Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

भारत धार्मिक मदांधता के सबसे भीषण दौर से गुजर रहा है !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 18, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
राम अयोध्या सिंह

भारत धार्मिक मदांधता के सबसे भीषण दौर से गुजर रहा है. मेरे जानते अबतक के भारतीयों के जीवन में ऐसा त्रासदपुर्ण भयानक संभावनाओं वाला मंजर इससे पहले कभी भी उपस्थित नहीं हुआ था. भारत के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में आया यह भयावह परिदृश्य कोई अचानक आज ही नहीं सामने उपस्थित हो गया है. अगर हम गौर से इसे देखें तो इसकी नींव आजादी के समय ही पड़ चुकी थी. आजादी के साथ ही राजनीतिक सत्ता के सामने एक नये भारत के निर्माण का सपना था, जिसे पूरा करने के लिए जवाहरलाल नेहरू की सरकार कृतसंकल्पित थी.

नेहरू की लोकप्रियता, उनका व्यक्तित्व, उनके विचार और उनके सपने भी दांव पर थे. कैबिनेट में नेहरू और आजाद को छोड़कर बाक़ी के अधिकतर सदस्य यथास्थितिवादी, दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी थे, और जो जनसमस्याओं के निराकरण के समाजवादी नीतियों, कार्यक्रमों और योजनाओं का भरसक विरोध करते थे. दुनिया एक नये परिवेश के निर्माण के लिए लालायित थी. भारत ही नहीं, पूरा विश्व ही संक्रमण के दौर से गुजर रही थी.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था. नयी दुनिया बनाने के सपने और कार्यक्रम भी बन गये थे. पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियों का पराभव हो चुका था और नयी महाशक्तियों का भी उदय हो चुका था. पुराने के विध्वंस और नये के निर्माण के इन कशमकश परिस्थितियों में बहुत कुछ असंभावित भी घट रहा था. अमेरिका और सोवियत संघ अपने नयी स्थिति को मजबूत और व्यापक बनाने के लिए हर संभावना पर विचार कर रहे थे. पूरी दुनिया के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में नयी संभावनाओं की तलाश हो रही थी.

जीवन के हर क्षेत्र में अमेरिका और सोवियत संघ अपने वैचारिक और व्यवस्था संबंधी योजनाओं को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध थे. लेकिन, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुरानी साम्राज्यवादी व्यवस्था के उत्तराधिकार के रूप में अकूत पूंजी के बल पर अमेरिका का उदय होकर विश्व रंगमंच पर छा जाना सोवियत संघ के लिए संभावनाओं को सीमित कर दिया था. इस नये और बदलते वैश्विक व्यवस्था से विकसित और समृद्ध राष्ट्र ही नहीं, दुनिया के नवस्वतंत्र देशों में भी एक नई व्यवस्था के निर्माण की संभावना की तलाश हो रही थी.

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात दुनिया वही नहीं रह गई थी, जो इसके पूर्व थी. सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना में बदलाव का यह दौर अपने चरित्र से ही वैश्विक था. इस नये परिवेश में अमेरिका ने भी पुरानी साम्राज्यवादी व्यवस्था के विपरीत नव-साम्राज्यवाद की नीति के तहत दुनिया भर में अपने सैन्य ठिकाने बनाने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर अधिक से अधिक राज्यों के साथ सैनिक समझौते किये.

इसी की कड़ी में पश्चिमी यूरोप के साथ नाटो, लैटिन अमेरिका के देशों के साथ रायो पैक्ट, अस्ट्रेलिया और न्युजीलैंड के साथ अनजस, मध्यपूर्व देशों के साथ सेंटो (बाद में बगदाद पैक्ट) तथा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ सीटो जैसे सैन्य संगठनों का निर्माण हुआ, जो वास्तव में सोवियत संघ और साम्यवाद को नियंत्रित करने के लिए ही बनाये गये थे. प्रत्युत्तर में सोवियत संघ ने भी पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ मिलकर वारसा पैक्ट की स्थापना की थी.

महाशक्तियों की इस सैनिक प्रतियोगिता के साथ ही जासूसी, वैचारिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक क्षेत्र में भी वैश्विक कार्यक्रम चले. लोकतंत्र के नाम पर अमेरिका एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उन देशों के विश्वविद्यालयों को भी अपना लक्ष्य बनाया, जहां साम्यवादी विचारधारा के प्रतिकार के लिए विश्वविद्यालयों को बेतहाशा आर्थिक अनुदान दिये गये. इन देशों के प्रोफेसरों, अध्येताओं और अनुसंधानकर्ताओं को छात्रवृत्तियां सुलभ कराई गईं. इस तरह से अमेरिका बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर अपने को सुदृढ़ करने में सफल हुआ.

दुनिया के अधिकतर विश्वविद्यालयों में साम्यवाद और मार्क्सवाद के खिलाफ एक मुहिम ही चलायी गयी. भारत भी इस अमेरिकी बौद्धिक और वैचारिक षड्यंत्र का शिकार हुआ. साठ के दशक में अमेरिका ने अपने जासूसी संगठन सीआईए के माध्यम से भारतीय बुद्धिजीवियों और नेताओं को भी लक्षित किया, और उन्हें आशातीत सफलता भी मिली. अपने विद्यार्थी और शिक्षक जीवन में मैंने इसे गौर से देखा है कि भारतीय विश्वविद्यालय क्रमशः धीरे-धीरे यथास्थितिवाद, दक्षिणपंथ और प्रतिक्रियावाद के बौद्धिक अड्डों के रूप में रूपांतरित हो गये.

भारत में भी आजादी के बाद से ही अमेरिकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप किसी न किसी रूप में होता रहा. जवाहरलाल नेहरू ने इसे भारत की विदेश नीति के लिए असंलग्नता की नीति लागू कर अमेरिकी दबाव और हस्तक्षेप को कम करने की कोशिश जरूर की, पर इसमें उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली. खुद कांग्रेस कोई समाजवादी या क्रांतिकारी दल न होकर एक दकियानूसी, दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी शक्तियों का जमघट था, जो एक मामले में एकमत थे कि भारत में किसी भी हाल में साम्यवादी क्रांति न हो, और इसकी संभावनाओं को खत्म करने के लिए उनलोगों ने तत्कालीन जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, रामराज्य परिषद, हिन्दू महासभा और यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ भी हाथ मिलाने से नहीं चुके.

नेहरू के शासनकाल में ही हिन्दी-चीनी भाई भाई तथा संसद में कम्युनिस्टों के बढ़ते प्रभाव और खासकर केरल में संसदीय तरीके से साम्यवादी सरकार के गठन से चिंतित सारे लोग एकजुट होकर इसके खिलाफ एक मुहिम ही छेड़ दी.

सबसे पहले तो तिब्बत का राग अलापना शुरू किया. उन्होंने बिना किसी आधार के ही नेहरू को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा कर दिया कि उन्होंने तिब्बत को चीन को दे दिया, मानो तिब्बत भारत का ही था. विश्व इतिहास और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की थोड़ी-सी भी जानकारी रखने वाले यह जानते हैं कि तिब्बत सदियों से चीन का भाग रहा है. भारत को उससे कभी भी कोई लेनादेना नहीं था.

हां, इतना जरूर था कि चीन के कमजोर होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने अपने भारतीय उपनिवेश की सुरक्षा के लिए तिब्बत के ल्हासा में एक पुलिस चौकी स्थापित किया था, और वह चौकी भी आजादी के बाद हटा लिया गया था. पूरी भारतीय राजनीति ही साम्यवाद के खिलाफ थी.

नेहरू को बदनाम करने और भारत में साम्यवाद को रोकने के लिए जो कुछ भी संभव हो सकता था, उन्होंने किया. हिन्दी-चीनी भाई भाई के दौर में चाऊ एन लाई के सीमा समझौते के प्रस्ताव को भी उन लोगों ने नेहरू पर दबाव बनाकर रद्दी की टोकरी में डलवा दिया. यहां तक कि तिब्बत में साम्यवादी सरकार के प्रभाव को विस्तारित करने की योजना को भी उन लोगों ने ऐसा प्रचारित किया मानो चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया है.

यह सभी जानते हैं कि चीन लंबे समय तक खुद ही विश्व साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का शिकार रहा है, और न चाहते हुए भी उसे साम्राज्यवादी शक्तियों को रियायतें देने के लिए मजबूर होना पड़ा था. 1950 में साम्राज्यवादी क्रांति के बाद पासा पलट गया था, और दक्षिण-पूर्व चीन के बाद साम्यवाद का प्रसार चीन के भीतरी इलाकों सहित तिब्बत में भी किया जाने लगा.

इसी बीच चीन के धार्मिक प्रधान दलाई लामा को चीन से भगाकर भारत लाया गया, जो चीन के साथ भारत के रिश्ते में एक स्थायी खटास पैदा करता रहा है. और, यह सब हुआ अमेरिका की शह पर. आखिर अमेरिका दलाई लामा को अमेरिका क्यों नहीं ले गया ? वहां तो वे ज्यादा आराम से सुरक्षित रह सकते थे. वास्तव में अमेरिका के लिए यह बर्दाश्त करना मुश्किल था कि चीन के साथ भारत के रिश्ते मित्रतापूर्ण हों. वह शुरू से ही सोवियत संघ, चीन और भारत के बीच मित्रता का विरोधी रहा है.

इसी के साथ केरल में चुनाव के माध्यम से साम्यवादी दल की सरकार बन गई. यह तो भारतीय दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के लिए वज्रपात ही था. अब और बर्दाश्त करना उनके लिए संभव नहीं था. इसीलिए नेहरू को न सिर्फ चाउ एन लाई के समझौते के प्रस्ताव को ठुकराने के लिए मजबूर किया गया, बल्कि लद्दाख़ में सीमा का अतिक्रमण कर फारवर्ड पोलिसी को अपनाने के लिए भी मजबूर किया गया, और जिसका नतीजा था चीन के साथ युद्ध.

1964 के मई महीने में नेहरू की मौत के बाद स्थितियां इन दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के लिए और भी अनुकूल हो गईं. कांग्रेस के भीतर नेतृत्व का संघर्ष, जनता में व्यवस्था के खिलाफ बढ़ता आक्रोश और मोहभंग ने इन शक्तियों को आपस में एकजुट होने के लिए आसान परिस्थितियों को उपलब्ध करा दिया.

आजादी के बाद तो यह स्पष्ट हो गया था कि भारत अब वैसा ही नहीं रहने वाला है, जैसा आजादी के पहले था. इसी संभावना को ध्यान में रखकर आजादी के पहले ही भारतीय पूंजपति वर्ग ने सामंतवादी ताकतों के साथ ही धार्मिक संगठनों के साथ भी अपने मित्रतापूर्ण संबंध बना लिया था. भारतीय पूंजपति वर्ग ने यहां इतिहास की गति को उलटने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ा दिया था. सामंतवादी और प्रतिक्रियावादी शक्तियों से लड़ने की जगह उसने इन शक्तियों के साथ समझौता कर लिया. बिड़ला जैसा पूंजीपति देश भर में मंदिरों के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया, जो बिल्कुल ही अनपेक्षित था.

भारतीयों का जीवन वैसे भी सदियों से एकरस बना हुआ धर्म और ब्राह्मण के इर्दगिर्द ही घुमता रहा है. गांव का एक अनपढ़ ब्राह्मण भी गांव का सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति माना जाता रहा है. ब्राह्मण का छोटा बच्चा भी गांव के दूसरे जाति के बुजुर्गों से भी पांव लग्गी कराने का अधिकार रखता है. किसी ब्राह्मण को देखते ही ‘गोड़ लागूं पंडित जी’ का उच्चारण दूसरी जातियों के लोगों के लिए स्वाभाविक माना जाता रहा है  लोगों का सामान्य जीवन ब्राह्मण के हाथों में कैद था. गांव के लोगों की जिंदगी का वह नियंत्रणकर्त्ता था, और अब भी कमोबेश वैसा ही है.

पूजापाठ, धार्मिक कर्मकांड, अष्ठयाम, पर्व-त्योहार और शादी तथा श्राद्ध संबंधी सारे कार्य ब्राह्मण के इशारे पर ही होता था. इसके अलावा और कोई जीवन तो था नहीं. स्वावलम्बी भारतीय ग्रामीण जीवन का यही तिलस्म था, जो सदियों तक अक्ष्क्षुण रहा. नतीजा यह हुआ कि लोग किसी दूसरे विकल्प के बारे में सोचना भी छोड़ चुके थे. सदियों तक एक बंधी-बंधायी जिंदगी जीने वालों के लिए यह संभव ही नहीं था कि वे उससे अलग हटकर भी कुछ सोच सकते.

विकृत और पतनशील सामंती व्यवस्था का धार्मिक जड़ता के साथ सह मिलन ने इसे एक ऐसा अलंघ्य जीवन-पद्धति बना दिया था कि उससे अलग कुछ भी सोचना अपराध की श्रेणी में आता था. धर्म, ब्राह्मण, भूत-प्रेत, ओझा-गुणी और चढ़ावा तक ही उनकी जिंदगी सीमित थी. ब्राह्मण के मुंह से निकली हर बात मानने के लिए लोग मजबूर थे. दयनीय आर्थिक स्थिति से निजात पाने के लिए लोग गांव से बाहर निकले तो जरूर, पर यह सिर्फ कमाई तक ही सीमित था.

पढ़ाई का कुछ जोर चला तो वह भी सिर्फ नौकरी और कमाई तक ही सीमित रहा. सोच, विचार और बदलाव जैसी कोई भी बात नहीं थी. कहीं मंदिर का निर्माण होता हो, या यज्ञ का आयोजन हो, यह लोगों के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि थी. साधुओं, महंतो और इसी तरह के अन्य पेशेवर धार्मिक व्यक्तियों के लिए लोगों के मन में अपूर्व श्रद्धा रही है.

हमारे भोजपुरिया इलाके में बहुत पहले एक त्रिदंडी स्वामी और करपात्री महाराज हुआ करते थे, जो घुम-घुमकर यज्ञ कराते थे. इसी तरह के न जाने कितने ही स्वामी या बाबा हर साल किसी न किसी गांव-जवार में दर्शन देते थे. ऐसे अधिकतर बाबा मूलतः जाहिल ही होते थे, पर लोग उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ते थे.

बहुत पहले जब मैं हाई स्कूल में था, तो पटना में एक बाल योगेश्वर का प्रवचन आयोजित था, जिसे सुनने के लिए हमारे गांव से भी कुछ लोग आये थे. मेला, बाजार, तीर्थाटन और प्रवचन तक सिमटी उनकी जिंदगी में किसी व्यापक और क्रांतिकारी परिवर्तन की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती थी. लोगों की यही विकलांग मानसिकता, बौद्धिक जड़ता और धार्मिक सड़ांध आज भी कमोबेश मौजूद है.

यहां तक कि उच्च शिक्षित प्रोफेसर, डाक्टर, इंजीनियर, अफसर, साहित्यकार और अन्य लोगों के लिए भी यह संभव नहीं हो सका कि मानसिक स्तर पर वे क्रांतिकारी विचारों को अपनी जिंदगी में स्वीकार और अंगीकार कर सकें. भारतीय जन जीवन की इस मानसिक विसंगतियों और जड़ता का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए संघ ने इसे अपना राजनीतिक रणनीति ही बना लिया.

यह संगठन आजादी के बाद से ही आमलोगों के मन में मुसलमानों के प्रति शिकायत को स्थायी नफरत में बदलने की योजना पर काम करता रहा है. यह आमलोगों को आज दिखाई दे रहा है, पर वास्तविकता तो यह है कि संघ लगातार ही अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्रियाशील रहा. देश के बंटवारे से लेकर कश्मीर, ज्यादा बच्चे पैदा करना, समान नागरिक संहिता तथा ऐसे ही न जाने कितने ही अनर्गल बातों को लगातार लोगों के मस्तिष्क में भरकर उन्हें गुमराह करते रहे.

अपनी दूरगामी योजना का सर अंजाम देने के लिए ही उन्होंने राममनोहर लोहिया के माध्यम से कांग्रेस के खिलाफ विरोधी दलों का एक संयुक्त मोर्चा बनवाने में सफल रहे, और जिसके परिणामस्वरूप 1967 में कई राज्यों में कांग्रेस विहीन संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी. राजनीति में उठापटक का खेल यूं ही चलता रहा. वैचारिक प्रतिबद्धता धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई. राजनीतिक स्वार्थ और धनार्जन ही राजनीति का मुख्य आकर्षण हो गया.

जो कुछ भी उम्मीद बची थी, जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति की आग में स्वाहा हो गया. ‘इंदिरा गांधी को हटाओ’ के नारे के साथ ही विभिन्न विरोधी विचारधाराओं का मिलन हुआ, और जनता पार्टी के नाम से एक पार्टी भी बनी. आपातकाल की घोषणा का राजनीतिक फायदा उठाते हुए भानुमती के कुनबे के रूप में जनता पार्टी की सरकार वैचारिक प्रतिबद्धता से शून्य और मूलतः प्रतिक्रियावादी मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बड़े ही तामझाम के साथ बनी. पर, वैचारिक विश्रृंखलता और अराजकता ने इस जनता पार्टी और जनता सरकार को तीन साल के भीतर ही निगल लिया.

यहां से फिर इंदिरा और राजीव गांधी की सरकार बनी, पर वैचारिक और कार्यक्रम का आधार खत्म होता गया. धर्म और धार्मिक बाबाओं के साथ बेहतर संबंध इंदिरा गांधी के भी बने. देश में न जाने कितने ही बाबा, योगी, संत और महंत बनते रहे. महर्षि योगी, देवेंद्र ब्रह्मचारी, पुटपर्ती के साईं बाबा, आशाराम, देवरहा बाबा और न जाने कितने ही बाबाओं का आगमन होता रहा. लोगों की भीड़ उनके दर्शन और चरण-रज प्राप्त करने के लिए दौड़ती रही. बाबाओं के आशीर्वाद और कृपादृष्टि पाने के लिए लोग अपना सब कुछ कुर्बान करने के लिए भी तैयार होते रहे. जगह-जगह प्रवचनकर्ताओं को बुलाया जाता रहा. ऐसी जगहों पर पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की भीड़ ज्यादा देखी गई.

समाज, शिक्षण-संस्थानों और सार्वजनिक मंच से आधुनिकता, प्रगतिशीलता, बौद्धिकता, साहित्य, कला और दर्शन के प्रति वैचारिक वाद-विवाद और संवाद की प्रक्रिया कम से कमतर होती गई. स्वस्थ मनोरंजन और खेलकूद का आयोजन धीरे-धीरे खत्म होने लगा, और इन सभी जगहों पर धार्मिक कर्मकांड ने अपना आधिपत्य जमा लिया. नेताओं ने भी इस बदलाव में अपना बखूबी योगदान दिया. वे भी विद्वत समाज से कटकर बाबाओं के दरबार में ज्यादा दिखाई पड़ने लगे.

उधर, मंडलवाद की काट के लिए कमंडलवाद ने अपनी सक्रियता के साथ ही आक्रामकता को भी बढ़ाया, और राममंदिर के नाम पर एक धार्मिक बवंडर पैदा किया गया, जिसकी चपेट में पूरा भारत ही आ गया. लोगों के बीच बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी, व्यवस्था से मोहभंग और जिंदगी की बदतर होती परिस्थितियों ने लोगों को भावशून्य बना दिया.

परीक्षा में नकल करने की छूट देकर युवा पीढ़ी को बर्बाद कर दिया गया. राजनीति के अपराधीकरण के साथ ही नयी आर्थिक विश्व व्यवस्था के नाम पर उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण ने तो बाजारवाद के माध्यम से जैसे अनैतिकता, स्वच्छंदता, लूट, दलाली और तस्करी के साथ ही संविधानवाद और लोकतंत्र को भी अप्रासंगिक बना दिया.

इतिहास के अंत और सभ्यताओं के संघर्ष के साथ ही बेहतर विश्व व्यवस्था की उम्मीद भी खत्म कर दी गई. नयी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश में विश्व पूंजीवाद ने अपने को आतंकवाद और धार्मिक कट्टरता के साथ भी एक्कीकृत कर लिया है. आज राजसत्ता, अर्थसत्ता और धर्मसत्ता का संश्रय ही वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था का तारनहार बनकर उभरा है.

ऐसी परिस्थिति में भारत में भी बाबाओं, साधुओं, संतों, महंतों और धर्माचार्यों का जलवा हमारे सामने जिस रूप में उपस्थित हो रहा है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. आश्चर्य की बात यह है कि इन धार्मिक बाबाओं को खुला मैदान मिल गया है. कहीं कोई अवरोध नहीं, कोई प्रतिकार नहीं, और न ही कहीं कोई चुनौती है. यह स्थिति ही देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.

Read Also –

बिहार में भाजपा की जमीन तैयार करने में जुटा ‘बाबा’
धार्मिक उत्सव : लोकतंत्र के मुखौटे में फासिज्म का हिंसक चेहरा 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

‘अलेक्स्ज़ान्द्र कोलंताई’ : मातृत्व का ‘राष्ट्रीयकरण’ करने वाली बोल्शेविक क्रांतिकारी…

Next Post

सुंदर लड़कियां

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

सुंदर लड़कियां

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

और तभी से अमेरिकी सेना सुरंगों से बहुत डरती है

March 15, 2026

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.