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चाङ चुन-चियाओ : बुर्जुआ वर्ग के ऊपर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करने के बारे में

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 6, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
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चाङ चुन-चियाओ (Zhang Chunqiao) चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के एक प्रमुख नेता थे, जो सांस्कृतिक क्रांति के दौरान प्रसिद्ध ‘गैंग ऑफ फोर’ (Gang of Four) या ‘चार का गिरोह’ के सदस्य थे. 1970 के दशक में, उन्होंने शंघाई में पार्टी के प्रमुख के रूप में कार्य किया और माओ त्से-तुंग की वामपंथी विचारधारा के जबरदस्त समर्थक थे.
चाङ चुन-चियाओ, जियांग किंग, याओ वेन्यूआन और वांग होंगवेन के साथ ‘गैंग ऑफ फोर’ का हिस्सा थे, जिसमें जियांग किंग महान माओ त्से-तुंग की पत्नी थी. 1976 में माओ त्से-तुङ के निधन के बाद चीन में देङ सियाओ पिङ के नेतृत्व में हुए प्रतिक्रान्तिकारी सत्ता परिवर्तन के बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और उनके खिलाफ भयंकर कुत्सा-प्रचार किया गया. चीन को पूंजीवादी राह पर ले जाने की कोशिशों के विरुद्ध जेल में भी वह आजीवन संघर्ष करते रहे.
आज दुनिया के तमाम कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ‘गैंग ऑफ फोर’ को सच्चे कम्युनिस्ट क्रांतिकारी मानते हैं. खासकर भारत में हथियारबंद आंदोलन का संचालन करने वाले महान कम्युनिस्ट क्रांतिकारी पार्टी सीपीआई-माओवादी ‘गैंग ऑफ फोर’ को माओ का सच्चा उत्तराधिकारी मानते हैं. चाङ चुन-चियाओ की तरह ही भारत के माओवादी भी संशोधनवाद को सबसे बड़ा खतरा मानते हैं.
चाङ चुन-चियाओ का यह लेख समाजवादी समाज में विभिन्न स्तरों पर चलने वाले गम्भीर वर्ग संघर्ष पर जोर देने के साथ ही चीन में पूंजीवादी पुनर्स्थापना को समझने में मदद करता है. सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का यह महत्वपूर्ण दस्तावेज 1975 में, विदेशी भाषा प्रकाशन, पेकिङ द्वारा प्रकाशित हुआ था. पेकिङ रिव्यू 14, 4 अप्रैल 1975 में यह प्रकाशित हुआ था [हांक्वी (लाल ध्वजा) 4, 1975 के लेख का अनुवाद].
चाङ चुन-चियाओ : बुर्जुआ वर्ग के ऊपर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करने के बारे में
चाङ चुन-चियाओ : बुर्जुआ वर्ग के ऊपर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करने के बारे में

अध्यक्ष माओ ने कहा था :

‘बुर्जुआ वर्ग पर अधिनायकत्व लागू करने की बात लेनिन ने क्यों की है ? इस सवाल पर स्पष्ट हो लेना आवश्यक है. इस सवाल पर स्पष्टता का अभाव संशोधनवाद की ओर ले जायेगा. इसे पूरे राष्ट्र को बता दिया जाना चाहिए.’

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‘इस समय हमारे देश में एक माल-अर्थव्यवस्था लागू है, वेतन-प्रणाली भी असमान है, जैसा कि आठ ग्रेड वाले वेतनमान के मामले में, और ऐसी ही कई चीजें हैं. सर्वहारा के अधिनायकत्व के अन्तर्गत ऐसी चीजों को केवल सीमित किया जा सकता है. इसलिए यदि लिन पियाओ जैसे लोग सत्ता में आ जाते हैं तो पूंजीवादी व्यवस्था को खड़ा कर देना उनके लिए काफी आसान होगा. यही कारण है कि हमें मार्क्सवादी-लेनिनवादी रचनाओं का और अधिक अध्ययन करना चाहिए.

‘लेनिन ने कहा है कि ‘छोटे पैमाने का उत्पादन लगातार, हर दिन, हर घंटे, स्वतः स्फूर्त रूप से और बड़े पैमाने पर पूंजीवाद और बुर्जुआ वर्ग को पैदा करता रहता है.’ वे मजदूरों और पार्टी सदस्यों के एक हिस्से के बीच से भी पैदा होते हैं. सर्वहारा की कतारों और राज्य एवं अन्य संस्थाओं के पदाधिकारियों, दोनों में ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्होंने बुर्जुआ जीवनशैली अपना ली है.’

सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व का सवाल एक लम्बे समय से मार्क्सवाद और संशोधनवाद के बीच संघर्ष का केन्द्र रहा है. लेनिन ने कहा है, “सिर्फ वही एक मार्क्सवादी है जो वर्ग संघर्ष की स्वीकृति को सर्वहारा के अधिनायकत्व की स्वीकृति तक विस्तारित करता है.” और सिद्धान्त एवं व्यवहार दोनों में हमें मार्क्सवाद के अनुसार चलने और संशोधनवाद के अनुसार नहीं चलने में सक्षम बनाने के ही उद्देश्य से अध्यक्ष माओ ने सर्वहारा के अधिनायकत्व के प्रश्न पर स्पष्ट होने के लिए समूचे राष्ट्र का आह्वान किया है.

हमारा देश अपने ऐतिहासिक विकास के एक महत्वपूर्ण काल से गुजर रहा है. समाजवादी क्रान्ति और समाजवादी निर्माण और खासतौर पर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के ल्यू शाओ-ची और लिन पियाओ के बुर्जुआ हेडक्वार्टरों के ध्वस्त किये जाने के दो दशकों से भी अधिक समय के परिणामस्वरूप हमारे सर्वहारा अधिनायकत्व का पहले हमेशा की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ीकरण हुआ है, और हमारा समाजवादी उद्देश्य फल-फूल रहा है. जुझारूपन से भरी हुई हमारी समूची जनता शताब्दी के अन्त तक चीन को एक शक्तिशाली समाजवादी देश में ढाल देने के लिए दृढ़ संकल्प है. इस प्रयास के दौरान और समाजवाद के पूरे ऐतिहासिक दौर में, चीन के भावी विकास का मूल मुद्दा यह है कि हम पूरे सर्वहारा के अधिनायकत्व पर डटे रहते हैं या नहीं. या वर्तमान वर्ग संघर्षों का भी यह तकाजा है कि हम सर्वहारा वर्ग दौर में चीन के भावी विकास का मूल मुद्दा यह है कि हम पूरे रास्ते सर्वहारा के अधिनायकत्व के अधिनायकत्व के प्रश्न पर स्पष्ट हो. अध्यक्ष माओ ने कहा है “इस प्रश्न पर स्पष्टता का अभाव हमें संशोधनवाद की ओर ले जायेगा.” सिर्फ कुछ लोगों की इस मुद्दे पर पकड़ होने से कछ नहीं होगा. इसे “पुरे राष्ट्र को बता दिया जाना” आवश्यक होगा. इस अध्ययन में सफलता के वर्तमान और दीर्घकालिक महत्व को बढ़ा-चढ़ा कर नहीं देखा जा सकता.

बहुत पहले, 1920 में, महान अक्तूबर समाजवादी क्रान्ति को नेतृत्व देने और सर्वहारा अधिनायकत्व वाले पहले राज्य को निर्देशन देने के अपने व्यावहारिक अनुभव के आधार पर; लेनिन ने तीक्ष्णता के साथ इंगित किया था “सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व इस नये वर्ग द्वारा अपेक्षतया अधिक शक्तिशाली शत्रु, बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध सर्वाधिक दृढ़ संकल्प के साथ छेड़ा गया और सर्वाधिक निष्ठुर युद्ध है जिसका प्रतिरोध इसकी सत्ता उखाड़ फेंके जाने के बाद (हालांकि सिर्फ एक देश में ही), दस गुना बढ़ गया है और जिसकी ताकत सिर्फ अन्तरराष्ट्रीय पूंजी की शक्ति में, बुर्जुआ वर्ग के अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों की शक्ति और स्थायित्व में ही नहीं, बल्कि आदत के बल में, छोटे पैमाने के उत्पादन की शक्ति में भी निहित है. क्योंकि दुर्भाग्यवश, छोटे पैमाने का उत्पादन अभी भी दुनिया में बहुत व्यापक रूप में मौजूद है और छोटे पैमाने का उत्पादन लगातार, हर दिन, हर घंटे, स्वतः स्फूर्त रूप से, और बड़े पैमाने पर पूंजीवाद और बुर्जुआ वर्ग को पैदा करता रहता है. इन सब कारणों से सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व अनिवार्य है. “लेनिन ने बताया है कि सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व पुराने समाज की शक्तियों और परम्पराओं के विरुद्ध-रक्तपातपूर्ण और रक्तहीन, हिसंक और शान्तिपूर्ण, सामरिक और आर्थिक, शैक्षिक और प्रशासकीय-चिरस्थायी संघर्ष है, कि इसका मतलब बुर्जुआ वर्ग पर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व है. लेनिन ने बार-बार जोर दिया है कि बुर्जुआ वर्ग पर एक दीर्घकालिक, सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू किये बगैर इस पर विजय पाना असम्भव है. लेनिन के इन शब्दों की, खासतौर से जिन पर उन्होंने विशेष जोर दिया है उनकी, बाद के वर्षों के दौरान व्यवहार में पुष्टि हो चुकी है. निश्चित तौर पर, नये बुर्जुआ तत्वों के जत्थे पैदा होते गये हैं, और खासतौर पर यह खुश्चेव-ब्रेझनेव गद्दार गुट ही है जो उनका प्रतिनिधि है. ये लोग आम तौर पर अच्छी वर्ग-पृष्ठभूमि वाले हैं; इनमें से लगभग सभी लाल झण्डे तले पले-बढ़े हैं; ये सांगठनिक तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गये हैं, कालेज में प्रशिक्षण लिया है, और तथाकथित लाल विशेषज्ञ बन गये हैं. लेकिन ये पूंजीवाद की पुरानी जमीन द्वारा पैदा किये गये नये जहरीले घास-पात हैं. इन्होंने अपने ही वर्ग से गद्दारी की है, पार्टी और राज्यसत्ता को हथिया लिया है, पूंजीवाद की पुनर्स्थापना कर दी है, सर्वहारा के ऊपर बुर्जुआ वर्ग की तानाशाही के सरदार बन गये हैं और वह काम किया है जिसे करने की कोशिश हिटलर ने की थी लेकिन असफल हो गया था. इतिहास का यह अनुभव हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि “उपग्रह आसमान में उड़े और लाल झण्डा जमीन पर गिर गया”, खासकर इस समय इसे नहीं भूलना चाहिए जब हम एक शक्तिशाली देश के निर्माण के लिए दृढ़संकल्प हैं.

हमें इस बात का संजीदा अहसास होना ही चाहिए कि अभी भी चीन के संशोधनवादी हो जाने का खतरा मौजद है. ऐसा सिर्फ इसलिए ही नहीं है कि साम्राज्यवाद और सामाजिक साम्राज्यवाद हमारे विरुद्ध हमले और तोड़‌फोड़ कभी नहीं बन्द करेंगे, सिर्फ इसलिए ही नहीं है कि चीन के पुराने जमीन्दार और पूंजीपति अभी भी कायम हैं और उन्होंने अपनी पराजय स्वीकार नहीं की है, बल्कि इसलिए भी है कि नये बुर्जुआ तत्व प्रतिदिन और प्रति घण्टा पैदा हो रहे हैं, जैसा लेनिन ने बताया है. कुछ कामरेड यह तर्क देते हैं कि लेनिन ने ऐसा सामूहिकीकरण के पहले की स्थिति के लिए कहा है. यह साफ तौर पर गलत है. लेनिन की टिप्पणियां कतई पुरानी नहीं पड़ी हैं. उन्हें 1957 में प्रकाशित अध्यक्ष माओ की रचना ‘जनता के बीच के अन्तरविरोध को सही ढंग से हल करने के बारे में’ को देखना चाहिए. इसमें अध्यक्ष माओ ने ठोस विश्लेषण के जरिये यह दिखाया है कि स्वामित्व की व्यवस्था के समाजवादी रूपान्तरण में, जिसमें कि कृषि सहकारिता की उपलब्धि भी शामिल है, बुनियादी जीत हासिल कर लेने के बाद अभी भी चीन में वर्ग, वर्ग-अन्तरविरोध और वर्ग संघर्ष मौजूद हैं, और अभी भी उत्पादन सम्बन्ध और उत्पादक शक्तियों के बीच तथा अधिरचना और आर्थिक मूलाधार के बीच सामंजस्य और अन्तरविरोध, दोनों ही मौजूद हैं. लेनिन के बाद सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के नये अनुभव का समाहार करने के पश्चात अध्यक्ष माओ ने स्वामित्व की व्यवस्था में परिवर्तन के बाद उठने वाले विभिन्न प्रश्नों के सुव्यवस्थित रूप से उत्तर दिये, सर्वहारा के अधिनायकत्व के कार्यभार और नीतियां निर्धारित की, और पार्टी की बुनियादी लाइन के लिए तथा सर्वहारा के अधिनायकत्व में क्रान्ति जारी रखने के लिए सैद्धान्तिक आधार तैयार किया. पिछले अठारह वर्षों में, विशेषकर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति में व्यवहार ने सिद्ध कर दिया है कि अध्यक्ष माओ द्वारा विकसित सिद्धान्त, लाइन और नीतियां पूरी तरह सही हैं.

अध्यक्ष माओ ने हाल में बताया है, ‘एक शब्द में, चीन एक समाजवादी देश है. मुक्ति के पहले वह वैसा ही था जैसा एक पूंजीवादी देश. अभी भी यहां आठ ग्रेड वाली वेतन-प्रणाली, काम के अनुसार वितरण और मुद्रा के जरिये विनिमय की व्यवस्था लागू है, और यह सब कुछ पुराने समाज से बहुत थोड़ा ही भिन्न है. जो भिन्नता है, वह यह कि स्वामित्व की व्यवस्था बदल गयी है.’ अध्यक्ष माओ के निर्देश की अधिक गहरी समझदारी के लिए, आइये, चीन में स्वामित्व की व्यवस्था में हुए परिवर्तनों और 1973 में चीन के उद्योग, कृषि और वाणिज्य में विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के समानुपात पर एक नजर डालें.

सर्वप्रथम उद्योग को लें. कुल उद्योग की अचल परिसम्पति में 97 प्रतिशत हिस्सा पूरी जनता के स्वामित्व वाले उद्योग का है, उद्योग में कार्यरत जनता की 63 प्रतिशत आबादी ऐसे उद्योग में लगी हुई है और कुल औद्योगिक उत्पादन के कुल मूल्य का 86 प्रतिशत यह पैदा करता है. सामूहिक स्वामित्व वाले उद्योग का अचल परिसम्पत्ति में तीन प्रतिशत हिस्सा है, उद्योग में काम करने वाले लोगों का 36.2 प्रतिशत हिस्सा इनमें लगा हुआ है, और कुल उत्पादित मूल्य का 14 प्रतिशत यह पैदा करता है. इसके अलावा उद्योग में लगी जनता का 0.8 प्रतिशत व्यक्तिगत दस्तकारों का है.

अब कृषि को देखें. कृषि-सम्बन्धी उत्पादन के साधनों में से, कृषि योग्य भूमि, सिंचाई-जलनिकास मशीनरी का 90 प्रतिशत तथा ट्रैक्टरों एवं भारवाही पशुओं का 80 प्रतिशत सामूहिक स्वामित्व के अन्तर्गत आता है. इसमें पूरी जनता के स्वामित्व का हिस्सा बहुत ही छोटा है. इसलिए राष्ट्र के अनाज और विभिन्न औद्योगिक फसलों का लगभग 90 प्रतिशत भाग सामूहिक अर्थव्यवस्था से आता है. राजकीय फार्मों का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा है, इनके अलावा अपनी व्यक्तिगत जरूरतों की पूर्ति के लिए कम्यून-सदस्यों के अपने छोटे-छोटे खेत और घरेलू गौण उत्पादन का एक सीमित परिमाण अभी भी कायम है.

इसके बाद वाणिज्य को लें. कुल खुदरा बिक्री का 92.5 प्रतिशत राजकीय वाणिज्य के अन्तर्गत, 7.3 प्रतिशत सामूहिक स्वामित्व वाले वाणिज्य-प्रतिष्ठानों के अन्तर्गत और 0.2 प्रतिशत व्यक्तिगत छोटे दुकानदारों के अन्तर्गत आता है. इनके अलावा, व्यापार का एक अच्छा-खासा हिस्सा अभी भी गांवों के मेलों के जरिये होता है.

ये आंकड़े बताते हैं कि पूरी जनता के समाजवादी स्वामित्व और मेहनतकश जनता के समाजवादी सामूहिक स्वामित्व ने निश्चित तौर पर चीन में एक महान विजय अर्जित की है. पूरी जनता के स्वामित्व की प्रभावी स्थिति में बहुत अधिक वृद्धि हुई है और जन-कम्यूनों की अर्थव्यवस्था में भी, कम्यून, उत्पादन-ब्रिगेड और उत्पादन टोली-इन तीनों स्तरों पर स्वामित्व के अनुपातों के मामले में कुछ परिवर्तन हुए हैं. उदाहरण के लिए, शंघाई के बाहरी इलाकों में, 1973 में कम्यून स्तर पर होने वाली आय कुल आय का 28.1 प्रतिशत थी जो 1974 में बढ़कर कुल आय का 30.5 प्रतिशत हो गयी, ब्रिगेडों के स्तर पर होने वाली आय का कुल आय में हिस्सा इसी अवधि में 15.2 प्रतिशत से बढ़कर 17.2 प्रतिशत और टोलियों के स्तर पर होने वाली आय का हिस्सा 56.7 प्रतिशत से नीचे गिरकर 52.3 प्रतिशत हो गया. अपने वृहत्तर आकार और सार्वजनिक स्वामित्व के उच्चतर अंश के रूप में जन-कम्यूनों ने अपनी श्रेष्ठता अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट तौर पर प्रदर्शित की है. जिस तरह हमने पिछले 25 वर्षों में, कदम-ब-कदम, साम्राज्यवाद, नौकरशाह-पूंजीवाद और सामन्तवाद के स्वामित्व का खात्मा किया है, राष्ट्रीय पूंजीवाद के स्वामित्व और मज़दूरों के निजी स्वामित्व का रूपान्तर किया है और निजी स्वामित्व की इन पांच किस्मों की जगह समाजवादी सार्वजनिक स्वामित्व की दो किस्में कायम की हैं, उन्हें देखते हुए हम गर्वपूर्वक घोषणा कर सकते हैं कि चीन में स्वामित्व की व्यवस्था बदल गयी है, कि सर्वहारा और अन्य मेहनतकश जनता ने चीन में खुद को निजी स्वामित्व की बेड़ियों से मुक्त कर लिया है और यह कि चीन का समाजवादी आर्थिक आधार क्रमशः मजबूत हुआ है तथा विकसित हुआ है. चौथी राष्ट्रीय जन-कांग्रेस द्वारा स्वीकृत संविधान ने हमारी इन महान जीतों को विशेष तौर पर चिह्नित किया है.

लेकिन हमें यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि स्वामित्व की व्यवस्था का सवाल अभी भी पूरी तरह तय नहीं हुआ हैं जब अक्सर हम यह कहते हैं कि स्वामित्व का सवाल ‘मुख्य रूप से तय हो गया है’, तो इसका मतलब यह है कि यह पूरी तरह से तय नहीं हुआ है, और यह भी कि इस दायरे में बुर्जुआ अधिकार अभी पूरी तरह समाप्त नहीं किये गये हैं. ऊपर दिये गये आंकड़े स्पष्टतः दर्शाते हैं कि उद्योग, कृषि और वाणिज्य में निजी स्वामित्व अभी भी अंशतः मौजूद है, कि समाजवादी सार्वजनिक स्वामित्व में केवल पूरी जनता द्वारा स्वामित्व ही नहीं बल्कि दो प्रकार के स्वामित्व शामिल हैं और यह कि कृषि के क्षेत्र में, जो कि राष्ट्रीय अर्थतंत्र का आधार है, पूरी जनता का स्वामित्व अभी भी निश्चित रूप से कमजोर है. जैसा कि मार्क्स और लेनिन ने सोचा था, समाजवादी समाज में स्वामित्व की व्यवस्था के घेरे में बुर्जुआ अधिकारों के विलोपन का अर्थ यह है कि उत्पादन साधन पूरे समाज की सामान्य सम्पत्ति में बदल चुके हैं. जाहिरा तौर पर हम अभी उस मंजिल पर नहीं पहुंचे हैं सिद्धान्त और व्यवहार, दोनों में ही हमें उस कठिन कार्यभार की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जो इस सम्बन्ध में सर्वहारा के अधि नायकत्व के आगे पड़े हुए हैं.

इसके साथ ही, हमें यह भी जरूर देखना चाहिए कि समूची जनता के स्वामित्व और सामूहिक स्वामित्व-दोनों के साथ नेतृत्व का सवाल जुड़ा हुआ है, यानी यह सवाल जुड़ा हुआ है कि वास्तव में, न कि सिर्फ नाम के लिए, स्वामित्व किस वर्ग के हाथ में है.

पार्टी की नवीं केन्द्रीय कमेटी के पहले प्लेनरी सत्र को सम्बोधित करते हुए, 28 अप्रैल 1969 को अध्यक्ष माओ ने कहा था, ‘स्पष्ट तौर पर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के बगैर हम कुछ नहीं कर सकते थे, क्योंकि हमारा आधार ठोस नहीं था. अपने प्रेक्षण के आधार पर, मेरी तो यहां तक आशंका है कि अच्छे-खासे बहुसंख्यक कारखानों में-मेरा मतलब यह नहीं है कि सभी या बहुत भारी बहुसंख्यक कारखानों में नेतृत्व असली मार्क्सवादियों और मजदूर जन-समुदाय के हाथों में नहीं था. ऐसा नहीं कि कारखानों के नेतृत्व में अच्छे लोग नहीं थे. जरूर थे. पार्टी कमेटियों, सेक्रेटरियों, उपसेक्रेटरियों एवं सदस्यों के बीच और पार्टी शाखा सेक्रेटरियों के बीच अच्छे लोग थे. लेकिन उन्होंने ल्यू शाओ-ची की लाइन का पालन किया, केवल भौतिक प्रोत्साहन का सहारा लिया, मुनाफे को कमान में रखा, और सर्वहारा राजनीति को बढ़ावा देने की जगह बोनस बांटते रहे, आदि-आदि’ ‘लेकिन निश्चित रूप से, कारखानों में बुरे लोग भी हैं’ ‘यह दिखाता है कि क्रान्ति अभी समाप्त नहीं हुई है.’ अध्यक्ष माओ की टिप्पणी न केवल महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की आवश्यकता की व्याख्या करती है, बल्कि हमें इस बात का और अधिक बोध कराने में भी मदद करती है कि स्वामित्व की व्यवस्था की समस्या में, और अन्य सभी समस्याओं में भी, हमें केवल इनके रूप पर ही नहीं बल्कि इनकी वास्तविक अन्तर्वस्तु पर भी ध्यान देना चाहिए. उत्पादन-सम्बन्धों में स्वामित्व की व्यवस्था की निर्णायक भूमिका को पूरी अहमियत देना सर्वथा सही है. लेकिन स्वामित्व का मुद्दा केवल बाह्य रूप में ही तय हुआ है या वास्तविक सच्चाई में तय हो गया है-इस बात को कोई अहमियत न देना, और उत्पादन-सम्बन्धों के दो विभिन्न पहलुओं-जनता के बीच के सम्बन्धों और वितरण के रूप-द्वारा स्वामित्व की व्यवस्था पर डाले जाने वाले प्रभाव तथा अधिरचना द्वारा आर्थिक मूलाधार पर डाले जाने वाले प्रभाव को कोई अहमियत न देना गलत है. किन्हीं परिस्थितियों में उत्पादन-सम्बन्ध के ये दो पहलू और अधिरचना एक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. राजनीतिक अर्थशास्त्र की घनीभूत अभिव्यक्ति है. विचारधारात्मक और राजनीतिक लाइन सही है या गलत, और नेतृत्व किस वर्ग के हाथों में है-यही बातें तय करती हैं कि वास्तव में उन कारखानों का मालिक कौन है. कामरेड इसे याद कर सकते हैं कि हमने किस तरह नौकरशाह पूंजी या राष्ट्रीय पूंजी के स्वामित्व वाले किसी भी प्रतिष्ठान को एक समाजवादी प्रतिष्ठान में रूपान्तरित कर दिया. क्या हमने पार्टी की लाइन और नीतियों के अनुसार उन्हें रूपान्तरित करने के लिए वहां एक सैन्य-नियंत्रण प्रतिनिधि या राज्य प्रतिनिधि भेजकर इस काम को नहीं किया था? चाहे दास-प्रथा की जगह सामन्ती व्यवस्था का आना हो या सामन्तवाद की जगह पूंजीवाद का, इतिहास में स्वामित्व की व्यवस्था में हर बड़ा परिवर्तन निरपवाद रूप से राजनीतिक सत्ता पर कब्जे के बाद ही हुआ है और इसके बाद इस राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल स्वामित्व की व्यवस्था में बडे पैमाने पर परिवर्तन लाने के लिए और नयी व्यवस्था को सुदृढ बनाने एवं विकसित करने के लिए किया गया है. समाजवादी सार्वजनिक स्वामित्व के मामले में यह बात और अधिक लागू होती है क्योंकि बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकत्व के अन्तर्गत यह पैदा ही नहीं हो सकता. नौकरशाह पूंजी को, जिसका पुराने चीन के अस्सी प्रतिशत उद्योगों पर नियन्त्रण था, केवल तभी रूपांतरित किया जा सका और पूरी जनता के स्वामित्व के अन्तर्गत लाया जा सका जबकि जन मुक्ति सेना ने च्याङ काई-शेक को परास्त कर दिया. इसी तरह, पूंजीवादी पुनर्स्थापना भी अनिवार्यतः नेतृत्व पर कब्जे और पार्टी की लाइन और नीतियों में परिवर्तन के बाद ही शुरू होती है. क्या इस तरह से खुश्चेव और ब्रेझनेव ने सोवियत संघ में स्वामित्व की व्यवस्था नहीं बदली थी ? क्या इसी तरह से ल्यू शाओ-ची और लिन पियाओ ने अलग-अलग अंशों में हमारे कई कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों की प्रकृति नहीं बदल डाली थी ?

साथ ही, हमें इस बात पर भी जरूर ध्यान देना चाहिए कि हम आज जिस पर अमल कर रहे हैं वह एक माल-अर्थव्यवस्था है. अध्यक्ष माओ ने कहा है, ‘वर्तमान समय में हमारे देश में माल-अर्थव्यवस्था लागू है, वेतन-प्रणाली भी असमान है, जैसा कि आठ ग्रेड वाले वेतनमान में, या अन्य मामलों में है. सर्वहारा के अधिनायकत्व के अन्तर्गत ऐसी चीजों को केवल सीमित किया जा सकता है. इसलिए यदि लिन पियाओ जैसे लोग सत्ता में आते हैं तो पूंजीवादी व्यवस्था को खड़ा कर देना उनके लिए काफी आसान होगा.’ जिन स्थितियों की ओर अध्यक्ष माओ ने इंगित किया है, उन्हें एक छोटे समय के भीतर बदला नहीं जा सकता. उदाहरण के तौर पर, शंघाई के बाहरी इलाकों के ग्रामीण जन कम्यूनों में, जहां कम्यून और उत्पादन-ब्रिगेड के स्तर पर अर्थव्यवस्था एक हद तक तेजी से विकसित हुई है, अचल परिसम्पत्ति के कुल तीनों स्तरों के स्वामित्व में 34.2 प्रतिशत हिस्सा कम्यून स्वामित्व का, 15.1 प्रतिशत हिस्सा उत्पादन-ब्रिगेडों के स्वामित्व का और 50.7 प्रतिशत हिस्सा उत्पादन टीमों के स्वामित्व का है. इसलिए, यदि हम केवल कम्यूनों की आर्थिक स्थिति को ही लें, तब भी, उत्पादन टीम की जगह पर ब्रिगेड और फिर ब्रिगेड की जगह पर कम्यून बुनियादी जवाबदेह इकाई बन जाये-ऐसे संक्रमण के लिए भी पर्याप्त लम्बे समय की जरूरत होगी. कम्यून के बुनियादी जवाबदेह इकाई बन जाने के बाद भी, स्वामित्व सामूहिक ही बना रहेगा. इस तरह, इस थोड़े समय में, इस वर्तमान स्थिति में जिसमें कि पूरी जनता का स्वामित्व और सामूहिक स्वामित्व साथ-साथ कायम है, कोई भी मूलभूत परिवर्तन नहीं आयेगा. जब तक ये दो प्रकार के स्वामित्व बने रहेंगे, माल-उत्पादन, मुद्रा के जरिये विनिमय और काम के अनुसार वितरण अनिवार्यतः कायम रहेंगे. और चूंकि ‘सर्वहारा के अधिनायकत्व के अन्तर्गत ऐसी चीजों को केवल सीमित किया जा सकता है,’ अतः शहर और देहात में पूंजीवादी उपादानों का विकास और नये बुर्जुआ तत्वों का पैदा होना अपरिहार्य है. यदि इन चीजों को सीमित नहीं किया जाता तो पूंजीवाद और बुर्जुआ वर्ग का विकास और तेजी से होगा. अतः, सिर्फ इसलिए कि हमने स्वामित्व की व्यवस्था के रूपान्तरण में एक महान जीत हासिल की है और एक महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति सम्पन्न की है, हमें अपनी क्रान्तिकारी चौकसी में किसी भी कीमत पर ढिलाई नहीं लानी चाहिए. हमें इस बात को अवश्य समझ लेना चाहिए कि हमारा आर्थिक आधार अभी मजबूत नहीं है, कि स्वामित्व की व्यवस्था में बुर्जुआ अधिकार अभी पूर्णतः समाप्त नहीं किये गये हैं, और यह कि जनता के बीच के सम्बन्धों में ये अभी भी गम्भीर रूप से मौजूद हैं और वितरण में इनकी एक प्रभावी स्थिति बनी हुई है. अधिरचना के विभिन्न क्षेत्रों में से कुछ पर वस्तुतः अभी भी बुर्जुआ वर्ग का नियंत्रण है, जो वहां प्रभुतापूर्ण स्थिति में है, कुछ का रूपान्तरण किया जा रहा है लेकिन परिणामों का सुदृढ़ीकरण अभी नहीं हो सका है, और पुराने विचार एवं पुरानी आदतों की शक्ति अभी भी नयी समाजवादी चीजों के विकास में अड़ियल ढंग से बाधाएं खड़ी कर रही है. शहर और देहात में पूंजीवादी उपादानों के विकास के परिणामस्वरूप, नये बुर्जुआ तत्वों के जत्थे पर जत्थे पैदा हो गये हैं. सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच वर्ग संघर्ष, विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के बीच वर्ग संघर्ष, विचारधारात्मक क्षेत्र में सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच वर्ग संघर्ष अभी लम्बे समय तक जारी रहेगा और यंत्रणादायी बना रहेगा और यहां तक कि कभी-कभी बहुत तीव्र भी हो उठेगा. यहां तक कि जब पुरानी पीढ़ी के सभी जमीन्दार और पूंजीपति मर जायेंगे, तब भी ऐसे वर्ग संघर्ष किसी भी तरह से रुकेंगे नहीं, और यदि लिन पियाओ जैसे लोग सत्ता में आ गये तो उस स्थिति में भी पूंजीवादी पुनर्स्थापना हो सकती है. ‘जापान के विरुद्ध प्रतिरोध संघर्ष में विजय के बाद की परिस्थिति और हमारी नीति’ नामक अपने भाषण में अध्यक्ष माओ ने बताया है कि किस तरह 1936 में पाओ-आन में पार्टी केन्द्रीय कमेटी में मुख्यालय के निकट एक किलेबन्दी किये हुए गांव पर मुट्ठी भर सशस्त्र प्रतिक्रान्तिकारियों का कब्जा बना हुआ था जो पूरे अड़ियलपन के साथ तब तक आत्मसमर्पण से इंकार करते रहे, जब तक कि समस्या को हल करने के लिए लाल सेना तूफानी ढंग से गांव में घुस नहीं पड़ी. इस कहानी का सार्वभौमिक महत्व है क्योंकि यह हमें बताती है कि, ‘हरेक प्रतिक्रियावादी चीज एक जैसी ही होती है; यदि तुम इस पर चोट नहीं करते, तो यह गिरेगी नहीं. यह फर्श को बुहारने के समान है; जहां झाडू नहीं पहुंचता, वहां की धूल अपने आप नहीं खत्म होती.’ आज कई ‘किलेबन्दी किये हुए गांव’ अभी भी मौजूद हैं जिनपर बुर्जुआ वर्ग का कब्जा बना हुआ है; जब एक नष्ट होता है, दूसरा खड़ा हो जाता है, और यदि एक को छोड़कर सभी नष्ट कर दिये जायें, तो वह एक भी अपने आप खत्म नहीं होगा जब तक कि सर्वहारा अधिनायकत्व का लोहे का झाडू उस तक पहुंच नहीं जाये. लेनिन का यह कहना पूरी तरह सही है, ‘इन सब कारणों से सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व अनिवार्य है.’

ऐतिहासिक अनुभव हमें बताते हैं कि सर्वहारा वर्ग बुर्जुआ वर्ग पर विजयी हो सकता है या नहीं और चीन संशोधनवादी हो जायेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर है कि हम हर क्षेत्र में और क्रान्ति की हर मंजिल में बुर्जुआ वर्ग पर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करने पर डटे रह सकते हैं या नहीं. बुर्जुआ वर्ग के ऊपर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व क्या है ? इसके बारे में सर्वाधिक सारगर्भित सामान्यीकरण 1852 में जे. वेडेमेयर को लिखे गये मार्क्स के एक पत्र के एक हिस्से में मिलता है, जिसका हम सभी अध्ययन कर रहे हैं. मार्क्स ने कहा है, ‘आधुनिक समाज में वर्गों की मौजूदगी, और साथ ही उनके बीच संघर्ष की मौजूदगी की खोज का श्रेय मुझे नहीं है. मुझसे बहुत पहले बुर्जुआ इतिहासकारों ने वर्गों के इस संघर्ष के ऐतिहासिक विकास का और बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों ने वर्गों की आर्थिक बनावट का वर्णन किया था मैंने जो नया किया, वह यह सिद्ध करना था : (1) कि वर्गों का अस्तित्व केवल उत्पादन के विकास में विशिष्ट ऐतिहासिक चरण से बंधा हुआ है, (2) कि वर्ग संघर्ष जरूर ही सर्वहारा के अधिनायकत्व तक जाता है; (3) कि यह अधिनायकत्व खुद केवल सभी वर्गों के उन्मूलन और वर्गविहीन समाज की दिशा में संक्रमण के लिए होता है.’

लेनिन के अनुसार अपनी इस शानदार टिप्पणी में मार्क्स ने राज्य के बारे में अपने सिद्धान्त और बुर्जुआ वर्ग के सिद्धान्त के बीच मुख्य और गुणात्मक फर्क और राज्य के बारे में अपनी शिक्षा के सारतत्व का असाधारण सुस्पष्टता के साथ अभिव्यक्त करने में सफलता प्राप्त की है. यहां इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि सर्वहारा के अधिनायकत्व विषयक वाक्य को मार्क्स ने तीन बिन्दुओं में बांट दिया है जो अन्तर्सम्बन्धित हैं और जिन्हें काटकर अलग नहीं किया जा सकता. तीन बिन्दुओं में से किन्हीं दो को छोड़कर सिर्फ एक को स्वीकार करना गलत होगा क्योंकि यह वाक्य सर्वहारा के अधिनायकत्व के प्रारम्भ, विकास और विलोपीकरण की पूरी प्रक्रिया को पूर्ण अभिव्यक्ति देता है और सर्वहारा के अधिनायकत्व के पूरे कार्यभार एवं इसकी वास्तविक अन्तर्वस्तु को समाहित करता है.

‘फ्रांस में वर्ग-संघर्ष, 1848-1850’ में मार्क्स ने आम तौर पर वर्ग विभेदों के उन्मूलन, उन सभी उत्पादन सम्बन्धों के उन्मूलन जिनपर वे आधारित हैं, उन सभी सामाजिक सम्बन्धों के उन्मूलन जो इन उत्पादन सम्बन्धों के अनुरूप हैं, और इन सामाजिक सम्बन्धों से उत्पन्न सभी विचारों के क्रान्तिकारी रूपान्तरण के आवश्यक संक्रमण-बिन्दु के रूप में सर्वहारा के इस अधिनायकत्व की चर्चा अधिक स्पष्ट शब्दों में की है. इन चारों मामलों में, मार्क्स का तात्पर्य सभी से है. केवल एक भाग से, एक अपेक्षतया बड़े भाग से या यहां तक कि सबसे बड़े भाग से भी नहीं, बल्कि सभी से ! इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं है, क्योंकि केवल पूरी मानवता को मुक्त करने के द्वारा ही सर्वहारा अपनी स्वयं की अन्तिम मुक्ति हासिल कर सकता है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता बुर्जुआ वर्ग पर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करना और सर्वहारा के अधिनायकत्व के अन्तर्गत जारी क्रान्ति को अन्त तक चलाना है, तब तक जब तक कि ऊपर उल्लिखित चारों, सभी इस धरती से मिट न जायें जिससे कि बुर्जुआ वर्ग एवं अन्य सभी शोषक वर्गों का अस्तित्व बने रह पाना या नये ऐसे वर्गों का उभर पाना असम्भव हो जायेगा; निश्चित तौर पर तब तक संक्रमण के रास्ते पर हमें कहीं रुकना न होगा. हमारे विचार से, जो लोग इस चीज को इस ढंग से समझते हैं केवल उन्हीं के बारे में यह विश्वास किया जा सकता है कि राज्य के बारे में मार्क्स की शिक्षा के सारतत्व को उन्होंने ग्रहण किया है. कामरेडो, कृपया इस पर सोचिये : यदि इस चीज को इस ढंग से नहीं समझा जाता है, यदि मार्क्सवाद को सीमित किया जाता है, इसमें कटौती की जाती है और सिद्धान्त एवं व्यवहार में तोड़ा-मरोड़ा जाता है, यदि सर्वहारा के अधिनायकत्व को एक खोखले शब्दाडम्बर में बदल दिया जाता है, या बुर्जुआ वर्ग के ऊपर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व को अंगभंग करके विकलांग बना दिया जाता है और उसे सभी क्षेत्रों में नहीं बल्कि कुछ क्षेत्रों में या सभी मंजिलों में नहीं केवल किसी एक मंजिल में (उदाहरण के लिए, सिर्फ स्वामित्व की व्यवस्था के रूपान्तरण के पहले) ही लागू किया जाता है, या दूसरे शब्दों में यदि बुर्जुआ वर्ग के सभी ‘किलेबन्दी किये हुए गांवों’ को नष्ट नहीं किया जाता है बल्कि कुछ को छोड दिया जाता है और बुर्जुआ वर्ग को फिर से फैलने की छूट दे दी जाती है, तो क्या इसका मतलब पूंजीवादी पुनर्स्थापना के लिए परिस्थितियां तैयार करना नहीं है ? क्या इसका मतलब सर्वहारा के अधिनायकत्व को ऐसी चीज में बदल देना नहीं है जो बर्जुआ वर्ग की खास तौर पर नये पैदा हुए बुजआ वर्ग की हिफाजत करता हो ?

सभी मजदूरों, सभी गरीब और निम्न मध्यम किसानों और अन्य मेहनतकशों को जो फिर से यातना और विपत्ति में डूबने को तैयार नहीं हैं, सभी कम्युनिस्टों को जिन्होंने अपना जीवन कम्युनिज्म के लिए संघर्ष को समर्पित किया है, और सभी कामरेडों को जो यह नहीं चाहते कि चीन संशोधनवादी हो जाये, अपने दिमाग में मार्क्सवाद के इस बुनियादी उसूल को दृढ़तापूर्वक बैठा ही लेना होगा : बुर्जुआ वर्ग पर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करना अनिवार्य है. और आधे रास्ते में इसे छोड़ देना पूरी तरह से अस्वीकार्य है. इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे बीच कुछ कामरेड ऐसे हैं जो सांगठनिक तौर पर तो कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गये हैं पर विचारधारात्मक तौर पर नहीं. अपने विश्व-दृष्टिकोण में उन्होंने अभी छोटे उत्पादन की और बुर्जुआ वर्ग की सीमा के बाहर कदम नहीं रखा है. वे सर्वहारा के अधिनायकत्व को एक खास मंजिल तक और एक खास घेरे के भीतर जरूर स्वीकार करते हैं और सर्वहारा की कुछ जीतों पर खुश होते हैं, क्योंकि इनसे उन्हें कुछ उपलब्धियां मिलती हैं; एक बार जब उनकी उपलब्धियां सुरक्षित हो जाती हैं तो वे महसूस करते हैं कि अब बसने-व्यवस्थित होने और अपने सुखकर घोंसलों को पंखों से सजाने का समय आ गया है. जहां तक बुर्जुआ वर्ग पर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करने की बात है, जहां तक 10,000 ली लम्बे अभियान में पहले कदम से आगे चलने की बात है, माफ कीजिये, यह काम दूसरों को करने दीजिए; मेरा पड़ाव तो आ गया और मुझे बस से उतरना ही होगा. हम इन कामरेडों को एक छोटा-सा सुझाव देना चाहेंगे-आधे रास्ते में रुकना खतरनाक होता है. बुर्जुआ वर्ग आपको इशारे से बुला रहा है. समय रहते कतारों को जा पकड़िये और आगे बढ़ना जारी रखिए.

ऐतिहासिक अनुभव हमें यह भी शिक्षा देते हैं कि, जब सर्वहारा का अधिनायकत्व एक के बाद दूसरी जीतें हासिल करता चला जाता है तो बुर्जुआ वर्ग ऊपर से इस अधिनायकत्व को स्वीकार कर लेने का दिखावा कर सकता है जबकि वास्तव में यह बुर्जुआ अधिनायकत्व को फिर से बहाल करने के लिए काम करना जारी रखता है. खुश्चेव और ब्रेझनेव ने ठीक यही किया था. उन्होंने न तो ‘सोवियत’ नाम बदला, न ही लेनिन की पार्टी का नाम बदला, न ही ‘सोवियत गणराज्य’ का नाम बदला. बल्कि इन नामों को स्वीकार करके और उनका खोल की तरह इस्तेमाल करते हुए उन्होंने सर्वहारा के अधिनायकत्व से इसका वास्तविक सारतत्व बाहर निकाल फेंका है और इसे इजारेदार पूंजीपति वर्ग के अधिनायकत्व में बदल दिया है जो सोवियत विरोधी है, लेनिन की पार्टी के विरोध में है और सोवियत गणराज्यों के विरोध में है. उन्होंने ‘पूरी जनता के राज्य’ और ‘समग्र जनता की पार्टी’ का संशोधनवादी कार्यक्रम प्रस्तुत किया है जो मार्क्सवाद के प्रति एक खुला विश्वासघात है. लेकिन जब सोवियत जनता उनके फासिस्ट अधिनायकत्व के विरुद्ध उठ खड़ी होती है तो जनसमुदाय को दबाने के लिए वे सर्वहारा के अधिनायकत्व का झण्डा लहराते हैं. चीन में भी ऐसी ही चीजें हुई हैं.

ल्यू शाओ-ची और लिन पियाओ ने खुद को वर्ग संघर्ष के खात्मे के सिद्धान्त तक ही सीमित नहीं रखा, उन्होंने भी क्रान्ति को दबाते समय सर्वहारा के अधिनायकत्व का झण्डा फहराया. क्या लिन पियाओ ने अपने चार ‘कभी न भूलो’ का उपदेश नहीं दिया ? उनमें से एक यह था कि ‘सर्वहारा के अधिनायकत्व का कभी न भूलो.’ बेशक कोई चीज थी, जिसे वह कभी नहीं भूला, केवल ‘उखाड़ फेंकना’ ये शब्द जोड़ देने से वह बन जाती है- ‘सर्वहारा के अधिनायकत्व को उखाड़ फेंकना कभी न भूलो,’ या जैसा कि उसके गिरोह ने स्वीकार किया था, ‘अध्यक्ष माओ की फौजों पर हमला करने के लिए अध्यक्ष माओ की पताका लहराओ.’ समय-समय पर सज-संवरकर वे सर्वहारा का चोला पहन लेते थे और विभ्रम पैदा करने तथा तोड़फोड़ की कार्रवाईयां चलाने के लिए ‘वामपंथी’ नारे लगाते हए किसी से भी ज्यादा क्रान्तिकारी होने का नाटक करते थे. पर आम तौर पर वे सर्वहारा के विरुद्ध प्रत्यक्षतः प्रतिक्रान्तिकारी संघर्ष चला रहे थे. आप समाजवादी रूपान्तरण को क्रार्यान्वित करना चाहते थे ? उन्होंने कहा कि नयी जनवादी व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण करना होगा. आप कोआपरेटिव और कम्यून संगठित करना चाहते थे ? उन्होंने कहा कि इसके लिए अभी समय नहीं आया है. जब आपने कहा कि साहित्य और कला का क्रान्तिकारी रूपान्तरण किया जाना चाहिए, तो उन्होंने कहा कि भूत-प्रेतों के बारे में थोड़े-बहुत नाटकों के मंचन में कोई हानि नहीं हैं. आप बुर्जुआ अधिकारों में कटौती करना चाहते थे ? उन्होंने कहा कि ये बेशक बहुत उम्दा चीजें हैं और इनका विस्तार किया जाना चाहिए. वे पुरानी चीजों की हिफाजत करने वाले माहिर लोगों का एक गिरोह हैं, उन मक्खियों के झुण्ड के समान हैं जो पुराने समाज के उन ‘जन्मचिह्नों’ और ‘विकारों’ पर दिनभर भिनभिनाती रहती हैं, जिनका उल्लेख मार्क्स ने किया है. वे खास तौर पर हमारे नौजवानों की अनुभवहीनता का लाभ उठाने के लिए व्यग्र रहते हैं, उनके बीच भौतिक प्रोत्साहन का यह कहते हुए गुणगान करते हैं कि यह सोयाबीन के दूध के तेज पनीर के समान हैं, जो बदबू तो करता है लेकिन स्वादिष्ट होता है. और ये गन्दी चालें चलते हुए वे लगातार समाजवाद का झण्डा लहराते रहते हैं. क्या ऐसे कुछ बदमाश नहीं हैं जो सट्टेबाजी, घूसखोरी और चोरी में लगे हुए हैं और कहते हैं कि वे समाजवादी सहकार को आगे बढ़ा रहे हैं ? क्या अपराधों को उकसाने वाले ऐसे कुछ लोग नहीं हैं जो ‘कम्युनिज्म के लक्ष्य के उत्तराधिकारियों के लिए प्यार और देखरेख’ की पताका उड़ाते हुए नौजवानों के दिमागों में जहर बोते रहते हैं ? हमें उनकी चालों का अध्ययन करना चाहिए और अपने अनुभव का सार-संकलन करना चाहिए ताकि अधिक प्रभावी ढंग से बुर्जुआ वर्ग पर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू किया जा सके.

‘क्या तुम ‘कम्यूनीकरण’ की हवा उभाड़ना चाहते हो ?’ ऐसे सवाल खड़ा करके अफवाहें गढ़ना एक चाल है जिसका हाल ही में कुछ लोगों ने सहारा लिया है. हम एक सुनिश्चित उत्तर दे सकते हैं: ‘कम्यूनीकरण’ की वैसी हवा कभी नहीं बहने दी जायेगी, जैसी ल्यू शाओ-ची और चेन पो-ता ने उभाड़ी थी. हमारी हमेशा से यह समझ रही है कि माल-उत्पादन की दिशा में काफी प्रगति के बाद भी अभी हमारे देश में सामग्रियों की पर्याप्त प्रचुरता नहीं है. जब तक कि कम्यूनों के पास, और साथ ही उत्पादन ब्रिगेड और टीमें जो पैदा करती हैं, उन्हें मिलाकर, कम्यूनीकरण के लिए काफी कुछ नहीं होगा, और जब तक कि पूरी जनता के स्वामित्व वाले प्रतिष्ठानों के पास हमारी 80 करोड़ जनता में प्रत्येक को उसकी जरूरत के अनुसार वितरण के लायक उत्पादों की अत्यधिक प्रचुरता नहीं होगी हमें माल-उत्पादन, मुद्रा के जरिये विनिमय और काम के अनुसार वितरण को जारी रखना होगा. इन चीजों से पैदा होने वाले नुकसानों को रोकने के लिए उचित कदम हमने उठाये हैं और आगे भी ऐसा करना जारी रखेंगे. सर्वहारा का अधिनायकत्व जनता द्वारा अधिनायकत्व है. हमें विश्वास है कि पार्टी के नेतृत्व में, व्यापक जनसमुदाय उस शक्ति और क्षमता से सम्पन्न है कि बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध संघर्ष कर सके और अन्ततः इसे पराजित कर सके. पुराना चीन छोटे उत्पादन का एक विशाल महासागर था. करोड़ों किसानों के बीच समाजवादी शिक्षा का संचालन हर समय के लिए एक गम्भीर सवाल है और कई पीढ़ियों के उद्यम की मांग करता है. लेकिन इन करोड़ों किसानों में बहुसंख्या गरीब और निम्न मध्यम किसानों की है और वे अपने व्यवहार से जानते हैं कि उनके लिए उज्जवल भविष्य की ओर जाने वाला एकमात्र रास्ता कम्युनिस्ट पार्टी का अनुसरण करने और समाजवादी रास्ते पर कायम रहने का है. हमारी पार्टी ने पारस्परिक सहायता टीमों से प्राथमिक और उन्नत कृषि उत्पादक-कोआपरेटिवों और फिर जन-कम्यूनों की ओर आगे बढ़ने के लिए मध्यम किसानों के साथ एकता कायम करने में इन पर भरोसा किया है और निश्चित तौर पर, और आगे की यात्रा में हम उनका नेतृत्व कर सकते हैं.

हम इस तथ्य की ओर कामरेडों का ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे कि यह दूसरी ही किस्म की हवा है जो इस समय बह रही है-यह ‘बुर्जुआ हवा’ है. जैसा कि अध्यक्ष माओ ने इंगित किया है, यह बुर्जुआ जीवन-शैली है, एक बुरी हवा है जिसे जनता के उन ‘हिस्सों’ ने उभाड़ा है जो पतित होकर बुर्जुआ तत्व बन चुके हैं. यह ‘बुर्जुआ हवा’ जो उन कम्युनिस्टों के बीच से, खासकर उन नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं के बीच से बह रही है जो इन ‘हिस्सों’ से आते हैं और यह हमारे लिए सर्वाधिक नुकसानदेह है. इस बुरी हवा के जहरीले प्रभाव से कुछ लोगों के दिमाग में बुर्जुआ विचार भर गये हैं, वे ओहदे और फायदे के लिए छीना-झपटी करते हैं और इस पर शर्मिन्दगी के बजाय गर्व महसूस करते हैं. कुछ इस हद तक नीचे गिर गये है कि अपने सहित हर चीज को माल समझते हैं. वे सिर्फ इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होते हैं और सर्वहारा वर्ग के लिए काम करते हैं कि माल के रूप में अपना भाव बढ़ा सकें और सर्वहारा वर्ग से ऊंची कीमत की मांग कर सकें. वे लोग जो नाम से कम्युनिस्ट हैं लेकिन वास्तव में नये बुर्जुआ तत्व हैं, समग्रता में पतनोन्मुख और मरणासन्न बुर्जुआ वर्ग की अभिलाक्षणिकताओं का प्रदर्शन करते हैं. ऐतिहासिक तौर पर, दास स्वामी, भूस्वामी और पूंजीपति वर्ग जब उभार पर थे, तो उन्होंने मानवता के लाभ के लिए कुछ किया था. लेकिन आज के नये बुर्जुआ तत्व अपने पूर्वजों से विपरीत दिशा में जा रहे हैं. वे नये ‘कचरे’ के ढेर के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं जो मानवता को सिर्फ नुकसान ही पहुंचा सकते हैं. ‘कम्यूनीकरण’ की हवा उभाड़े जाने की अफवाह फैलाने वालों में, कुछ तो वे नये बुर्जुआ तत्व हैं जिन्होंने सार्वजनिक सम्पत्ति पर अपना कब्जा जमा लिया है और डरते हैं कि जनता फिर इनका ‘कम्यूनीकरण’ कर लेगी; कुछ दूसरे इस मौके का फायदा उठाकर अपने लिए कुछ झपट लेना चाहते हैं. हमारे बहुत से कामरेडों के मुकाबले इन लोगों की घ्राण शक्ति ज्यादा तेज है. हमारे कुछ कामरेड कहते हैं कि अध्ययन एक ‘लचीला’ काम है जो दूसरे के ऊपर वरीयता स्थापित करने में लाभ पहुंचाता है, जबकि इन लोगों ने अपनी सहज वृत्ति से भांप लिया है कि वर्तमान अध्ययन एक ‘गैर लचीली’ वस्तु है जो सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग दोनों के सामने गम्भीर चुनौती के रूप में खड़ी है. दरअसल वे खुद जानबूझकर ‘कम्यूनीकरण’ की थोड़ी हवा उभाड़ सकते हैं, या दो प्रकार के अन्तरविरोध के बारे में विभ्रम पैदा करने के लिए हमारे अपने नारों में से एक या दो को अपना सकते हैं और कोई अप्रत्याशित चाल चल सकते हैं. इस पर नजर रखी जानी चाहिए.

अध्यक्ष माओ की अध्यक्षता में पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के नेतृत्व के अन्तर्गत, चीन की कराड़ों-करोड़ जनता से बनी हुई सर्वहारा क्रान्ति की शक्तिशाली सेना ऊर्जस्विता के साथ लम्बे डग भरती हुई आगे बढ़ रही है. सर्वहारा का अधिनायकत्व लागू करने के पच्चीस वर्षों के व्यावहारिक अनुभव के साथ ही, पेरिस कम्यून से लेकर अब तक के सभी अन्तरराष्ट्रीय अनुभवों से हम लैस हैं, और जब तक मनोयोगपूर्वक पढ़ने एवं अध्ययन करने, जांच-पड़ताल एवं विश्लेषण करने तथा अनुभवों का सार-संकलन करने में हमारी पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के कुछ एक सौ सदस्य और कुछ एक हजार वरिष्ठ कार्यकर्ता नेतृत्व देते रहते हैं और अन्य कार्यकर्ताओं एवं जनसमुदाय की विशाल आबादी के साथ मिलकर इन कामों को अंजाम देते रहते हैं, हम पक्के तौर पर अध्यक्ष माओ के आह्वान को वास्तविकता में उतार सकते हैं, सर्वहारा के अधिनायकत्व के सवाल पर स्पष्टता हासिल कर सकते हैं और मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ त्से-तुङ विचारधारा द्वारा निर्धारित मार्ग पर अपने देश की विजय-यात्रा को सुनिश्चित कर सकते हैं. ‘सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है, जीतने के लिए सारी दुनिया है.’ यह असीम उज्जवल सम्भावना पार्टी की बुनियादी लाइन पर डटे रहने, बुर्जुआ वर्ग पर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करने में दृढ़ रहने और सर्वहारा के अधिनायकत्व में क्रान्ति को अन्त तक चलाते रहने के लिए जागृत मजदूरों और अन्य मेहनतकशों की बढ़ती जा रही संख्या और उनके हिरावल, कम्युनिस्टों को लगातार प्रेरित करती रहेगी. बुर्जुआ वर्ग और अन्य शोषक वर्गों की समाप्ति तथा कम्युनिज्म की विजय अनिवार्य है, सुनिश्चित है और मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र है.

  • दायित्वबोध, पुस्तिका नं. – 4

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