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महिला कामगारों की बड़ी तादाद और तड़प-तड़प कर मरती महिलाएं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 14, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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महिला कामगारों की बड़ी तादाद और तड़प-तड़प कर मरती महिलाएं

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

हाल के दशकों में असेम्बलिंग के क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ते गए हैं और कुछ खास उद्योगों से जुड़ी कंपनियों की कोशिश रही है कि इसमें अधिक से अधिक महिलाओं को लगाया जाए. असेम्बली लाइन में कहीं-कहीं तो महिला कामगारों का अनुपात 70 प्रतिशत से अधिक है- अपने काम के दौरान वे क्रम से खड़ी रहती हैं, अपना निर्धारित काम करती हैं और काम के दौरान आवश्यकता पड़ने पर न उन्हें पानी पीने का अवकाश मिलता है न पेशाब करने का. धीरे-धीरे अनेक महिलाएं किडनी रोगों की शिकार होने लगती हैं, कुछ को मासिक धर्म संबंधी बीमारियां घेर लेती हैं, कुछ अन्य रोगों की चपेट में आ जाती हैं. फिर, वे काम के लायक नहीं रह जातीं और तब कंपनी उन्हें नौकरी से निकाल देती है. अधिकतर को कोई मुआवजा नहीं मिलता, पेंशन आदि की बात तो भूल ही जाइये.

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इलेक्ट्रॉनिक प्लांट्स जैसी इकाइयों में भी महिला कामगारों की बड़ी तादाद होती है, जहां काम के दौरान उन्हें मानक सुरक्षा कवच देने में कंपनियां कंजूसी करती हैं और वे जहरीले रसायनों के संपर्क में आती हैं. यह संपर्क उन्हें आंखों और फेफड़े की बीमारियों सहित कई असाध्य रोगों की सौगात देता है. फिर, कंपनी उन्हें कुछ दे-दिला कर नौकरी से बाहर कर देती है.

नौकरी छूटने और रोगग्रस्त होने के बाद अधिकतर महिलाएं तड़प-तड़प कर मर जाती हैं क्योंकि अधिकतर मामलों में ये ऐसे निर्धन देशों की नागरिक होती हैं, जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र नाकारा होता है और निजी अस्पतालों में इन जटिल रोगों का महंगा इलाज करवाने की इनकी हैसियत नहीं होती.

इलेक्ट्रॉनिक प्लांट्स, असेम्बलिंग, खिलौना उद्योग आदि में महिला कामगारों को बहाल करने के लिये कंपनियां उत्सुक रहती हैं क्योंकि वे अधिक अनुशासित रहती हैं, काम के प्रति उनका समर्पण अधिक रहता है, पुरुषों से कम काम वे नहीं करतीं लेकिन उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम पारिश्रमिक मिलता है. अधिकतर मामलों में उन्हें यूनियन बनाने का अधिकार हासिल नहीं होता और कम पढ़ी-लिखी होने के कारण उन्हें अपने कानूनी अधिकारों, जो दिन ब दिन तमाम सरकारें उनसे छीनती जा रही हैं, की जानकारी भी नहीं होती.

हालांकि, पढ़ी-लिखी होने से भी कोई अधिक फर्क नहीं पड़ता और जान बूझ कर संवेदनहीन बनता जा रहा तंत्र उनके शोषण के हर तरीके आजमाता रहता है. निजी स्कूलों में महिला शिक्षकों की बड़ी संख्या है. बेहद कम वेतन पर उनसे लगातार काम लिया जाता है, स्कूल की टाइमिंग शुरू होने से खत्म होने तक वे इस क्लास से उस क्लास तक हांफती-दौड़ती रहती हैं, लेकिन, एक महिला होने के नाते जो उनकी दैहिक समस्याएं होती हैं, उनके साथ प्रबंधन की कोई संवेदना जुड़ी हुई नहीं होती. 95 प्रतिशत निजी स्कूलों में मातृत्व अवकाश नाम की कोई चीज नहीं होती या तो उन्हें बिना वेतन के अवकाश दिया जाता है या फिर नौकरी से ही उनकी छुट्टी कर दी जाती है.

महिला-पुरुष बराबरी की बातें करने वाले इस दौर में महिलाएं बड़ी संख्या में निजी सुरक्षा एजेंसियों, हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र आदि में भी काम करने लगी हैं. महिला होने के नाते उन्हें जो मानवीय सुविधाएं मिलनी चाहिये उसका कोई जिक्र तक वे नहीं कर सकती. यह जरूर है कि महिला होने के कारण रोजगार के इन क्षेत्रों में भी उनके साथ पारिश्रमिक के मामलों में भेद-भाव किया जाता है. अधिकतर मामलों में उनसे निर्धारित अवधि से अधिक समय तक काम करवाया जाता है और काम के घण्टों को लेकर वे आपत्ति दर्ज नहीं कर सकती.

घरेलू काम करने के लिये या यौन दासी बनाने के लिये बड़ी संख्या में महिलाओं की तस्करी होती है. वैश्वीकरण के दौर में यह अवैध कारोबार निरंतर फलता-फूलता गया है क्योंकि धनी देशों में निर्धन देशों की महिलाओं की मांग बढ़ती ही जा रही है. जिन देशों की महिलाओं के साथ ऐसा होता है उनकी सरकारें विदेशी मुद्रा के लालच में इन अवैध और अमानवीय गतिविधियों से न सिर्फ अपनी आंखें मूंदे रहती हैं बल्कि कुछ मामलों में तो इन्हें अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन तक मिलता है.

भारत उन देशों की अग्रणी पंक्ति में है जहां की स्त्रियों को झूठे सब्जबाग दिखा कर अवैध तरीके से धनी देशों में ले जाया जाता है. चूंकि यह पूरी प्रक्रिया ही अवैध होती है इसलिये उनका कोई सरकारी रिकार्ड नहीं होता और इस कारण विपत्ति में पड़ने पर उन्हें कोई कानूनी संरक्षण नहीं मिल पाता. यह जरूर है कि उनके द्वारा भेजी गई विदेशी मुद्रा से देश का खजाना समृद्ध होता है. पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों से सबसे अधिक संख्या में ऐसी महिलाओं की तस्करी होती है.

प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन माना जाता है कि अवैध तरीके से बाहर के देशों में भेजी गई महिलाओं का विदेशी मुद्रा भेजने में अच्छा-खासा योगदान ह. स्याह हाशिये पर की इन महिलाओं की स्थिति पर सेमिनार और विमर्श तो होते हैं लेकिन कोई ठोस कार्रवाई कभी नजर नहीं आती. जनवरी, 2014 में भारत से अवैध तरीके से मध्य यूरोप ले जाने वाली 22 महिलाओं को उनके तस्कर तूफान आने की आशंका से बीच पहाड़ों पर छोड़ कर भाग गए. वे सभी असहाय महिलाएं वहीं ठंड से सिकुड़-सिकुड़ कर मर गई.

बीते तीन-चार दशकों में जैसे-जैसे कंपनी राज वापस लौटता गया, नवऔपनिवेशिक दासता ने शोषण और त्रासदियों के नए-नए अध्याय रचने शुरू किए. महिलाएं और बच्चे इन त्रासदियों के सबसे आसान शिकार बने. नई सदी में विकास प्रक्रिया और नागरिक जीवन में महिलाओं की जितनी भागीदारी बढ़ी उसी अनुपात में उनका शोषण भी बढ़ा.

अतीत के स्त्री आंदोलनों और स्त्रीवादी विमर्शों ने जिन मूल्यों और आदर्शों की परिकल्पनाएं की, कुछ मामलों में उन्हें हासिल भी किया, नवउदारवादी व्यवस्था ने उन्हें सिर के बल खड़ा कर दिया. स्त्री विमर्श जो, अभिजात और सबाल्टर्न, तमाम महिलाओं की बातें करता था, वह धीरे-धीरे सबाल्टर्न के मामलों में किताबी बनता गया. मातृत्व अवकाश से कंपनी के इन्कार और एक दिन की छुट्टी मांगने पर तीन दिनों का वेतन काट लेने की धमकी…अंततः महिला सिक्युरिटी गार्ड की मौत की खबरें अखबारों में एक कोने में छपी और फिर विलुप्त हो गईं. कहीं कोई खास स्पंदन नहीं. ऐसी निष्क्रिय चुप्पियां विमर्शों के किताबी होते जाने का प्रमाण देने लगी.

महिला अधिकारों के लिये हुए आंदोलनों का एक समृद्ध इतिहास है जिसमें समाजवादी आदर्शों और आंदोलनों की बड़ी भूमिका है. किसी भी देश की सरकार ने इन अधिकारों को तोहफे की तश्तरी में सजा कर नहीं दिया बल्कि इन्हें हासिल करने के लिये लंबी लड़ाइयां लड़नी पड़ी. तब जा कर काम के घण्टों, स्त्रीत्व की गरिमा, मातृत्व की सुविधाएं आदि से जुड़े प्रावधान तय किये गए और उन्हें लागू किया गया.

कंपनी राज वापस लौटने के साथ ही ये तमाम अधिकार फिर से छीन लेने की कोशिशें शुरू हो गईं और इसमें कंपनियों को सरकारों का समर्थन भी मिलने लगा. आज महिला दिवस के दिन सरकारी स्तर पर जितने भी आयोजन हो रहे हैं, वे निर्धन कामगार महिलाओं के संदर्भ में पाखण्ड ही अधिक लगते हैं. किसी आंदोलन के समृद्ध इतिहास के विपन्न वर्त्तमान में बदलने की त्रासद गाथा अगर देखनी है तो आप स्त्री अधिकारों के लिए हुए आंदोलनों का इतिहास और वर्त्तमान देख सकते हैं.

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