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बाबरी मस्जिद बिना किसी विवाद के एक मस्जिद थी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 11, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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बाबरी मस्जिद बिना किसी विवाद के एक मस्जिद थी

हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ताहिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ता
गर भारत के युवा आज मन्दिर बनाने को अपनी राजनीतिक सफलता मान लेते हैं तो भारत के हिंदू समुदाय के युवा अपने वर्तमान और भविष्य को नष्ट कर लेंगे. कोई भी कौम मजहब के आधार पर आगे नहीं बढ़ती. अब सिर्फ वही कौम बचेगी और आगे बढ़ेगी जो शिक्षा और विज्ञान को अपनायेगी.

अगर हिन्दुत्ववादी आज सुप्रीम कोर्ट की बदमाशी, धर्म गुरु रविशंकर की गुंडागर्दी और सरकार की बेशर्मी के दम पर बाबरी मस्जिद के मलबे पर एक मन्दिर बनाते हैं तो आने वाली पीढियों के हिन्दू बच्चे इस हरकत को शर्म से याद करेंगे. यह पूरी तरह से गुंडागर्दी है. वह बिना किसी विवाद के एक मस्जिद थी.  उस मस्जिद का बाबर से कोई लेना-देना नहीं था.

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अयोध्या में चार सौ राम मन्दिर हैं. हर मन्दिर का पुजारी अपने मन्दिर को ही असली जन्म-भूमि कहता है. तुलसीदास के रामचरित मानस लिखने से पहले भारत में कोई राम का मन्दिर नहीं था. राम का कोई वर्णन किसी वेद या उपनिषद में नहीं है. राम से मिलती-जुलती कहानियां बहुत सारे देशों में सुनाई जाती है.

तुलसीदास के रामचरितमानस लिखने से पहले भारत की आम जनता राम को नहीं जानती थी. तुलसीदास ने रामचरितमानस तब लिखा जब अकबर का शासन था. अयोध्या के सारे मन्दिर उसके बाद बने. अकबर बाबर का पोता था तो मन्दिर बने पोते के टाइम पर और भाजपा बताती है कि मन्दिर बाबर ने तोड़ दिया यानी जो मन्दिर पोते के टाइम में बना उसे दादा ने तोड़ दिया ! बाबर के टाइम पर मन्दिर बना ही नहीं था. बाबर कभी अयोध्या नहीं आया था.

बाबरी मस्जिद पर हिन्दुओं का कोई हक नहीं बनता. संघ और भाजपा ने सत्ता हडपने के लिए इस विवाद को जन्म दिया. असल में संघ आज़ादी आने से डरा हुआ था. संघ का निर्माण भारत के अमीर सवर्णों ने किया था. इन्हें डर लगता था कि आज़ादी के बाद कहीं समानता ना आ जाए वरना अमीर सवर्ण जातियों का आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक दबदबा खत्म हो जाएगा.




भगत सिंह आंबेडकर नेहरु गांधी सभी बराबरी की बात कर रहे थे. आप उस दौर के संघी नेताओं के लेख पढ़ लीजिये. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता लोग भगत सिंह, आंबेडकर गांधी और नेहरु से के बारे में नफरत भरे बयान दे रहे थे. आज़ादी के बाद समानता ना आ सके इसलिए संघ ने राजनीति को साम्प्रदायिकता की तरफ मोड़ा. आज़ादी मिलने के एक साल के भीतर गांधी को गोली मारी और बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रख दीं और प्रचार किया कि ‘गांधी मुसलमानों का दलाल था और मुसलमान हमारे राम जी का मन्दिर नहीं बनने दे रहे हैं.’




धीरे-धीरे यह झूठ और ज़हर भारत के नौजवानों के दिमाग में भरने में सफल हो गये और अंत में इन्होंने भारत की सत्ता पर कब्जा कर लिया. लेकिन अगर भारत के युवा आज मन्दिर बनाने को अपनी राजनीतिक सफलता मान लेते हैं तो भारत के हिंदू समुदाय के युवा अपने वर्तमान और भविष्य को नष्ट कर लेंगे. कोई भी कौम मजहब के आधार पर आगे नहीं बढ़ती. अब सिर्फ वही कौम बचेगी और आगे बढ़ेगी जो शिक्षा और विज्ञान को अपनायेगी.

मंदिर-मस्जिद पूजा और नमाज किसी भी कौम की कोई भलाई नहीं कर सकते. जो कौम मंदिर मस्जिद पूजा और नमाज में फंसेगी वह कुछ ही समय में खत्म हो जाएगी. और जो कौम शिक्षा और विज्ञान को अपनायेगी वहीं कौम आगे बढ़ेगी और बचेगी. फैसला भारत के हिंदू युवाओं को करना है कि उन्हें अपने वर्तमान और भविष्य को बचाना है या मंदिर पूजा अंधविश्वास और पिछड़ेपन में डूब कर खुद को नष्ट कर लेना है.




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Tags: अयोध्यातुलसीदासमस्जिदसंघ और भाजपाहिन्दुत्ववादी
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