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भारत के हिंसक जन्म के पीछे बेरहम साम्राज्यवाद था, पर आज सिर्फ भारतीय जिम्मेदार हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 4, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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भारत के हिंसक जन्म के पीछे बेरहम साम्राज्यवाद था, पर आज सिर्फ भारतीय जिम्मेदार हैं

बॉन की मून, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव और ‘द एल्डर्स’ के डिप्टी चेयर
‘द एल्डर्स’ के डिप्टी चेयर की हैसियत से बोलते हुए मैं इस बात को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हूं कि अलगाववादी हिंसा और बांटने वाले राजनीतिक माहौल और संवादों से गांधी के विचारों और सपनों को गंभीर खतरा खड़ा हो गया है. दुनिया में शांति और न्याय के लिए काम करने के मकसद से ही मंडेला ने ‘द एल्डर्स’ की स्थापना की थी.

भारत के पास वह क्षमता है जिससे वह 21वीं सदी की प्रमुख शक्तियों में से एक बन सकता है. दुनिया में यह सबसे बड़ा लोकतंत्र है. इस देश के पास प्रतिभावान नागरिक होने का वरदान और आशीर्वाद है, जिन्होंने कारोबार, शिक्षा, सूचना तकनीक, मनोरंजन और खेल जैसे क्षेत्रों में परचम लहराया है. भारत दुनिया को लोकतंत्र की परंपराओं और अहिंसा का पाठ पढ़ा सकता है, इसीलिए हाल के हफ्तों में दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा से मेरे सहित इसके मित्र काफी चिंतित और नाराज थे.

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दुनियाभर के करोड़ों लोग आज भी महात्मा गांधी के उदाहरण से प्रेरित हैं, जिन्होंने भारत को आजादी दिलाने का नेतृत्व किया था. उनके सबसे बड़े प्रशंसकों में नेलसन मंडेला भी थे, जिन्हें दमन और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष में इनसे प्रेरणा मिली थी. 2008 में मंडेला को जब गांधी सम्मान से नवाजा गया था, तब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और भारत जैसी उभरती शक्तियों से साथ मिल कर काम करने को कहा था, ताकि अंतरराष्ट्रीय जगत में लोकतंत्र और समानता हकीकत बन सकें. उनके शब्द आज भी प्रासंगिक हैं.

लेकिन ‘द एल्डर्स’ के डिप्टी चेयर की हैसियत से बोलते हुए मैं इस बात को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हूं कि अलगाववादी हिंसा और बांटने वाले राजनीतिक माहौल और संवादों से गांधी के विचारों और सपनों को गंभीर खतरा खड़ा हो गया है. दुनिया में शांति और न्याय के लिए काम करने के मकसद से ही मंडेला ने ‘द एल्डर्स’ की स्थापना की थी.

दिल्ली में गरीबों, कामकाजी लोगों, खासतौर से मुसलमानों पर हुए हमलों को भारतीय नागरिकता को फिर से परिभाषित करने और हाल के नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), प्रस्तावित राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर के जरिए यह तय करने कि कौन भारत का नागरिक होगा, की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है.

ये कदम भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि कानून के सामने सभी नागरिक समान हैं. साथ ही, इन घटनाक्रमों ने भारत के लोकतांत्रिक भविष्य और वैश्विक राष्ट्रों के परिवार में इसके स्थान को लेकर भी गंभीर और व्यापक सवाल पेश कर दिए हैं. स्वतंत्र भारत के रूप में भारत के हिंसक जन्म के पीछे बेरहम साम्राज्यवाद था. आज, अपने देश की दिशा तय करने के लिए सिर्फ भारतीय जिम्मेदार हैं.

किसी एक धार्मिक समूह के खिलाफ दूसरे को खड़ा करके और कुछ भारतीयों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना कर भारत अपनी विकास संबंधी चुनौतियों से बच नहीं सकता. फिर भी, मुझे इस बात का डर है कि सीएए और प्रधानमंत्री मोदी की सरकार द्वारा प्रस्तावित विधायी कदमों का स्पष्ट नीहितार्थ यही है. जब एक धर्म के लोगों को नागरिकता प्रदान करने से इनकार किया जा रहा है, जो कि दूसरे धर्म के लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध है, तो यह मानव जाति के हाल के इतिहास की कुछ सबसे बुरे दौर और यादों की ओर ले जाने वाली घटना है.

संवेदनशील मुद्दों जैसे गोहत्या, गोमांस खाने और अंतर-धार्मिक वैयक्तिक संबंधों को लेकर भारत के मुसलमानों पर अफवाहों पर आधारित हमले जिस तेजी से बढ़े हैं, उन्हें लेकर मैंने और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने भी लगातार चेतावनी दी है. इस तरह की घटनाएं भीड़ द्वारा न्याय और सजा दिए जाने जैसा ही है, जो सामाजिक सौहार्द और ताने-बाने पर उतना ही बुरा असर डालती हैं जितना कि समाज के लोकतांत्रिक ताने-बाने पर. अगर भारत राष्ट्रवादी और धार्मिक भेदभाव के रास्ते पर और नीचे चला गया, तो यह यह राजनीतिक और सामाजिक रूप से बहुत ही बड़ा अनर्थ हो जाएगा, जो देश के विकास के लिए बड़ा झटका साबित होगा और कई पीढ़ियां इसका खमियाजा भुगतेंगी.

पिछले साल जब पहली बार बतौर परीक्षण यह नया नागरिकता कानून पेश किया गया था, तब असम में बड़े पैमाने पर हुआ इसका विरोध देश में इसके खतरे का संकेत दे रहा था, और सरकार को चेता रहा था कि इसे रोक कर नागरिकों की बात सुनी जानी चाहिए. जब 2019 में इसे पेश किया गया था, तब 19 लाख से ज्यादा नागरिकों जिनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे, को असम में एनआरसी से बाहर कर दिया गया था.

इससे यह खौफ पैदा हो गया कि जब 2021 में अगली जनगणना होगा तो इन सभी को बाहर कर दिया जाएगा. नागरिकता कानून और एनआरसी के खिलाफ विरोध ने मुसलमानों, हिंदुओं और दूसरे धर्म के लोगों को एकजुट कर दिया है, जिन्होंने इस कवायद से धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को पैदा होने वाले खतरे को लेकर चिंताएं साझा कीं और आवाज उठाई. यह एकता और भाई-चारे की यह प्रतिबद्धता दिल्ली में हाल की हिंसा के बाद पीडित लोगों के बीच जाकर काम करने वाले नागरिक समाज के समूहों में भी देखने को मिली.

वर्ष 2018 में मैं अपने सहयोगी और विश्व स्वास्थ्य संगठन के पूर्व अध्यक्ष एल्डर ग्रो हरलेम ब्रंडलैंड के साथ दिल्ली के मुहल्ला क्लीनिकों में गया था, हमारे साथ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी थे. अमीरी, धर्म या वर्ग को दरकिनार कर इन मुहल्ला क्लीनिकों में जिस तरह से मुफ्त और सर्वसुलभ सेवाएं देखने को मिलीं, उस मॉडल ने हमें बहुत ही प्रभावित किया. यह सिर्फ निःशुल्क, संयुक्त और सामूहिक एकजुटता से ही संभव हो पाया और इसी से भारत शांति, न्याय और खुशहाली हासिल कर सकता है.

आपके देश की स्थापना करने वालों ने इसकी जरूरत को समझ लिया था. उनका यह सपना अपके भविष्य के हृदय में होना चाहिए.

(जनसत्ता से साभार)

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