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तसलीमा नसरीन : पुरुष क्या ज़रा भी स्त्री के प्रेम के योग्य है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 2, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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तसलीमा नसरीन : पुरुष क्या ज़रा भी स्त्री के प्रेम के योग्य है ?
तसलीमा नसरीन : पुरुष क्या ज़रा भी स्त्री के प्रेम के योग्य है ?
तसलीमा नसरीन

मुझमें एक भारी दोष है कि मैं प्रेम में पड़ जाती हैं. प्रेम में पड़ते ही मैं पुरुषों के प्रति खूब हार्दिक हो जाती हैं. मैं तब पुरुषों के सात खून माफ़ कर देती हैं. मैंने बहुत बार अपने आप को चेतावनी दी है. कह चुकी हूं ‘और जो मन चाहे करना, लेकिन प्रेम कतई न करना.’ मेरा हृदय, शरीर कोई भी इस चेतावनी को नहीं मानता. हृदय का दरवाजा खुला रखती हूं इसलिए कोई भी सुदर्शन अचानक उसमें प्रवेश कर सकता है. सभी को देखकर पहले-पहल लगता है, यह पुरुष पुरुषतंत्र को नहीं मानता, यह धर्म, अन्धविश्वास और रूढिवादिता वगैरह से लाखों मील दूर है. यह पुरुष असाधारण प्रेमी के सिवा और कुछ नहीं हो सकता.’

प्रेम मुझे कल्पना के सात सागरों में डुबोये रखता है. प्रेम में डूबी हुई मैं सोच लेती हूं कि पुरुष स्त्रियों के प्रति आदरभाव रखने वाले हैं, वे स्त्री-स्वाधीनता में सौ प्रतिशत विश्वास रखते हैं और स्त्रियों के अधिकारों के लिए खुद ही लडाई करेंगे. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगते हैं वह डूबी हुई मैं ऊपर आने लगती हैं, आखिरकार किनारे उठ आती हूं. मुझे हताश करता हुआ प्रेमी समझा देता है कि और दस लोगों की तरह वह भी स्त्री-विद्वेषी है, वह भी मौक़ा मिलने पर स्त्री का सर्वनाश करने से बाज नहीं आता.

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‘पुरुष लोग स्त्रियों का प्रेम पाने योग्य नहीं हैं’, इस बात पर विश्वास करके भी मैं प्रेम करती हूं और पुरुषों के साथ ही करती हूं. इसका कारण है कि कोशिश करके भी समलैंगिक नहीं बन सकी, और मेरी प्रकृति में पुरुष-काम प्रचंड है. सुदर्शन, सुडौल, छरहरे, धारदार पुरुष-देह को भोगने में मुझे बड़ा आनन्द आता है. पुरुषों की जिंस हो जाना मेरा काम नहीं. मैं भी क्या यह चाहती हूं कि पुरुष मेरा जिंस हो जाये. नहीं चाहती.

इस स्त्री द्वेषी समाज में जहां स्त्री ही घर-घर में पुरुषों की जिंस बनकर रह रही है, वहां पुरुषों को जिंस में तब्दील करना असम्भव है. यदि सम्भव होता तो मैं प्रतिशोध लेने के लिए एक बार उन्हें जिंस में बदलकर देखती. मुझे जो चीज चाहिए वह वहां नहीं मिलती. उसका नाम है समानाधिकार. समानाधिकार क्या चाह यहां के पुरुषों को उसकी धारणा भी नहीं है. जिन लोगों ने समानाधिचीज है. कहानियां सुनी हैं, उन्होंने केवल सुनी हैं, समझा कुछ नहीं.

दरअसल सभी पुरुष एक-जैसे हैं. पूर्व-पश्चिम-दक्षिण और उत्तर के सभी पुरुष एक ही हैं, उनमें कोई फर्क नहीं है. फ़र्क यदि है तो वह बाहरी है. साथी से वे सभी एक हैं. अभिन्न हैं. आत्मनिर्भर, परनिर्भर, उच्चश्रेणी, निम्न श्रेणी सब एक हैं. भीतर एक हैं. निम्नश्रेणी का एक परनिर्भर अनुकम्पा पाने के लिए बहुत दिनों तक मेरे पीछे-पीछे चला था. मैं भला क्या अनुकम्पा करती ! मैंने एक बार उस पर प्रेम उड़ेल दिया था, उसे जैसे ही प्रेम मिला, वह तुरन्त सिर चढ़ गया. सिर पर चढ़ते ही उसने मुझे पहचानने से ही मना कर दिया, मेरे बदन को थपथपाते हुए बोला, ‘एई तू कौन है रे ? कौन है तू ?’

पुरुषों को प्रश्रय देना और प्रेम देना एक ही बात है. वे प्रेम लेना जानते हैं, उन्होंने प्रेम देना कभी नहीं सीखा. वे कैसे सीखेंगे, उन्हें कौन सिखाएगा ! जन्म के बाद घर के भीतर ही उन्हें पहला पाठ मिल जाता है, पिता और मां की दो भिन्न भूमिकाएं उन्हें नज़र आ जाती हैं. वे देखते हैं कि मां प्रेम दे रही है, आदर दे रही है, सेवा कर रही है, और पिता निश्चिन्त होकर मजे से सब कुछ भोग रहे हैं. पाठों का क्या कोई अन्त है ! घर से बाहर निकलते ही दूसरा पाठ, तीसरा पाठ.

घर और बाहर पुरुषों की ही जय-जयकार है. पुरुष प्रभु की भूमिका में हैं, समाज की राजनीति और अर्थव्यवस्था के सरदार हैं वे. इस आराम को कोई भी पुरुष नहीं छोड़ना चाहता. चलिए यह तो भारतवर्ष की तसवीर है. पश्चिम के जिन देशों में स्त्रियों की हैसियत ख़ासी बढ़ चुकी है, वहां की तसवीर भी ऐसी ही है. मैंने गोरे प्रेमियों को भी हीनताबोध से ग्रस्त, ईर्ष्याकातर, दुष्ट और दम्भ से भरा देखा है. असल में पुरुष की जात ही भीषण रूप से स्त्री-विद्वेषी है. जात को दोष देना शायद ठीक न होगा, पुरुषों को स्त्री-विद्वेषी बनाया गया है.

कई शताब्दियों से पुरुषों को यही तालीम मिली है कि वे ज्यादा समझते हैं, उनके शरीर में ज्यादा ताकत है, उनके दिमाग में बुद्धि है, वे उन्नत प्रजाति के मनुष्य हैं. इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि वे, ज्यादा जानते हैं, कम जानने वाली, दुर्बल और बुद्धिहीन औरत-जात को मर्द लोग नहीं वे केवल अपने स्वार्थ के लिए उसका उपयोग करेंगे. मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आता है. मैं इतना सिर उठाकर चलने वाली बलशाली इतनी आजाद, आत्मनिर्भर, इतनी मजबूत, इतनी बलशाली, शक्तिमान, और प्रेम में पड़ते ही मैं एक दुर्बल दो पैरों वाला जीव हो जाती हैं.

प्रेम पडने पर यह बुद्धिदीप्त मैं जाने किस हवा के झोंके में बिला जाती हैं. एक बुद्धि मूढ़ मैं अपने प्रेमी की जद में पड़ी रहती हूं. मैं फिर अपने पेट की चिंता को लेकर परेशान होने लगती हूं, मेरी डबल चिन को लेकर मेरी दुश्चिन्ताओं का कोई अन्त नहीं होता. मेरी नाक, मेरी आंखों और मेरे चेहरे का आकार बेतुका लगता है. पके बाल सहन नहीं होते, बालों का विन्यास जघन्य लगता है. मुझे तब रेखा-जैसी सूरत चाहिए, सुष्मिता सेन जैसा फ़िगर चाहिए.

मेरा अपना कुछ भी मुझे तब पसन्द नहीं आता. मैं तब प्रेमी की नजर से खुद की ओर देखने लगती हैं, कारण कि उस समय मेरी अपनी कोई नज़र नहीं रहती. प्रेमी की नजर में मैं असन्तोष ठूंस देती हूं. उस असन्तोष के माध्यम से अपने आप को देखती हूं. बार-बार देखती हूं. हज़ार बार देखती हूं. मैं जितना देखती हूं उतनी निस्तेज होती जाती हूं. मैं जितना देखती हूं, प्रेमी को मुग्ध करने के तमाम आयोजनों में उतनी ही अस्थिर होती जाती हूं.

भोथरे दिमाग मूर्खताएं, हीन भावनाएं और विवशताएं निकलने लगती हैं. प्रेमी की आग मेरे आत्मविश्वास को जलाकर राख कर देती है. मैं अपने आप को ही नहीं पहचान पाती. मैं झुकी हुई, स्तब्ध और नम्र हो जाती हूं ताकि मेरा यह रूप देखकर प्रेमी आह्लादित हो उठे, मेरे गुण देखकर आमोदित हो जाए, मैं जी-जान से इसी की कोशिश करती रहती हूं. मेरा अपना कोई बोध शेष नहीं रहता. मेरी इन्द्रियां धीरे-धीरे काम करना बन्द करने लगती हैं. केवल खोपड़ी पड़ी रहती है, भीतर मस्तिष्क-जैसा कुछ नहीं बचा रहता.

मैं अपने आप को खोने लगती हूं. मेरा व्यक्तित्व, मेरा अहंकार, मेरी दृढ़ता, मेरी बलिष्ठता, मेरी शक्ति और मेरा साहस प्रेम के तूफ़ान में टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ते रहते हैं. यह जितने उडते रहते हैं, मैं जितनी एक दीन-हीन जड़ वस्तु में तब्दील होती रहती हूं, मैं अपने प्रेमी को उतना ही ताक़तवर आदमी बनते देखती हूं. मैं जितनी झुकती है वह उतना ही आनन्दित होता है, वह उतना ही फूल-फूल कर ढोल बनता जाता है, वह उतना ही मैग्लोमैनियेक, इनक्रेडिबल हल्क, उतना ही वह ‘मुझे किसकी परवाह…’- जैसा रवैया अपनाने लगता है.

मुझे किसने प्रेमी को खुश करना सिखाया है ? मेरे भीतर क्या कोई पुरानी तालीम अब भी घात लगाए बैठी है ? कैन्सर रोग-जैसी यह तालीम, जीवन का विनाश करने वाली यह तालीम, हमारा सर्वनाश करके छोडती है. वह मुंह खोलकर खड़ी मौत को खींच लाती है और समूचे जीवन को ही उसके भीतर ठूंस देती है. और प्रचंड प्राणशक्ति से भरपूर जीवन जीने वाली, इस धरती पर सारे धर्मों और कट्टरवाद के विरुद्ध, कुत्सित पुरुषतंत्र, युद्ध और रक्तपात के विरुद्ध संग्राम करने वाली, मानवता के लिए विश्वव्यापी लड़ाई करने वाली मैं, जो झुकी नहीं, जिसने समझौते नहीं किये, वह अमानवीय पुरुष के समक्ष झुक जाती हूं. पुरुषतंत्र की सुविधा का भोग करने वाले, युगों-युगों से स्त्रियों को कुचलकर, पीसकर आराम करने वाले पुरुष के समक्ष झुक जाती हूं.

अब मैं इसके लिए क्या तर्क दूं ! इस भूल के लिए, इस अधःपतन के लिए ! एक ही तसल्ली है कि पीठ पर चाबुक के पड़ते ही मेरा यह नशा काफूर हो जाता है. पुरुष जैसे ही सिर चढ़ जाता है वैसे ही मेरा सिर घूमने लगता है. एक ही तसल्ली है कि तब उसे नीचे उतारे बिना मेरा काम नहीं चलता. पुरुष को सिर से उतारते समय, मकड़ी की तरह जीवन को जकड़े हुए पुरुष को ठेलकर हटाते समय मेरे मन और शरीर में अद्भुत शक्ति आ जाती है. प्रेम की जंजीर को तोड़कर, प्रेमी की धूल-कालिख को झाड़कर मैं फिर से उठ खड़ी हो सकती हूं.

यह उठ खड़ी हुई मैं किसी विषमता के साथ समझौता नहीं करती. यह उठ खड़ी हुई मैं पीछे मुड़कर नहीं देखती. खड़ी हुई मैं पुरुषों को नहीं पूछती. इस खड़ी हुई मैं सिर्फ़ एक के साथ प्रेम कर सकती है, सिर्फ़ एक के साथ ही उसकी दोस्ती हो सकती है, और वह है इनसान. इस समाज के पुरुष अब भी सिर्फ़ पुरुष हैं, वे अब तक इनसान नहीं बन सके हैं. वे जब तक इंसान नहीं बन सकते, उनसे प्रेम नहीं किया जा सकता है.’

  • प्रख्यात बंग्ला लेखिका तसलीमा नसरीन के लेखों के अनुवाद के दो खण्ड राजकमल प्रकाशन से आये हैं. इनका अनुवाद उत्पल बनर्जी ने किया है. इन दो खंडों में उनके 102 लेख हैं.

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