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मार्क्सवाद बनाम उदारवाद : जे. वी. स्तालिन के साथ एच. जी. वेल्स की बातचीत 23 जुलाई 1934

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 29, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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एचजी वेल्स ने 1934 में मॉस्को में ‘द न्यू स्टेट्समैन’ पत्रिका के लिए स्टालिन का साक्षात्कार लिया था. वेल्स एक घोषित समाजवादी और वामपंथी विचारधारा के सबसे प्रभावशाली लेखकों में से एक थे. उनका पहला उपन्यास, द टाइम मशीन, मूलतः वर्ग संघर्ष का एक रूपक है. दोनों के बीच का साक्षात्कार दिलचस्प है और महान शिक्षक स्टालिन के विचारों की स्पष्टता यहां देखी जा सकती है. – सम्पादक
मार्क्सवाद बनाम उदारवाद : जे. वी. स्तालिन के साथ एच. जी. वेल्स की बातचीत 23 जुलाई 1934
मार्क्सवाद बनाम उदारवाद : जे. वी. स्तालिन के साथ एच. जी. वेल्स की बातचीत 23 जुलाई 1934

वेल्स : मुझसे मिलने का समय देने के लिए, स्तालिन मैं आपका बहुत आभारी हूं. मैं हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका में था. मैंने राष्ट्रपति रूजवेल्ट के साथ लम्बी बातचीत की और यह जानने की कोशिश की कि उनके प्रमुख विचार क्या हैं. अब मैं आपसे यह पूछने आया हूं कि आप दुनिया को बदलने के लिए क्या कर रहे हैं…

स्तालिन : ज्यादा कुछ नहीं कर रहा हूं.

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पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

वेल्स : मैं एक आम आदमी की हैसियत से दुनिया भर में घूमता हूं और चीजों को एक आम आदमी की तरह देखता हूं कि मेरे आसपास क्या चल रहा है.

स्तालिन : आप जैसे महत्त्वपूर्ण ख्यातिप्राप्त इंसान ‘आम आदमी’ नहीं होते हैं. बेशक, इतिहास ही यह दिखा सकता है कि यह या वह ख्यातिप्राप्त इन्सान कितना महत्त्वपूर्ण होता है; दुनिया की सभी घटनाओं को आप ‘आम आदमी’ की तरह नहीं देखते हैं.

वेल्स : मैं विनम्रता का दिखावा नहीं कर रहा हूं. मेरा मतलब यह है कि मैं दुनिया को आम आदमी की नजर से देखने की कोशिश करता हूं, न कि पार्टी के राजनेता या जिम्मेदार प्रशासक के रूप में. संयुक्त राज्य अमेरिका की मेरी यात्रा ने मेरा मन उत्साहित कर दिया. पुरानी वित्तीय दुनिया ढह रही है; देश का आर्थिक जीवन नयी लाइन पर पुनर्गठित हो रहा है. लेनिन ने कहा था ‘हमें व्यापार करना सीखना चाहिए, हमें यह पूंजीपतियों से सीखना चाहिए.’

आज समाजवाद की भावना को समझने के लिए पूंजीपतियों को आपसे सीखना होगा. मुझे ऐसा लगता है कि संयुक्त राज्य अमरीका में जो कुछ हो रहा है, वह एक गम्भीर पुनर्गठन है, नियोजन का निर्माण, यानी समाजवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण. आप और रूजवेल्ट दो अलग-अलग प्रस्थान बिन्दुओं से शुरू करते हैं. लेकिन क्या मास्को और वाशिंगटन के बीच विचारों में सम्बन्ध, विचारों में नातेदारी नहीं है ? वाशिंगटन में मैं उसी चीज से घिरा हुआ था जिसे मैं यहां देख रहा हूं; वे कार्यालय बना रहे हैं, वे कई राज्य विनियमन निकाय बना रहे हैं, वे लम्बे समय से आवश्यक सिविल सेवा को आयोजित कर रहे हैं. आपकी तरह उनको भी निर्देशकीय क्षमता की जरूरत है.

स्तालिन : संयुक्त राज्य अमेरिका जिस लक्ष्य के पीछे दौड रहा है वह उससे अलग है, जिसको हम यू.एस.एस.आर. में हासिल करना चाहते हैं.

जिस लक्ष्य का पीछा अमेरिका कर रहा है, वह आर्थिक संकटों से उपजी आर्थिक मुसीबतों की देन है. अमरीकी आर्थिक आधारों को बिना बदले, निजी पूंजीवादी गतिविधि के आधार पर खुद को संकट से उबारना चाहता है. वे तबाही को कम से कम करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसा नुकसान जो मौजूदा आर्थिक प्रणाली के चलते है. हालांकि, जैसा कि आप जानते हैं कि यहां नष्ट कर दिये गये पुराने आर्थिक आधार के स्थान पर एक पूरी तरह से अलग, एक नया आर्थिक आधार बनाया गया है. आपने जिन अमरीकियों का जिक्र किया है, भले ही वे आंशिक रूप से अपने लक्ष्य को हासिल कर भी लें यानी इन नुकसानों को कम से कम कर दें तो भी वे अराजकता की जड़ों को नष्ट नहीं करेंगे जो मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में निहित है. वे ऐसी आर्थिक प्रणाली का संरक्षण कर रहे हैं जो अनिवार्य रूप से उत्पादन में अराजकता की ओर न सिर्फ ले जा सकती है बल्कि ले ही जाती है.

तो अपने सबसे अच्छे सूरते हाल में भी, यह समाज के पुनर्गठन की बात नहीं होगी, पुरानी सामाजिक व्यवस्था को खत्म करने की बात नहीं होगी, जो अराजकता और संकटों को जन्म देती है, ये बस इसकी कुछ ज्यादतियों पर लगाम लगाने भर की बात है. वस्तुगत रूप से, शायद, अमरीकी यह सोचते हैं कि वे समाज का पुनर्गठन कर रहे हैं; जबकि, वे समाज के वर्तमान आधार को संरक्षित कर रहे हैं.

इसीलिए, वस्तुतः, वहां समाज का पुनर्गठन नहीं होगा. न ही नियोजित अर्थव्यवस्था होगी. नियोजित अर्थव्यवस्था क्या है ? इसकी कुछ विशेषताएं क्या हैं ? नियोजित अर्थव्यवस्था बेरोजगारी को खत्म करने की कोशिश करती है. मान लीजिए कि पूंजीवादी व्यवस्था को संरक्षित करते हुए, बेरोजगारी को एक निश्चित न्यूनतम सीमा तक कम करना सम्भव है.

लेकिन निश्चित रूप से, कोई भी पूंजीपति बेरोजगारी के पूर्ण उन्मूलन, बेरोजगारों की आरक्षित सेना के उन्मूलन के लिए सहमत नहीं होगा, जिसका उद्देश्य श्रम बाजार पर दबाव बनाना होता है, जिससे सस्ते श्रम की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके. यहां आप बुर्जुआ समाज की ‘नियोजित अर्थव्यवस्था’ में एक दरार पाते हैं. इसके अलावा, नियोजित अर्थव्यवस्था उद्योग की उन शाखाओं में उत्पादन में वृद्धि करती है जो ऐसे सामानों का उत्पादन करती हैं जिनकी व्यापक जनता को विशेष रूप से आवश्यकता होती है. लेकिन आप जानते हैं कि पूंजीवाद के तहत उत्पादन का विस्तार पूरी तरह से अलग उद्देश्यों के लिए होता है, वहां पूंजी अर्थव्यवस्था की उन इकाईयों में लगायी जाती है जिनमें लाभ की दर सबसे अधिक होती है. आप कभी भी किसी पूंजीपति को खुद नुकसान झेलने और लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए लाभ की दर कम करने के लिए मजबूर नहीं कर पायेंगे. पूंजीपतियों से छुटकारा पाये बिना, उत्पादन के साधनों में निजी सम्पत्ति के सिद्धान्त को समाप्त किये बिना, नियोजित अर्थव्यवस्था निर्मित करना असम्भव है.

वेल्स : आपने जो कहा है, मैं उससे काफी हद तक सहमत हूं.

लेकिन मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि अगर एक पूरा देश नियोजित अर्थव्यवस्था के सिद्धान्त को अपनाता है, अगर सरकार, धीरे-धीरे, कदम-दर-कदम, लगातार इस सिद्धान्त को लागू करना शुरू करती है, तो वित्तीय कुलीनता को समाप्त किया जा सकता है और एंग्लो-सैक्सन’ अर्थ में समाजवाद लाया जा सकता है. रूजवेल्ट की ‘न्यू डील’ के विचारों का प्रभाव बहुत शक्तिशाली है और मेरी राय में वे समाजवादी विचार हैं. मुझे ऐसा लगता है कि दो दुनियाओं के बीच की दुश्मनी पर जोर देने के बजाय, हमें वर्तमान परिस्थितियों में, सभी रचनात्मक ताकतों के लिए एक समान भाषा स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए.

स्तालिन : मैं पूंजीवाद के आर्थिक आधार को संरक्षित करते हुए नियोजित अर्थव्यवस्था के सिद्धान्तों को साकार करने की असम्भवता की बात करूंगा. मेरी रूजवेल्ट के उत्कृष्ट व्यक्तिगत गुणों, उनकी पहल, साहस और दृढ़ संकल्प को कम करके दिखाने की मंशा नहीं है. निस्सन्देह, रूजवेल्ट समकालीन पूंजीवादी दुनिया के सबसे मजबूत कप्तानों में से एक हैं. यही कारण है कि मैं एक बार फिर इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि पूंजीवाद की शर्तों के तहत नियोजित अर्थव्यवस्था पर यकीन करना मेरे लिए असम्भव है, इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे राष्ट्रपति रूजवेल्ट की व्यक्तिगत क्षमताओं, प्रतिभा और साहस पर कोई सन्देह है. लेकिन अगर परिस्थितियां प्रतिकूल होती हैं, तो सबसे प्रतिभाशाली कप्तान भी आपके द्वारा निर्दिष्ट लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता.

निश्चित रूप से, सिद्धान्ततः पूंजीवाद की शर्तों के तहत कदम ब कदम, धीरे-धीरे, उस लक्ष्य की ओर बढ़ने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता जिसे आप एंग्लो-सैक्सन अर्थ में समाजवाद कहते हैं.

लेकिन यह ‘समाजवाद’ क्या होगा ? अपने सबसे अच्छे रूप में, पूंजीवादी मुनाफे के सबसे बेलगाम प्रतिनिधियों पर कुछ हद तक लगाम कसकर, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विनियमन के सिद्धान्त को लागू करने में कुछ वृद्धि हो जाएगी. वह सब वहुत अच्छा है. लेकिन जैसे ही रूजवेल्ट या समकालीन बुर्जुआ जगत का कोई अन्य कप्तान, पूंजीवाद की नींव के खिलाफ कुछ गम्भीर करने के लिए आगे बढ़ेगा, उसे अनिवार्य रूप से पूरी तरह से हार का सामना करना पड़ेगा. बैंक, उद्योग, बड़े उद्यम, बड़े खेत रूजवेल्ट के हाथों में नहीं हैं. ये सभी निजी सम्पत्ति हैं. रेलरोड, व्यापारिक बेड़े, ये सभी निजी मालिकों के हैं. और, आखिरकार, कुशल श्रमिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों की सेना, ये भी रूजवेल्ट की कमान में नहीं हैं, वे निजी मालिकों की कमान में हैं; वे सभी निजी मालिकों के लिए काम करते हैं. हमें बुर्जुआ दुनिया में राज्य के कार्यों को नहीं भूलना चाहिए.

वहां राज्य एक ऐसी संस्था है जो देश की सुरक्षा का इन्तजाम करती है, ‘व्यवस्था’ के रखरखाव का इंतजाम करती है; यह कर एकत्र करने का एक उपकरण है. पूंजीवादी राज्य का इस शब्द के सटीक अर्थों में अर्थव्यवस्था के साथ ज्यादा लेना-देना नहीं है; अर्थव्यवस्था राज्य के हाथों में नहीं है. इसके विपरीत, राज्य पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के हाथों में है. इसलिए मुझे डर है कि अपनी सारी ऊर्जाओं और क्षमताओं के बावजूद, रूजवेल्ट आपके द्वारा उल्लेखित लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकेंगे बावजूद इसके कि वह वास्तव में उनका लक्ष्य है. शायद, कई पीढ़ियों में कुछ हद तक इस लक्ष्य को हासिल कर पाना सम्भव होगा; लेकिन मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि यह भी बहुत सम्भव नहीं है.

वेल्स : शायद मैं राजनीति की आर्थिक व्याख्या में आप की तुलना में अधिक दृढ़ता से विश्वास करता हूं. आविष्कारों और आधुनिक विज्ञान के जरिए विशाल ताकतें समुदाय के बेहतर संचालन के लिए यानी समाजवाद के लिए एक बेहतर संगठन की ओर बढ़ रही है. संगठन और व्यक्तिगत कार्रवाई के नियमन, सामाजिक सिद्धान्तों का ख्याल किये बिना ही यांत्रिक आवश्यकता बन गये हैं. अगर हम बैंकों पर राज्य के नियंत्रण से शुरू करे और फिर उसके बाद परिवहन पर, भारी उद्योगों पर, सामान्य रूप से उद्योग पर, वाणिज्य आदि पर राज्य का नियंत्रण कायम करें तो इस तरह का सर्वांगपूर्ण नियंत्रण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की सभी शाखाओं के राज्य स्वामित्व के बराबर होगा. यह समाजीकरण की प्रक्रिया होगी. समाजवाद और व्यक्तिवाद काले और सफेद जैसे विपरीत नहीं हैं. उनके बीच कई मध्यवर्ती चरण होते हैं.

यहां ऐसा व्यक्तिवाद है जो डकैटी की सीमा पर खड़ा है, और अनुशासन तथा संगठन है जो समाजवाद के समकक्ष है. योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की शुरूआत करना, बहुत ज्यादा हद तक, अर्थव्यवस्था के प्रबंधकों पर, कुशल तकनीकी बुद्धिजीवियों पर पर निर्भर करता है जो कदम दर कदम, संगठन के समाजवादी सिद्धान्तों में परिवर्तित किया जा सकता है. और यह सबसे महत्त्वपूर्ण बात है क्योंकि संगठन समाजवाद से पहले आता है. यह अधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य है.

संगठन के बिना समाजवादी विचार महज एक विचार है.

स्तालिन : व्यक्ति और समूह के बीच, व्यक्तिगत हितों और सामूहिक हितों के बीच की अंसगतता ऐसी नहीं है और न ही होनी चाहिए जो हल न हो सके. ऐसी कोई असंगतता नहीं होना चाहिए, क्योंकि सामूहिकता, समाजवाद, इसे खारिज करने के बजाय सामूहिक हितों के साथ व्यक्तिगत हितों को जोड़ता है. समाजवाद खुद को व्यक्तिगत हितों से अलग नहीं कर सकता. केवल समाजवादी समाज ही इन व्यक्तिगत हितों को पूरी तरह से सन्तुष्ट कर सकता है. उससे भी अधिक, समाजवादी समाज ही व्यक्ति के हितों की रक्षा कर सकता है. इस अर्थ में ‘व्यक्तिवाद’ और समाजवाद के बीच ऐसा कोई विरोध नहीं है जो हल न हो सके. लेकिन क्या हम वर्गों के बीच के विरोध को, सम्पत्तिशाली वर्ग पूंजीपति वर्ग और मेहनतकश वर्ग, सर्वहारा वर्ग के बीच के विरोधों को नकार सकते हैं ?

एक तरफ हमारे पास सम्पत्तिशाली वर्ग है जो बैंकों, कारखानों, खदानों, परिवहन, उपनिवेशों में बागानों का मालिक है. इन लोगों को अपने निजी मुनाफे, मुनाफे की अपनी भूख के अलावा कुछ नहीं दिखता.

वे समूह की इच्छा के आगे नहीं झुकते हैं वे हर समूह को अपनी इच्छा के अधीन करने की कोशिश करते हैं. दूसरी ओर गरीब, शोषित वर्ग है, जिसके पास न तो कारखाने हैं और न ही काम, न ही बैंक, जो अपनी श्रम शक्ति को पूंजीपतियों को बेचकर जीने के लिए मजबूर है जो अपनी सबसे बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाता. ऐसे विपरीत हितों और झगड़ों को कैसे हल किया जा सकता है ? जहां तक मुझे पता है, रूजवेल्ट इन हितों के बीच सुलह का रास्ता खोजने में सफल नहीं हुए हैं. और जैसा कि अनुभव ने दिखाया है, ऐसा हो पाना असम्भव है. संयोग से, आप संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थिति को मुझसे बेहतर जानते हैं क्योंकि मैं कभी वहां नहीं रहा और मैंने अमेरिका के बारे में मुख्य रूप से साहित्य के जरिए जाना है. लेकिन समाजवाद के लिए संघर्ष करने का मेरा थोड़ा अनुभव है, और यह अनुभव मुझे बताता है कि अगर रूजवेल्ट पूंजीपति वर्ग की कीमत पर सर्वहारा वर्ग के हितों को सन्तुष्ट करने के लिए कोई वास्तविक प्रयास करते हैं, तो पूंजीपति वर्ग उनकी जगह पर किसी और को राष्ट्रपति बनाकर बैठा देगा. पूंजीवादी कहेंगे : राष्ट्रपति आते-जाते रहते हैं, लेकिन हम हमेशा कायम रहेंगे, अगर कोई राष्ट्रपति हमारे हितों की रक्षा नहीं करता है, तो हम किसी और को ढूंढ लेंगे. पूंजीपति वर्ग की इच्छा का क्या राष्ट्रपति विरोध कर सकता है ?

वेल्स : मैं गरीब और अमीर के बीच में मानव जाति के इस सरलीकृत वर्गीकरण पर आपत्ति करता हूं. बेशक ऐसे लोगों की एक श्रेणी है जो केवल मुनाफा देखते हैं. लेकिन क्या इन लोगों को पश्चिम में भी उतनी ही बाधा के रूप में नहीं देखा जाता है जितना कि यहां ? क्या पश्चिम में काफी सारे लोग ऐसे नहीं हैं जो एक हद तक सम्पत्ति के मालिक हैं, जो निवेश करते हैं और इस निवेश से मुनाफा कमाना चाहते हैं लेकिन मुनाफा कमाना उनका अंतिम लक्ष्य नहीं है. वे इसे मुख्य उद्देश्य नहीं मानते हैं ? वे निवेश को असुविधाजनक आवश्यकता मानते हैं. क्या यहां बहुत सारे ऐसे सक्षम और समर्पित इंजीनियर यानी अर्थव्यवस्था के संयोजक नहीं हैं जिनकी गतिविधियां मुनाफे के अलावा किसी और चीज से प्रेरित है ? मेरी राय में सक्षम लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग है जो स्वीकार करता है कि वर्तमान व्यवस्था असन्तोषजनक है और जिसे भविष्य के समाजवादी समाज में एक महान भूमिका निभाने के लिए नियत किया गया है. पिछले कुछ सालों के दौरान मैं इंजीनियरों, एयरमैन (विमान चालकों), सैन्य तकनीकी लोगों आदि के व्यापक हलकों के बीच समाजवाद और विश्वबंधुत्व के पक्ष में प्रचार करने की जरूरत के बारे में काम कर रहा हूं और सोच रहा हूं कि ऐसे लोगों के पास जाकर दो वर्गों के बीच संघर्ष की बात करना बेकार है. ये लोग दुनिया की हालत को समझते हैं. वे समझते हैं कि यह एक खूनी अव्यवस्था है, लेकिन वे आपके सामान्य वर्ग-युद्ध को बकवास मानते हैं.

स्तालिन : आप अमीर और गरीब के मानव जाति के सरलीकृत वर्गीकरण पर आपत्ति करते हैं. बेशक एक बीच का स्तर भी है, इसमें तकनीकी बुद्धिजीवी आते हैं जिनका आपने उल्लेख किया है और जिनके बीच बहुत अच्छे और बहुत ईमानदार लोग हैं. उनमें से बेईमान और दुष्ट लोग भी हैं, उनमें हर तरह के लोग हैं, लेकिन सबसे पहली बात है कि पूरी मानव जाति अमीर और गरीब, सम्पत्ति के मालिकों और शोषितों में विभाजित है और इस बुनियादी विभाजन के बारे में, गरीब और अमीर के बीच के बीच के विरोध के बारे में खुद को झुठलावे में रखने का मतलब है खुद को इस बुनियादी सच्चाई के बारे में झुठलावे में रखना. मैं मध्यवर्ती स्तर के अस्तित्व से इनकार नहीं करता, जो या तो इन दो परस्पर विरोधी वर्गों में से एक या दूसरे का पक्ष लेता है, या फिर इस संघर्ष में तटस्थ या अर्ध-तटस्थ स्थिति अपनाता है. लेकिन, मैं फिर कहता हूं कि समाज में इस बुनियादी विभाजन से और दो मुख्य वर्गों के बीच बुनियादी संघर्ष के बारे में खुद को झुठलावे में रखने का मतलब तथ्यों को अनदेखा करना है. संघर्ष जारी है और आगे भी जारी रहेगा. फैसला सर्वहारा वर्ग, मेहनतकश वर्ग द्वारा तय होगा.

वेल्स : लेकिन क्या ऐसे बहुत से लोग नहीं हैं जो गरीब नहीं हैं, लेकिन जो काम करते हैं और बहुत ही सफलता से करते हैं ?

स्तालिन : बेशक, छोटे जमींदार, कारीगर, छोटे व्यापारी हैं, लेकिन यह ऐसे लोग नहीं हैं जो किसी देश के भाग्य का फैसला करते हैं इसके बजाय मेहनतकश जनता है जो उन सभी चीजों का उत्पादन करती है जिनकी समाज को आवश्यकता होती है.

वेल्स : लेकिन पूंजीपति कई तरह के हैं. ऐसे पूंजीपति भी हैं जो केवल मुनाफे के बारे में सोचते हैं, अमीर होने के बारे में सोचते हैं, लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो वलिदान देने के लिए तैयार हैं. उदाहरण के लिए ओल्ड मॉर्गन को लें. उसने केवल लाभ के बारे में सोचा; वह समाज के लिए एक परजीवी था, उसने केवल सम्पत्ति जमा की. लेकिन रॉकफेलर को ही लीजिए. वह एक शानदार प्रबंधन हैं, उन्होंने इस बात की नजीर पेश की है कि किस तरह तेल के वितरण को व्यवस्थित किया जा सकता है और इसका अनुकरण किया जाना चाहिए. या फोर्ड को ही लें. बेशक फोर्ड स्वार्थी हैं. लेकिन क्या वह तर्कसंगत उत्पादन के लिए एक उत्साही प्रबंधक नहीं हैं जिनसे आप सबक लेते हैं ? मैं इस तथ्य पर जोर देना चाहूंगा कि हाल ही में अंग्रेजी भाषी देशों में यूएसएसआर के प्रति एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है. इसका कारण, सबसे पहले, जापान की स्थिति और जर्मनी की घटनाएं हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति से प्रेरित होने के अलावा अन्य कारण भी हैं. इसका सबसे बड़ा कारण कई लोगों द्वारा इस तथ्य को मंजूर कर लेना है कि निजी मुनाफे पर टिकी हुई व्यवस्था ढह रही है. इन परिस्थितियों में, मुझे यह लगता है कि हमें दो दुनियाओं के बीच की दुश्मनी को आगे नहीं लाना चाहिए, बल्कि जितना हो सके सभी रचनात्मक आन्दोलनों, सभी रचनात्मक ताकतों को एक साथ लाने का प्रयास करना चाहिए. मुझे लगता है कि मैं आपसे अधिक वामपंथी हूं, श्रीमान स्तालिन, मुझे आपसे ज्यादा यह लगता है कि पुरानी प्रणाली अपने अंत के करीब है.

स्तालिन : पूंजीपतियों के बारे में, जो केवल मुनाफा देखते हैं, जो बस अमीर होना चाहते हैं, मैं यह नहीं कहना चाहता कि ये सबसे बेकार लोग हैं, कुछ और करने में सक्षम नहीं हैं. बेशक उनमें से कई में प्रबंधन की महान प्रतिभा हैं, जिन्हें मैं सपने में भी नहीं नकारता. हम सोवियत लोग पूंजीपतियों से बहुत कुछ सीखते हैं. और मॉर्गन, जिसे आप प्रतिकूल रूप से चित्रित करते हैं, निस्सन्देह एक अच्छा, सक्षम प्रबंधक था. लेकिन अगर आपका अर्थ उन लोगों से है जो दुनिया का पुनर्निमाण करने के लिए तैयार हैं, तो बेशक, आप उन्हें उन लोगों की श्रेणी में नहीं पाएंगे जो ईमानदारी से मुनाफा कमाते हैं. हम और वे विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं. आपने फोर्ड का उल्लेख किया. बेशक, वे उत्पादन के एक सक्षम प्रबंधक हैं. लेकिन क्या आप मजदूर वर्ग के प्रति उनके रवैये को नहीं जानते हैं ?

क्या आप नहीं जानते कि वह कितने मजदूरों को सड़क पर फेंक देता है ? पूंजीपति बस मुनाफा जानता है और धरती की कोई भी ताकत उसे इससे दूर नहीं कर सकती. पूंजीवाद का खात्मा तकनीकी बुद्धिजीवियों द्वारा और उत्पादन के ‘प्रबंधकों’ द्वारा नहीं बल्कि मेहनतकश वर्ग द्वारा होगा, क्योंकि उपर्युक्त तबका स्वतंत्र भूमिका नहीं निभाता है. इंजीनियर, उत्पादन का प्रबंधन उस तरह से नहीं करता जैसा वह करना चाहता है बल्कि उस तरह करता है जैसा कि उसे आदेश दिया जाता है, इस तरह से अपने नियोक्ताओं के हितों की सेवा के लिए करता है. बेशक इसमें अपवाद भी हैं. इस तबके में ऐसे लोग हैं जो पूंजीवाद के नशे से बाहर आ गये हैं. तकनीकी बुद्धिजीवी कुछ शर्तों के तहत, चमत्कार कर सकता है और मानव जाति को बहुत लाभ पहुंचा सकता है. लेकिन वह बहुत नुकसान भी पहुंचा सकता है. हम सोवियत लोगों के पास भी तकनीकी बुद्धिजीवियों का थोड़ा अनुभव है.

अक्टूबर क्रान्ति के बाद, तकनीकी बुद्धिजीवियों के एक खास वर्ग ने नये समाज के निर्माण के काम में भाग लेने से इनकार कर दिया, उन्होंने निर्माण के इस काम का विरोध किया और तोड़फोड़ की.

निर्माण के इस काम में तकनीकी बुद्धिजीवियों को लाने के लिए हमने हर वह सम्भव काम किया जो हम कर सकते थे. हमने हर तरीका आजमाया. हमारे तकनीकी बुद्धिजीवियों को नयी व्यवस्था की सहायता के लिए सक्रिय रूप से सहमत होने में ज्यादा समय नहीं लगा. आज इस तकनीकी बुद्धिजीवी वर्ग की सबसे अच्छी श्रेणी समाजवादी समाज के निर्माणकर्ताओं में सबसे आगे है. इस अनुभव के बाद हम तकनीकी बुद्धिजीवियों के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों को कम आंकने से काफी दूर हैं और हम जानते हैं कि एक ओर यह नुकसान पहुंचा सकता है, और दूसरी ओर, यह ‘चमत्कार’ कर सकता है. बेशक, चीजें अलग होंती अगर आध्यात्मिक रूप से यह सम्भव हो पाता कि एक ही झटके में तकनीकी बुद्धिजीवियों को पूंजीवादी दुनिया से अलग कर लिया जाए. लेकिन यह यूटोपिया है.

क्या ऐसे तकनीकी बुद्धिजीवी हैं जो बुर्जुआ दुनिया से अलग होकर समाज के पुनर्निर्माण का काम करेंगे ? क्या आपको लगता है कि इंग्लैंड में या फ्रांस में, इस तरह के लोग हैं ? नहीं, ऐसे बहुत कम लोग हैं जो अपने नियोक्ताओं से अलग होना चाहते हैं और दुनिया का पुनर्निर्माण शुरू करना चाहते हैं.

इसके अलावा, क्या हम इस तथ्य भुला सकते हैं कि दुनिया को बदलने के लिए राजनीतिक सत्ता का होना आवश्यक है ? श्रीमान वेल्स मुझे लगता है कि आप राजनीतिक सत्ता के सवाल को इतना कम करके आंकते हैं कि यह पूरी तरह से आपकी धारणा से बाहर हो जाती है.

अगर वे सत्ता पर कब्जा करने का सवाल उठाने में असमर्थ हैं, और उनके पास सत्ता नहीं है तो वे इस दुनिया में सबसे अच्छे इरादों के साथ भी क्या कर सकते हैं ? वे सबसे अच्छा काम उस वर्ग की मदद कर सकते हैं जिसके पास सत्ता है, लेकिन वे खुद दुनिया नहीं बदल सकते. ऐसा केवल उस महान वर्ग द्वारा किया जा सकता है जो पूंजीपति वर्ग का स्थान ले लेगा और सम्प्रभु स्वामी बन जायेगा जैसा कि पूंजीपति वर्ग खुद था. यह वर्ग मजदूर वर्ग है. बेशक, तकनीकी बुद्धिजीवियों की सहायता को स्वीकार किया जाना चाहिए; और बदले में उनकी मदद की जानी चाहिए. लेकिन यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि तकनीकी बुद्धिजीवी एक स्वतंत्र ऐतिहासिक भूमिका निभा सकते हैं. दुनिया का बदलना एक महान, जटिल और दर्दनाक प्रक्रिया है. इस कार्य के लिए एक महान वर्ग की आवश्यकता होती है. बड़े जहाज ही लम्बी यात्राओं पर जाते हैं.

वेल्स : हां, लेकिन लम्बी यात्राओं के लिए एक कप्तान और नाविक की आवश्यकता होती है.

स्तालिन : यह सच है; लेकिन लम्बी यात्रा के लिए सबसे पहले जो जरूरी है वह है एक बड़ा जहाज. जहाज के बिना कोई नाविक क्या है ? एक बेकार आदमी.

वेल्स : बड़ा जहाज मानवता है, वर्ग नहीं.

स्तालिन : श्रीमान वेल्स, आप स्पष्ट रूप से यह मानकर चलते हैं कि सभी लोग अच्छे हैं. मैं, हालांकि, यह नहीं भूलता कि कई दुष्ट लोग भी हैं. मैं पूंजीपतियों की अच्छाई में विश्वास नहीं करता.

वेल्स : मुझे तकनीकी बुद्धिजीवियों की कई दशक पहले की स्थिति याद है. उस समय तकनीकी बुद्धिजीवी संख्यात्मक रूप से कम थे, लेकिन करने को बहुत कुछ था और हर इंजीनियर, तकनीशियन और बौद्धिक को मौका मिल जाता था. इसीलिए तकनीकी बुद्धिजीवी वर्ग सबसे कम क्रान्तिकारी वर्ग था. हालांकि अब तकनीकी बुद्धिजीवी प्रचुरता में हैं और उनकी मानसिकता बहुत तेजी से बदल गयी है. कुशल व्यक्ति, जो पहले क्रान्तिकारी बात कभी नहीं सुनता था, अब इसमें बहुत रुचि लेता है. मैं हाल ही में हमारे महान अंग्रेजी वैज्ञानिक समाज रॉयल सोसाइटी के साथ भोजन कर रहा था. राष्ट्रपति का भाषण सामाजिक नियोजन और वैज्ञानिक नियंत्रण के बारे में था. मैंने उनसे जो कहा, तीस साल पहले वे उसे सुनते भी नहीं. आज, रॉयल सोसाइटी के प्रमुख क्रान्तिकारी विचार रखते हैं और मानव समाज के वैज्ञानिक पुनर्गठन पर जोर देते हैं. मानसिकता बदलती है. आपके वर्ग-युद्ध के प्रोपगेंडा का तलमेल इन तथ्यों के साथ नहीं बैठता.

स्तालिन : हां, मुझे यह पता है और इसे इस तथ्य से समझाया जाना चाहिए कि पूंजीवादी समाज अब एक अंधी गली में है. पूंजीपति इससे बाहर निकलना चाह रहे हैं, लेकिन वे इस अंधी गली से बाहर निकलने का कोई ऐसा रास्ता नहीं खोज सकते जो इस वर्ग की गरिमा के अनुकूल हो, इस वर्ग के हितों के अनुकूल हो. वे कुछ हद तक अपने हाथों और घुटनों के बल घिसट कर संकट से बाहर निकल सकते हैं, लेकिन वे एक ऐसा रास्ता नहीं खोज सकते जहां वे सिर उठा कर चल सकें यानी एक ऐसा तरीका जो पूंजीवाद के हितों में मूल रूप से कोई छेड़छाड़ नहीं करेगा. बेशक तकनीकी बुद्धिजीवियों के व्यापक हलकों में इसे महसूस किया जाता है. इसका एक बड़ा हिस्सा उन लोगों के समुदाय के साथ अपने हितों को महसूस करने लगा है जो इस अंधी गली से बाहर जाने का रास्ता बताने में सक्षम हैं.

वेल्स : स्तालिन, आप सभी लोग व्यावहारिक पक्ष से क्रान्तियों के बारे में थोड़ा-बहुत जानते हैं. क्या जनता कभी उठ खड़ी होती है ? क्या यह एक स्थापित सत्य नहीं है कि सभी क्रान्तियां अल्पसंख्यकों द्वारा की जाती हैं ?

स्तालिन : क्रान्ति के लिए एक नेतृत्वकारी क्रान्तिकारी अल्पसंख्या की आवश्यकता होती है; लेकिन सबसे प्रतिभाशाली, समर्पित और ऊर्जावान अल्पसंख्या भी असहाय हो जायेगी अगर वह लाखों लोगों के कम से कम निष्क्रिय समर्थन पर भी भरोसा नहीं करे.

वेल्स : कम से कम निष्क्रिय ? शायद अवचेत ?

स्तालिन : आंशिक रूप से अर्ध-सहज और अर्धचेतन भी, लेकिन लाखों लोगों के समर्थन के बिना, सबसे अच्छी अल्पसंख्या भी बेबस होती है.

वेल्स : मैं पश्चिम में साम्यवादी प्रचार देखता हूं और मुझे लगता है कि आधुनिक परिस्थितियों में यह प्रचार बहुत पुराने ढंग का है, क्योंकि यह विद्रोही प्रचार है. सामाजिक व्यवस्था को हिंसक तरीकों से उखाड़ फेंकने के पक्ष में यह प्रचार तब बहुत बढ़िया था जब यह निरंकुशता के खिलाफ था. लेकिन आधुनिक परिस्थितियों में, जब व्यवस्था किसी भी तरह ढह रही है, तो दक्षता, दक्षता और उत्पादकता पर जोर देना चाहिए न कि विद्रोह पर.

मुझे यह लगता है कि विद्रोह का विचार पुराना पड़ गया है. पश्चिम में साम्यवादी प्रचार रचनात्मक दिमाग वाले लोगों के लिए एक बाधा है.

स्तालिन : बेशक पुरानी व्यवस्था ढह रही है और सड़ रही है. यह सच है. लेकिन यह भी सच है कि इस मरती हुई व्यव्स्था को बचाने के लिए, अन्य तरीकों से, हर तरीके से बचाने के नये प्रयास किये जा रहे हैं.

आप एक सही दावे से गलत निष्कर्ष निकालते हैं.

आप ठीक कहते हैं कि पुरानी दुनिया ढह रही है.

लेकिन आप यह गलत सोच रहे हैं कि यह अपने आप ढह रही है. नहीं, एक सामाजिक व्यवस्था की जगह पर दूसरी व्यवस्था को लाना एक जटिल और लम्बी क्रान्तिकारी प्रक्रिया है. यह केवल एक सहज प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक संघर्ष है, यह वर्गों के टकराव से जुड़ी प्रक्रिया है. पूंजीवाद सड़ रहा है, लेकिन इसकी तुलना महज एक पेड़ से नहीं की जानी चाहिए, जो इस हद तक सड़ गया है कि अपने आप जमीन पर गिर जाएगा. नहीं, क्रान्ति, एक सामाजिक व्यवस्था की जगह पर दूसरी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना है, यह हमेशा चलेना वाला एक संघर्ष, एक दर्दनाक और एक क्रूर संघर्ष, जीवन और मृत्यु का संघर्ष रहा है. और हर बार नयी दुनिया के लोग जब सत्ता में आये तो उन्हें पुरानी दुनिया की पुरानी सत्ता को दुबारा बहाल करने की कोशिश के खिलाफ खुद को बचाने के लिए ताकत का इस्तेमाल करना पड़ा, नयी दुनिया के इन लोगों को हमेशा सतर्क रहना पड़ा, नयी व्यवस्था पर पुरानी दुनिया के हमलों को पीछे खदेड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ा.

हां, आप सही हैं जब आप कहते हैं कि पुरानी सामाजिक व्यवस्था टूट रही है लेकिन यह अपने आप नहीं टूट रही है. उदाहरण के लिए फासीवाद को ही लें.

फासीवाद एक प्रतिक्रियावादी ताकत है जो हिंसा के जरिये पुरानी व्यवस्था को बचाये रखने की कोशिश कर रही है. आप फासीवादियों के साथ क्या करेंगे? क्या उनके साथ बहस करेंगे ? उन्हें समझाने की कोशिश करेंगे ? लेकिन इसका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. कम से कम कम्युनिस्ट हिंसा के तरीकों को आदर्श नहीं मानते हैं. लेकिन कम्युनिस्ट ऐसा नहीं मानते, वे ऐसा नहीं सोच सकते कि पुरानी दुनिया खुद-ब-खुद रंगमंच से गायब हो जायेगी, वे देखते हैं कि पुरानी व्यवस्था हिंसक रूप से खुद को बचाने में लगी रही है, और इसीलिए कम्युनिस्ट मजदूर वर्ग से कहते हैं: हिंसा का जवाब हिंसा से दें; पुरानी मरणासन्न व्यवस्था आपको कुचले इससे बचने के लिए जो कुछ किया जा सकता है वह करें, इसे अपने उन हाथों में बेड़िया डालने की इजाजत न दें, जिन हाथों से आप पुरानी व्यवस्था को उखाड़ फेंकेंगे. जैसा कि आपने देखा, कम्युनिस्ट एक सामाजिक व्यवस्था की जगह पर दूसरी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना को एक सहज और शांतिपूर्ण प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल, लम्बी और हिंसक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं. कम्युनिस्ट तथ्यों की अनदेखी नहीं कर सकते.

वेल्स : लेकिन पूंजीवादी दुनिया में अब जो हो रहा है उसे देखें. उसक पतन साधारण नहीं है; यह प्रतिक्रियावादी हिंसा का प्रकोप है जो गैंगस्टरवाद की हद तक पतित हो गया है. और मुझे यह लगता है कि जब प्रतिक्रियावादी और अनजाने में हिंसा के साथ संघर्ष की बात आती है, तो समाजवादी कानून के सामने अपील कर सकते हैं, और पुलिस को दुश्मन बनाने के बजाय उन्हें प्रतिक्रियावादियों के खिलाफ लड़ाई में उनका समर्थन करना चाहिए. मुझे लगता है कि पुराने विद्रोही समाजवाद के तरीकों से ऐसा करना बेकार है.

स्तालिन : कम्युनिस्ट इसे समृद्ध ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर देखते हैं जो सिखाता है कि पुराने पड़ चुके वर्ग इतिहास के रंगमंच को राजी-खुशी नहीं छोड़ते हैं.

सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड के इतिहास को याद करें. क्या बहुतों ने यह नहीं कहा कि पुरानी सामाजिक व्यवस्था का पतन हो गया ? लेकिन क्या इसे बलपूर्वक कुचलने के लिए क्रॉमवेल की जरूरत नहीं थी ?

वेल्स : क्रॉमवेल ने संविधान के आधार पर और संवैधानिक व्यवस्था के नाम पर काम किया.

स्तालिन : संविधान के नाम पर उसने हिंसा का सहारा लिया, राजा का सिर काट दिया, संसद को तितर-बितर कर दिया, कुछ को गिरफ्तार कर लिया और कुछ को मार डाला !

या हमारे इतिहास से एक उदाहरण लेते हैं. क्या यह लम्बे समय से स्पष्ट नहीं था कि जारशाही व्यवस्था का पतन हो रहा था, वह ढह रही थी ? लेकिन इसे उखाड़ फेंकने के लिए कितना खून बहाना पड़ा?

और अक्टूबर क्रान्ति का क्या? क्या ऐसे बहुत सारे लोग नहीं थे जो जानते थे कि हम बोल्शेविक ही केवल सही रास्ता दिखा रहे थे?

क्या यह स्पष्ट नहीं था कि रूसी पूंजीवाद का पतन हो चुका था ?

लेकिन आप जानते हैं कि अक्टूबर क्रान्ति की अपने आंतरिक और बाहरी सभी दुश्मनों से रक्षा करने के लिए किया गया प्रतिरोध कितना महान था और उसमें कितना खून बहा था.

या अठारहवीं सदी के अंत में फ्रांस को ही ले लीजिए.

1789 से बहुत पहले कई लोगों के लिए यह स्पष्ट था कि शाही सत्ता, सामन्ती व्यवस्था कितनी सड़ी हुई थी. लेकिन वर्गों के टकराव को तो नही, पर एक लोकप्रिय विद्रोह को टाला नहीं जा सकता था. आखिर ऐसा क्यों था? क्योंकि जिन वर्गों को इतिहास के रंगमंच को छोड़ देना चाहिए, वे इस बारे में आश्वस्त होने वाले आखिरी होते हैं कि उनकी भूमिका समाप्त हो गयी है. उन्हें इस बात का यकीन दिलाना नामुमकिन है. उन्हें लगता है कि पुरानी व्यवस्था की ढहती इमारतों की दरारें भरकर उसे बचाया जा सकता है. यही कारण है कि मरणासन्न वर्ग एक शासक वर्ग के रूप में अपने अस्तित्व को दुबारा हासिल करने के लिए हथियारों का सहारा लेते हैं और हर उपलब्ध तरीके का उपाय करते हैं.

वेल्स : लेकिन महान फ्रांसीसी क्रान्ति के अगुआओं में अच्छी खासी संख्या में वकील थे.

स्तालिन : क्या आप क्रान्तिकारी आन्दोलनों में बुद्धिजीवियों की भूमिका से इनकार करते हैं ? क्या महान फ्रांसीसी क्रान्ति एक वकीलों की क्रान्ति थी और एक लोकप्रिय क्रान्ति नहीं थी, जिसने सामन्तवाद के खिलाफ व्यापक जनता को उत्तेजित किया और थर्ड एस्टेट के हितों की हिमायत की ? और क्या महान फ्रांसीसी क्रान्ति के नेताओं के बीच वकीलों ने पुरानी व्यवस्था के नियमों के अनुसार काम किया ? क्या वे नये, बुर्जुआ क्रान्तिकारी कानून लेकर नहीं आये ?

इतिहास का समृद्ध अनुभव सिखाता है कि अब तक किसी भी वर्ग ने अपनी मर्जी से दूसरे वर्ग के लिए रास्ता नहीं बनाया है. विश्व इतिहास में ऐसी कोई मिसाल नहीं है. कम्युनिस्टों ने इतिहास का यह सबक सीखा है. कम्युनिस्ट पूंजीपति वर्ग के खुद-ब-खुद चले जाने का स्वागत करेंगे. लेकिन ऐसा होना असम्भव है, अनुभव यही सिखाता है. यही कारण है कि कम्युनिस्ट सबसे बुरे के लिए तैयार रहना चाहते हैं और मजदूर वर्ग को सतर्क रहने के लिए कहते हैं, ताकि युद्ध के लिए तैयार रहें. ऐसा कप्तान कौन चाहता है जो अपनी सेना की सतर्कता को कम कर दे, एक ऐसा कप्तान जो यह नहीं समझता कि दुश्मन आत्मसमर्पण नहीं करेगा, उसे कुचल दिया जाना चाहिए ? इस तरह के कप्तान होने का मतलब है मजदूर वर्ग को धोखा देना, उससे विश्वासघात करना. यही कारण है कि मुझे लगता है कि जो आपको पुराने जमाने का लगता है वह वास्तव में मजदूर वर्ग के लिए क्रान्तिकारी सहूलियत का एक पैमाना है.

वेल्स : मैं इस बात से इनकार नहीं करता कि ताकत का इस्तेमाल किया जाना है, लेकिन मुझे लगता है कि संघर्ष के रूपों को मौजूदा कानूनों द्वारा दिये किये गये अवसरों के जितना करीब हो सके उतना ही माकूल होना चाहिए, जो प्रतिक्रियावादी हमलों के खिलाफ बचाव होना चाहिए. पुरानी व्यवस्था को अव्यवस्थित करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह जैसी है वह अपने आप में ही काफी अव्यवस्थित है. इसलिए मुझे यह लगता है कि पुरानी व्यवस्था के खिलाफ, कानून के खिलाफ विद्रोह, अप्रचलित, पुराने जमाने का लगता है. संयोग से, मैं सच्चाई को अधिक स्पष्ट रूप से सामने लाने के लिए जानबूझकर मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा हूं. मैं निम्नलिखित तरीके से अपने नजरिये को सूत्रबद्ध कर सकता हूं :

सबसे पहले, मैं शान्ति का समर्थक हूं; दूसरा, मैं वर्तमान व्यवस्था पर तब तक ही हमला करता हूं जब तक वह शान्ति का आश्वासन नहीं दे सकती है; तीसरा, मुझे लगता है कि वर्ग युद्ध प्रचार उन शिक्षित लोगों को समाजवाद से सिर्फ दूर कर सकता है जिन्हें समाजवाद की जरूरत है.

स्तालिन : किसी महान उद्देश्य को, एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक उद्देश्य को हासिल करने के लिए, एक मुख्य ताकत, एक बांध, एक क्रान्तिकारी वर्ग होना चाहिए. इसके बाद इस मुख्य ताकत के लिए एक सहायक ताकत की मदद को संगठित करना आवश्यक है; इस मामले में यह सहायक ताकत पार्टी है, बुद्धिजीवियों की सबसे अच्छी ताकत जिससे सम्बन्धित होती है. अभी-अभी आपने ‘शिक्षित लोगों’ के बारे में बात की थी. लेकिन आपने किन शिक्षित लोगों को ध्यान में रखा है ? क्या सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड में, अठारहवीं शताब्दी के अंत में फ्रांस में और अक्टूबर क्रान्ति के युग में रूस में पुरानी व्यवस्था के पक्ष में बहुत सारे शिक्षित लोग नहीं थे ? पुरानी व्यवस्था की सेवा में कई उच्च शिक्षित लोग थे जिन्होंने पुरानी व्यवस्था का बचाव किया, जिन्होंने नयी व्यवस्था का विरोध किया. शिक्षा एक हथियार है जिसका प्रभाव उन हाथों द्वारा निर्धारित होता है जिनके हाथों में वह होती है, जो इसका इस्तेमाल करते हैं.

बेशक, सर्वहारा वर्ग, समाजवाद को उच्च शिक्षित लोगों की जरूरत है. स्पष्ट रूप से, अनाड़ी लोग सर्वहारा वर्ग को समाजवाद के लिए संघर्ष में, नये समाज के निर्माण में मदद नहीं कर सकते. मैं बुद्धिजीवियों की भूमिका को कम नहीं आंकता; इसके उलट, मैं इसपर जोर देता हूं. हालांकि, सवाल यह है कि हम किस बुद्धिजीवी वर्ग पर चर्चा कर रहे हैं ?

क्योंकि अलग-अलग तरह के बुद्धिजीवी होते हैं.

वेल्स : शैक्षिक प्रणाली में आमूल परिवर्तन के बिना कोई क्रान्ति नहीं हो सकती. इसके लिए दो उदाहरण देना काफी होगा जर्मन गणराज्य का उदाहरण, जिसने पुरानी शैक्षिक प्रणाली को नहीं छुआ और इसलिए कभी गणतंत्र नहीं बना; और ब्रिटिश लेबर पार्टी का उदाहरण है, जिसमें शैक्षिक प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन पर जोर देने के संकल्प का अभाव है.

स्तालिन : यह एक सही टिप्पणी है.

आपके तीन बिन्दुओं का जवाब देने की मैं इजाजत चाहूंगा.

सबसे पहले, क्रान्ति के लिए सबसे मुख्य चीज है एक सामाजिक हिरावल का अस्तित्व. क्रान्ति का यह हिरावल मजदूर वर्ग है.

दूसरा, एक सहायक ताकत की आवश्यकता होती है, जिसे कम्युनिस्ट एक पार्टी कहते हैं. पार्टी में बुद्धिमान कार्यकर्ता और तकनीकी बुद्धिजीवी वर्ग के वे तत्व शामिल होते हैं जो मजदूर वर्ग के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं. बुद्धिजीवी वर्ग तभी मजबूत हो सकता है जब वह मजदूर वर्ग के साथ गठजोड़ करे.

अगर वह मजदूर वर्ग का विरोध करता है तो उसका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता. तीसरा, परिवर्तन के लिए सम्बल के रूप में राजनीतिक शक्ति की आवश्यकता होती है. नयी राजनीतिक शक्ति नये कानून, नयी व्यवस्था, जो क्रान्तिकारी व्यवस्था है, का निर्माण करती है.

मैं हर तरह की व्यवस्था को नहीं मान सकता. मैं सिर्फ उस व्यवस्था को मानता हूं जो मजदूर वर्ग के हितों से मेल खाती है. हालांकि अगर पुरानी व्यवस्था के किसी भी कानून का उपयोग नयी व्यवस्था के लिए संघर्ष के हितों में किया जा सकता है, तो पुराने कानूनों का उपयोग किया जाना चाहिए.

मुझे आपकी इस बात पर आपत्ति नहीं है कि वर्तमान व्यवस्था पर तब तक ही हमला किया जाना चाहिए तक यह लोगों के लिए आवश्यक व्यवस्था को सुनिश्चित नहीं करती है.

और, अन्त में, आप गलत हैं अगर आपको लगता है कि कम्युनिस्ट हिंसा के पुजारी हैं. अगर शासक वर्ग मजदूर वर्ग को रास्ता देने के लिए सहमत हो जाता है तो वे हिंसक तरीकों को छोड़कर बहुत खुश होंगे. लेकिन इतिहास का अनुभव ऐसी धारणा को खारिज करता है.

वेल्स : हालांकि इंग्लैंड के इतिहास में ऐसा एक मामला था, जब एक वर्ग स्वेच्छा से दूसरे वर्ग को सत्ता सौंप रहा था. 1830 और 1870 के बीच की अवधि में, अभिजात वर्ग, जिसका प्रभाव अभी भी अठारहवीं शताब्दी के अंत में काफी था, स्वेच्छा से, एक गम्भीर संघर्ष के बिना, बुर्जुआ वर्ग के सामने सत्ता समर्पित कर रहा था, जिसने राजशाही के एक भावुक समर्थन के रूप में कार्य किया था. इसके बाद, सत्ता के इस हस्तांतरण से वित्तीय कुलीनतंत्र के शासन की स्थापना हुई.

स्तालिन : लेकिन आप जाने-अनजाने क्रान्ति के सवाल से सुधार के सवाल पर चले गये हैं. यह एक ही बात नहीं है. क्या आपको नहीं लगता कि उन्नीसवीं शताब्दी में इंग्लैंड में सुधारों में चार्टिस्ट आन्दोलन ने एक महान भूमिका निभायी थी ?

वेल्स : चार्टिस्ट आन्दोलन ने इतनी कम भूमिका निभायी कि कोई निशान तक छोड़े बिना गायब हो गया.

स्तालिन : मैं आपसे सहमत नहीं हूं. चार्टिस्टों ने, और उनके द्वारा आयोजित हड़ताल आन्दोलन ने एक महान भूमिका निभायी, उन्होंने मताधिकार के सम्बन्ध में, शासक वर्ग को तथाकथित ‘संसद में प्रतिनिधि भेजने वाले सड़ चुके नगरों’ को खत्म करने के सम्बन्ध में और ‘चार्टर’ के कुछ बिन्दुओं के सम्बन्ध में कई रियायतें देने के लिए मजबूर किया.

चार्टिस्टवाद ने कोई महत्त्वहीन ऐतिहासिक भूमिका नहीं निभायी और बड़े झटकों को टालने के लिए शासक वर्गों के एक वर्ग को कुछ रियायतें देने, सुधार करने के लिए मजबूर किया. आम तौर पर, यह कहा जाना चाहिए कि सभी शासक वर्ग, इंग्लैंड के शासक वर्ग, अभिजात और बुर्जुआ वर्ग, दोनों ही अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए अपने वर्ग के हितों के दृष्टिकोण से सबसे चतुर, सबसे अधिक लचीले साबित हुए हैं. आधुनिक इतिहास के एक उदाहरण के तौर पर 1926 में इंग्लैंड में हुई आम हड़ताल को लें. कोई भी अन्य पूंजीपति यही करता कि जब जनरल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन ने हड़ताल का आह्वान किया तो वह ट्रेड यूनियन के नेताओं को गिरफ्तार कर लेता.

ब्रिटिश बुर्जुआ वर्ग ने ऐसा नहीं किया और इसने अपने हितों के दृष्टिकोण से चतुराई से काम लिया.

मैं संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी या फ्रांस में पूंजीपतियों द्वारा नियोजित की जा रही ऐसी लचीली रणनीति की कल्पना नहीं कर सकता. अपने शासन को बनाये रखने के लिए, ग्रेट ब्रिटेन के शासक वर्गों ने कभी भी मामूली रियायतों, सुधारों की पेशकश को कभी नहीं रोका. लेकिन यह सोचना गलत होगा कि ये सुधार क्रान्तिकारी थे.

वेल्स : मेरे देश के शासक वर्गों के बारे में आप मुझसे ज्यादा बेहतर राय रखते हैं. लेकिन क्या एक छोटी सी क्रान्ति और एक महान सुधार के बीच कोई बड़ा अंतर है ? क्या एक सुधार एक छोटी क्रान्ति नहीं है ?

स्तालिन : नीचे से पड़ रहे दबाव के कारण, जनता के दबाव कारण, पूंजीपति कभी-कभी मौजूदा सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के आधार पर कुछ आंशिक सुधारों को स्वीकार कर सकते हैं.

इस तरह से कार्य करते हुए, वह यह जोड़-तोड़ करते हैं कि ये रियायतें उनके वर्ग शासन को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं. यही सुधार का सार है. हालांकि, क्रान्ति का अर्थ है सत्ता का एक वर्ग से दूसरे वर्ग में संक्रमण. इसलिए क्रान्ति के तौर पर किसी भी सुधार का वर्णन करना असम्भव है. इसलिए हम किसी अगोचर ढंग से शासक वर्ग द्वारा रियायतें देकर और सुधारों के जरिए एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में परिवर्तन को किसी समाज व्यवस्था में परिवर्तन के तौर पर नहीं ले सकते.

वेल्स : इस बातचीत के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूं, मेरे लिए यह बहुत मायने रखती है. जब आप मुझे ये बातें समझा रहे हैं तो मुझे यकीन है कि आपके मन में वह सब चल रहा होगा जब आप क्रान्ति से पहले गैरकानूनी अध्ययन चक्रों में समाजवाद की बुनियादी शिक्षा दिया करते थे. आज के समय में केवल दो व्यक्ति हैं जिनकी राय, जिनके हरेक शब्द को लाखों लोग सुन रहे हैं: आप और रूजवेल्ट. अन्य लोग जितना चाहें उतना उपदेश दे सकते हैं; वे जो कहते हैं वह कभी छपेगा नहीं या उस पर ध्यान नहीं दिया जायेगा.

आपके देश में जो कुछ हो रहा है मैं अभी उसका मूल्यांकन तो नहीं कर सकता, मैं कल ही यहां आया हूं. लेकिन मैं स्वस्थ औरतों और मर्दों के खुशहाल चेहर देख चुका हूं और मुझे पता है कि यहां बहुत कुछ किया जा रहा है. 1920 की तुलना में यह आश्चर्यजनक है.

स्तालिन : बहुत कुछ किया जा सकता था अगर हम बोल्शेविक चतुर होते तो !

वेल्स : नहीं, अगर मनुष्य चतुर होते. मानव मस्तिष्क के पुनर्निर्माण के लिए एक पंचवर्षीय योजना का आविष्कार करना एक अच्छी बात होगी. मानव मस्तिष्क में स्पष्ट रूप से एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक कई चीजों का अभाव है.

(हंसी.)

स्तालिन : क्या आप सोवियत लेखक संघ की कांग्रेस होने तक यहां रुकेंगे ?

वेल्स : दुर्भाग्य से, मेरे पास कई सारे काम हैं जिन्हें पूरा करना है और मैं केवल एक सप्ताह के लिए यूएसएसआर में हूं.

मैं आपसे मिलने आया था और हमारी बाचतीच से मैं बहुत सन्तुष्ट हूं. लेकिन मैं ऐसे सोवियत लेखकों के साथ चर्चा करने का इरादा रखता हूं ताकि मैं उन्हें पीईएन क्लब से जोड़ने की सम्भावना देख सकूं. यह गॉल्सवर्थी द्वारा स्थापित लेखकों का एक अन्तरराष्ट्रीय संगठन है; उनकी मृत्यु के बाद मैं इसका अध्यक्ष बना. संगठन अभी भी कमजोर है, लेकिन इसकी कई देशों में शाखाएं हैं, और जो अधिक महत्त्वपूर्ण है, सदस्यों के भाषणों की रिपोर्ट को प्रेस में व्यापक रूप से प्रकाशित किया जाता है. यह विचार की मुक्त अभिव्यक्ति पर जोर देता है विपक्ष की राय का भी.

मैं उम्मीद करता हूं कि गोर्की के साथ इस बिन्दु पर चर्चा होगी. मुझे नहीं पता कि क्या आप अभी तक यहां इतनी आजादी के लिए तैयार हैं.

स्तालिन : हम बोल्शेविक इसे ‘आत्म-आलोचना’ कहते हैं. यूएसएसआर में इसका व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है. अगर कुछ ऐसा है जिसमें मैं आपकी मदद कर सकता हूं. मुझे खुशी होगी.

वेल्स : (धन्यवाद व्यक्त करते हैं)

स्तालिन : (आने के लिए धन्यवाद व्यक्त करते हैं.)

संदर्भ :

1. एंग्लो-सैक्सन, शब्द का उपयोग ऐतिहासिक रूप से जर्मन लोगों के किसी भी सदस्य का वर्णन करने के लिए किया गया था, जो 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से नॉर्मन विजय (1066) के समय तक, वहां रहते थे और शासित प्रदेश थे जो आज इंग्लैंड और वेल्स का हिस्सा हैं.

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