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राज बादशाह का और हुक्म कम्पनी बहादुर का : सत्ता की पुलिस और पुलिस की सत्ता के बीच गुम लोगों की पुलिस

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 12, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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अंग्रेज अपनी सत्ता के “पाये-पाटी की चूलों” को ठीक से ‘टाईट’ भी नहीं कर पाए थे कि देश में 1857 के ग़दर से निबटने की चुनौती सामने खड़ी हो गयी. आजादी की मांग को, राष्ट्रद्रोह ठहराने का कानूनी जामा तैयार करना और फिर कानून के डंडे से आज़ादी की मांग को लेकर, सड़कों पर उतरने वालों की टांग तोड़ उनके सर पर देशद्रोह के मुकदमें लादने के उद्देश्य से वर्ष 1861 में क़ानून और क़ानून की रक्षा के नाम पर पुलिस की फ़ौज खड़ी की गयी.

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अंग्रेज गए, हुन्दुस्तानी आ गये. गोरे गए – काले आ गये. “राज बादशाह” का ही कायम रहा (भरतीय दण्ड संहिता, 1861). पुलिस तब भी कुर्सी पर बैठे “कम्पनी बहादुरों” के इशारों पर नागरिकों पर जुल्म ढ़ाती थी, आज भी कुर्सी पर बैठे कम्पनी बहादुरों के इशारे पर नागरिकों पर जुल्म ढ़ाती है. एक फर्क पड़ा है, तब अंग्रेजी राज से आज़ादी की मांग राष्ट्रद्रोह कहलाता था, आज “संवैधानिक अधिकार और आज़ादी” को ख़तम करने पर तुले “राज बादशाह” के “कम्पनी बहादुर” का विरोध “राष्ट्रद्रोह” कहलाता है. नागरिकों के सर पर आये दिन होने वाले पुलिसिया जुल्मों के बादल, पहले से भी ज्यादा काले और घने हो गए हैं.

जिस “राज बादशाह” (सरकार) का मुखिया खुद को “कम्पनी बहादुर” समझने लगा हो, जो संविधान और संसद की पैदा की गयी संस्थाओं को अपने “राजनैतिक, सांस्कृतिक पैगम्बरों” की विचारधारा की कोख से “पुनर्जन्म” देने पर आमादा हो, उस सरकार से ये अपेक्षा करना कि वह ‘किसी भी संस्था’ को स्वायत्तता प्रदान करने की मांगों पर “कान देगी”, को जनून नहीं तो और क्या कहें ?

लेकिन संविधान, संसदीय लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण से आहत, जनूनी लोग (सोशल एक्टिविस्ट) इन संस्थाओं और मूल्यों को मरने नहीं देना चाहते. ऐसे ही जनूनी लोगों ने तब भी अपना मुंंह और कलम चलाना बंद नहीं किया था, जब देश में नागरिकों की संवैधानिक स्वतन्त्रता को निलंबित कर दिया गया था (वर्ष1975 आपातकाल). स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से आज तक सत्ता की बागडोर  जि किसी भी राजनैतिक सूत्र के हाथ रही हो, पुलिस उसी की कठपुतली बनकर रहती चली आ रही है. असामाजिक तत्वों से रक्षा करने वाली नागरिक पुलिस, सत्ता की पुलिस और पुलिस की सत्ता के बीच गुम हो कर रह गयी है.

भारत में पुलिस सुधारों की बहस सौ साल पुरानी है. भारत की पुलिस 155 साल पुराने पुलिस अधिनियम के तहत ही काम कर रही है. आजादी के बावजूद किसी ने 1861 के पुलिस अधिनियम में बदलाव की जरूरत नहीं समझी. देश में पुलिस सुधारों पर बहस बहुत पुरानी है. वर्ष 1902-03 में ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय पुलिस आयोग ने इस दिशा में पहला प्रयास किया था. उसके बाद इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर छह और राज्य स्तर पर पांच आयोगों का गठन किया जा चुका है. लेकिन उन सबकी सिफारिशें फाइलों में धूल फांक रही हैं. इसके पक्ष में आवाज तो तमाम राजनीतिक दल उठाते हैं लेकिन जब इससे संबंधित सिफारिशों पर अमल करने की बात आती है तो सब बगलें झांकने लगते हैं. वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद पुलिस सुधार की सिफारिशों के लिए धरमवीर की अध्यक्षता में 15 नवंबर, 77 को राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया गया था. आयोग की रिपोर्ट में हर राज्य में एक प्रदेश सुरक्षा आयोग का गठन करने, उसके जांच कार्यों को शांति व्यवस्था संबंधी कामकाज से अलग करने और पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिए एक खास प्रक्रिया अपनाने की सिफारिश की गई थी ताकि इस पद पर योग्यतम उम्मीदवार का चयन किया जा सके. उसने पुलिस प्रमुख का कार्यकाल तय करने और एक नया पुलिस अधिनियम लागू करने का भी सुझाव दिया था. आयोग ने चार साल बाद अपनी रिपोर्ट देने की शुरूआत की. मई,1981 तक इसने कुल आठ रिपोर्ट्स दीं. लेकिन उससे पहले वर्ष 1980 में ही जनता पार्टी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई. उसके बाद आयोग पर ही संकट के बादल मंडराने लगे. ज्यादातर सिफारिशों को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया.

दरअसल, सत्ता में आने वाली हर सरकार पुलिस के पुराने ढांचे को बनाए रखना चाहती थी कि ताकि वह इस सुरक्षा बल का मनमाने तरीके से इस्तेमाल कर सके. हालांकि उसके बाद भी इसी काम के लिए कई समितियों का गठन किया गया.

वर्ष 1997 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने तमाम राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को एक पत्र लिख कर पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए कुछ सिफारिशें भेजी थी लेकिन उनकी उपेक्षा कर दी गई. उसके बाद महाराष्ट्र के पुलिस अधिकारी जे.एफ. रिबैरो की अध्यक्षता में एक अन्य समिति का गठन किया गया. उसने भी अगले साल मार्च में अपनी रिपोर्ट सौंप दी. लेकिन उसकी सिफारिशें भी फाइलों में पड़ी धूल फांक रही है. उसके बाद गठित पद्मनाभैया समिति ने भी केंद्र सरकारों को सुधारों की लंबी सूची सौंपी थी. लेकिन नतीजा जस का तस ही रहा.

देश में इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादातियों की जांच के लिए गठित शाह आयोग ने भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिए पुलिस को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करने की बात कही थी. राज्य स्तर पर गठित कई पुलिस आयोगों ने भी पुलिस को बाहरी दबावों से बचाने की सिफारिशें की थीं.

उत्तर प्रदेश व असम में पुलिस प्रमुख और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के महानिदेशक रहे प्रकाश सिंह ने वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर अपील की थी कि ‘तमाम राज्यों को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्देश दिया जाए.’ इस याचिका पर एक दशक तक चली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई आयोगों की सिफारिशों का अध्ययन कर आखिर में 22 सितंबर, 2006 को पुलिस सुधारों पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में राज्यों के लिए छह और केंद्र के लिए एक दिशानिर्देश जारी किए.
इनमें पुलिस पर राज्य सरकार का प्रभाव कम करने के लिए, 1- राज्य सुरक्षा आयोग का गठन करने, 2 – पुलिस महानिदेशक, आईजी और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों का न्यूनतम कार्यकाल दो साल तय करने, 3 – जांच और कानून व्यवस्था की बहाली का जिम्मा अलग-अलग पुलिस इकाइयों को सौंपने, 4 – सेवा संबंधी तमाम मामलों पर फैसले के लिए एक पुलिस इस्टैब्लिस्टमेंट बोर्ड का गठन करने और 5 – पुलिस अफसरों के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन करने 6 – केंद्र सरकार को केंद्रीय पुलिस बलों में नियुक्तियों और कर्मचारियों के लिए बनने वाली कल्याण योजनाओं की निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के गठन का भी निर्देश भी अदालत ने दिया था. लेकिन अब तक इसका गठन नहीं हो सका है

विडंबना यह है कि किसी भी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कोई तवज्जो नहीं दी. दरअसल, राजनीतिक दलों के आकाओं को लगा कि इन दिशानिर्देशों पर अमल करने के बाद, पुलिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा. लेकिन अदालत के आदेश का पालन करने के लिए कई राज्य सरकारों ने वैकल्पिक रास्ता अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को बलाए ताक रखने की नियत से अपने-अपने पुलिस अधिनियम बना लिए पर इन अधिनियमों में सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों का कहींं अता-पता नहीं दिखता. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि उसके निर्देश उसी समय तक लागू रहेंगे जब तक सरकारें अपना अलग कानून नहीं बना लेती. सरकारों ने इसी प्रावधान का फायदा उठाया.

इसी तरह सुरक्षा आयोग का गठन करते समय अदालती आदेश को ठेंगा दिखाते हुए राजनीतिक दलों ने अपने लोगों को इसका सदस्य बना दिया. तमाम राज्यों में पुलिस प्रमुख का चयन भी सत्तारुढ़ राजनीतिक पार्टी की मर्जी के आधार पर होता है. सोली सोराबजी समिति ने वर्ष 2006 में पुलिस अधिनियम का प्रारूप तैयार किया था लेकिन केंद्र या राज्य सरकारों ने उस पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि देश के बदले हालात और चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए पुलिस अधिनियम में बदलाव बेहद जरूरी है. इसके साथ ही पुलिस के निरंकुश रवैये पर अंकुश लगाने के लिए भी एक तंत्र की स्थापना की जानी चाहिए. आज हालत यह है कि ग्रामीण इलाकों में तो दूर शहरों में भी लोग पुलिस के पास शिकायत लेकर जाने में डरते हैं. पुलिस की इस छवि में बदलाव जरूरी है. देश में पुलिस बल में लोगों की भी भारी कमी है. 732 लोगों पर एक पुलिस वाले का होना तस्वीर की दयनीयता बखान करता है. संयुक्त राष्ट्र ने हर साढ़े चार सौ व्यक्ति पर एक पुलिसकर्मी होने की सिफारिश की थी.

जब सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों का पालन करना, सरकारों के राजनैतिक हितों के अनुकूल न हो, तो इन निर्देशों के पालन में उनका रवैया ढुलमुल ही रहता है. अपने सियासी फायदे के लिए पुलिस को इस्तेमाल करने के मामले में तमाम राजनीतिक दलों का रवैया समान है. ऐसे में भारत में पुलिस सुधार अभी दूर की कौड़ी ही लगती है.

– विनय ओसवाल

देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
सम्पर्क नं. 7017339966

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