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धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 10, 2026
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धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न
धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया
गैर आदिवासी समाज से भिन्न

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदुओं को अधिक से अधिक, न्यूनतम तीन बच्चे पैदा करने की सलाह दी है. कुछ इस अंदाज में जैसे किसानों से कहा जाता है कि ज्यादा से ज्यादा फसल उगाओ. लेकिन यह कहते हुए कभी इस बात का ध्यान नहीं रहता कि ज्यादा से ज्यादा फसल उगाने के लिए धरती के साथ हमारा व्यवहार कैसा हो जाता है. जमीन पर लगातार खेती करना, एक के बाद दूसरी फसल लगाना, उसे ज्यादा से ज्यादा निचोड़ लेना, बिना इस बात की परवाह किये कि इससे जमीन किस कदर बेहाल हो जाती होगी. आदिवासी समाज का रवैया धरती और औरत दोनों के प्रति वैसा नहीं जैसा हिंदू समाज का है.

बच्चे ज्यादा पैदा करने की बात कुछ इस अंदाज से कही जा रही है जैसे औरत बच्चा पैदा करने की मशीन हो. भागवत जब ज्यादा बच्चे पैदा करने का आह्वान करते हैं तो क्या उनके जेहन में औरत रहती भी है कि वह क्या सोचती है? गर्भ धारण और बच्चे को जन्म देने में उसे कितनी पीड़ा होती है? वास्तविकता यही है कि जैसे धरती बेजुबान होती है, उसी तरह मनुवादी संस्कृति में औरत को बेजुबान बना दिया गया है. वह बच्चे पैदा करने की मशीन ही मानी जाती है. आदर्श स्थिति में उसका काम घर की चाहरदिवारी के भीतर रह कर बच्चे पैदा करना और उनका लालन पालन करना है.

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त्रासद सिथति यह है कि हमारे देश में बच्चे पैदा करने की उम्र वाली यानि, 15 से 49 वर्ष की महिलाओं की कुल आबादी का 53.7 फीसदी एनीमिया की शिकार हैं. भरपेट भोजन न मिलने या कुपोषित होने की वजह से उनके बदन में खून की बेहद कमी है. और उनको ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की बात भागवत कर रहे हैं. सरना और सनातन एक होने की बात करने वाले लोगों को इस कसौटी पर भी फर्क को देखना चाहिए.

आदिवासी समाज का रवैया धरती और औरत दोनों के प्रति वैसा नहीं जैसा हिंदू समाज का है. आदिवासी धरती का उस कदर दोहन नहीं करता जैसे, बाहर का समाज. पंजाब, हरियाणा या फिर ज्यादा से ज्यादा तथाकथित विकसित इलाकों में धान की फसल कटते ही गेहूं या किसी अन्य फसल की खेती शुरु हो जाती है. पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पराली जलाने की वजह ही यही है, ताकि जल्द से जल्द नई फसल लगायी जा सके. जबकि आदिवासी इलाकों में धान की एक फसल के बाद सामान्यतः धरती को परती छोड़ दिया जाता है, ताकि वह कुछ महीने विश्राम कर ले.

आदिवासी समाज में स्त्रियां सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं. वे घर के भीतर बाहर पुरुषों के साथ मिल कर काम करती हैं. सामान्यतः हिंदू समाज जब युद्ध भूमि में जाता तो स्त्रियों को जौहर के लिए घर में छोड़ जाता, लेकिन आदिवासी महिलाएं संघर्ष के मैदान में भी पुरुषों के साथ होती हैं. सार्वजनिक उत्पादन प्रणाली का हिस्सा बनती हैं. खेत खलिहानों में पुरुषों के साथ मिल कर काम करती हैं. अपने बल पर जीने का हौसला रखती हैं.

गैर आदिवासी समाज में भी निम्न तबके की महिलाएं खेतों में काम करती हैं, लेकिन सवर्ण घर की महिलाओं से तो आप यह कल्पना नहीं कर सकते. आर्थिक संपन्नता हासिल करते ही पिछड़े वर्ग में भी महिलाओं को धर के अंदर रखने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है. यह दो संस्कृतियों के नजरिये का फर्क है.

  • विनोद कुमार

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