इन्दरा राठौड़
ज्ञानेश कुमार राहुल से शपथ पत्र मांगते समय भूल गए कि पीएम और गृहमंत्री के साथ साथ विपक्ष के नेता बतौर राहुल उनका employer हैं. नौकर मालिक से ही शपथ पत्र मांग रहा है. संविधान के अनुसार विपक्ष के नेता का पद चुनाव आयुक्त से बड़ा होता है, इसलिए यह ग़ैरक़ानूनी है.
दूसरी बात ये है कि चुनाव आयोग के नियमों में कहीं भी SIR का ज़िक्र ही नहीं है, सिर्फ़ Intensive Revision का ज़िक्र है जो कि बिहार में पहले ही हो चुका है.
तीसरी बात ये है कि वोटर लिस्ट को सार्वजनिक करना चुनाव आयोग की सांवैधानिक और क़ानूनी ज़िम्मेदारी है, जिसे निजता के अधिकार के उल्लंघन के पीछे नहीं छुपाया जा सकता है.
चौथी बात ये है कि सुप्रीम कोठा के पास ताक़त है कि वह मोदी सरकार के उस क़ानून ( दरअसल अध्यादेश) को ख़ारिज करे जिसके तहत चुनाव आयुक्त को चुनने के लिए तीन सदस्यीय कमेटी में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल हैं. यह संविधान के check and balance की मूल भावना के खिलाफ है और चुनाव आयोग को एक निष्पक्ष संस्था नहीं रहने देता है.
आखिर बात ये है कि चारु मजूमदार ने 1967 में ही कहा था कि चुनाव किसी भी पूंजीवादी लोकतंत्र में बस एक छलावा है और आज जब विपक्षी पार्टियां चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं, तब चारु मजूमदार सच साबित हो रहे हैं.
यह हलफनामा यद्यपि दादा सुब्रतो चटर्जी ने दाखिल किया परन्तु, यह हर उन भारतीय लोगों का भी है जिन्होंने अपने देश और उसके संविधान पर हो रहे हमले से दुखी हैं. जिनका विश्वास उन्हें ही टूटकर बिखरता देख रहा है.
इसी तरह बकौल सर्वेश्वरदयाल के कहना न होगा कि ‘देश कागज़ पर बना कोई नक्शा नहीं है’ कि उसे मिटाया जा सके. या फिर लाखों बलिदान के बाद प्राप्त हुई आजादी की कीमत को वे इस रूप में स्वीकार सके जैसा कि आजादी के संदर्भ में धूमिल कहते हैं – ‘आजादी क्या सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिसे एक पहिया ढोता है.’
इस बात से अपने देश के नागरिक होने के अर्थ को इस तरह से समझा जाए, कि यह वह भी नहीं है जैसा हमें हमारी व्यवस्था अब समझाने लगी है. माने कथित नैतिकता इस हद तक आदत बन जाए कि बाएं हाथ गांड़ धोता फिरे ! तो यह अनुचित ही है.
बहरहाल, जबसे देश में संघी सरकार बनी है वह, वही कर रही है जिससे देश और जन भावनाएं आहत होने लगे हैं. साल 2014 के बाद इस देश में जो कुछ घटा है, दादा सुब्रतो चटर्जी की यह कविता इसी की बयानी है. इसी का हलफनामा है.
देश विभाजनकारी धर्म और संप्रदायिकता के चंगुल में अब ऐसे आ फंसी है कि घृणा और नफ़रत का करोबार धड़ल्ले से चल निकला. नतीजातन एक सजग जागरूक कवि को यह कहना हुआ है –
मी लॉर्ड
मुझे आपसे सच्चा भारतीय होने का
एक प्रमाण पत्र चाहिए
वह कैसा है ?
बेहद दारुण और पीड़ादाई भाव दशा है ?
कठोर व्यंग्य व्यंजना में कहे, सुब्रतो चटर्जी की इस कविता की मानें तो सब कुछ वैसा ही होता दिख रहा है जैसा सुब्रतो दादा देख समझ रहे हैं इसलिए ही कह भी सके हैं / कि
इस तमग़े को पाने के लिए मैंने
फोड़ दीं हैं अपनी आंखें
काट दीं हैं अपनी ज़ुबान
कानों में डाल दिये हैं पिधले हुए सीसे
और शल्यचिकित्सा के ज़रिए
निकाल बाहर कर दी हैं
अपनी रीढ़ की हड्डियों को
जैसे सुप्रीम कोठे ने कर दिखाया. स्थिति की भयावहता यह है कि न्यायपालिका और जन, जमीन पर एक अंधे सरीसृप सा रेंगते हुए कृतज्ञ भाव में मर-खप रहे हैं पांच किलो राशन की लाइन में खड़े रहकर. इस कारुणिक दशा के बाद भी देश की व्यवस्थापिका और कार्यपालिका से लेकर न्यायपालिका तक को. अब सड़कों पर कांवड़ियों का उत्पात नहीं दिखता ! नहीं दिखता हरेक दिन हो रहे हज़ारों बलात्कार !! और उन बलात्कार पीड़िताओं की चीत्कार नहीं सुनाई देतीं !!!
मणिपुर की सड़कों पर नंगी घुमाई जा रहीं वे औरतें नहीं दिखतीं !
अपराधियों को अपराधी कहने के जुर्म में
जेल में बंद संजीव भट्ट या उमर ख़ालिद नहीं दिखते !
अपने जल, जंगल और ज़मीन के लिए लड़ते हुए मारे जाते आदिवासी नहीं दिखते !
गौकशी के झूठे इल्ज़ाम में मारे जाते
अख़लाक़ और पहलू ख़ान नहीं दिखते !
कुंभ की भगदड़ में मारे गए हज़ारों लोग नहीं
दिखते
ऐसे में, देश की न्यायपालिका की इस लचर अवस्था को कोई कवि चिन्हित कर रहा है और कह रहा है कि –
मी लॉर्ड
एक सच्चे भारतीय होने की ख़ातिर
मैंने छोड़ दिया है सोचना
तो यह शर्मिंदगी उस कवि के लिए नहीं है बल्कि उस देश की कानून व्यवस्था के लिए है जिसके होते, देश में बढ़ती गई बेरोज़गारों की फ़ौज जिनके बूढ़े, अशक्त मां बाप की आंखों की रोशनियां बुझती चली गई उनके बच्चे असमय अधेड़ हुए. इसलिए ही कवि कह सका कि –
मैंने छोड़ दिया है आंसू बहाना
उन करोड़ों लोगों के लिए
अपने मुल्क की मेहनतकश आवाम के लिए
जिनको मालूम नहीं है कि
पचास साल के बाद भी अगर ज़िंदा बचे तो
कितना और कैसे बचे रहेंगे
जब उनके शरीर में बंद हो जाएगा
नया ख़ून बनना
जिसे चूसने के लिए धन्ना जोंक बैठे हैं
देश के चप्पे चप्पे में
हाथ में कंठी की माला लिए
अथवा यह भी कि
अब आपके ऊंचे महल के फैसलों से अगर मुझे
कोठे पर बजती घुंघरू की आवाज़ आती भी है
तो मैं हरेक उस फ़ैसले को न्याय मान लेता हूं
मी लार्ड
जब आप कहते हैं कि
सरकार ही देश है, तो मैं उसे भी मान लेता हूं
और सरकार की कोई सीमा तो होती नहीं है
जिसका अतिक्रमण किया जाए
इसलिए न कोई घुसा है और ना कोई क़ब्ज़ा हुआ है के अमृत वाक्य में मेरा अगाध विश्वास
इस अमृत काल में कई गुना बढ़ा है
मी लॉर्ड !
कविता बहुस्तरीय विडंबना बोध से ओत-प्रोत है जिसके कटघरे में जितना यह तंत्र है उतना ही जन भी हैं कि वे सबव्यंग्य में उतरते चले गए.
मुल्क और समाज जो किसी भयानक लाइलाज़ रोग से ग्रसित है. देखा नहीं जाता. देखा नहीं जाता कि देश में ईवीएम के जरिए वोटों की चोरी कर हारा हुआ दल सत्तानशीं है और केंचुआ के संग सुप्रीम कोठा कैसे कैसे कर सहभागिता निबाह रहा है.
अंत में एक और काम किया है मैंने
खुद को सच्चा भारतीय साबित करने के लिए
प्रतिरोध करना छोड़ दिया है मैंने
मैंने उस दिन भी कुछ नहीं कहा
जिस दिन सरकार बहादुर ने मुझे
जंतर मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक
और गांधी मैदान से लेकर हरेक सभास्थल से
बेदख़ल कर दिया
सच्चा भारतीय
मी लॉर्ड
मुझे आपसे सच्चा भारतीय होने का
एक प्रमाण पत्र चाहिए
इस तमग़े को पाने के लिए मैंने
फोड़ दीं हैं अपनी आंखें
काट दीं हैं अपनी ज़ुबान
कानों में डाल दिये हैं पिधले हुए सीसे
और शल्यचिकित्सा के ज़रिए
निकाल बाहर कर दी हैं
अपनी रीढ़ की हड्डियों को
जमीन पर एक अंधे सरीसृप सा रेंगते हुए
मैं कृतज्ञ हो कर रुका हूं
पाँच किलो राशन की लाइन में
मुझे अब सड़कों पर कांवड़ियों का उत्पात नहीं दिखता
मुझे अब देश में हरेक दिन हो रहे
हज़ारों बलात्कार पीड़िताओं की चीत्कार नहीं सुनाई देतीं
मणिपुर की सड़कों पर नंगी घुमाई जा रहीं वे औरतें नहीं दिखतीं
अपराधियों को अपराधी कहने के जुर्म में
जेल में बंद संजीव भट्ट या उमर ख़ालिद नहीं दिखते
अपने जल, जंगल और ज़मीन के लिए लड़ते हुए मारे जाते आदिवासी नहीं दिखते
गौकशी के झूठे इल्ज़ाम में मारे जाते
अख़लाक़ और पहलू ख़ान सरीखे नहीं दिखते
कुंभ की भगदड़ में मारे गए हज़ारों कीड़े मकोड़े नहीं दिखते
मी लॉर्ड
एक सच्चे भारतीय होने की ख़ातिर
मैंने छोड़ दिया है सोचना
बेरोज़गारों की फ़ौज के बारे में
और उन बूढ़े, अशक्त मां बाप की आंखों की बुझती रोशनियों के बारे
जो अपने अधेड़ होते बेरोजगार बच्चों को देखते हुए
और भी हो रहे हैं अंधे दिन ब दिन
मैंने छोड़ दिया है आंसू बहाना
उन करोड़ों लोगों के लिए
अपने मुल्क की मेहनतकश आवाम के लिए
जिनको मालूम नहीं है कि
पचास साल के बाद भी अगर ज़िंदा बचे तो
कितना और कैसे बचे रहेंगे
जब उनके शरीर में बंद हो जाएगा
नया ख़ून बनना
जिसे चूसने के लिए धन्ना जोंक बैठे हैं
देश के चप्पे चप्पे में
हाथ में कंठी की माला लिए
एक सच्चा भारतीय बनने के लिए
मैंने सिल दी है अपनी ज़ुबान मी लॉर्ड
अब आपके ऊंचे महल के फैसलों से अगर मुझे
कोठे पर बजती घुंघरू की आवाज़ आती भी है
तो मैं हरेक उस फ़ैसले को न्याय मान लेता हूं
जब आप कहते हैं कि
सरकार ही देश है तो मैं उसे भी मान लेता हूं
और सरकार की कोई सीमा तो होती नहीं है
जिसका अतिक्रमण किया जाए
इसलिए न कोई घुसा है और ना कोई क़ब्ज़ा हुआ है के अमृत वाक्य में मेरा अगाध विश्वास
इस अमृत काल में कई गुना बढ़ा है मी लॉर्ड
अंत में एक और काम किया है मैंने
खुद को सच्चा भारतीय साबित करने के लिए
प्रतिरोध करना छोड़ दिया है मैंने
मैंने उस दिन भी कुछ नहीं कहा
जिस दिन सरकार बहादुर ने मुझे
जंतर मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक
और गांधी मैदान से लेकर हरेक सभास्थल से
बेदख़ल कर दिया
मैंने उस दिन भी कुछ नहीं कहा
जिस दिन मेरे प्रेत ने मेरे बदले वोट देकर
सरकार बहादुर को जिता कर आया
और आज भी मैं चुप हूं जब सरकार बहादुर का कारिंदा
अपने घर में बैठ कर मुझे घोषित कर देता है मृत
मृत काल के इस दशक की शुरुआत में
मैंने कई बार कोशिश की आपकी तरफ
कि मुझे मृत घोषित करने की इस प्रक्रिया पर
आपकी कोई जीवित प्रतिक्रिया आती है या नहीं
लेकिन, वहां भी निराशा हाथ लगी
और तब मैं समझ गया कि आप अब
सच्चे भारतीय होने की परिभाषा तय करने लायक
समुचित व्यक्ति बन गए हैं
ईश्वर की आज्ञा के अनुसार दिए गए राम मंदिर के
फ़ैसले ने जिस नरपिशाच को अशरीरी बना कर
अमरत्व दान दिया था
उस अभागे भारत का एक सच्चा भारतीय
अब बन गया हूं मैं
आज आप खुश तो बहुत होंगे मी लॉर्ड !
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इन्दरा राठौड़