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बेनीटो मुसोलिनी का अंत बताता है कि तानाशाहों का अंत कैसा हो सकता है !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 7, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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बेनीटो मुसोलिनी का अंत बताता है कि तानाशाहों का अंत कैसा हो सकता है !
बेनीटो मुसोलिनी का अंत बताता है कि तानाशाहों का अंत कैसा हो सकता है !

उसे एक मरे हुए जानवर की तरह घसीटा गया. उसका चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था. उसका शरीर बेरहमी से पीट-पीट कर क्षत-विक्षत कर दिया गया था. उसे एक सार्वजनिक चौक में उल्टा लटका दिया गया. जबकि भीड़ ने उसकी लाश पर थूका. यही अंत था बेनिटो मुसोलिनी का उस व्यक्ति का जिसने इटली की महानता को बहाल करने का वादा किया था. लेकिन उसका अंजाम किसी भी दुश्मन से ज्यादा क्रूर हुआ.

दो दशकों से अधिक समय तक उसने लोहे की मुट्ठी से शासन किया. हिटलर के साथ समझौते किए और आतंक पर आधारित एक साम्राज्य खड़ा किया. लेकिन जब युद्ध ने उसे आ घेरा तो उसकी दुनिया बिखर गई. त्यागा गया वेश बदलकर भागता हुआ एक अपराधी की तरह पकड़ा गया. उसने अपने जीवन की भीख मांगी. लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी. उसे बिना किसी मुकदमे के, बिना किसी दया के, बिना किसी पछतावे के मार दिया गया.

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लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात उसकी मौत नहीं थी. बल्कि यह था कि उसके शव के साथ क्या किया गया. भीड़ ने एक लाश पर इतना क्रोध क्यों निकाला ? उसे मरने के बाद भी किन अत्याचारों का सामना करना पड़ा और उसके अवशेषों का अंतिम भयावह हश्र क्या हुआ ?

फासीवाद का उदय : विचारधारा से सत्ता तक

हिटलर के सत्ता में आने से एक दशक पहले जब फ्रेंको महज एक गुमनाम कर्नल थे और यूरोप ज्यादातर लोकतांत्रिक गणराज्यों से बना था. एक व्यक्ति ने एक निरंकुश तानाशाही की कल्पना की थी जो प्राचीन रोमन साम्राज्य की महिमा को टक्कर दे सके. 1923 में बेनिटो मुसोलिनी इटली के सर्वोच्च नेता बने और उन्होंने वह विशेषताएं लागू की जिन्हें बाद में अन्य अधिनायकवादी राज्यों ने अपनाया. विपक्षियों को नजरबंद करने के लिए यातना शिविर, जनता पर निगरानी रखने के लिए एक गुप्त पुलिस, विशाल प्रचार तंत्र और एक शक्तिशाली नेता के इर्दगिर्द व्यक्तित्व पंथ.

1912 में बेनिटो मुसोलिनी इटली की समाजवादी पार्टी के कट्टरपंथी धड़े के नेता के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए. शुरुआत में उन्होंने लीबिया में युद्ध और प्रथम विश्व युद्ध में इटली की भागीदारी का विरोध किया. लेकिन समय के साथ उनकी विचारधारा दक्षिण पंथ की ओर मुड़ गई. उन्हें विश्वास हो गया कि इटली की सरकार में आमूल परिवर्तन आवश्यक था. क्रांतिकारी सिंडिकलिस्टों से प्रभावित होकर उन्होंने राष्ट्रीयता को एक ऐसा आंदोलन बनाने का साधन माना जो पूंजीवादी उदारवाद को खत्म कर एक नया इटली गढ़ सके.

प्रथम विश्व युद्ध में इटली की करारी हार के बाद जनता सरकार से नाराज थी और बदलाव की मांग कर रही थी. इसी स्थिति का लाभ उठाकर 23 मार्च 1919 को मुसोलिनी ने मिलान में फास्टियोदी कॉम्बैटमेंटो की स्थापना की. इस नए राजनीतिक आंदोलन ने पूर्व सैनिकों श्रमिक संघवादियों और भविष्यवादी विचारधारकों को अपने साथ जोड़ा. इसका कार्यक्रम राष्ट्रवाद को गणराज्यवाद, चर्च विरोध, महिला मताधिकार और सामाजिक सुधारों के साथ जोड़ता था. फासीवाद का केंद्रीय विचार एकीकृत राष्ट्रीय समुदाय बनाना था. जिसमें मजदूर और मालिक, किसान और जमींदार सभी शामिल हो.

मुसोलिनी के अनुसार इसे प्राप्त करने का एकमात्र तरीका हिंसा था. फासीवादी गुट जिन्हें स्क्वाड कहा जाता था, ने कैथोलिकों और समाजवादियों के खिलाफ हिंसक आतंक अभियान चलाया जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए. 1922 तक फासीवादी ग्रामीण इलाकों में कानून और व्यवस्था के वास्तविक नियंत्रक बन चुके थे. वेनिस क्षेत्र में स्लाव अल्पसंख्यकों पर भी हमले कर रहे थे और शहरों में फैलकर हड़तालों को कुचलने में मदद कर रहे थे. जुलाई 1922 में उन्होंने आम हड़ताल को विफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वर्ष के अंत तक फांसीवादी आंदोलन के सदस्यों की संख्या ढाई लाख तक पहुंच गई थी.

मुसोलिनी और उनके अनुयायियों ने प्राचीन रोम से प्रेरित प्रतीकों को अपनाया क्योंकि उनका दावा था कि उनका मिशन इटली को उसकी खोई हुई महिमा लौटाना था. जैसे हिटलर ने भारतीय मूल के स्वस्तिक प्रतीक को अपनाया वैसे ही मुसोलिनी ने फास्टचेस को चुना. लकड़ी की छड़ियों में लिपटा एक कुल्हाड़ी जो रोमन काल में शासकों के दंड और शक्ति का प्रतीक थी. उनकी अर्धसैनिक टुकड़ियों द्वारा पहनी जाने वाली काली शर्ट राजनीतिक हिंसा का प्रतीक बन गई. मुसोलिनी की राजनीतिक विचारधारा पूर्ण राज्यवाद पर आधारित थी. जिसमें व्यक्ति को पूरी तरह से राष्ट्र और नेता की इच्छा के अधीन होना पड़ता था.

उन्होंने घोषणा की राज्य में सब कुछ, राज्य के बाहर कुछ भी नहीं, राज्य के खिलाफ कुछ भी नहीं. इस विचारधारा के आधार पर उन्होंने स्वतंत्र श्रमिक संघों, विपक्षी, राजनीतिक दलों और स्वतंत्र प्रेस को समाप्त कर दिया और उनकी जगह पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण वाली संस्थाएं स्थापित की. 1921 के चुनावों में फासीवादियों को संसद में केवल 35 सीटें मिली. जिससे वे प्रमुख राजनीतिक ताकत नहीं बन सके. लेकिन मुसोलिनी को विश्वास था कि उन्हें सत्ता हासिल करने के लिए वोटों की जरूरत नहीं थी. वे सड़कों पर अपनी हिंसक ताकत और देश के व्यवसायियों, जमींदारों और राजनीतिक अभिजात वर्ग के समर्थन का उपयोग कर सकते थे.

1922 की गर्मियों तक फासीवादी सत्ता हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार थे और अक्टूबर तक रोम पर मार्च की योजना बन चुकी थी. इतालवी सरकार फासीवादी हिंसा को रोकने में विफल रही. कई स्थानीय अधिकारी या तो इस हिंसा को नजरअंदाज कर रहे थे या स्वयं इसका समर्थन कर रहे थे. इस निष्क्रियता ने फासीवादियों को और अधिक साहसी बना दिया जिससे वे कई शहरों पर कब्जा करने में सफल रहे. 23 अक्टूबर 1922 को फासीवादियों ने बोलों और ट्रेंटो पर कब्जा कर लिया और स्थानीय प्रशासन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया. सरकार की निष्क्रियता ने मुसोलिनी को यह विश्वास दिलाया कि वे सीधे रोम पर कब्जा कर सकते हैं.

24 अक्टूबर 1922 को नापली में 60 हजार काली शर्ट पहने समर्थकों के सामने बोलते हुए मुसोलिनी ने एक नई रोम के पुनर्जागरण की भविष्यवाणी की. उन्होंने घोषणा की कि इटली पर शासन करने का अधिकार केवल फासीवादियों को है. भाषण के बाद उन्होंने अपने प्रमुख सहयोगियों के साथ गुप्त बैठक की और रोम पर कब्जा करने की योजना बनाई. दिलचस्प बात यह है कि खुद मुसोलिनी इस मार्च में शामिल नहीं हुए बल्कि मिलान में अपने मुख्यालय से इसे निर्देशित करते रहे.

जब 3000 फासीवादी सैनिक रोम पहुंचे तो सरकार के पास कोई प्रतिक्रिया देने की शक्ति नहीं थी. यह मार्च एक सैन्य विजय की तुलना में सत्ता प्रदर्शन अधिक था. इस बीच चतुर मुसोलिनी इटली के राजा के साथ सीधे बातचीत कर रहे थे ताकि उन्हें देश का नेतृत्व सौंप दिया जाए. 30 अक्टूबर 1922 को रोम पर मार्च के बाद राजा के पास मुसोलिनी को सत्ता सौंपने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. सेना, उद्योगपतियों और दक्षिणपंथी धड़े के समर्थन के साथ मुसोलिनी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया.

राजा विक्टोरियो इमानुएल तीसरे गृह युद्ध की आशंका और फासीवादी समर्थक जनरलों के दबाव में अंततः मुसोलिनी के आगे झुक गए. नई सरकार के प्रमुख के रूप में मुसोलिनी जब रोम पहुंचे तो वे काली शर्ट के बजाय पारंपरिक औपचारिक कोर्ट में थे. यह प्रतीकात्मक बदलाव था जिससे उन्होंने रूढ़िवादी शक्तियों को यह आश्वासन दिया कि वे एक जिम्मेदार राजनेता हैं ना कि केवल एक क्रांतिकारी नेता. हालांकि यह संवैधानिक वैधता की छवि जल्द ही धूमिल हो गई क्योंकि मुसोलिनी ने व्यवस्थित रूप से इटली की लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट करना शुरू कर दिया.

इसके बाद के 21 वर्षों तक मुसोलिनी इटली के निरंकुश तानाशाह बने रहे. आतंक की मशीनरी, राजनीतिक दमन और नस्लीय उत्पीड़न, फासीवाद का विरोध करने वाले कुछ गिनेचुने स्थानों में से एक ट्यूरिन था. रोम पर मार्च के कुछ महीनों बाद मुसोलिनी की काली शर्टधारी सेना ने इतालवी इतिहास के सबसे भयानक नरसंहारों में से एक को अंजाम दिया.

17 से 18 दिसंबर 1922 की रात एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता ने ट्यूरिन में दो फासीवादियों की हत्या कर दी. जिसके जवाब में अत्यधिक क्रूर और रक्त रंजित बदला लिया गया. उसी रात मुसोलिनी की सेना ने स्थानीय श्रमिक संघ के मुख्यालय पर हमला कर उसे जला दिया और इतालवी समाजवादी पार्टी के स्वामित्व वाले दो क्लबों पर हमला किया. इसके बाद एंटोनियो ग्रामशी द्वारा संपादित कम्युनिस्ट अखबार लॉर्ड इनवो को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया. इसके संपादकों को ट्यूरिन के केंद्रीय पार्क में ले जाया गया और मौत की धमकी दी गई.

सशस्त्र फासीवादियों ने शहर में कम्युनिस्टों और श्रमिक संघ के सदस्यों को पकड़ कर उनमें से कई की बेरहमी से हत्या कर दी. कुछ को पीट-पीट कर मार डाला गया. अराजकतावादी और श्रमिक संघ नेता पियत्रो फेरेरो की मौत विशेष रूप से भयावह थी. यातनाएं देने के बाद फासीवादियों ने उसे एक ट्रक से बांध दिया और पूरी रफ्तार से कोरसो विटोरियो इमानुएल की सड़कों पर घसीटा. जबकि वे हंसते और गाते रहे. उनका शव किंग विटोरियो इमानुएल द्वितीय की प्रतिमा के नीचे फेंक दिया गया. जब स्थानीय पुलिस ने उसका शव पाया तो वह इतना क्षतविक्षत हो चुका था कि उसकी पहचान केवल उसकी जेब में मिले एक दस्तावेज से की जा सकी.

हालांकि फासीवादी संसद में अल्पसंख्यक थे. लेकिन बहुत कम सांसद या सीनेटर उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटा पाए क्योंकि उन्हें ट्यूरिन की हिंसा का शिकार होने का डर था. उन कुछ लोगों में से एक जो खुलकर फासीवादियों की आलोचना करने का साहस रखते थे. वे थे समाजवादी सांसद जियाकोमो मत्तिती जो 1919 में चुने गए थे. उन्होंने 1924 में फंसीवादियों का पर्दाफाश फासीवादी शासन का एक वर्ष नामक एक पुस्तक भी प्रकाशित की. जिसने उनकी मृत्यु की भविष्यवाणी कर दी थी.

10 जून 1924 को मत्तोती अचानक लापता हो गए. वे संसद में भाषण देने वाले थे. जिसमें वे राष्ट्रीय फासीवादी पार्टी और सिंक्लेयर ओनियल के बीच हुए भ्रष्टाचार का खुलासा करने जा रहे थे. जिससे फासीवादी प्रचार के लिए धन प्राप्त किया गया था. इसमें मुसोलिनी के भाई अर्नाल्डो की संलिप्तता भी थी. 2 महीने बाद उनका क्षतविक्षत और सड़ा गला शव रियानो में पाया गया, जो उनके अंतिम बार देखे जाने की जगह से 23 किलोमीटर दूर था.

मत्यत्ति को सड़क पर अगवा कर एक बिना पहचान वाले वाहन में डाल दिया गया. उन्होंने भागने की कोशिश की लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया और एक बढ़ई की फाइल से बार-बार गोदा गया. फॉरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार अपहरण के कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई थी. कुछ दिनों बाद पांच काली शर्टधारी फासीवादियों को गिरफ्तार किया गया. केवल तीन को दोषी ठहराया गया. लेकिन जल्द ही राजा विटोर इमैनुअल तीसरे द्वारा दी गई माफी के तहत उन्हें रिहा कर दिया गया.

मत्योत्ति मामला फासीवादी सरकार के लिए सबसे कठिन परीक्षा थी. क्योंकि इसमें दिखाया गया था कि वे कितनी क्रूरता और दंड मुक्ति के साथ कार्य कर सकते थे. इतालवी जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस निशंस हत्या से स्तब्ध रह गए. कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि जन आक्रोश के दबाव में फासीवादी शासन गिर सकता है. लेकिन मुसोलिनी ने कुशलता से स्थिति को संभाला. उन्होंने हत्या में किसी भी प्रत्यक्ष संलिप्तता से इंकार किया. जबकि साथ ही उन्होंने राज्य मशीनरी पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली. अंततः यह स्पष्ट हो गया कि पुलिस, राजा और इतालवी पूंजीपति वर्ग सभी मुसोलिनी के समर्थन में थे.

इस घटना का एक और परिणाम यह हुआ कि फासीवाद विरोधी सांसदों और सीनेटरों ने महसूस किया कि फासीवादी पार्टी जिसने सत्ता और हिंसा दोनों पर पूर्ण नियंत्रण पा लिया था, इसके खिलाफ लड़ाई बेकार थी और वे धीरे-धीरे संसद छोड़ने लगे. हालांकि खुद फासीवादी पार्टी के भीतर भी विद्रोह था. 1924 की शरद ऋतु के दौरान पार्टी के कट्टरपंथी गुट ने मुसोलिनी को तख्ता पलट की धमकी दी.

31 दिसंबर की रात हुए टकराव के 3 दिन बाद मुसोलिनी ने एक प्रसिद्ध भाषण दिया जिसमें उन्होंने न केवल फासीवाद विरोधियों पर हमला किया बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि फासीवाद का एकमात्र नेता वही थे. उन्होंने स्वीकार किया कि सभी हिंसा की जिम्मेदारी उन्हीं की थी क्योंकि उन्होंने ही ऐसा माहौल बनाया था जिसमें यह पनप सकी. उन्होंने सभी इटालियनों को चेतावनी देते हुए कहा कि देश को स्थिरता की जरूरत है और इसे केवल फासीवाद ही किसी भी आवश्यक साधन से सुनिश्चित कर सकता है. यह भाषण इटली में वास्तविक तानाशाही की शुरुआत थी.

फासीवादी शासन के दौरान दमन के लिए बनाई गई सबसे प्रभावी मशीनों में से एक थी. इटली की गुप्त पुलिस ओवीआरए जो 1927 में स्थापित की गई थी. जर्मनी में गेस्टापो के गठन से छह साल पहले ओवीआरए हिटलर की गेस्टापो के लिए एक प्रत्यक्ष पूर्ववर्ती और मॉडल था. स्वयं हेनरिक हिमलर ने गेस्टापो के निर्माण के दौरान ओवीआरए के नेताओं से कई बार मुलाकात की. 1937 में दोनों संगठनों के बीच सहयोग और खुफिया साझेदारी के लिए एक गुप्त समझौता हुआ.

ओवेरा का निगरानी तंत्र बहुत प्रभावी था. इसने लगभग 1 लाख संभावित असंतुष्टों की व्यक्तिगत फाइलें रखी थी और अपने चरम पर 1 लाख मुखबिरों का एक नेटवर्क संचालित करता था. 1930 तक ओवियारे प्रतिदिन लगभग 20,000 छापेमारी करता था. मुख्य रूप से कम्युनिस्टों और विपक्षी दलों के सदस्यों को निशाना बनाते हुए लगभग 6000 लोगों को गिरफ्तार किया गया और जिन्हें सरकार के खिलाफ साजिश करने का दोषी पाया गया, उन्हें भूमध्य सागरीय द्वीपों पर निर्वासित कर दिया गया. इन स्थानों की परिस्थितियां इतनी दयनीय थी कि कई फासीवाद विरोधी कार्यकर्ताओं ने इटली छोड़ने को प्राथमिकता दी.

ओवीआरए गुप्त रूप से सार्वजनिक स्थानों पर माइक्रोफोन लगाने के लिए कुख्यात थी. जिससे वह लोगों की बातचीत सुनकर उनके विचारों और भावनाओं को समझ सकती थी. इसका मुख्य उद्देश्य किसी भी तरह की फासीवाद विरोधी गतिविधियों को रोकना था. ओवीआरए का प्रभाव केवल घरेलू निगरानी तक सीमित नहीं था. यह अन्य देशों में भी काम करता था और प्रवासी, इतालवी, असंतुष्टों और फासीवाद विरोधी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाता था.

ओवीआरए द्वारा किए गए सबसे चर्चित हत्याओं में से एक कार्लो रोसेली और उनके भाई नेल्लो की थी. 9 जून 1937 को कार्लो और नेल्लो रोसेली जो पहले स्पेन में लड़े थे. फ्रांस के नरमंडी तट पर यात्रा कर रहे थे. एक साल पहले ओवीआरए ने कार्लो को सबसे खतरनाक प्रवासी समाजवादी के रूप में चिन्हित किया था और उनकी हत्या की सिफारिश की थी. ओवेरा के यूरोपीय नेटवर्क के माध्यम से फ्रांसीसी फासीवादियों को उनकी हत्या करने का निर्देश दिया गया.

रोसेली का अंतिम संस्कार बहुत बड़ा था. जिसमें लगभग 1 लाख वामपंथी कार्यकर्ता उनके शव के साथ पेरिस के पेरे लाशेज कब्रिस्तान तक गए. फासीवादी आतंकवाद के खिलाफ अपना विरोध जताते हुए जब मुसोलिनी ने ओवेरा गुप्त पुलिस की स्थापना का आदेश दिया तो उसका प्राथमिक लक्ष्य कम्युनिस्ट पार्टी थी. लेकिन इसमें समाजवादी, गणराज्यवादी और कोई भी व्यक्ति जिसे फासीवाद विरोधी माना जाता था, वो भी शामिल था. उनकी निगरानी निर्मम, गहन और घुसपैठ करने वाली थी. यहां तक कि जो लोग केवल मामूली रूप से उपनिवेशवादी गतिविधियों से जुड़े थे जैसे कि उनके परिवार के सदस्य वे भी पुलिस जांच में फंस सकते थे.

स्थानीय पुलिस कभी-कभी ओवीआरए के साथ काम करती थी और बंदियों के खिलाफ धमकी, हमले और यातनाओं के उनके तरीकों की सराहना करती थी. जब विरोध को कुचल दिया गया तो ओवीआरए ने अपनी निगरानी प्रणाली का उपयोग यह आकलन करने के लिए किया कि जनता शासन और इसके युद्ध संबंधी योजनाओं के बारे में क्या सोचती है. एक विशेष कार्यालय नियमित रूप से हजारों टेलीफोन कॉल सुनता था जिसमें फासीवादी अधिकारियों की भी कॉल शामिल थी ताकि उनकी निष्ठा की जांच की जा सके.

1930 के दशक की शुरुआत में यूरोप की परिस्थितियां काफी बदल गई. जर्मनी में हिटलर और नाजी पार्टी के सत्ता में आने से यूरोपीय संतुलन पूरी तरह बदल गया. अब मुसोलिनी के पास एक शक्तिशाली वैचारिक सहयोगी था जिसने उसे नए अवसर और चुनौतियां दोनों प्रदान की. हालांकि फासीवाद और नाजीवाद की विचारधाराओं के बीच कई महत्वपूर्ण अंतर थे. विशेष रूप से नस्लीय अशुद्धता और यहूदियों के प्रति व्यवहार को लेकर 1930 के दशक तक मुसोलिनी का राष्ट्रवाद महत्वपूर्ण रूप से नस्लवादी नहीं था. हालांकि इसमें यहूदी विरोधी तत्व मौजूद थे.

1932 में मुसोलिनी ने पत्रकार एमिल लुडविक से कहा था कि वह शुद्ध नस्ल की अवधारणा का समर्थन नहीं करता. यह कहते हुए कि विभिन्न नस्लों के मिश्रण ने ही इटालियनों को उनकी शक्ति और सुंदरता प्रदान की थी. उसी साक्षात्कार में उन्होंने यहूदियों को इटली के नागरिकों के रूप में सकारात्मक रूप से चित्रित किया. फासीवाद ने यहूदी पहचान और इतालवी राष्ट्रवाद के सह अस्तित्व का समर्थन किया. अप्रैल 1937 में मुसोलिनी ने एक साक्षात्कार में स्पष्ट रूप से कहा कि वह नाजी नस्लीय सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करता.

हालांकि सितंबर 1938 में इतालवी मंत्री परिषद ने एक कानून पारित किया जिसने यहूदियों के अधिकारों को बड़े पैमाने पर समाप्त कर दिया. सरकारी एजेंसियों की स्थापना की ताकि उन्हें दबाया जा सके और आर्यकरण नीतियों को अपनाया. इन यहूदी विरोधी कानूनों को लागू करने का निर्णय नाजी जर्मनी के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता था और यह दिखाता था कि मुसोलिनी अपने शासन को हिटलर के शासन के अधिक निकट लाना चाहता था. इस बदलाव ने उन हजारों इतालवी यहूदियों के साथ विश्वासघात किया जिन्होंने फासीवादी शासन के प्रति निष्ठा दिखाई थी और उनमें से कई ने इसकी सेवा भी की थी.

इटली की यहूदी समुदाय जो यूरोप के सबसे पुराने समुदायों में से एक थी और जिसकी जड़े रोमन साम्राज्य तक फैली हुई थी, अचानक हाशिये पर डाल दी गई और उस शासन द्वारा सताई गई जिसे उन्होंने कभी समर्थन दिया था. 1938 के नस्लीय कानूनों के पारित होने से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक यहूदी नागरिकों को नागरिक और आर्थिक जीवन के लगभग सभी पहलुओं से बाहर कर दिया गया.

उन्हें स्कूलों में जाने, सेना में भर्ती होने, व्यवसाय रखने, जमीन के मालिक होने या गैर यहूदी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति नहीं थी. वे सार्वजनिक प्रशासन, बैंकिंग, बीमा कंपनियों, समाचार पत्रों, प्रकाशनों या शैक्षणिक संस्थानों में भी काम नहीं कर सकते थे. यहूदियों और आर्य इटालियनों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया गया. विदेशी यहूदियों को निर्वासित करने का आदेश दिया गया. हालांकि इस उपाय को लागू करना मुश्किल साबित हुआ.

1940 तक मुसोलिनी ने इटली को आर्य बनाने का प्रयास किया और सभी विदेशी यहूदियों को बाहर निकालने की कोशिश की. लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के फैलने के कारण यह असंभव हो गया. परिणाम और भी भयावह निकला. यहूदी समुदाय को श्रम शिविरों में भेजा जाने लगा. इटली में नस्लीय कानूनों से पहले भी फासीवादी शासन ने पहले से ही जबरन कैद और श्रम शिविरों का उपयोग किया था.

1926 से सरकार ने किसी कानूनी प्रक्रिया के बिना राजनीतिक और सामाजिक नियंत्रण के लिए नजरबंदी का एक औपचारिक तंत्र स्थापित कर लिया था. मुसोलिनी के शासनकाल में 15,000 इटालियनों को राजनीतिक बंदी के रूप में और 25,000 को सामान्य बंदियों के रूप में कैद किया गया था. अधिकांश को दूरदराज के द्वीपों पर भेज दिया गया.

हालांकि दक्षिणी इटली के कुछ गांवों को भी नजरबंदी स्थलों के रूप में इस्तेमाल किया गया. सामान्य रूप से इन कैदियों की परिस्थितियां बेहद अमानवीय थी और जीवन की स्थितियां खराब थी. सुरक्षा की जिम्मेदारी नियमित पुलिस के बजाय काली शर्टधारी फासीवादियों पर थी जो अक्सर कैदियों को भयानक यातनाएं और क्रूर पिटाई देते थे. 1927 से सरकार ने एक प्रभावी श्रम शिविर प्रणाली विकसित कर ली थी जो हजारों कैदियों को रखने में सक्षम थी.

अन्य देशों के विपरीत इटली में दो प्रकार के शिविर थे. एक दमन के लिए और दूसरा विडंबना पूर्ण रूप से कैदियों की सुरक्षा के लिए. पहले प्रकार के शिविरों में स्लोवेनियाई, क्रोट्स, मॉन्टोंनेग्रिन, अल्बानियाई, ग्रीक, इथियोपियाई और लीबियाई कैदी रखे जाते थे. इन शिविरों में हालात भयानक थे. भोजन अपर्याप्त था. आश्रय असंतोषजनक था और चिकित्सा सुविधाएं लगभग न के बराबर थी. हजारों लोग बीमारियों और कुपोषण से मर गए और उन्हें बिना किसी पहचान के सामूहिक कब्रों में दफना दिया गया.

दूसरे प्रकार के शिविर विरोधाभास पूर्ण रूप से हजारों गैरइतालवी यहूदियों के लिए जीवन दान बन गए. क्योंकि इटली में शिविरों में बंद होने का मतलब था कि वे जर्मन सेना और क्रोएशियाई उस्ताशा शासन की पहुंच से बाहर थे. 1930 के दशक के अंत तक मुसोलिनी ने इटली के राज्यतंत्र को पूरी तरह बदल दिया था. जो कभी एक संवैधानिक राजशाही और संसदीय लोकतंत्र था, वह अब एक पूर्ण अधिनायकवादी राज्य बन चुका था, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को राष्ट्रीय महानता के नाम पर कुचल दिया गया था.

सार्वजनिक शिक्षा को फासीवादी प्रचार का साधन बना दिया गया था. जिससे बच्चों को डस, मुसोलिनी की पूजा करने और सैन्य बलिदान के लिए तैयार होने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था.  मीडिया पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में था. केवल वही समाचार प्रकाशित होते थे जो शासन को मंजूर होते थे और मुसोलिनी की उपलब्धियों की महिमा करते थे. उद्योगों का तेजी से राष्ट्रीयकरण किया जा रहा था और युद्ध उत्पादन की ओर मोड़ा जा रहा था. जबकि ओवीआरए की सर्वव्यापी निगरानी के तहत असहमति लगभग असंभव हो गई थी.

इटली युद्ध के लिए तैयार दिखता था लेकिन इसकी सैन्य क्षमता और बुनियादी ढांचा उस संघर्ष के लिए पूरी तरह अपर्याप्त थे, जो आने वाला था.

विस्तार और अत्याचार अफ्रीका से यूरोप तक

अक्टूबर 1935 में इथियोपिया पर इतालवी आक्रमण को व्यापक रूप से उन घटनाओं में से एक माना जाता है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध को जन्म दिया और लीग ओन्फ नेशंस की विश्वसनीयता को कमजोर कर दिया. अंतरराष्ट्रीय समुदाय की असहाय निगरानी में मुसोलिनी की सेना मई 1936 में राजधानी अदीस अबाबा तक पहुंच गई, जिससे सम्राट हेले सेलासी को निर्वासन में जाना पड़ा. लेकिन इथियोपिया अभी भी पूरी तरह से अधीन नहीं हुआ था.

इतालवी सेना को अरबगनोज देशभक्तों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जिनमें विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों के इथियोपियाई नागरिक शामिल थे. अगले कुछ वर्षों तक इन देशभक्तों ने गुप्त नेटवर्क की मदद से फासीवादी सेना के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध लड़ा. यह संघर्ष बेहद भीषण था और इसमें इतालवी सेना की ओर से क्रूर प्रतिशोध लिया गया. जनसंहार, घरों को जलाना, फसलों और पशुओं का विनाश.

अफ्रीका में इतालवी कब्जे के दौरान की सबसे रक्त रंजित तिथि 12 से 19 फरवरी 1937 के रूप में जानी जाती है. उस दिन विद्रोहियों ने रोडोल्फो ग्रजियानी जो उस समय इटालियन ईस्ट अफ्रीका का वायसराय था, की हत्या करने का प्रयास किया. ब्राजियानी बच गया. लेकिन तुरंत ही उसने कठोर प्रतिशोध का आदेश दिया. विडो कॉरतेसे जो संघीय सचिव था, ने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि वे तीन दिनों तक इथियोपियाई विद्रोहियों के खिलाफ कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं.

इन तीन दिनों के दौरान इतालवी सैनिकों ने ड्यूस-ड्यूस चिल्लाते हुए इथियोपियाई नागरिकों को चाकुओं और लाठियों से मार डाला. उन्होंने घरों पर पेट्रोल छिड़क कर उनमें आग लगा दी. जबकि लोग अंदर ही फंस गए. स्थानीय ग्रीक और अर्मेनियाई नागरिकों के घरों में घुसकर उनके नौकरों की हत्या कर दी गई. कुछ इतालवी सैनिकों ने मृतकों के शवों के ऊपर खड़े होकर तस्वीरें भी खींचवाई. केवल तीन दिनों में इतालवी सेना ने अदीबा में ही 14,400 से लेकर 3000 तक इथियोपियाई नागरिकों की हत्या कर दी.

हत्याओं की संख्या को लेकर विभिन्न अनुमानों में भारी अंतर है. इथियोपियाई स्रोतों का कहना है कि 300 लोग मारे गए. जबकि अन्य अनुमानों के अनुसार यह संख्या 14400 से 16000 के बीच थी. हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह संख्या लगभग 19200 पाई गई जो उस समय अदीसबा की कुल जनसंख्या का 20% थी. अगले हफ्ते तक कई इथियोपियाई नागरिकों को विद्रोह में शामिल होने के संदेह में गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई. जिनमें ब्लैक लायंस संगठन के सदस्य और उच्च वर्ग के लोग भी शामिल थे. कुछ को गोली मार दी गई. कुछ का सिर कलम कर दिया गया और कुछ को जिंदा जला दिया गया.

वसंत 1939 में इतालवी सेना ने इथियोपियाई प्रतिरोध सेनानियों, उनके परिवारों और नागरिकों को बाहर निकालने के लिए सरसों गैस, मस्टर्ड गैस का उपयोग किया. यह लोग एक गुफा में शरण लिए हुए थे, जिसे बाद में अमित सेगना वाशा विद्रोहियों की गुफा के रूप में जाना जाने लगा. 8 अप्रैल को 65वीं इनफेंट्री डिवीजन की रासायनिक इकाई वहां पहुंची. जिसके पास आरसीन युक्त हथियार और 200 किलोग्राम मस्टर्ड गैस थी. यह गैस युद्ध में उपयोग के लिए 1925 के जिनेवा प्रोटोकॉल द्वारा प्रतिबंधित थी. जिसका इटली भी हस्ताक्षर करता था.

9 अप्रैल की सुबह इथियोपियाई नागरिकों ने गुफा के प्रवेश द्वार पर रस्सियों से लटके हुए कुछ बेलनाकार वस्तुओं को देखा. कुछ ही पलों में विस्फोट और गोलियों की आवाज आई. गैस के कनस्तरों में छेद कर दिया गया और घने पीले धुएं ने पूरी गुफा को भर दिया. अंदर मौजूद सभी लोग तड़पते हुए मर गए क्योंकि जहरीली गैस ने उनके फेफड़ों, आंखों और त्वचा पर हमला किया.

इथियोपिया में रासायनिक हथियारों का यह उपयोग एक बहुत ही खतरनाक संकेत था कि यूरोप में भीषण युद्ध निकट था. मुसोलिनी ने इस गैस के उपयोग की खुली अनुमति दी थी. अंतरराष्ट्रीय संधियों को पूरी तरह अनदेखा करते हुए ताकि वह इतालवी सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता का प्रदर्शन कर सके. निर्दोष नागरिकों के खिलाफ निषिद्ध और अमानवीय तरीकों के इस प्रयोग ने फासीवादी विचारधारा को स्पष्ट रूप से प्रकट किया जिसमें शक्ति और प्रभुत्व को मानवीयता या नैतिकता से अधिक प्राथमिकता दी जाती थी.

जब जुलाई 1936 में स्पेनिश गृह युद्ध छिड़ा तो मुसोलिनी ने जनरल फ्रेंको को पूर्ण समर्थन देने का आश्वासन दिया. उसने तीन स्वयंसेवी फासीवादी डिवीजन भेजे जिनमें लगभग 75,000 सैनिक थे. इन्हें डओस लोकियरे ईश्वर ऐसा चाहता है. लास लामास निग्रास काली लपट्टे और लास प्लुमास काली पंखुड़ियां निग्रास काले पंख कहा गया. लेकिन इन नामों के बावजूद उनके पास युद्ध का अनुभव नहीं था और गुआ डाला जारा की लड़ाई में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा.

मुसोलिनी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उसकी वायु सेना थी जिसका उपयोग निहत्ते शहरों पर बमबारी कर भय फैलाने के लिए किया गया. इन हमलों को पाबलो पिकासो की ग्वेनिका पेंटिंग में अमर किया गया, जिसने इस नरसंहार की भयावहता को दिखाया जब जर्मन और इतालवी विमानों ने स्पेन के बास्क शहर पर हमला किया. इस बमबारी में 1654 नागरिकों के मारे जाने की पुष्टि बास्क सरकार ने की थी.  इटालवी वायु सेना ने शायद ही कभी सैन्य लक्ष्यों पर हमला किया. ग्वर्निका की तरह इसके अधिकतर बमबारी हमले रिपब्लिकन इलाकों की मनोबल तोड़ने के लिए किए गए. इसमें एलिकांटे, दुरांगो, ग्रैनोलेयर्स और बार्सिलोना पर हमले शामिल थे.

16 से 18 मार्च 1938 तक इतालवी वायुसेना ने मायोर्का से उड़ान भरकर बार्सिलोना पर 44 टन बम गिराए. इन बमों ने आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों को निशाना बनाया, जिससे 1300 नागरिक मारे गए और हजारों घायल या बेघर हो गए. 1939 में फ्रेंको की जीत के बाद इतालवी वायुसेना ने स्पेन में 728 बमबारी अभियानों को अंजाम दिया. 16558 बम गिराए और लगभग 5000 लोगों की जान ली जिनमें अधिकांश नागरिक थे. मुसोलिनी ने इसे सफल माना लेकिन जब उसके पुराने विमानों को 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध में तैनात किया गया तो वे ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स के आधुनिक विमानों के सामने बेकार साबित हुए और बड़ी संख्या में मार गिराए गए.

स्पेन में हस्तक्षेप

द्वितीय विश्व युद्ध में उपयोग की जाने वाली रणनीति और हथियारों के लिए एक परीक्षण मैदान बन गया. मुसोलिनी के लिए यह अन्य फासीवादी और साम्यवाद विरोधी शासन के प्रति अपनी एकजुटता दिखाने का अवसर भी था, जिससे अंततः अधिनायकवादी राज्यों का गठबंधन मजबूत हुआ जो धुरी का हिस्सा बने. स्पेनिश नागरिकों की पीड़ा उसके लिए कोई मायने नहीं रखती थी. उसके लिए केवल शक्ति का प्रदर्शन और हिटलर के जर्मनी के साथ संबंधों को मजबूत करना महत्वपूर्ण था.

फ्रंको की जीत को रोम में फासीवाद की बढ़ती शक्ति के प्रमाण के रूप में मनाया गया. भले ही यह जीत भयानक मानवीय क्षति के साथ आई थी. मर्दानगी और हिंसा मुसोलिनी की विचारधारा और प्रचार का एक प्रमुख हिस्सा थे. और इन्हीं सिद्धांतों को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इटली की सैन्य रणनीतियों में बेरहमी से लागू किया गया. 1940 में मुसोलिनी ने अंततः नाजी जर्मनी के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर किए जिससे दोनों अधिनायकवादी राष्ट्र सहयोगी बन गए. इस अवधि के दौरान इथियोपिया लीबिया और बाद में क्रोएशिया पर कब्जे के बाद मुसोलिनी ने घोषणा की कि इटली एक बार फिर एक साम्राज्य बन चुका है, जैसा कि रोमन काल में था.

इतालवी नागरिकों को इन कब्जे वाले क्षेत्रों में बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया. लगभग 1 लाख इतालवी उपनिवेशवादी लीबिया में और 1 लाख 65000 अफ्रीकी पूर्वी इटली में बस गए. पूर्वी यूरोप के कब्जे वाले क्षेत्रों में इतालवी फासीवादी नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध उत्पन्न हुआ. जिससे युगोस्लाविया के कुछ हिस्सों में पाटिजान मिलिसीया का गठन हुआ. इसके जवाब में इतालवी सेना ने बर्बर रणनीतियां अपनाई. गैर न्यायिक हत्याएं, सामूहिक नजरबंदी, संपत्तियों की जब्ती और गांवों को जलाना. इतालवी सरकार ने हजारों नागरिकों जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे को कंसंट्रेशन कैंपों में भेजा.

इन कैदियों में 3000 स्लोवेनियाई और 80 हजार डालमाटियन शामिल थे, जो उस समय इस क्रोशियाई क्षेत्र की कुल जनसंख्या का 12% थे. फासीवादी शासन के तहत यूरोप और अफ्रीका में इतालवी सेना द्वारा किए गए सभी नरसंहारों की प्रक्रिया एक जैसी थी. जब भी किसी विद्रोही या स्थानीय प्रतिरोध सेनानी द्वारा इतालवी एजेंट मारे जाते तो बदले में इतालवी सेना सैकड़ों या हजारों निर्दोष नागरिकों को मार डालती. महिलाओं के साथ दुष्कर्म करती और बच्चों का अपहरण कर लेती.

ऐसा ही पडूम गांव में हुआ जिसे 1941 में इटली के फयूमे प्रांत में शामिल कर लिया गया था. इस क्षेत्र का प्रफेक्ट कर्नल कैमिकिया नेग्रा टेमिस्टोकले टेस्ला था जो उन लोगों को गंभीर सजा देने की धमकी देता था जो इतालवी सेना के साथ सहयोग करने से इंकार करते थे. 1942 में जलेन्य गांव में टेस्टा ने 34 निर्दोष ग्रामीणों को गोली मारने का आदेश दिया. उसी वर्ष जून में चार इतालवी नागरिकों की हत्या का बदला लेने के लिए उसने पडूम गांव को निशाना बनाया.

12 जुलाई 1942 की सुबह 250 इतालवी सैनिकों ने दूसरे कैमिकिया नेग्रा एमिलियानो बटालियन के तहत मेजर आर्मांडो जरले के नेतृत्व में पडहूम में प्रवेश किया. उन्होंने 16 से 74 वर्ष की आयु के सभी पुरुषों को इकट्ठा किया और 91 पुरुषों को गिरफ्तार किया. 14 ने गिरफ्तारी का विरोध किया और उन्हें तत्काल गोली मार दी गई. शेष 77 लोगों को गांव के दक्षिण में खुले मैदान में ले जाया गया. वहां एक बड़ा गड्ढा था. यह स्पष्ट नहीं है कि वह पहले से मौजूद था या उसी दिन खोदा गया. कैदियों को पांच-पांच के समूहों में गड्ढे के किनारे ले जाया गया और गोली मार दी गई जिससे उनके बंधे हुए शव गड्ढे में गिर गए.

इस तरह 20 समूहों को मौत के घाट उतार दिया गया और 100 से अधिक निर्दोष ग्रामीणों को बेरहमी से मार दिया गया. इतनी क्रूरता दिखाने के बावजूद फासीवादी सैन्य कमांडर युद्ध लड़ने में बेहद अक्षम थे. जून 1940 में जब इटली द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल हुआ तो जल्द ही मुसोलिनी की सेना की भारी कमजोरियां उजागर हो गई. ड्यूस मुसोलिनी ने वर्षों तक इतालवी सेना की ताकत और आधुनिकता का दावा किया था लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत थी. हथियार पुराने थे. रणनीति कमजोर थी और सैनिकों का मनोबल बेहद कम था.

इटली की उत्तर अफ्रीका और ग्रीस में शुरुआती सैन्य अभियान शर्मनाक पराजय में समाप्त हुए, जिससे हिटलर को अपने संघर्षत सहयोगी को बचाने के लिए कीमती संसाधन भेजने पड़े. लगभग सभी प्रमुख युद्धों में हारने के बाद इटली को अंततः 3 सितंबर 1943 को मित्र राष्ट्रों के साथ एक युद्ध विराम समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ा. अब इटली के तथाकथित आर्य नागरिकों को वही भुगतना पड़ा जो यहूदी, इथियोपियाई, लीबियाई और क्रोएशियाई नागरिकों ने वर्षों तक सहा था.

जुलाई 1943 में मित्र देशों की सेनाओं ने सिसली पर आक्रमण किया, जिससे राजा विटोर इमानुएल तीसरे को 25 जुलाई को मुसोलिनी को सत्ता से हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा. उसी वर्ष जब राजा ने मित्र देशों के साथ युद्ध विराम पर हस्ताक्षर किए तो जर्मन सेना ने इटली के उत्तरी और मध्य भाग पर हमला कर दिया, जिससे युद्ध इटली की धरती पर पहुंच गया. अगले 2 वर्षों में 1 लाख 50000 से अधिक इताल्वी नागरिक युद्ध की विभीषिका में मारे गए.

मित्र राष्ट्रों ने भी अपने कब्जे के दौरान कई क्रूरताएं की जिसमें उनके पूर्व सहयोगियों इटालियनों के खिलाफ कई बड़े नरसंहार शामिल थे. इटली में जर्मन वाफेन एसेस इकाइयों द्वारा सबसे कुख्यात हत्या मारजाबोटो नरसंहार था. बोलोगना के पास मारजाबोटो गांव में वाफेन ऐसे सैनिकों ने लगभग 800 नागरिकों की सामूहिक हत्या कर दी, जो अब भी इटली के इतिहास में सबसे भीषण गोलीबारी नरसंहार के रूप में दर्ज है.

पीड़ितों में 155 बच्चे 10 वर्ष से कम उम्र के थे और 316 महिलाएं थी. यह सभी पूरी तरह निर्दोष थे. उनका एकमात्र अपराध यह था कि वे इतालवी नागरिक थे और मारजाबोटो में रहते थे. शासन का पतन और सालो गणराज्य था तो मुसोलिनी ने अपने सहयोगी हिटलर से बेतहाशा मदद मांगी. 19 जुलाई 1943 को उसने फेलतरे में फ्यूहर के साथ बैठक की. लेकिन हिटलर ने क्रूर स्पष्टता के साथ उसे बताया कि वे कुछ नहीं कर सकते और इटली जल्द ही गिर जाएगा.

जब वे बात कर रहे थे, रोम पर मित्र देशों की वायु सेनाओं द्वारा बमबारी की जा रही थी जो फासीवादी शासन के आसन्न पतन का एक आदर्श प्रतीक था. फेलतरे की बैठक दोनों तानाशाहों के बीच संबंधों में एक निर्णायक क्षण थी. हिटलर जिसे इटली की सैन्य अक्षमता पर गुस्सा था. अपने सहयोगी के प्रति अपनी घृणा को मुश्किल से छिपा पाया. मुसोलिनी जो एक समय में हिटलर के लिए मार्गदर्शक और आदर्श थे. अब अपमानित होकर उस व्यक्ति से मदद की भीख मांग रहे थे जिसने कभी उन्हें सराहा था.

बैठक के दौरान रोम की बमबारी ने डूचे की असहायता और जर्मनी के साथ उसके गठबंधन की निरर्थकता को रेखांकित कर दिया. मुसोलिनी इटली लौट आया. निराश और इस सच्चाई से अवगत कि उसके शासन का समय तेजी से समाप्त हो रहा है. कुछ ही समय बाद फासीवादी ग्रैंड काउंसिल ने मुसोलिनी को पद से हटाने के लिए एक याचिका पर हस्ताक्षर किए. हालांकि उनके पास इसे लागू करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था. राजा ने 25 जुलाई को उससे इस्तीफा देने को कहा. यह बताते हुए कि उसकी जगह पियत्रो बडोलियो लेंगे लेकिन उसे दंड मुक्ति की गारंटी दी.

विक्टर इमैनुएल तीसरे ने 200 पुलिसकर्मियों को सरकार भवन को घेरने का आदेश दिया और मुसोलिनी को रेड क्रॉस की एंबुलेंस में एक सुरक्षित घर ले जाया गया. इस प्रकार समाप्त हुआ वह शासन जिसने दो दशकों से अधिक समय तक इटली पर राज किया था. कम से कम दिखने में. मुसोलिनी का पतन पूरे इटली में स्वतः स्फूर्त उत्सवों के साथ मनाया गया. रोम, मिलान, नेपल्स और अन्य शहरों में प्रसन्न लोगों की भीड़ ने फासीवादी शासन के प्रतीकों को गिरा दिया. डूचे की मूर्तियों को नष्ट किया गया. सार्वजनिक भवनों से फासीवादी प्रतीक हटाए गए और मुसोलिनी के चित्र सड़कों पर जलाए गए.

वर्षों के दमन के बाद इटालियनों ने खुलेआम अपनी राहत और एक बेहतर भविष्य की आशा को व्यक्त किया. हालांकि यह उत्सव समय से पहले थे. इटली और मुसोलिनी का भाग्य अभी भी काले अध्यायों से भरा हुआ था. राजा को लगा कि वह साम्राज्य और अपनी सत्ता को बचा लेंगे. लेकिन वह गलत था. युद्ध विराम के बाद इटली एक गृह युद्ध में डूब गया. राजा और उसका परिवार बड़ोलियों और सरकार के सहयोगी लोग सहयोगी सेना की सुरक्षा में अपुलिया भाग गए. उन्होंने एक अस्थाई सरकार बनाई और जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा की जो हाल ही तक उनका मुख्य सहयोगी था.

इससे जर्मनी को उत्तरी इटली पर आक्रमण करने का मौका मिला जिसने आम नागरिकों और उन इतालवी सैनिकों के खिलाफ भयानक प्रतिशोध लिया जिन्होंने नाजियों के साथ लड़ाई जारी रखने से इंकार कर दिया. मुसोलिनी को पहले ला म्डालेना द्वीप पर और फिर ग्रान सासो दिटालिया पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित एक दूरस्थ पर्वतीय रिसोर्ट होटल कैंपो इंपेरातोरे में ले जाया गया. वहां वह बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह कट गया था.

सैकड़ों काराबिनियरी द्वारा संरक्षित सहयोगियों के हाथों सौंपे जाने के डर से उसने अपनी कलाई काटने की कोशिशकी लेकिन असफल रहा. उसे पता नहीं था कि हिटलर पहले से ही उसकी रिहाई की योजना बना रहा था. अपने फासीवादी सहयोगी को छोड़ने के लिए नहीं और अधिक महत्वपूर्ण रूप से उत्तरी इटली में एक कठपुतली सरकार स्थापित करने के लिए जो मित्र देशों के खिलाफ लड़ाई जारी रख सके.

12 सितंबर 1943 को युद्ध की सबसे साहसी बचाव अभियानों में से एक हुआ. ऑन प्रेशन ओक अंटनेमन आईके के नाम से जाने जाने वाले इस अभियान में एसएस अधिकारी ऑटो स्कोरजनी के नेतृत्व में जर्मन कमांडो ने उस पर्वतीय परिसर पर हवाई हमला किया जहां मुसोलिनी को बंदी बनाकर रखा गया था. ग्लाइडरों में सवार जर्मन पैराट्रूपर्स होटल में घुस गए और मुसोलिनी को अगवा करके हिटलर से मिलने के लिए जर्मनी ले गए. इस अभियान में केवल 4 मिनट लगे और जर्मन योजना की सटीकता और आश्चर्य के तत्व के कारण खून का एक भी कतरा नहीं बहा.

जब मुसोलिनी को पूर्वी प्रशा में हिटलर के मुख्यालय लाया गया तो वह एक टूटे हुए इंसान की तरह लग रहा था. थका हुआ, उदास और बिगड़ी हुई सेहत के साथ वह कभी के करिश्माई नेता की बस परछाई रह गया था. फिर भी हिटलर के लिए उसके लिए योजनाएं थी. कुछ लोगों के अनुसार यह व्यक्तिगत निष्ठा का प्रदर्शन था. लेकिन अधिक संभावना है कि यह रणनीतिक विचारों को दर्शाता था.

हिटलर ने मुसोलिनी को जर्मनी द्वारा कब्जा किए गए इतालवी क्षेत्रों में एक नया फासीवादी गणराज्य बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसमें वेर मार्क्स का सैन्य समर्थन होगा. 18 सितंबर को डूचे के एक भाषण ने फासीवादी पार्टी के पुनर्गठन की घोषणा की जिसे अब रिपब्लिकन फासिस्ट पार्टी कहा गया. मुसोलिनी ने दावा किया कि उसे राजशाही और बुरजुआ वर्ग ने धोखा दिया था और उन लोगों से बदला लेने का वादा किया जिन्होंने फासीवादी कारण को छोड़ दिया था.

उसने एक नए राज्य को बनाने की मंशा भी जताई जो फासीवाद के मूल आदर्शों के प्रति अधिक वफादार हो जिन्हें पिछले वर्षों में कथित रूप से भ्रष्ट कर दिया गया था. फिर भी उसकी आवाज में अब वह ऊर्जा और विश्वास नहीं था जो पहले उसे विशेष बनाते थे. रेडियो पर प्रसारित भाषण सुनने वाले कई लोगों के लिए यह स्पष्ट था कि पुनर्जीवित मुसोलिनी अब केवल हिटलर के हाथों की कठपुतली था.

23 सितंबर 1943 को मुसोलिनी इटली लौटा ताकि इटालियन सोशल रिपब्लिक आरएसआई का शासन कर सके जिसे सलो गणराज्य भी कहा जाता है. उस छोटे से झील किनारे के शहर के नाम पर जहां उसने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था बनाई.

जर्मनी द्वारा नियंत्रित यह कठपुतली राज्य कभी भी नागरिक असंतोष को नियंत्रित नहीं कर सका क्योंकि उसे एक ओर सहयोगियों से और दूसरी ओर बढ़ते हुए प्रतिरोधी आंदोलन से लड़ना पड़ा. केवल छह देशों ने आरएसआई को एक संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता दी और वे सभी धुरी राष्ट्रों के उपग्रह थे. यहां तक कि स्पेन, पुर्तगाल और विची फ्रांस ने भी कूटनीतिक संबंध स्थापित करने से इंकार कर दिया. सालो गणराज्य इतालवी फासीवाद का एक अधिक कट्टर और चरम संस्करण था जो सीधे जर्मन नाजीवाद से प्रभावित था. जबकि पिछला शासन नाजी नस्लीय विचारधारा से कुछ हद तक स्वतंत्र रहा था.

आरएसआई ने नरसंहारकारी यहूदी विरोध को पूरी तरह अपना लिया. आरएसआई के नियंत्रण वाले क्षेत्र में यहूदियों को गिरफ्तार किया गया और जर्मन नरसंहार शिविरों में निर्वासित कर दिया गया. नई फासीवादी मिलेशिया, रिपब्लिकन नेशनल गार्ड, यहूदियों और राजनीतिक विरोधियों के उत्पीड़न में एसएस के साथ सक्रिय रूप से सहयोग कर रही थी. आरएसआई ने विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध में भी भाग लिया. जिसमें उन्होंने प्रतिरोध का समर्थन करने के संदेह में कई नागरिकों पर अत्याचार किए.

1944 में मुसोलिनी ने हिटलर को सुझाव दिया कि उसे सोवियत संघ के बजाय ब्रिटेन को नष्ट करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. लेकिन हिटलर एक ऐसे रणनीतिकार से सलाह नहीं लेता था जिसे वह साधारण मानता था. मुसोलिनी गथिक लाइन एपिनिन पर्वतों में एक रक्षात्मक रेखा के साथ एक आक्रामक अभियान शुरू करना चाहता था. उसकी अल्पाइन डिवीजनों ने दिसंबर 1944 में कुछ लड़ाईयां जीती. लेकिन उसकी सेना मित्र देशों की तुलना में छोटी थी.

फरवरी 1945 में जब मित्र देशों ने अंततः गौथिक लाइन को पार कर लिया तो स्थिति निराशाजनक हो गई. डूचे के लिए समर्थन बिखरने लगा और कई सैन्य अधिकारियों ने गुप्त रूप से मित्र देशों के साथ युद्ध विराम की बातचीत करने की कोशिश की. जैसे-जैसे युद्ध अपने अंत के करीब पहुंच रहा था, मुसोलिनी की स्थिति और अधिक अस्थिर होती जा रही थी.

दक्षिण से मित्र देशों की प्रगति और प्रतिरोधी विद्रोहियों द्वारा नियंत्रित क्षेत्र के विस्तार ने आरएसआई के नियंत्रण वाले इलाके को लगातार घटा दिया. जबरन भर्ती से लोग बड़े पैमाने पर भाग रहे थे और कई सैनिक सेना से भाग जा रहे थे. स्वयं मुसोलिनी भी वास्तविकता से कटे हुए लगते थे. कभी भव्य सैन्य योजनाएं बनाते हुए उत्साह में होते और कभी हार की अनिवार्यता को स्वीकारते हुए गहरे अवसाद में चले जाते.

सत्ता में उनके अंतिम महीनों को शुद्धिकरण, त्वरित फांसी और जुलाई 1943 के गद्दारों के खिलाफ बदले की कारवाइयों द्वारा चिन्हित किया गया था. एक ऐसे शासन पर नियंत्रण बनाए रखने का बेतुका प्रयास जो पूरी हिसाब किताब का वक्त मुसोलिनी की गिरफ्तारी और निष्पादन जब 1945 के वसंत में जर्मनी की हार तय हो गई तो मुसोलिनी के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे.

18 अप्रैल को वह मिलान गया जहां उसने फासीवाद विरोधी नेताओं से बातचीत करने की असफल कोशिश की ताकि किसी तरह अपनी जान बचाई जा सके. मिलान के आर्च बिशप कार्डिनल इल्फोनसो शूस्टर ने मध्यस्थता करने का प्रयास किया. लेकिन राष्ट्रीय मुक्ति समिति सीएलएन द्वारा प्रस्तावित बिना शर्त आत्मसमर्पण की शर्तें मुसोलिनी को अस्वीकार्य लगी.

इस बीच मित्र राष्ट्रों की सेनाएं तेजी से आगे बढ़ रही थी और इटली के उत्तरी भाग में पाटिजान बलों का नियंत्रण बढ़ता जा रहा था. भागने की खिड़की तेजी से बंद हो रही थी. मिलान में आर्चबिश के महल में हुई विफल बैठक के बाद मुसोलिनी ने उत्तर की ओर भागने का फैसला किया. हालांकि उसका कोई स्पष्ट गंतव्य नहीं था. शायद वह स्विट्जरलैंड या ऑल्प्स में स्थित जर्मन ठिकानों तक पहुंचने की उम्मीद कर रहा था.

वह एसएस सैनिक की वर्दी में भेष बदलकर भाग रहा था और एक जर्मन काफिले के साथ यात्रा कर रहा था, जिसका नेतृत्व लुफ्टवाफे के लेफ्टिनेंट शालमेयर कर रहे थे. उसकी पत्नी राचेले और उसके छोटे बच्चे कोमो में ही रह गए. लेकिन उसने अपनी प्रेमिका क्लारा पेटाची और उसके भाई मार्शेलो को साथ ले लिया जो स्पेनिश काउंसिल और उसकी पत्नी का भेष बनाए हुए थे. अन्य फासीवादी नेता जैसे एलेजेंड्रो पावोलिनी और निकोला बमबाची भी इस समूह में शामिल थे.

मुसोलिनी का यह पलायन पावोलिनी कॉलम का हिस्सा था. जिसमें फासीवादी शासन के उच्च अधिकारी, उनके परिवार और महत्वपूर्ण दस्तावेजों से भरे वाहन शामिल थे. यह अव्यवस्थित और अराजक समूह फासीवादी इटली के अंतिम दिनों की अराजकता का प्रतीक था. कुछ अधिकारियों के पास वर्षों की लूट से अर्जित सोना, पैसा और गहने थे. जबकि कुछ महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों को नष्ट करने की योजना बना रहे थे या उन्हें सौदेबाजी के रूप में इस्तेमाल करना चाहते थे. लेकिन अधिकांश लोग केवल अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे. यह काफिला धीरे-धीरे उन सड़कों से गुजर रहा था जो पहले से ही शरणार्थियों और पीछे हट रही जर्मन सेना से भरी हुई थी.

फासीवादी साम्राज्य के अराजक अंत का सही प्रतिबिंब 27 अप्रैल को सुबह 6:30 पर डोंगो के पास यह काफिला 52वी गरिबालदी ब्रिगेड के कम्युनिस्ट पार्टीज जानों द्वारा पकड़ लिया गया जिसका नेतृत्व उर्बानो लाचारो बिल कर रहे थे. पहले हल्की झड़प हुई लेकिन जब जर्मनों ने विद्रोही बलों की बढ़ती संख्या देखी तो उन्होंने बातचीत का फैसला किया.

पाटीजानों ने जर्मनों को उत्तर की ओर आगे बढ़ने की अनुमति दी लेकिन सभी इतालवी फांसीवादियों को आत्मसमर्पण करना पड़ा. शाम 7:00 बजे जब पाटीजान सैनिक फासीवादी अधिकारियों के दस्तावेजों की जांच कर रहे थे. तभी जोसेपे नेगरी ने मुसोलिनी को पहचान लिया और इसकी सूचना लाचारो को दी. मुसोलिनी ने खुद को टेनेंटे लेफ्टिनेंट टेननेटे बताकर पहचान छुपाने की कोशिश की लेकिन उसका चेहरा आसानी से पहचाना जा सकता था, भले ही उसने सैन्यकोट और हेलमेट पहना हुआ था.

जब पाटिजानों ने उसे घेर लिया तो उसने बिना किसी प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया और कहा मैं मुसोलिनी हूं. अगर तुम मुझे मित्र राष्ट्रों को सौंप दोगे तो मेरा अंतरराष्ट्रीय सम्मान इटली को बेहतर शांति शर्तें दिलाने में मदद करेगा. यह एक पराजित तानाशाह की निरर्थक याचना थी जो हकीकत से पूरी तरह कट चुका था.

पाटिजान जिन्होंने अपने परिवारों को उसकी क्रूर नीतियों के कारण खो दिया था, उसे मित्र राष्ट्रों को सौंपने का कोई इरादा नहीं रखते थे. उसी रात मुसोलिनी की गिरफ्तारी की खबर मिलान पहुंच गई और इसे भविष्य के इतालवी राष्ट्रपति और उस समय राष्ट्रीय मुक्ति समिति के नेता सेंड्रो पेरतीनी ने रेडियो पर घोषणा की.

भावनाओं से भरी आवाज में पेरतीनी ने कहा जल्लाद गिर चुका है. इसके तुरंत बाद उन्होंने यह भी घोषणा की कि मुसोलिनी को एक पागल कुत्ते की तरह गोली मार दी जानी चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कोई व्यक्तिगत बदला नहीं था बल्कि इटली को फासीवाद से मुक्त करने के लिए आवश्यक क्रांतिकारी न्याय था.

28 अप्रैल की सुबह मुसोलिनी और क्लारा पिटाची को डोंगो के एक ग्रामीण घर में ले जाया गया. मिलान से आए एक समूह को उन्हें तुरंत फांसी देने का आदेश मिला था, बिना किसी मुकदमे या औपचारिकताओं के. यह आदेश मिलान में स्थित उच्चस्तरीय पाटीजान नेतृत्व से आया था, जो चिंतित था कि अगर मुसोलिनी को जीवित रखा गया तो मित्र राष्ट्र या अधिक उदारवादी नेता उसे मुकदमे में बचा सकते हैं. इसलिए उन्होंने सुनिश्चित किया कि केवल उसकी मृत्यु ही फासीवाद को समाप्त कर सकती थी.

फिएट कार में बिठाकर मुसोलिनी और पिटाची को कोमो झील के पास गलिनोदी मेजग्रा गांव ले जाया गया. जहां उनका अंतिम समय आ चुका था. पाटीजान सैनिकों ने मुसोलिनी और पिटाची को विला बेलमोंटे की ओर ले जाया जो झील के सामने स्थित एक आवास था. कम्युनिस्ट कमांडर वाल्टर ओडिसियो जिसे कर्नल वालेरियो के नाम से जाना जाता था, ने उन्हें गाड़ी से उतरने का आदेश दिया.

मुसोलिनी जो काले कोर्ट में था चुपचाप खड़ा रहा, मानो अपने भाग्य को स्वीकार कर चुका था. पिटाची घबराई हुई थी और उसने ड्यूस का हाथ कसकर पकड़ लिया, मानो उसे बचाने की कोशिश कर रही हो. ओडिसियो ने इतालवी निर्मित मास 38 सबमशीन गण निकाली और बिना किसी औपचारिकता के कहा राष्ट्रीय मुक्ति समिति के आदेश से मैं बेनिटो मुसोलिनी के खिलाफ मौत की सजा लागू करने आया हूं.

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मुसोलिनी ने अपना कोर्ट खोला, अपना सीना उजागर किया और कहा छाती में गोली मारो. ओडिसियो ने बंदूक तानी लेकिन ऐन मौके पर उसकी गणजाम हो गई. जिससे एक क्षणिक नाटकीय तनाव पैदा हो गया. इसी बीच क्लारा पिटाची दौड़कर मुसोलिनी के सामने खड़ी हो गई. उसे कसकर पकड़ते हुए चिल्लाई – तुम इसे मार नहीं सकते.

ओडिसियो ने तुरंत एमपी40 मशीन गन उठाई और एक लंबी गोलीबारी की. जिससे पहले पिटाची गिरी और फिर मुसोलिनी का शरीर भी नीचे गिर पड़ा. ओडिसियो ने पास जाकर दो और गोलियां चलाई. एक उसके हृदय में और दूसरी उसके सिर में यह सुनिश्चित करने के लिए कि तानाशाह वास्तव में मर चुका था. घड़ी में 4:10 बजे थे. जिस व्यक्ति ने दो दशकों तक लोहे की मुट्ठी से इटली पर शासन किया था, वह अब एक गंदे सड़क किनारे धूल में गिरा हुआ था. मृत उसी क्रूरता के साथ जिसे उसने अपने शासन में फैलाया था.

मुसोलिनी और अन्य फासीवादी नेताओं के शवों को एक ट्रक के पीछे फेंक दिया गया और मिलान ले जाया गया. रास्ते में किसी को भी शवों के पास जाने की अनुमति नहीं थी. जब तक कि वे 19 अप्रैल को पियाजा लोरेटो नहीं पहुंच गए. यह स्थान संयोग से नहीं चुना गया था. कुछ महीने पहले फासीवादियों ने यहां 15 पाटीजानों के शव लटकाए थे ताकि मिलान के नागरिकों को डराया जा सके और विरोध करने वालों को चेतावनी दी जा सके. अब इसी जगह पर मुसोलिनी, क्लारा पेटाची और अन्य फासीवादी नेताओं के शवों को प्रदर्शित किया गया. मानो यह न्यायिक प्रतिशोध का एक कार्य हो.

इसके बाद जो हुआ वह सामूहिक बदले का एक ऐसा दृश्य था जिसने यह दर्शाया कि फासीवादी शासन के वर्षों ने इटली को कितनी गहरी पीड़ा दी थी. शवों को उतार कर एक एसो पेट्रोल स्टेशन के सामने फेंक दिया गया. भीड़ तुरंत वहां इकट्ठा हो गई और कुछ ही देर में सैकड़ों से हजारों लोग वहां पहुंच गए. सामान्य नागरिक, जबरन श्रमिक शिविरों से लौटे बचे हुए लोग पीड़ितों के परिवारजन और पार्टीजान लड़ाके सभी इस राष्ट्रीय आक्रोश के क्षण में शामिल हो गए.

शवों को क्रूरता से अपमानित किया गया. जिसमें जनता का वर्षों की घृणा और आक्रोश झलक रहा था. लोग शवों पर थूक रहे थे. उन्हें लात मार रहे थे और लाठियों से पीट रहे थे. कुछ लोगों ने मृत शरीर पर गोलियां भी चलाई. एक महिला जिसका बेटा फासीवादियों द्वारा मारा गया था. मुसोलिनी के शरीर पर पांच गोलियां दागी. हर गोली अपने एक मृत बेटे के लिए.

कुछ लोगों ने शवों पर कूड़ा फेंका, यह दिखाने के लिए कि वे उन लोगों से कितनी नफरत करते थे. जिन्होंने वर्षों तक इटली को आतंक में रखा था. अंततः पाटिजानों ने शवों को पेट्रोल स्टेशन के लोहे के बीम से उल्टा लटकाने का फैसला किया क्योंकि इटली में गद्दारों के लिए यह पारंपरिक सजा थी. मुसोलिनी और पिटाची को रस्सियों से उनके पैरों से बांधकर लटकाया गया. उनके साथ अन्य फासीवादी नेताओं स्टाराचे, पाबोलिनी और बमबाची के शव भी टांग दिए गए.

तस्वीर को और भी भयावह बनाने के लिए शवों को आपस में बहुत करीब लटकाया गया, जिससे वे किसी कसाई खाने में मरे हुए जानवरों की तरह दिखने लगे. यह तस्वीर जिसमें मुसोलिनी का शव उल्टा लटका था, उसके कपड़े फटे और खून से सने हुए थे, इतिहास की सबसे शक्तिशाली छवियों में से एक बन गई. यह इटली में फासीवाद के अंत का एक प्रतीक और 20वीं सदी की सबसे चौंकाने वाली तस्वीरों में से एक बन गई.

मुसोलिनी का चेहरा इतना बिगड़ चुका था कि वह लगभग पहचान में नहीं आ रहा था. जबकि इसी चेहरे की तस्वीरें कभी स्कूल की किताबों और झंडों पर छपी होती थी. शव घंटों तक लटके रहे. हजारों मिलानी नागरिकों ने इस दृश्य को देखा जब तक कि उन्हें नीचे उतारकर मुसो को कब्रिस्तान में अज्ञात कब्रों में दफन नहीं कर दिया गया. शवों का सार्वजनिक प्रदर्शन और उनकी मृत्यु के बाद की हिंसा इतिहासकारों और विश्लेषकों द्वारा अलग-अलग तरीकों से व्याख्या की गई है. कुछ के लिए यह सामूहिक शुद्धिकरण का एक अनिवार्य कार्य था.

फासीवाद के भूत को समाप्त करने के लिए एक अनुष्ठान दूसरों के लिए यह उसी क्रूरता का प्रतिबिंब था. जिसने फासीवादी शासन को परिभाषित किया था. यह दर्शाता था कि राजनीतिक हिंसा किस हद तक इतालवी समाज में गहरी जड़े जमा चुकी थी. लेकिन एक बात निर्विवाद है. प्याजाले लोरेटो में उल्टे लटके मुसोलिनी की तस्वीर एक स्थाई चेतावनी बन गई कि तानाशाहों का अंत कैसा हो सकता है. लेकिन यह मुसोलिनी की कहानी का अंत नहीं था.

22 अप्रैल 1946 को उसकी लाश को कब्रिस्तान से चुरा लिया गया. इस काम को अंजाम देने वाले थे नव फासीवादी नेता डोमेनिको लेचसी और उसके साथी. यह घटना साबित करती है कि मुसोलिनी की मृत्यु के बाद भी वह एक विवादास्पद राजनीतिक प्रतीक बना रहा. शव चुराने वाले अपने नेता को एक गुमनाम कब्र में दफन देखना अपमानजनक मानते थे.

113 दिनों तक मुसोलिनी का शव कहां था ? यह एक रहस्य बना रहा. जिसने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित किया. अंततः अधिकारियों ने शव को बरामद कर लिया. इसे कई जगहों पर ले जाया गया था. लेकिन अंततः पाविया के कार्थूसियन मठ में छिपा दिया गया. जहां इसे गुदी नामक एक छोटे से बॉक्स में रखा गया था. बाद में शव को मुसोलिनी के परिवार को सौंप दिया गया. लेकिन इसे एक दशक से अधिक समय तक गुप्त रखा गया.

1957 में इतालवी सरकार ने आखिरकार इसे उसके जन्म स्थान प्रडपियों में स्थानांतरित करने की अनुमति दी. वहां मुसोलिनी की कब्र तुरंत नव फासीवादियों के लिए एक तीर्थ स्थल बन गई. आज भी हर साल हजारों लोग उसकी कब्र पर जाते हैं. विशेष रूप से उसके जन्म और मृत्यु की वर्षगांठ पर. यह स्थल हर साल लगभग 1 लाख आगंतुकों को आकर्षित करता है. जिनमें से कई लोग फासीवादी शासन के समर्थक होते हैं.

1971 में एक बम विस्फोट ने मुसोलिनी की कब्र को क्षतिग्रस्त कर दिया. हालांकि ताबूत को कोई नुकसान नहीं हुआ. यह हमला वामपंथी चरमपंथियों द्वारा किया गया माना जाता है. इस हमले की निंदा पूरे राजनीतिक स्पेक्ट्रम ने की और यह स्पष्ट हो गया कि इटली में अब राजनीतिक हिंसा को अस्वीकार करने की सहमति बन चुकी थी. लेकिन फिर भी मुसोलिनी की विरासत इतालवी राजनीति में एक विवादास्पद मुद्दा बनी रही.

29 अप्रैल 1945 को एडोल्फ हिटलर को मुसोलिनी की मृत्यु की सूचना मिली. नूरनाबर्ग परीक्षणों में हरमन गोरिंग ने गवाही दी कि उन्होंने और हिटलर ने मुसोलिनी के उल्टे लटके शव की तस्वीरें देखी थी. यह तस्वीर देखकर हिटलर को यह एहसास हुआ कि उसे कभी भी जीवित पकड़ा नहीं जाना चाहिए. 30 अप्रैल को एक दिन बाद हिटलर ने बर्लिन के बंकर में आत्महत्या कर ली. उसने वही नियति चुनी जिसे उसने अपने पुराने सहयोगी को झेलते देखा था. लेकिन वह सार्वजनिक अपमान से बच गया.

मुसोलिनी की खूनी विरासत फासीवादी तानाशाही पर विचार

मुसोलिनी 20वीं शताब्दी के सबसे क्रूर यूरोपीय तानाशाहों में से एक था. उसके शासन के दौरान सैकड़ों हजारों लोग मारे गए, जिनमें यहूदी, अफ्रीकी और इतालवी नागरिक शामिल थे. उसका शासन इटली और उसके कब्जे वाले क्षेत्रों में गहरी चोटें छोड़ गया. इतालवी फासीवाद ने एक ऐसा अधिनायकवादी मॉडल स्थापित किया जिसे विश्व स्तर पर अपनाया गया. इसका मुख्य सिद्धांत था कि व्यक्ति पूरी तरह से राज्य के अधीन हो जिसे मुसोलिनी ने इस नारे में व्यक्त किया – राज्य में सब कुछ राज्य के बाहर कुछ नहीं. राज्य के खिलाफ कुछ नहीं.

इसके जवाब में 1948 की इतालवी गणतांत्रिक संविधान ने फासीवादी पार्टी के पुनर्गठन पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगाया और संसदीय लोकतंत्र और सत्ता के विकेंद्रीकरण को स्थापित किया. अफ्रीका में इतालवी उपनिवेशों को दशकों तक शोषण, नस्लीय भेदभाव और हिंसक दमन का सामना करना पड़ा. इथियोपिया और लीबिया में बड़े पैमाने पर हत्याएं, रासायनिक हथियारों का उपयोग और जानबूझकर भुखमरी लाना यह सब द्वितीय विश्व युद्ध की कुछ सबसे भयानक घटनाओं की पूर्व संकल्पना थी.

इसी तरह स्पेन में फासीवादी बमबारी जो नागरिक आबादी को निशाना बनाती थी, युद्ध के दौरान व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली रणनीतियों का अग्रदूत बनी. इस शासन की सांस्कृतिक विरासत विरोधाभासी थी. हालांकि मुसोलिनी ने मत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शुरू की. जिनसे इटली को लाभ हुआ. लेकिन बुद्धिजीवियों की सेंसरशिप और उत्पीड़न के कारण सांस्कृतिक रूप से देश को भारी नुकसान हुआ. कई प्रतिष्ठित कलाकारों और विद्वानों को निर्वासन में जाने के लिए मजबूर किया गया या पूरी तरह से चुप करा दिया गया.

मुसोलिनी की यात्रा एक चेतावनी के रूप में कार्य करती है कि कैसे लोकतंत्र धीरे-धीरे तानाशाही में बदल सकता है. हिटलर के विपरीत मुसोलिनी ने शुरू में लगभग कानूनी तरीकों से सत्ता हासिल की. जनता के असंतोष और साम्यवाद के डर का फायदा उठाकर धीरे-धीरे उसने लोकतांत्रिक संस्थानों को नष्ट कर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया. युद्ध के बाद के वर्षों में एक प्रवृत्ति विकसित हुई जिसमें इटली की जिम्मेदारी को कम करने की कोशिश की गई. इसे अच्छे इतालवी बन इटालियानो के मिथक के रूप में जाना गया जिसमें कहा गया कि अधिकांश इटालवी लोग अनच्छुक फासीवादी थे और युद्ध के दौरान उन्होंने मानवीयता दिखाई.

हालांकि हाल के ऐतिहासिक शोधों ने इस कथा को चुनौती दी है और फासीवादी उपनिवेशवाद के अपराधों को स्पष्ट रूप से दस्तावेज किया है. मुसोलिनी और क्लारा पिटाची के शवों को पियाजाले लोरेटो में उल्टा लटकाए जाने की छवियां 20वीं सदी के आइकन बन गई. एक तानाशाह जिसने अपने व्यक्तित्व को शक्ति और मर्दानगी के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया था. उसकी मौत अंतिम अपमान साबित हुई. यह एक स्थाई दृश्य अनुस्मारक बन गया कि सत्ता का दुरुपयोग करने वालों का क्या हश्र हो सकता है. 75 साल बाद भी इटली में मुसोलिनी की छवि विवादास्पद बनी हुई है. हालांकि अधिकांश इटालवी लोग फासीवाद को अस्वीकार करते हैं, फिर भी एक छोटा लेकिन समर्पित वर्ग उसकी स्मृति की पूजा करता है.

कैसा पाउंड और फर्जान नुवा जैसे नव फासीवादी समूह उसकी विचारधारा को जीवित रखे हुए हैं. उसकी कब्र जो प्रेडपियो में स्थित है अब भी दूरदराज के दक्षिणपंथी समर्थकों के लिए तीर्थ स्थल बनी हुई है. मुसोलिनी की सबसे स्थाई विरासत वह नहीं है जिसकी उसने कल्पना की थी. उसने इटली के लिए एक नया साम्राज्य बनाने की कोशिश की लेकिन वह वास्तव में एक चेतावनी बन गया.

 

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