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Home गेस्ट ब्लॉग

कॉमेडियन जेलेंस्की की ही तरह कॉमेडियन मोदी के राष्ट्रवाद की क़ीमत भारत को चुकानी होगी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 1, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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कृष्णन अय्यर

ट्रंप अमेरिका और मोदी को लगातार निशाने पर रखे हैं. नया बम्बू आया है. पहले तो ईरान के कच्चे तेल पर बैन लगाया तो भारत को अमरीका का महंगा तेल ख़रीदने की मजबूरी आई. अब ट्रम्प ने भारत की 4 तेल कंपनियों पर भी बैन लगा दिया ताकि भारत ईरान का तेल ना ख़रीद सके. ऐसा कमज़ोर PM जो ख़ुद के नागरिकों को महंगाई से ना बचा सके उसे PM रख कर क्या फ़ायदा ? बोलो मोदी : अब की बार ट्रम्प सरकार…

‘फाइनेंसियल एक्सप्रेस’ के हवाले से लिख रहा हूं…ग़ौर फ़रमाइए – टेस्ला यानी ट्रम्प की इलेक्ट्रॉनिक कार की बिक्री 45% डाउन हो चुकी है. चीन की इलेक्ट्रॉनिक कार की बिक्री पूरी दुनिया में रफ़्तार पकड़ चुकी है…बस यही वजह है कि ट्रम्प ने चीन से पंगा नहीं लिया और चीन को दोस्त बताया है. जो भारत नहीं कर पाया वो चीन ने कर दिखाया है…पर टेस्ला की बिक्री डाउन क्यों हुई ?

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तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

~ एलन मस्क की इमेज ख़राब हो रही है
~ मस्क को लोग सियासतदान मानते हैं
~ मस्क को लोग ‘अविष्कारक’ मानते थे
~ पर अब ‘दक्षिणपंथी’ मानते हैं
~ मस्क के कस्टमर पोलाराईज़ हो रहे हैं

एलन मस्क ने जर्मनी में दक्षिणपंथी पार्टी को सपोर्ट किया..और जर्मनी में मस्क के कार की बिक्री गिर गई..जबकि जर्मनी मस्क के लिए दूसरा सब से बड़ा मार्केट था. जर्मनी में अब चीन की इलेक्ट्रिक कार (EV) का दबदबा है. यूरोप में चीन की ग्रोथ में तेज़ी है..

यूरोपियन यूनियन ने मस्क को यूरोप की राजनीति में दख़लअंदाज़ी के लिए होशियार किया है..जबकि चीन के राष्ट्रपति का किसी के ख़िलाफ़ कोई बयान नहीं आता. इलेक्ट्रिक कार (EV) भी मस्क से सस्ती है..तो ख़रीददार चीन का माल ख़रीद रहे हैं.

मस्क अमरीका की अवाम के बीच भेदभाव वाली बात कर रहा है, अजीब ओ ग़रीब ट्वीट कर रहा है..लोगों को धमका रहा है, तौहीन कर रहा है..इसी वजह से मस्क को ‘ज़हरीला ब्रांड’ कहा जाने लगा है..लोग कह रहे हैं कि नफ़रती ब्रांड से आइंदा दूर रहेंगे. अगर हम भारत के मुत’ल्लिक़ देखे तो अदाणी, अंबानी भी मस्क वाली हरकतें कर रहे हैं.

अदाणी अंबानी के घोटाले, बैंक लूट, मोदी के साथ ज़ाहिर तौर पर रहना और मुल्क में नफ़रत फैलाना सब कुछ ने उनके व्यापार पर भी असर डाला है. कोई भी उद्योगपति सियासत से जुड़कर व्यापार में क़ामयाब नहीं हुआ है..और कोई भी सियासतदान नफ़रत और भ्रष्टाचार से विकास करने में क़ामयाब नहीं हुआ है.

मुझे भारत से मतलब है. भारत की अर्थव्यवस्था को नफ़रत, भ्रष्टाचार, मोदी और उद्योगपतियों ने खोखला बना दिया है. मैं चाहता हूं कि ऐसे लोगों को सज़ा मिले और भारत की तरक़्क़ी जारी रहे..

घटिया स्वामी (सुब्रमण्यम स्वामी) इस वक़्त सही सवाल पूछ रहा है कि जब ट्रम्प बोला कि मोदी को 21 मिलियन डॉलर दिए तो मोदी ख़ामोश क्यों है ? मोदी ने ट्रम्प को दोस्त माना है. तो मोदी बोले कि उस का दोस्त झूठ बोल रहा है.

घटिया स्वामी कहता है : ट्रम्प ने भारत सरकार को पैसे देने की बात नहीं की है..ट्रम्प ने मोदी को पैसे देने की बात की है जो बहुत बड़ा मसला है. घटिया स्वामी पूछता है कि ये पैसे मोदी ने कहां रखे हैं ?मोदी बताने को मजबूर है. ऐसे पैसों पर कुछ कोर्ट की रूलिंग भी है.

दोस्तों, अमरीका से पैसे ले कर मोदी ने चुनाव जीता है, ये बात सामने आ चुकी है..इस मुद्दे’ को लगातार उठाते रहिए क्योंकि ये बात EVM से भी जुड़ी हुई है. स्वामी घर का भेदी है..लंका ढाने में काम आएगा.

यूक्रेन जंग किसी भी वक़्त ख़त्म होना मुमकिन है. और यूक्रेन जंग ख़त्म होने के बाद भारतीय रुपया और गिरेगा. गिरने का क़िस्सा बाद में लिखूंगा. ट्रम्प को यूक्रेन जंग में अमरीका के ख़र्च हुए 500 बिलियन डॉलर वापिस चाहिए..और इसी मुत’ल्लिक अमरीका, रूस चीन में लगभग एक समझौता हो चुका है.

Forbes के हवाले से लिख रहा हूं. यूक्रेन के पास 13 ट्रिलियन डॉलर के ‘रेयर अर्थ मिनरल’ हैं. रूस और यूक्रेन की जंग की सब से बड़ी वजह यही थी. ($1 ट्रिलियन=87 लाख करोड़ रुपये). रूस और चीन मिल कर यूक्रेन का आधा रेयर अर्थ मिनरल लूट चुके हैं..इसी मिनरल के बदले चीन रूस की जंग में मदद कर रहा है.

ट्रम्प ने बोला कि मुझे ज़्यादा नहीं सिर्फ़ 500 बिलियन का मिनरल दे दो और अमरीका इस जंग से बाहर हो जाएगा..ज़ेलेंस्की को ट्रम्प ने लात मार दी है.

जापान और ताइवान की ‘चिप’ बनाने की कंपनियां ऑलरेडी रेयर अर्थ मिनरल प्रोसेसिंग प्लांट अमरीका में लगाने की तैयारी कर रही है. सरकारी तौर पर ऐलान हो चुका है. हालांकि अमरीका को यह मिनरल मिलने पर चीन को नुक़सान मुमकिन है, पर पुतिन ने टैरिफ पर कुछ सेटिंग करवाई है.

अगर अमरीका को यह मिनरल मिलते हैं तो चीन पर टैरिफ की कहानी रुकेगी और ‘यूरोपियन यूनियन’ झक मारकर अमरीका में मैन्यूफैक्चरिंग करेगा. ट्रम्प रोज़ बोलता है कि यूरोप अमरीका को लूट रहा है…अमरीका यूरोप के साथ व्यापार घाटा बर्दाश्त नहीं करेगा. वैसे भी यूरोप इस वक़्त दिक़्क़त में है.

रेयर अर्थ मिनरल चिप, AI, ड्रोन, स्पेस और दूसरी टेक्नोलॉजी में काम आता है. अगर डील हो गई तो अमरीका, रूस और चीन का दबदबा ऐसा बनेगा कि दुनिया सोच भी नहीं सकती. ये तीनों देश मिल कर दुनिया बांट लेंगे. पूरी दुनिया का व्यापार कंट्रोल करेंगे. ट्रम्प को चीन और रूस से कोई लफड़ा नहीं चाहिए. ट्रम्प को सिर्फ़ मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट चाहिए.

यूक्रेन में पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका को देखिए..आप को शायद भारत का ख़तरा समझ आए. यूक्रेन का प्रेसिडेंट ज़ेलेंस्की पेशे से एक जोकर/कॉमेडियन हुआ करता था. इस जोकर ने पूरे यूक्रेन को ‘राष्ट्रवाद’ के जुनून में बहा दिया. रुस की संस्कृति के ख़िलाफ़ यूक्रेन की नफ़रत इस लेवल पर पहुंची कि जंग हो गई. यूक्रेन में भूखमरी का निज़ाम क़ाबिज़ हो गया.

जंग में अमरीका ने यूक्रेन को $500 बिलियन डॉलर की मदद की..इस के बावजूद यूक्रेन का एक बड़ा हिस्सा रूस के क़ब्ज़े में चला गया. इस हिस्से में यूक्रेन के 53% मिनरल हैं, जिसे रूस और चीन ने बांट लिए. चीन की इकॉनमी मज़बूत हुई और रूस ने सस्ता तेल बेच कर अरबों डॉलर कमा लिए.

अब आता है ट्रम्प. ट्रम्प ने अमरीका के $500 बिलियन यूक्रेन से वापिस मांगे..यूक्रेन के पास डॉलर है नहीं. तो ट्रम्प ने बोला कि अमरीका को $500 बिलियन का मिनरल दे दो..रूस चीन से जंग रुकवा दूंगा..पर रूस ने यूक्रेन की जो ज़मीन क़ब्ज़ाई है वो यूक्रेन को वापिस नहीं मिलेगी.

ट्रम्प इतने पर नहीं रुका. ट्रम्प ने यूक्रेन को बोला कि जंग रुकने के बाद यूक्रेन को नए तौर से बनाने का काम भी अमरीका करेगा..यानी $200 बिलियन और लेगा. ज़ेलेंस्की सर झुका कर अमरीका जाने और मिनरल का समझौता करने पर मजबूर है..क्योंकि अब कोई रास्ता नहीं बचा.

राष्ट्रवाद की क़ीमत यह है कि यूक्रेन के 2 टुकड़े हो गए, यूक्रेन लूट गया और आने वाली यूक्रेनी नस्लें क़र्ज़दार/ग़ुलाम बन गई. ज़ेलेंस्की ने अमरीका को बाप माना था. मोदी भी अमरीका को ‘फ्रेंड’ मानता है..पर अमरीका मोदी को क्या मानता है ?

मोदी ने भारत को अमरीका के जबड़ों की जानिब धकेल दिया है. चीन भारत पर नज़रें बनाए हुए है. भारत का व्यापार ख़त्म है..और ट्रम्प भारत से मनचाही मांगे मनवा रहा है. राहुल गांधी ने बोला था कि अमरीका से ख़ुद की शर्त पर बात करो..पर मोदी तो अदाणी/ट्रम्प की शर्त में जकड़ा जा चुका है..राष्ट्रवाद की क़ीमत भारत को भी अदा करनी है.

शेयर बाज़ार में ख़ून की मौजों की रवानगी है. इसकी वजूहात सिर्फ़ फाइनेंसियल नहीं है..इस वक़्त शेयर बाज़ारों पर सियासी वजूहात हावी है. चलिए समझते हैं –

  • ट्रम्प ने बोला था कि मोदी को चुनाव जीतने/वोटर टर्न आउट बढ़ाने 21 मिलियन डॉलर दिए गए थे..यहां तक सही था.
  • ट्रम्प का एक और बयान था कि USAID एक ‘रिश्वत की स्कीम’ है..ये बहुत बड़ा धमाका था. यहीं से खेल बिगड़ना शुरू’ हुआ.

सवाल आया कि क्या ट्रम्प ने मोदी पर ‘अमरीका से रिश्वत’ लेने का इल्ज़ाम लगाया है ? ये सवाल बहुत बड़ा बन चुका है. शेयर बाज़ार हर दम आगे की सोचता है..हर वाक़ि’ए के आइंदा के नतीजों पर बाज़ारों की चाल बनी रहती है. शेयर बाज़ार यह मान चुका है कि ट्रम्प ने मोदी पर डायरेक्टली/इंडिरेक्टली अमरीका से रिश्वत लेने का इल्ज़ाम लगा चुका है..लोगों के दिमाग़ में चिपक गया है..पर मोदी, सरकार, मीडिया ख़ामोश है..यह ख़ामोशी शेयर बाज़ारों को और ज़्यादा बेचैन कर रही है.

शेयर बाज़ार को महसूस हो रहा है कि पहले से अदाणी, अंबानी जैसे घोटाले हैं..अब अगर सीधा PM मोदी पर रिश्वतख़ोरी की बात आगे बढ़ती है तो आइंदा क्या होगा. बाज़ारों में ऐसी सोच है कि ट्रम्प का ख़ुलासा अभी अधूरा है..ट्रम्प इस मुद्दे पर आइंदा भी कुछ बोलेगा..और उस बयान का नतीजा बहुत बुरा होगा.

गोदी मीडिया भारत की ‘अवाम को गुमराह कर सकती है..पर विदेशी/देशी HNI जैसे बड़े इन्वेस्टर्स को इन्वेस्ट करने पर मजबूर नहीं कर सकती है..’तब तक बेचो जब तक ज़ीरो हो जाए’ ऐसी सोच है. इस के अलावा जिस तरह से भारत के विदेशी रिश्तों में गिरावट आ रही है, उस से बाज़ारों में पैनिक है.

नफ़रत, हिंसा की सियासत ने एक ‘इकनोमिक वैक्यूम’ बनाया है. बाज़ार चाहता है कि यह वैक्यूम ख़त्म हो..क्योंकि ये सीधे सीधे इन्वेस्टमेंट पर असर डालता है. कुल मिला कर बाज़ारों का मानना है कि मोदी की इमेज और सरकार का इक़बाल दोनों ख़तरे में हैं..इस वक़्त हर फ़र्ज़ी प्रचार बाज़ारों में और पैनिक बनाएगा. विदेशों में भारत की हवा ख़राब हो चुकी है..देश में वो जगह नहीं बची कि विदेशी धक्का संभाल ले..पिक्चर अभी बाक़ी है.

राहुल गांधी ने संसद में यही तो बोला था कि अमरीका के साथ ख़ुद की शर्त पर मैन्युफैक्चरिंग की बात करो..प्रॉजेक्ट डालो तो बात बनेगी. पर मोदी तो अदाणी/ट्रम्प की शर्त में जकड़ा जा चुका है..राष्ट्रवाद की क़ीमत भारत को भी अदा करनी है. अब भी राहुल गांधी की बात मान लो..वरना झोला उठाना तो है ही..

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