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बिहार के चुनाव का ‘कल, आज और कल’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 18, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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बिहार के चुनाव का ‘कल, आज और कल’
बिहार के चुनाव का ‘कल, आज और कल’

2024 का चुनाव RSS-मोदी-भाजपा के लिए भारत की संसदीय राजनीति के बारे में एक नए सत्य के बोधोदय की घटना थी. उन्होंने जान लिया कि अब इस संसदीय राजनीतिक संरचना में उनकी राजनीति, सांप्रदायिक विभाजन, पाकिस्तान, धर्म और डर तथा दमन की राजनीति की और संभावनाएं खत्म हो रही है. यहीं से स्थापित संसदीय संरचना को विकृत कर, गैर-संसदीय चुनावी उपायों से सत्ता पर बने रहने की उनकी रणनीति का दूसरा दौर शुरू हो गया.

रणनीति के इस दूसरे दौर का आधार उन्होंने 10 साल की सत्ता के जरिये, सभी संवैधानिक संस्थाओं पर अपना लगभग पूर्ण प्रभुत्व कायम करके तैयार कर लिया था. खास तौर पर चुनाव आयोग और न्यायपालिका को कब्जे में करके, उन्होंने चुनाव व्यवस्था को अपनी मुट्ठी में कर लिया. न सिर्फ चुनाव आयोग की नियुक्ति को प्रधानमंत्री को सुपुर्द कर दिया गया, बल्कि चुनाव आयोग को कानूनन सभी फौजदारी कानूनों के दायरे से बाहर कर दिया गया.

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अब तक जिन चीजों को चुनाव और दलबदल कानून के हिसाब से भ्रष्टाचार और गैर-कानूनी माना जाता था, चुनाव आयोग और न्यायपालिका ने उनसे पूरी तरह आंखें फेर ली; सरकारी मशीनरी, धन और धर्म के प्रयोग और जहरीले प्रचार की भाजपा के नेताओं को खुली छूट दे दी गई; भाजपा के द्वारा विधायकों की घोड़ामंडी राजनीति का मान्य सत्य बना दिया गया;

न सिर्फ चुनाव आयोग के लिए, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के लिए भी विपक्ष की शिकायतें कोरे उपहास का विषय बन कर रह गई. सभी शिकायतों को पूरी बेशर्मी से कूड़ेदान के सुपुर्द किया जाने लगा. इस प्रकार, हमारी संसदीय प्रणाली के मर्म ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ से लेकर ‘सभी प्रतिद्वंदियों को बराबरी का मौका’ देने जैसी चुनाव संबंधी मूलभूत बातों की धज्जियां उड़ा दी गई. और…संसदीय व्यवस्था की सबसे बुनियादी नैतिकता तक को विकृत करके चुनाव में सुनियोजित धांधली के प्रकल्प पर काम शुरू हो गया.

केंद्रीय स्तर से इस प्रकल्प का पहला आभास मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, और हरियाणा में मिला था, पर एक प्रमाणित सत्य के रूप में इसकी पहचान, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कराई जब उन्होंने कर्णाटक और हरियाणा में लाखों की संख्या में डुप्लीकेट वोटरों की उपस्थिति, लाखों फर्जी मतदाताओं की फर्जी तस्वीरों और पतों के साथ प्रविष्टी, बीजेपी के हजारों कार्यकर्ताओं के द्वारा घूम-घूम कर विभिन्न राज्यों में मतदान करने के वोट चोरी के सारे प्रमाणों को दुनिया के सामने उजागर किया.

पहली बार यह साफ साफ पता चला कि न सिर्फ भारत का चुनाव आयोग खुद मोदी-भाजपा के सुनियोजित चुनाव चोरी के अपराध में बराबरी का भागीदार है, बल्कि इसमें उनके साथ सुप्रीम कोर्ट के जज भी मिले हुए हैं. तो फिर बचा क्या ?

मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर ज्ञानेश कुमार नामक RSS के खास प्रचारक प्रकार के व्यक्ति ने आकर इस चोरी को भी एक सांस्थानिक रूप देना शुरू कर दिया, जिसे आज मतदाता सूची की विशेष गहन जांच (Special Intensive Revision/SIR) के नाम से देश का हर नागरिक जानता है.

इसके जरिये एक ऐसी स्थायी व्यवस्था की जा रही है, जिसमें चुनाव आयोग अपनी मर्जी से बीजेपी के इशारों पर, मतदान के आखिरी वक्त में भी मतदाता सूची में हेरा-फेरी करके कुछ लोगों के नामों को काट सकता है और अनेक फर्जी नामों को जोड़ सकता है ताकि बीजेपी मतदान के वक्त अपने कार्यकर्ताओं को फर्जी मतदान के लिए चुनिंदा दिशाओं में कूच कराके उन केंद्रों के चुनावों को लूट सकें.

यह सारा काम केंद्रीय स्तर से कंप्यूटरों में डाटा इंट्री के जरिये रात के अंधेरे में इतनी गोपनीयता से किया जाता है कि किसी को कानों-कान खबर नहीं हो सकती है. इन सबके अलावा मतदाताओं को सरकारी खजाने से पैसा लुटाने और दूसरे लाभ-लोभ की तरह की घनघोर भ्रष्ट बातें तो बदस्तूर चल ही रही हैं.

मोदी ने 2024 की उन्हें मिली चपत के बाद, स्थायी तौर पर सत्ता पर बने रहने के अपने प्रकल्प के इस दूसरे चरण पर ताबड़तोड़ काम शुरू कर दिया. चुनाव आयोग को यह सख्त हिदायत दे दी गई है कि वह भी प्रधानमंत्री की तरह कोई संवाददाता सम्मेलन वगैरह न करें और किसी भी प्रकार की जवाबदेही को जरूरी न माने.

बिहार के ताजा चुनाव में जबर्दस्ती, जनमत को ठेंगा दिखा कर सत्ता पर बने रहने के मोदी के ‘फासिस्ट अभियान’ का यह दूसरा दौर पूरी नंगई के साथ सामने आया है. इसे कहने के लिए तो कोई बिहार के राजनीतिक सत्य का एक स्थानीय ठोस अपवाद कह सकता है, पर सच्चाई यह है कि यह भारत में फासिस्ट RSS के सार्वभौमिक सत्य की एक ठोस स्थानीय अभिव्यक्ति है.

हर सत्य किसी खास ठोस स्थानीय परिस्थितियों से उत्पन्न हो कर ही अपनी सार्वभौमिकता को प्रकट किया करता है. बिहार में जिस प्रकार फर्जी मतदान में पारंगत लाखों पेशेवर पार्टी कार्यकर्ताओं की स्थायी सेना से लेकर ‘मुद्रा-प्राप्त मतदाताओं’ की एक नई श्रेणी का जो रूप दिखाई दिया है, वह हमारे शासकों की संसदीय राजनीति के नए सार्वभौम स्वरूप का प्रकटीकरण है. इन सबसे जाहिरा तौर पर हमारे देश की जनता की गरीबी और जहालत की सच्चाई भी सामने आती है.

भाजपा की इस रणनीति का आभास मिला था मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, इसके प्रमाण मिलें कर्णाटक और हरियाणा में और इसका सर्वांग रूप देखने को मिला है इस बार के बिहार चुनाव में. बिहार के इन चुनावों में कौन जीता और कौन हारा की तरह के विषय पर विचार निरर्थक है: ये चुनाव सिर्फ एक बात के संकेत है कि वहां चुनाव पर डाकाजनी हुई है.

यह सब अब तक 2024 के भूकंप के बाद के झटकों से विधान सभाओं में फासिस्ट मोदी की सत्ता को बचाने के अतिरिक्त उपाय है; पर हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि अभी से ‘वोट चोरी’ की इन नग्न करतूतों के खिलाफ सारे भारत में व्यापक जन-आंदोलन का प्रारंभ होता है, तो इसी बीच मोदी ने न्यायपालिका के साथ ही भारत की सेना को भी पूरी तरह से तैयार कर लिया है.

किसी भी बड़े जन-आंदोलन के दमन के लिए RSS और मोदी सेना-पुलिस के चरम प्रयोग से नहीं चूकेंगे; तब भारत का यह फासीवाद, अपने तमाम नख-दंतों और पैशाचिक हवस के साथ हमें इस देश की आत्मा पर बलात्कार करता दिखाई देगा.

बहरहाल, कोई भी राजनीतिक दल यदि प्रकृत अर्थ में एक राजनीतिक दल है तो उसका कर्तव्य है कि वह ‘वोट चोरी’ और चुनावों की लूट के भाजपा के इस प्रकल्प के खिलाफ, आम जनता को लामबंद करके व्यापक आंदोलन में उतारने की दिशा में काम शुरू करें. आंदोलनों के जरिये जन-आक्रोश की अभिव्यक्ति को ठोस संगठित विकल्प का आकार देना ही राजनीति का मूलभूत काम है.

  • अरुण माहेश्वरी

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