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भारतीय किसानों का घोषणा पत्र

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 10, 2018
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भारतीय किसानों का घोषणा पत्र

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति द्वारा दिल्ली में 30 नवंबर, 2018 को बुलाये गए ऐतिहासिक किसान मुक्ति मार्च के अवसर पर भारतीय किसानों के प्रतिनिधियों के सम्मेलन द्वारा पारित घोषणा-पत्र इस प्रकार है :

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‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

हम, भारत के किसान, जो प्राथमिक कृषि उत्पादों के उत्पादक हैं; जिन में शामिल हैं महिला, दलित, घुमंतू और आदिवासी किसान; भू-स्वामी, पट्टेदार, हिस्सेदार, कृषि श्रमिक और बगान श्रमिक; मछुआरे, दूध उत्पादक, मुर्गी पालक, पशु पालक, चरवाहे, एवं वन उपज संग्रहक; एवं वो हर व्यक्ति जो फसल उत्पादन में, झूम खेती, मधुमक्खी पालन, रेशम उत्पादन, केंचुआ खाद उत्पादन और कृषि-वानिकी में लगा हुआ है; मानते हैं कि किसानों की खुशहाली न केवल अधिकांश भारतीय परिवारों के आर्थिक अस्तित्व के लिए आवश्यक है अपितु यह हमारी राष्ट्रीय गरिमा और हमारी सभ्यता की विरासत बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है;

किसान हमारे भूतकाल का अवशेष मात्र नहीं है अपितु किसान, खेती एवं ग्रामीण समाज, भारत और दुनिया के भविष्य का अभिन्न अंग हैं; एवं किसान संगठनों की मांगें पूरी तरह से संवैधानिक परिप्रेक्ष्य, मौलिक अधिकार और राज्य-नीति के निर्देशक सिद्धांतों के अनुरूप हैं; एवं विकट परिस्थितियों में ईमानदारी से कठोर श्रम करने वालों के रूप में, अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए; ऐतिहासिक ज्ञान, क्षमताओं और संस्कृति के वाहक के रूप में; अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए; खाद्य सुरक्षा एवं संप्रभुता के वाहक के रूप में; अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए; एवं, जैव विविधता तथा पर्यावरणीय स्थायित्व के वाहक के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए; तथा




आर्थिक व्यवहार्यता पर्यावरणीय स्थायित्व सामाजिक और आर्थिक न्याय के साथ समानता को ध्यान में रखते हुए परंतु भारतीय कृषि के आर्थिक, पर्यावरणीय, सामाजिक एवं अस्तित्व के संकट; किसानों और उन की आजीविका को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय क्षरण और विनाश की चुनौती; खाद्य सुरक्षा और आजीविका को प्रभावित करने वाले कृषि भूमि के उपयोग में बदलाव एवं उस की गुणवत्ता में क्षरण में अभूतपूर्व बढ़ोतरी, पानी के निजीकरण, बलात् विस्थापन, अभाव और पलायन के संकट; कृषि की लगातार अनदेखी और कृषक समुदाय के साथ साथ भेदभाव के चलते; गाँव के सामर्थ्यवान एवं सरकारी अमले द्वारा किसानों की लूट के बढ़ते जोखि़म; विशालकाय, लूटेरी और मुनाफाखोर कंपनियों, जो पहले ही भारतीय कृषि के कई क्षेत्रों पर काबिज हैं, के खेती में लगातार बढ़ते दखल के चलते; पूरे देश में किसानों की आत्महत्या की बाढ़ और कर्जे के ज़बरदस्त बोझ के चलते; हमारे समाज में किसानों और बाकी समाज के बीच बढ़ती खाई; एवं किसान आंदोलन पर सरकार के बढ़ते हमलों के चलते चिंतित होते हुए निष्ठा पूर्वक उद्घोषणा करते हैं –

कि हमें, जीने एवं गरिमा पूर्वक आजीविका-अर्जन का अधिकार है;

कि हमें, सामाजिक सुरक्षा एवं प्राकृतिक एवं अन्य आपदाओं से सुरक्षा का अधिकार है;

कि हमारा भूमि, पानी, जंगल एवं सभी प्राकृतिक संसाधनों जिन में सार्वजनिक संसाधन शामिल हैं पर अधिकार है;

कि हमें, बीज, खाद्य व्यवस्था और टिकाऊ तकनीक के चयन में विविधता का अधिकार है;




कि हमें अभिव्यक्ति, संगठन, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक तरीकों से अपनी मांगों की पूर्ति हेतु संघर्ष एवं अपने भविष्य के निर्धारण की स्वतन्त्रता का आधिकार है, इसलिए हम भारत की संसद से यह मांग करते हैं कि –

वो तुरंत कृषि संकट के निवारण हेतु भारत के किसानों के लिए एवं उन द्वारा प्रस्तावित निम्न दो किसान मुक्ति विधेयकों को पारित एवं लागू करने हेतु विशेष सत्र बुलायेः

1. कर्ज़ से किसान की मुक्ति विधेयक, 2018 एवं
2. किसानों को सुनिश्चित लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य का अधिकार विधेयक, 2018.

हम यह भी मांग करते हैं कि भारत सरकार निम्नलिखित कदम उठाए : 

1. मनरेगा के तहत सुनिश्चित कार्यदिवसों की संख्या बढ़ा कर 200 दिन प्रति परिवार करे, विधिसम्मत अवधि में भुगतान सुनश्चित करे तथा यह अकुशल श्रमिक के लिए निर्धारित न्यूनतम वेतन के अनुरूप हो;

2. किसानों की लागत कम करे. इस के लिए या तो उद्योगों की कीमत को नियंत्रित करे या किसानों को सब्सिडी दे;

3. सब किसान परिवारों को व्यापक सामाजिक सुरक्षा दे. इस में कम से कम 5000 रुपया प्रति माह की दर से 60 साल से ऊपर के किसानों के लिए पेंशन शामिल हो;

4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सार्वभौमीकरण किया जाए एवं इस में अन्न तथा पौष्टिक-अन्न, दालें, चीनी एवं तेल शामिल हो और इसे आधार या शारीरिक पहचान की पुष्टि से ने जोड़ा जाएं एवं न ही इस का नकदीकरण किया जाए;

5. आवारा पशुओं के नुकसान से मुक्ति दी जाए. इसके लिए कानून एवं भीड़ तंत्र द्वारा पशु व्यापार पर लगाई गई सब अड़चनों को दूर किया जाए, जंगली एवं आवारा पशुओं द्वारा किए गए किसानों के नुकसान की भरपाई की जाए तथा पशु आश्रय स्थलों को सहायता दी जाए;




6. बिना किसानों की विवेक-सम्मत अनुमति के भूमि अधिग्रहण करने और भूमि बैंक बनाने पर रोक लगाई जाए; कृषि भूमि का व्यवसायिक भूमि विकास के लिए अधिग्रहण एवं उपयोग न हो और न ही इस का भूमि बैंक के लिए प्रयोग हो; राज्यों के स्तर पर ‘भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार, सुधार तथा पुनर्वास अधिनियम, 2013’ में ढील देने और इसे नज़रअंदाज़ करने पर रोक लगाई जाए; भूमि उपयोग एवं कृषि भूमि संरक्षण नीति बनाई जाए;

7. अगर 14 दिनों के अंदर भुगतान नहीं किया जाता तो चीनी मिलों का 15þ प्रति वर्ष की दर से ब्याज देना अनिवार्य किया जाए; गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफ़आरपी) का निर्धारण चीनी उत्पादन की दर 9.5þ मान कर किया जाए;

8. अन्य देशों में प्रतिबंधित कीटनाशकों पर रोक लगाई जाए एवं बिना आवश्यकता, विकल्पों एवं प्रभावों के व्यापक मूल्यांकन के संशोधित जीन वाले (जीएम) बीजों को अनुमति न दी जाए;

9. कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर रोक लगाई जाए, तथा मुक्त व्यापार समझौतों, जिस में प्रस्तावित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागेदारी (आरसीईपी) भी शामिल है, से कृषि को बाहर रखा जाए;

10. सभी वास्तविक किसानों जिन में पट्टे पर खेती करने वाले, हिस्से पर खेती करने वाले, महिला किसान, ठेके पर खेती करने वाले एवं ग्रामीण श्रमिक शामिल हैं, को चिन्हित एवं पंजीकृत किया जाए ताकि सब को सारी सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके; एवं

11. वनरोपण के नाम पर आदिवासी किसानों की बेदखली बंद करें एवं पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम एवं वन अधिकार अधिनियम, 2006 की कड़ाई से अनुपालना सुनिश्चित की जाए।




उपरोक्त के अतिरिक्त सरकार से आग्रह करते हैं कि निम्न बारे नीति बनाई जाए :

1. भूमिहीन किसानों को भूमि एवं आजीविका का अधिकार दिया जाए, जिस में कृषि और आवास हेतु भूमि, मछली पालन के लिए पानी, गौण खनिजों के खनन का अधिकार इत्यादि शामिल हों;

2. प्राकृतिक आपदा के चलते फसल नुकसान की भरपाई समय पर, प्रभावी एवं पर्याप्त हो; ऐसी व्यापक फसल बीमा योजना लागू की जाए जो किसानों के हित में हो न कि केवल कंपनियों के हित में हो और सभी किसानों की सभी फसलों के सारे जोखिम की भरपाई करे, जिस के लिए नुकसान मूल्यांकन की इकाई खेत हो; एवं सूखा प्रबंधन मार्गदर्शिका में किसान विरोधी सब बदलाव निरस्त किए जाएं;

3. विशेष कर वर्षा आधारित क्षेत्रों में, किसानों के लिए सुनिश्चित सुरक्षात्मक सिंचाई व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए;

4. दूध के लिए सुनिश्चित लाभकारी दाम एवं मध्याह्न भोजन योजना तथा एकीकृत बाल विकास योजना में अतिरिक्त पोषण सुरक्षा के लिए इसकी खरीद सुनिश्चित की जाए;

5. किसान आत्महत्या प्रभावित सभी परिवारों के सभी बकाया कृषि ऋण माफ किए जाएं एवं इन परिवारों के बच्चों के लिए विशेष अवसर उपलब्ध कराये जाएं;

6. अनुबंध खेती अधिनियम 2018 की समीक्षा कर के किसानों को कंपनियों की लूट से बचाया जाए;

7. किसान उत्पादक संगठनों और कृषक सहकारी समतियों के माध्यम से खरीदी, प्रसंस्करण एवं बिक्री को बढ़ावा दिया जाए न कि खेती का कंपनीकरण किया जाए एवं खेती पर बहु राष्ट्रीय निगमों के कब्ज़े को बढ़ावा दिया जाए;

8. आर्थिक रूप से व्यवहार्य, पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ, स्वशासी, एवं जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में लचीली खेती को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त फसल चुनाव एवं स्थानीय बीज वैविध्य के पुनर्स्थापना पर आधारित जैविक कृषि को बढ़ावा दिया जाए.




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