
सौमित्र राय
फिलिस्तीन में यहूदी 1000 BCE से रहते आए हैं, लेकिन बहुत छोटे टुकड़ों में. फिलिस्तीन में यहूदियों की बड़ी आबादी पहले आलियाह (1882–1903) में आई. पूर्वी यूरोप में यहूदियों का बड़ा नरसंहार हुआ और भागते–छिपते 25 हजार यहूदी फिलिस्तीन आ धमके. तब फिलिस्तीनी मुसलमानों ने उनका गले लगाकर स्वागत किया. रोटी दी, काम दिया और रहने की जगह भी. फिर दूसरे आलियाह (1904–1914) में नरसंहारों से जान बचाकर 40 हजार यहूदी और आ गए. इस बार वे घर नहीं, देश बसाने आए थे.
पहले वर्ल्ड वॉर (1919–1923) के बाद 40 हजार यहूदियों का एक और कारवां आया. और बस्तियां बसी. 1917 के बालफोर घोषणापत्र में यहूदियों के लिए एक देश का ऐलान हुआ. 1924 से 1929 के बीच पोलैंड और यूरोप की सख्ती के बाद 80 हजार यहूदी फिर फिलिस्तीन आए. अब उनकी अरबों से तनातनी शुरू हुई. आज फिलिस्तीनी मुसलमानों को जरूर उस गलती का मलाल हो रहा होगा कि उन्होंने संपोलों को आसरा दिया क्योंकि जियोनिज्म की शुरुआत भी तभी हुई थी.
1929 से 1939 के दशक में ढाई लाख यहूदी फिलिस्तीन पहुंच चुके थे. अरब विद्रोह के बाद अंग्रेजों को आप्रवास पर रोक लगानी पड़ी. इसके बाद भी सेकंड वर्ल्ड वॉर के समय से यहूदियों का गैरकानूनी आना जारी रहा. 1948 में इजरायल की स्थापना हुई और दुनियाभर से यहूदी वहां आ बसे. इस तरह फिलिस्तीन का नक्शा ही बदल गया. अब इजरायल उन्हीं फिलिस्तीनियों को मारकर उन्हें देश से भगाना चाहता है और अरब देश अपने ही भाइयों के साथ ऐसा होते देख रहे हैं. वे सालों पुरानी अपनी गलती नहीं सुधारना चाहते.
ट्रंप ने कल कहा कि उसे खामेनेई के ठिकाने का पता है, लेकिन वह उसे अभी नहीं मरेगा. इजरायल मोसाद के अपने एजेंट्स के जरिए ईरानी सेना के कमांडरों को मारकर छाती पीटता रहता है. लेकिन 1979 में बने ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स का ढांचा और उनके अपने सुप्रीम कमांडर के प्रति समर्पण को कम लोग जानते हैं. IRGC का ढांचा ही ऐसा है कि एक गया तो पीछे 2 खड़े हैं. यह ईरान का मोजेक डिफेंस सिस्टम है.
यह सोवियत संघ के मत्रियोशिका जैसा मॉडल है, जिसने हिटलर को हराया. सुप्रीम लीडर के नीचे IGRC और कड्स फोर्स भी आती है. यह संघीय व्यवस्था है. प्रांतीय सेनाएं भी इसी से जुड़ी हैं. यानी खामेनेईं का आदेश सिर आंखों पर. जंग में शहादत ईरान में दुख के साथ फक्र का विषय भी है. हिमाचल में तो परिवार का दूसरा बेटा तुरंत फौज में भर्ती होने निकल लेता है. इसलिए ईरान का हर फौजी अपने सुप्रीम नेता के लिए जीता–मरता है. इजरायल और अमेरिका इसीलिए खामेनेईं को मारने की बात कह रहे हैं. यह इतना आसान नहीं है.
तो डोनाल्ड ट्रंप देश का कोई भी फैसला 2 हफ्ते के बाद लेंगे. यानी ईरान पर हमले का फैसला 2 हफ्ते के लिए लटक गया है. ईरान और इजरायल के बीच जंग अब अस्पताल के बदले अस्पताल, न्यूक्लियर रिएक्टर के बदले रिएक्टर और मीडिया के बदले मीडिया तक आ पहुंचीं है. ट्रंप ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की आशंका से कुछ राहत दी है. शायद वे इजरायल को पूरी तरह से तबाह देखना चाहते हैं. इजराइली नाव में देश छोड़कर भाग रहे हैं, जैसे वे 1930 के दशक में आए थे.
कल इजरायल ने हार की खीझ के मारे गजा में खाना लेने आए भूखे लोगों को आग में झोंक दिया. 59 लोग मर गए. कल इजरायल की औरतें हाथ में प्लेट लिए सड़कों पर खाना लेने उतर आईं. तेल अवीव गजा बन रहा है. सारी अमीरी, ऐशो–आराम छिन गए. लेकिन, इजरायल का यह आतंकवादी चेहरा राहुल गांधी के सिवा और किसी नेता को नहीं दिखता. सारी एनर्जी संसद के लिए बचाना चाहते हैं. कोई रैली नहीं, कोई विरोध प्रदर्शन नहीं. एकदम चुप, क्योंकि फिलिस्तीन से उन्हें वोट नहीं मिलना है. अमेरिकी चंदा जरूर मिल सकता है.
उधर, चीन और रूस अब खुलकर सामने आ चुके हैं. ट्रंप की हेकड़ी निकल चुकी है. उनके साथ ब्रिटेन के सिवा कोई नहीं खड़ा है. इजरायल के साथ सिर्फ जर्मनी खड़ा है, जिसने उसे फिर हथियार भेजे हैं. अमेरिका फंस गया है. सीनेट जंग के खिलाफ है, IAEA भी और अब अवाम भी खड़ी हो रही है. आपको बता दूं कि इजरायल अमेरिकी पैसे से अपने लोगों को फ्री लाइफ इंश्योरेंस देता है, जबकि अमेरिका में लोगों को इससे महरूम रखा जा रहा है.
ईरान धड़ाधड़ अमेरिकी हथियारों को मिट्टी में मिला रहा है. अब तक 5 एफ-35 खेत रहे तो लॉकहीड मार्टिन के शेयर औंधे हो गए. फिर भी, 77 साल पुराना एक देश इजरायल 6000 साल की सभ्यता वाले फिलिस्तीनियों को वतन छोड़ने को कह रहा है. इस जुल्म के खिलाफ एक मित्र ने कविताओं में आवाज उठाई तो 2 टके का कांग्रेसी ट्रोल बिलबिला उठा. सरेआम अपनी कब्ज उतारी. मैंने उसे पहचान लिया तो फन उठा लिया. अब हमेशा के लिए बिल में है. उसका जहर उसी को खत्म कर देगा.
ऐसे कांग्रेसी ट्रोल्स को यह नहीं दिखता कि 2024 में स्विस बैंकों में काला धन 3 गुना बढ़कर 37600 करोड़ हो चुका है. राहुल बोलें तो ही आईटी सेल का वॉट्सएप शेयर कर देंगे. बनिए कभी देश लूटने वालों पर आवाज नहीं उठाते, क्योंकि ऐसा करते ही उनकी भी धोती खुल जाएगी. इन सबके बीच भारतीय अवाम की भी सड़कों पर चुप्पी देखकर एक शेर याद आता है– ‘फ़रेब कर कर के उसने उम्र गुज़ार दी
यक़ीन कर कर के हमने भी उम्र गुजारी…’. –अज्ञात
बहरहाल, ईरान में यहूदियों का 100 साल पुराना सिनेगॉग मौजूद है. इस जंग में भी पूरी तरह से सुरक्षित…क्योंकि ईरान धर्मस्थलों का आदर करता है लेकिन, यहूदियों ने अल अक्सा मस्जिद को भी नहीं छोड़ा. भूखे फिलिस्तीनियों को इस बार कैंडी और मीठी रोटियों के चंद टुकड़ों से ईद मनानी पड़ी थी. इजरायल के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा यहूदी ईरान में रहते हैं. कभी दंगे, नरसंहार या नफरत की खबर सुनी है ?
जॉन एफ. केनेडी अकेले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति थे, जिन्होंने इजरायल का एक अलग देश के रूप में वजूद का विरोध किया था. उन्होंने अमेरिका में ज़्योनिष्ट आंदोलन का भी विरोध किया था. केनेडी की हत्या में उनके इस विचार का बड़ा योगदान रहा. इजरायल के रूप में एक यहूदी राष्ट्र के खिलाफ पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी की सोच और उनकी हत्या के बीच के सीधा अंतर्संबंधों है. दिक्कत यह है आजकल इतिहास को वर्तमान संदर्भों में कोई देखना नहीं चाहता इसीलिए जाहिल भेड़ों का डफरलैंड भारत में तेजी से विकसित हो रहा है. इनके खुदा हिंदी भाषी नरेंद्र मोदी और अमित शाह है.
खैर, डिमोना नाम है उस इजराइली न्यूक्लियर रिएक्टर का, जहां दुनिया से छिपाकर प्लूटोनियम बम बनाया गया. यह बात CIA और मोसाद को पता थी. यह जानकारी केनेडी तक भी पहुंची. 1963 का साल. महीना–अप्रैल का. केनेडी ने फौरन डिमोना पर चौबीसों घंटे अमेरिकी खुफिया अफसरों की निगरानी लगा दी. तब बेन गुरियन इजरायल के पीएम थे. केनेडी ने उन्हें चिट्ठी लिखकर चिंता जाहिर की. केनेडी ने चेताया कि अगर बम बनाना नहीं रोका तो वे इजरायल से रिश्ते तोड़ लेंगे.
बेन गुरियन भड़क गया लेकिन, इस चिट्ठी की खबर मिलते ही अरब देशों में कोहराम मच गया और जून में गुरियन को इस्तीफा देना पड़ा. उस वक्त इजरायल बम बनाने की उसी स्थिति में था, जो आज ईरान की है, यानी 60% से ज्यादा प्रोसेस्ड. इजरायल और अमेरिका में तनाव बढ़ता रहा. केनेडी हर हफ्ते अपने अफसरों से फीड ले रहे थे. इजरायल और बम के बीच केनेडी खड़े थे.
तो इजरायल ने मोसाद को केनेडी की सुपारी दे डाली और नवंबर 1963 को अमेरिका ने केनेडी को खो दिया. यह सुपारी मोसाद ने ऑस्टवॉल्ड को दी थी. बाद में ऑस्टवॉल्ड को भी गोली मार दी गई और वह भी मोसाद के एजेंट्स जैक रूबी थे. सारे सबूत खत्म हो गए. कल इसी डिमोना को उड़ा देने की धमकी ईरान ने दी है. फ्रांस ईरान पर हमला इसलिए कराना चाहता है, ताकि उसकी पोल न खुले, क्योंकि डिमोना 50 और 60 के दशक में उसी का बनाया हुआ है. ये जियोनिस्ट अपने बाप के भी सगे नहीं हैं. आज ट्रंप के पैर पकड़े खड़े हैं.
कल इकोनॉमिस्ट और यू गवर्नमेंट ने मिलकर एक पोल किया. पता चला कि 60% अमेरिकी जंग में फंसना नहीं चाहते. सिर्फ़ 16% जंग के पक्ष में हैं. अमेरिकी कांग्रेस के लिए ट्रंप को जंग की अनुमति देना मुश्किल होगा. जाहिर है, फिर भी अगर जंग हुई तो वर्ल्ड वॉर हो न हो, दुनिया भयंकर मंदी में डूबेगी.
रूस के 200 इंजीनियर्स ईरान में एक और रिएक्टर बना रहे हैं. क्या रूस अमेरिका को ईरान पर हमला करने देगा ? रूस के इंजीनियर्स यूरेनियम से बम बनाने की प्रक्रिया को तेज नहीं कर सकते ? रूस ने कहा है कि किसी भी कीमत पर ईरान का परमाणु कार्यक्रम नहीं रुकेगा. ईरान ने रूस से बड़े भाई के रिश्ते बनाए हैं. इजरायल ने जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया. हर्जाना तो भरना ही होगा !
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