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आर्थिक मंदी : समाजवादी अर्थव्यवस्था का मुकाबला पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कभी नहीं कर सकता

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 28, 2023
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आर्थिक मंदी : समाजवादी अर्थव्यवस्था का मुकाबला पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कभी नहीं कर सकता
आर्थिक मंदी : समाजवादी अर्थव्यवस्था का मुकाबला पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कभी नहीं कर सकता

मौजूदा व्यवस्था के रहते, हमारे देश में चीन के टक्कर में बड़े पैमाने का उत्पादन सम्भव नहीं है क्योंकि यदि पूंजीपति वर्ग अपने उद्योगों का विस्तार करके चीन के टक्कर में बड़े पैमाने का उत्पादन करता है, तो एक हद तक सस्ता माल तैयार हो सकता है और सस्ते मालों के बल पर कुछ समय के लिए चीन को टक्कर दिया जा सकता है. मगर हमारे देश का पूंजीपति वर्ग चीन के टक्कर में बड़े पैमाने पर उत्पादन कर ही नहीं सकता क्योंकि –

  1. उसके पास पूंजी का अभाव है.
  2. उसके पास आन्तरिक बाजार नहीं है क्योंकि यहां लोगों के पास क्रय शक्ति नहीं है.
  3. आर्थिक मंदी के कारण उसका माल अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी नहीं बिक सकता.

अब यहां फिर प्रश्न उठता है कि क्या कोई पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाला विकसित देश भी चीन के टक्कर में बड़े पैमाने का औद्योगीकरण नहीं कर सकता है ? तो जवाब है कोई कितना भी विकसित पूंजीवादी देश क्यों न हो, वह चीन के टक्कर में विराट पैमाने का उत्पादन नहीं कर पा रहा है और कर भी नहीं पायेगा.

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क्योंकि समाजवादी देशों में जल, जंगल, जमीन, कल-कारखाना, खान-खदान, यातायात, शिक्षा, चिकित्सा, बीमा और बैंक सरकारी हैं, इसका मतलब सारी पूंजी सरकार द्वारा नियंत्रित होती है. FDI, FII आदि के जरिये जो विदेशी पूंजी आती है, वह भी सरकार के नियंत्रण में ही रहती है.

इस प्रकार सारी पूंजी एक जगह से नियंत्रित होती है. इसी कारण चीन की पूंजी, पूरी दुनिया में फैली होने के बावजूद भी संगठित है. इसीलिये वह बड़े से बड़ा उद्योग लगाने में सक्षम है. इसके विपरीत पूंजीवादी देशों की पूंजी में 3 कमजोरियां होती है –

  1. उत्पादन के संसाधनों के निजी मालिकाने के कारण पूंजीवादी देशों की सारी पूंजी बिखरी हुई होती है.
  2. पूंजीपति वर्गों में आपसी तालमेल नहीं होता. लाखों पूंजीपति अपनी-अपनी पूंजी को अपने-अपने ढंग से जहां चाहते हैं वहां लगाते हैं. वे अपनी पूंजी को अलग-अलग नियंत्रित करते हैं.
  3. पूंजीपति एक दूसरे से अधिक मुनाफा कमाने के लिये आपस में होड़ करते हैं तथा एक दूसरे के विरुद्ध गलाकाट प्रतिस्पर्धा करते हैं.

इन तीन कारणों से पूंजीवादी देशों की पूंजी से विराट पैमाने का उत्पादन संभव ही नहीं है. विश्व के सारे पूंजीवादी देशों का सरगना अमेरिका भी, चाह कर भी चीन की तुलना में बड़े से बड़ा उद्योग लगाने में सक्षम नहीं हैं.

वालमार्ट अमेरिका की बहुत बड़ी कम्पनी है, जो दुनिया भर में शापिंग माल खोल कर चीन का सस्ता माल बेच रही है; और भारी मुनाफा कमा रही है. यदि वालमार्ट कम्पनी अपना कारखाना खोलकर माल पैदा करके बेचती तो उसे जोखिम ज्यादा उठाना पड़ता; और जोखिम के मुकाबले उतना भारी मुनाफा नहीं मिलता. बाजार में चीन के सस्ते माल के मुकाबले उसका माल नहीं बिक पाता तो उसे भारी घाटा हो सकता था, और उसकी पूंजी डूब सकती थी. यही भय भारत के पूंजीपतियों को भी है.

पूंजीवादी तरीके से समाजवादी उत्पादन का मुकाबला करना सम्भव नहीं रह गया है, क्योंकि पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली अनियंत्रित बाढ़ अथवा सूखे की तरह होती है. पूंजीवादी उत्पादन हमेशा ही सीमित पैमाने का उत्पादन होता है. पूंजीवादी उत्पादन जितना ही ज्यादा बढा़ते हैं, उतनी ही ज्यादा भयानक मन्दी आती है.

पूंजीवादी व्यवस्था में जितना ही भारी पैमाने का उत्पादन करेंगे, पूंजीपतियों के बीच निजी स्वामित्व के कारण उतनी ही भयानक प्रतिस्पर्धा होगी. वे अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लागत मूल्य घटायेंगे. लागत मूल्य घटाने के लिए बड़ी से बड़ी मशीनें लगायेंगे, जिससे कम मजदूरों द्वारा ज्यादा माल पैदा कर सकें. बड़ी मशीनें लगा कर पैदावार को बढ़ा देते हैं, परन्तु मजदूरों की छंटनी कर देते हैं. इस प्रकार खरीदने वालों की संख्या घटा देते हैं.

दरअसल काम से हटाये गये मजदूर तनख्वाह नहीं पाते हैं, अतः खरीददारी नहीं कर पाते. इस प्रकार पूंजीपति माल की पैदावार तो बढ़ा दे सकता है, परन्तु साथ ही साथ खरीदने वालों की संख्या घटा देता है; जिसके कारण अनिवार्य रूप से एक ऐसा समय आता है, जब बाजार माल से पट जाता है और खरीदने वाले बहुत कम रह जाते हैं. इस प्रकार आर्थिक मंदी आ जाती है. पूंजीपति जितने ही बड़े पैमाने का उत्पादन करते हैं, उतनी ही भयानक आर्थिक मंदी आती है.

पूंजीवाद विकसित होकर साम्राज्यवाद में बदल जाता है, तब अति उत्पादन के कारण नहीं बल्कि उत्पादन ठप्प या कम होने के कारण भी मंदी आती है. इस दौर में औद्योगिक पूंजी वित्तीय पूंजी के रूप में बदलती जाती है. वह वित्तीय पूंजी उन तमाम गैर जरूरी चीजों के उत्पादन को बढ़ावा देती है, जिसमें कम से कम समय, कम से कम लागत में अधिक से अधिक मुनाफा हो.

तब वह वित्तीय पूंजी मनुश्य की बुनियादी जरूरतों- रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य सम्बन्धी वस्तुओं का उत्पादन करने की बजाय हथियार, शराब आदि नशीले पदार्थ, गंदी फिल्में, गंदे गाने तथा कामुकता बढ़ाने की दवायें एवं उपकरण आदि के उत्पादन को बढ़ावा देती है. और अपने मजबूत प्रचार तंत्रों के जरिये अपने इन गैर जरूरी उत्पादों को खरीदने के लिए लोगों के मन में कृत्रिम जरूरत पैदा करती है.

आर्थिक मंदी के दौरान अपना मुनाफा बरकरार रखने के लिए जब पूंजीपति लोग मजदूरों की छंटनी करते हैं, तो मंदी और बढ़ जाती है. मंदी के दौरान मुनाफा बढ़ाने के लिए जब पूंजीपति मंहगाई बढ़ाते हैं तो चीन जैसी उत्पादन प्रणाली का सस्ता माल और अधिक तेजी से उन्हें बाजार से बाहर खदेड़ता है. मंहगाई बढ़ने से खर्च भी बढ़ जाता है. तब बढ़े हुए खर्च को पूरा करने के लिए भ्रष्टाचार भी बढ़ता है.

जहां पूंजीपति वर्ग प्राकृतिक संसाधनों एवं टैक्स की चोरी आदि से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है, वहीं सरकारी अधिकारी व कर्मचारी अपने कानूनी अधिकारों को बेचकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते रहते हैं. यदि आर्थिक मंदी से उबरने के लिए विदेशों से कर्ज लेते हैं, तो कर्ज देने वाले देश की शर्तों को मानना पड़ता है, जिससे साम्राज्यवादी शोषण व गुलामी की जकड़न और अधिक बढ़ जाती है, जिससे जनाक्रोश बढ़ता है.

ऐसे में जनता विकल्प तलाशती है तो पूंजीपति वर्ग जनता को भुलावा देने के लिए चुनाव करवाता है; चुनाव का खर्च जनता से वसूलने के लिए टैक्स बढ़ाया जाता है, जिससे महंगाई बढती है. और यह मंहगाई आर्थिक मंदी को और बढ़ाती है. अतः पूंजीपति वर्ग समाजवादी उत्पादन के मुकाबले भारी पैमाने का उद्योग चला ही नहीं सकता. इसलिए पूंजीवादी उत्पादन द्वारा समाजवादी उत्पादन के मुकाबले सस्ता माल नहीं तैयार किया जा सकता.

समाजवादी उत्पादन का मुकाबला करने में पूंजीपतियों की पूंजी निश्चित ही डूब जायेगी; क्योंकि समाजवादी उत्पादन में आर्थिक मंदी नहीं आती जबकि पूंजीवादी उत्पादन में हर छठवें-सातवें…. दसवें-पन्द्रहवें…. साल अनिवार्य रूप से आर्थिक मंदी आती ही है. पहले जब आर्थिक मंदी आती थी तो धीरे-धीरे साल दो साल में दूर हो जाया करती थी, परन्तु जब पूंजीवादी मंदी का फायदा उठाने में समाजवादी अर्थव्यवस्था सक्षम हो जाती है, तब पूंजीवादी मंदी प्रायः महामंदी में बदल जाती है और उस महामंदी के दूर होने की संभावना खत्म होती जाती है.

ऐसी परिस्थिति में अल्प विकसित देशों की बात ही छोडि़ये, अमेरिका जैसे विकसित पूंजीवादी साम्राज्यवादी देश की पूंजी को यदि सौ गुना बड़ा कर दिया जाय तो भी उसकी पूंजी भागकर चीन की तरफ जायेगी. पूंजीवाद की आर्थिक मंदी का फायदा उठाकर समाजवादी उत्पादन उससे बहुत आगे बढ़ता जायेगा और इतना बड़ा हो जायेगा कि पूंजीवादी उद्योगों को ही निगल जायेगा.

अतः समाजवादी उत्पादन के मुकाबले पूंजीवादी उद्योग लगाकर पूंजीपति वर्ग मुनाफा कमाने की बात छोडि़ये, अपना उद्योग भी नहीं बचा पा सकता; और बिना मुनाफा के वह कोई जोखिम उठा ही नहीं पायेगा…इसलिए उसके सामने एक ही उपाय होता है कि वह अपने उद्योग बन्द कर समाजवादी उद्योगों का माल खरीदे और बेचे. तो फिर चीन में बड़े पैमाने का उत्पादन करने के बावजूद भी आर्थिक मंदी क्यों नहीं आती ?

क्योंकि चीन का सामाजिक संगठन पूंजीवादी देशों के सामाजिक संगठन से अलग तरह का है. वहां दास और दास मालिक वाला समाज नहीं है, वहां राजा-प्रजा या मजदूर-मालिक वाला समाज नहीं है. वहां पूरा समाज ही उत्पादन के साधनों का मालिक है. श्रमिक वर्ग के सामूहिक नेतृत्व में कारखाने चल रहे हैं. श्रमिक वर्ग आपस में मुनाफाखोरी के लिए होड़ नहीं करता. वह समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ‘योजनाबद्ध तरीके’ से उत्पादन करता है. और भारी पैमाने के उद्योगों के बल पर सस्ता सामान सबके लिए उपलब्ध कराता है.

इसी वजह से बडे़ पैमाने का उत्पादन होने के बावजूद भी चीन में आर्थिक मंदी नहीं आती और न ही वहां मंहगाई और बेरोजगारी की गुंजाइश बन पाती है. ऐंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र में पेज 80 पर लिखा है –

‘…. इस तरह, बड़े पैमाने के उद्योग का ठीक वह गुण जो आज के समाज में सारी गरीबी और सारे व्यापार संकटों को जन्म देता है, ही बिल्कुल वह गुण है जो भिन्न सामाजिक संगठन में उस दरिद्रता को तथा इन विनाशकारी उतार-चढ़ावों को नष्ट कर देगा.

‘अर्थात बड़े पैमाने के उद्योग द्वारा किये जाने वाले भारी पैमाने के उत्पादन, पूंजीपति वर्ग के अधीन होते हैं तो विनाशकारी उतार-चढ़ावों (आर्थिक मंदी) को जन्म देते हैं जिससे तमाम छोटे कारखानेदार तबाह हो जाते हैं और लाखों मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं. मंहगाई बढ़ती है तो भ्रष्टाचार भी बढ़ता है और कर्ज, युद्ध एवं दिवालियापन का संकट भी बढ़ता है परन्तु बड़े पैमाने के वही उद्योग जब समाज के अधीन रहकर उत्पादन का असीम विस्तार करते हैं तो विकास होता है तथा आर्थिक मंदी भी नहीं आती और मंहगाई, बेरोजगारी, गरीबी आदि तमाम संकट दूर हो जाते हैं.’

(नोट : चीन समाजवादी व्यवस्था नहीं है, लेकिन भूतपूर्व समाजवादी व्यवस्था होने के कारण उसका सामाजिक ढ़ांचा काफी हद तक समाजवादी स्वरूप को लिए हुए है. – सं.)

  • रजनीश भारती, राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा (उ.प्र.)

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