य व राष्ट्रीय-स्तरीय नेता लगातार यह बोल रहे हैं कि बंगलादेशी मुसलमान घुसपैठिये इन घटनाओं के लिए जिम्मेवार हैं. लेकिन तथ्यान्वेंशन के दौरान दल ने यह पाया कि जो भी घटना हुई है, वहीं के रहने वाले समुदायों व स्थानीय लोगों के बीच हुई है. इन सभी गावों के किसी भी ग्रामीण – आदिवासी, हिंदू या मुसलमान – ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के बसने की बात नहीं की. यहां तक कि तारानगर-इलामी में रहने वाले भाजपा के मंडल अध्यक्ष भी बोले कि उनके क्षेत्र में सभी मुसलमान वहीं के निवासी है.

इसी गांव के मामले को निशिकांत दुबे ने बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा हिंसा का मामला बनाकर उछाला था. दल ने कई गांवों का दौरा किया एवं सभी गावों में ग्रामीणों, शहर के लोगों, छात्रों, जन प्रतिनिधियों आदि से पूछा कि किसी को आजतक एक भी बांग्लादेशी घुसपैठी की जानकारी है या नहीं. सबने बोला कि नहीं है. जब पूछा गया कि घुसपैठी की बात कहां सुने हैं, सबने कहा कि सोशल मीडिया पर सुने हैं लेकिन आजतक देखे नहीं हैं. चाहे ज़मीन लेकर बसने की बात हो, आदिवासी महिलाओं से शादी की बात हो या हाल के हिंसा की बात हो, इनमें बांग्लादेशी घुसपैठी का कोई सवाल ही नहीं है.

वर्तमान में पाकुड़ व साहेबगंज में रहने वाले मुसलमान समुदाय का एक बड़ा हिस्सा शेर्षाबादिया है जो अनेक दशकों से वहां बसे हैं. इसके अलावा झारखंड में बसे व पड़ोसी राज्यों से आये पसमांदा व अन्य समुदाय हैं. इनमें से अनेक जमाबंदी रैयत हैं और अनेक पिछले कुछ दशक में आसपास के ज़िला/राज्य से आकर बसे हैं. ऐतिहासिक रूप से शेर्षाबादिया मुसलमान समुदाय मुग़ल काल से गंगा के किनारे (राजमहल से वर्तमान बांग्लादेश के राजशाही ज़िला तक) बसे रहे हैं. यह भी महत्त्वपूर्ण है कि जितने भी जगह के मामलों को भाजपा ने उठाया है, अधिकांश गावों में सांप्रदायिक हिंसा का कोई इतिहास नहीं है.

भाजपा लगातार बोल रही है कि बांग्लादेशी घुसपैठिये के कारण पिछले 24 सालों में आदिवासियों की जनसंख्या 10-16% कम हुई है. पहली बात तो बांग्लादेशी घुसपैठी के बसने का ही कोई प्रमाण नहीं है. दूसरी बात, जनगणना के आंकड़ों के अनुसार संथाल परगना क्षेत्र में 1951 में 46.8% आदिवासी, 9.44% मुसलमान और 43.5% हिंदू थे. वही 1991 में 31.89% आदिवासी थे और 18.25% मुसलमान. आखिरी जनगणना (2011) के अनुसार क्षेत्र में 28.11% आदिवासी थे, 22.73%% मुसलमान और 49% हिंदू थे. 1951 से 2011 के बीच हिन्दुओं की आबादी 24 लाख बढ़ी है, मुसलमानों की 13.6 लाख और आदिवासियों की 8.7 लाख.

यह तो स्पष्ट है कि भाजपा द्वारा संसद और मीडिया में पेश किये जा रहे आंकड़े झूठे हैं . लेकिन कुल जनसंख्या में आदिवासियों का घटता अनुपात गंभीर विषय है और इसके मूल कारणों को समझने की ज़रूरत है. आदिवासियों के अनुपात में व्यापक गिरावट 1951 से 1991 के बीच हुई और अभी भी जारी है. इसके तीन प्रमुख कारण हैं: 1) दशकों से आदिवासियों की जनसंख्या वृद्धि दर अपर्याप्त पोषण, अपर्याप्त स्वास्थ्य व्यवस्था, आर्थिक तंगी के कारण गैर-आदिवासी समूहों से कम है, 2) संथाल परगना क्षेत्र में झारखंड, बंगाल व बिहार से मुसलमान और हिंदू आकर बसते गए और आदिवासियों से ज़मीन खरीदते गए, 3) संथाल परगना समेत पूरे राज्य के आदिवासी दशकों से लाखों की संख्या में पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं जिसका सीधा असर उनकी जनसँख्या वृद्धि दर पर पड़ता है.

इस परिस्थिति से जुड़ा एक प्रमुख मुद्दा है आदिवासियों की ज़मीन का, जो भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति में छुप जा रही है. तथ्यान्वेषण दल ने यह भी पाया कि संथाल परगना टेनेंसी एक्ट का व्यापक उल्लंघन हो रहा है और बड़े पैमाने पर आदिवासी अपनी ज़मीन दान-पत्र व आपसी लेन-देन (जो अनौपचारिक और गैर-क़ानूनी व्यवस्था है) करके गैर-आदिवासियों – मुसलमान व हिंदू – को बेच रहे हैं. संथाल परगना और पास के जिलों/राज्यों के गैर-आदिवासी ज़मीन खरीद रहे हैं. संथाल परगना टेनेंसी एक्ट में आदिवासी ज़मीन पूर्ण रूप से non-transferable है, जिसे आदिवासी भी नहीं खरीद सकते हैं. लेकिन आर्थिक तंगी में आदिवासी ज़मीन आपसी लेन-देन करके गैर-आदिवासियों को बेच रहे हैं.

गौर करने की बात है कि संथाल परगना से संटे बंगाल और बिहार में ज़मीन का मूल्य संथाल परगना के non-transferable ज़मीन के अनौपचारिक दाम से कहीं ज्यादा है. क्षेत्र के transferable ज़मीन का मूल्य भी non-transferable ज़मीन के अनौपचारिक मूल्य से कहीं ज़्यादा है. यह भी देखा गया है कि गैर-आदिवासियों की प्रशासन में पहुंच ज्यादा मज़बूत है, जिसके कारण विवाद की स्थिति में अक्सर उनके पक्ष में ही निर्णय होता है.

भाजपा यह भी फैला रही है कि बांग्लादेशी मुसलमान ज़मीन लूटने के लिए आदिवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं. इस सम्बन्ध में अनुसूचित जनजाति आयोग की सदस्य व भाजपा नेता आशा लकड़ा ने 28 जुलाई को प्रेस वार्ता कर एक सूची जारी की जिसमें संथाल परगना क्षेत्र की 10 आदिवासी महिला जन प्रतिनिधियों और उनके मुसलमान पति के नाम थे.

उन्होंने कहा कि रोहिंग्या मुसलमान व बांग्लादेशी घुसपैठिये आदिवासी महिलाओं को फंसा रहे हैं. तथ्यान्वेषण दल ऐसी कई महिलाओं से मिला. ऐसा एक भी मामला नहीं मिला जिसमें बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठिये से शादी हुई हो. स्थानीय ग्रामीणों को भी ऐसे किसी मामले की जानकारी नही है. इन 10 में 6 महिलाओं ने स्थानीय मुसलमानों से शादी की है और तीन के पति तो आदिवासी ही हैं.

क्षेत्र में आदिवासी महिलाओं द्वारा हिंदू व मुसलमान गैर-आदिवासियों से शादी करने के कई उदहारण है. पर इन महिलाओं ने अपनी सहमति और आपसी पसंद से शादी की है. यह भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि राजनैतिक दलों और लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर महिलाओं की सूची और उनके व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी बातों को प्रसारित करना उनकी निजता के अधिकार का व्यापक उल्लंघन है.

यह साफ़ है कि भाजपा राज्य के मुसलमानों को बांग्लादेशी घुसपैठी घोषित करके आदिवासियों, हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच सामाजिक व राजनैतिक दरार पैदा करना चाहती है. उसका उद्देश्य है झारखंड के विधान सभा चुनाव के पहले धर्मिक व सामाजिक ध्रुवीकरण पैदा करना.

संथाल परगना में आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक समस्याएं पूर्व व वर्तमान राज्य सरकार की विफ़लता को भी दर्शाती है. संथाल परगना समेत राज्य के अन्य क्षेत्रों के मूल मुद्दे जैसे – आदिवासियों की कमज़ोर आर्थिक स्थिति, गैर-आदिवासियों का SPTA का उल्लंघन कर ज़मीन खरीदना, सरकारी नौकरियों पर गैर-आदिवासियों और अन्य राज्यों के लोगों का कब्ज़ा, अपर्याप्त पोषण, अपर्याप्त स्वास्थ्य व्यवस्था, आर्थिक तंगी के कारण आदिवासियों का अधिक मृत्यु दर दर आदि – पर सरकार की कार्यवाई निराशाजनक है.

ऐसे में, झारखंड जनाधिकार महासभा व लोकतंत्र बचाओ अभियान राज्य सरकार से निम्न मांगे करते हैं –

  1. भाजपा व अन्य किसी भी नेता या सामाजिक संगठन द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठिये, लैंड जिहाद, लव जिहाद जैसे शब्दों का प्रयोग, जो विभिन्न घटनाओं को इनके साथ जोड़ने व साम्प्रदायिकता फ़ैलाने के लिए करती है, उनके विरुद्ध न्यायसंगत कार्यवाई हो. किसी भी परिस्थिति में समाज के तानेबाने को तोड़ने न दिया जाए.
  2. गायबथान, तारानगर-इलामी, गोपीनाथपुर, कुलापहाड़ी व केकेएम कॉलेज घटना में पुलिस दोषियों के विरुद्ध न्यायसंगत कार्यवाई करें. केकेएम कॉलेज के छात्रावास में छात्रों पर हुई हिंसा के लिए दोषी पुलिस पदाधिकारियों व कर्मियों के विरुद्ध न्यायसंगत कार्यवाई हो.
  3. संथाल परगना टेनेंसी एक्ट का कड़ाई से पालन हो. किसी भी परिस्थिति में आदिवासी ज़मीन गैर-आदिवासी को बेचा न जाए. जल्द से जल्द revisional survey को पूरा कर सर्वे रिपोर्ट जारी हो. पांचवी अनुसूची और पेसा प्रावधानों का कड़ाई से पालन हो.
  4. साहिबगंज व पाकुड़ समेत संथाल परगना के अन्य ज़िला प्रशासन द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठी की जनता द्वारा जानकारी देने के लिए स्थापित फ़ोन व्यवस्था को तुरंत रद्द किया जाए.
  5. संथाल परगना समेत राज्य के सभी पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आदिवासियों की आर्थिक स्थिति, कम जनसँख्या वृद्धि दर के कारण, गैर-आदिवासियों का बसना, गैर आदिवासियों का नौकरियों पर कब्ज़ा, आदिवासियों का पलायन आदि पर अध्ययन के लिए राज्य सरकार एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करे. रिपोर्ट में जिन मूल मुद्दों पर चर्चा की गई है, उन पर राज्य सरकार त्वरित कार्यवाई करे.

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