
प्रियंका ओम
ब्रा विमर्श कितना जरूरी, कितना गैर-जरूरी, जितना पहनना या न पहनना. इस विमर्श में पुरुषों की हिस्सेदारी मुझे नहीं चौंकाती, मैं उनकी दरियादिली देखकर आश्वस्त भी नहीं होती. यह मात्र सोशल मीडिया स्टंट मालूम होता है, तो कभी गुड बुक्स सिंड्रोम. अंतर्वस्त्र पहनना या न पहनना किसी भी व्यक्ति का या तो निजी चॉइस हो सकता है या उपलब्धता पर निर्भरता; आज भी लाखों बच्चियों/स्त्रियों के पास अंतर्वस्त्र की उपलब्धता नहीं है और वे पुरुष कामुकता का शिकार होती रहती हैं.
‘नो ब्रा’ के समर्थन में आज एक पोस्ट पर नजर पड़ी, अच्छी पोस्ट थी. उसमें लिखा था कि बिहार/झारखंड की स्त्रियां आज भी ब्रा नहीं पहनती हैं, बिहार/झारखंड यानी पिछड़ा राज्य, जबकि सक्षमता के आधार पर पिछले दो दशक से आदिवासी स्त्रियाँ भी बिना ब्रा के नहीं रहतीं; घर के कामों में हाथ बटाने वाली स्त्रियों ने अंतर्वस्त्र को बेहद जरूरी वस्त्र माना है. ‘झूला’ शायद दो दशक पहले की बात होगी.
मैंने अक्सर यह भी देखा है कि हम अपनी सुविधानुसार पश्चिम की भर्त्सना करने लगते हैं और कभी तो उनके उदाहरण प्रस्तुत कर आप ही खुद को पिछड़ा हुआ मान लेते हैं; खैर, पिछड़े हुए तो हम हैं ही बिना शक. जब हमें सेनेटरी पैड, स्त्रियों में स्वच्छता, बर्थ कंट्रोल डिस्कस करना चाहिए, तब हम नो ब्रा डिस्कस कर रहे हैं. तुलनात्मक विवेचना बराबरी में न हो तो बेअर्थ ही होता है; भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक और जातीय आधार पर हम पश्चिम से इतने अलग हैं कि चाहकर भी बराबरी की बात नहीं सोच सकते.
पेरिस में एफिल टावर के सामने स्त्रियों ने अपनी ब्रा उतार फेंकी थी, कनाडा में ‘नो ब्रा डे’ मनाया जाता है, आए दिन पश्चिमी स्त्रियां ब्रा उतार फेंकती हैं, लेकिन तब क्या बाजार में ब्रा बिकना बंद हो गया ? क्या सचमुच स्त्रियां ब्रा से मुक्त हो गईं ? नहीं, ऐसा नहीं हुआ बल्कि हाल के वर्षों में और अधिक जकड़ी गई हैं; अब तो ब्लाउज (भारतीय) भी पैडेड आने लगा है.
पश्चिम सुविधा संपन्न है, वे ब्रा लेस/टॉप लेस डिस्कस कर सकते हैं; हमारी तो अभी बेसिक नीड भी पूरी नहीं हुई है, तब भी हम स्त्रियां सेनेटरी पैड के ऊपर ब्रा चुनती हैं. दरअसल, हमारी बेसिक समझ भी डेवलप नहीं हुई है कि क्या जरूरी है और क्या गैर-जरूरी !
पश्चिम में सुप्रीमेसी भाव इतना अधिक है कि उन्हें जज किए जाने का भय नहीं है; उन्हें मालूम है वे जो भी करेंगे, वह समूची दुनिया में उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जाएगा. पुरुष अपना सीना दिखा सकते हैं तो स्त्रियां क्यों नहीं ? (हालांकि दिखाने वाले को कौन रोके और क्यों रोके, अपनी देह अपना मन) लेकिन क्या इस प्रश्न का जवाब भी इतना मुश्किल है ?
उन दिनों जब हम सभ्य नहीं हुए थे और हमारे पास मात्र साड़ी थी, ब्लाउज नहीं था, तब भी स्त्रियों ने साड़ी लपेटकर स्तन ढंकना सीखा. जब साड़ी नहीं थी और विकृतियां उजागर होने लगी थीं, तब पुरुषों ने पत्तों की सहायता से कमर के नीचे ढंका और स्त्रियों ने अपना ऊपरी हिस्सा भी ढंक लिया.
बहुत पहले पश्चिमी समाज में कॉर्सेट का चलन था. उन दिनों शादियां कम उम्र में हुआ करती थीं; बच्चियों के अविकसित उभारों में उठान दिखाने के लिए कॉर्सेट का इस्तेमाल किया जाता था; यह सीने से लेकर कमर तक हुआ करती थी, जो शरीर को तना हुआ दिखाती थी. फिल्मों में देखा है कि बच्चियों की सांस अटकी रहती है; जब कॉर्सेट उतारती हैं, तब चैन की सांस लेती हैं. आजकल कई वर्षों से बाजार में पुनः उपलब्ध है, लेकिन अपने लचीले और आरामदायक स्वरूप में.
हम नंगे ही पैदा हुए थे, साड़ी, ब्लाउज सब बाद में आया. ब्रा तो बहुत बाद में आया. युवा होती बच्चियों में ब्रा के लिए ललक छुपाए नहीं छुपती है, वे ब्रा पहनकर जल्द से जल्द बड़ी हो जाना चाहती हैं, दे वांट टू बी सीन, नोटिस किया जाना चाहती हैं. ब्रा न सिर्फ स्त्री देह के उभारों को उभारता है, बल्कि संभालता भी है; आपके भीतर तनकर खड़े रहने का साहस भरता है, कंधे सिकोड़कर नहीं. प्रसव के बाद आकार में असमानता सामान्य सी बात है; कई बार हम ब्रा इस असमानता को कवर करने के लिए भी पहनते हैं, लैक्टोसिस के दौरान तो निहायत ही जरूरी है ब्रा पहनना.
उन दिनों शोषित जनजातियों को शरीर का ऊपरी हिस्सा ढंकने की इजाजत नहीं थी; वे पुरुष की कामुकता का समान हुआ करती थीं, जबकि पश्चिम में सहायिकाएं भी कॉर्सेट पहना करती थीं.
लब्बोलुआब यह है कि ब्रा पहनना या न पहनना व्यक्तिगत चॉइस का मसला है. आपको पसंद है, पहनिए; नहीं पसंद है, नहीं पहनिए, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ब्रा का अस्तित्व भी पुरुष लुभाने के लिए ही हुआ है. पुरुषों द्वारा पसंद किया जाना ही स्त्रियों का अंतिम सत्य है; यह जद्दोहद हम यहां सोशल मीडिया में भी खूब देखते हैं. पुरुष स्वीकार्यता ही हमारे लिए सबसे अहम है !
खैर, ब्रा पर लौटते हुए, मेरे ‘साज़-बाज़’ की नायिका देविका के कई अजीब शौक हैं, जैसे सब्जियों के हिसाब से चाकू खरीदना और पेंसिल देखकर के.जी. के बच्चों की तरह मचल जाना. लांजरी (ब्रा), लांजरी तो कपड़ों से भी अधिक खरीदना; जिसमें ब्लैक रंग की ब्रा उसकी सबसे फेवरेट है, इतनी फेवरेट कि ब्लैक को अगर दूसरे रंगों की ब्राजियर से अलग किया जाए, तो आधी से अधिक ब्लैक निकलेंगी.
कभी-कभी वह खुद भी असमंजस में पड़ जाती है कि ब्लैक और ब्लैक में कौन सी ब्लैक पहने, लेसी या पैडेड, चौड़े स्ट्रैपवाली या ट्रांस्पेरेंट ? लेकिन हां, जब लाल या आसमानी रंग के कपड़े पहनती है, तो हमेशा ही पतले स्ट्रैपवाली ब्लैक ब्रा चुनती है, क्योंकि ? क्योंकि-व्योंकि कुछ नहीं, उसे ऐसा ही पसंद है, इसलिए शुरू से वो ऐसा ही करती आई है.
अभी उसने पतले स्ट्रैपवाला फ्लोरल ब्लू पहना है, क्योंकि उसके टॉप का रंग सफेद है और फैशन टीवी पर मिडनाइट सीक्रेट्स में ‘विक्टोरिया सीक्रेट्स’ के लेसी ब्लैक में रैंप पर कैटवॉक करती कंडीस स्वयंपूल को देख उसका मन ललक उठा; किंतु फौरन ही ‘अब इस मोह का क्या फायदा ?’ के खयाल से मन बच्चों-सा बहला लिया, क्योंकि आज तो आत्महत्या कर मानेगी. फैसला कर चुकी है, वह अपने फैसले किसी तौर पर नहीं बदलती !
अब इतनी वैरायटी के बाद क्या आपको लगता है कि हम कभी ब्रा से मुक्त हो सकेंगे ? बनिस्बत और जकड़े जा रहे हैं, अब तो टॉप भी ब्रालेट हो गया है और ब्रा कॉर्सेट !!!!
Read Also –
[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लॉग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

प्रियंका ओम