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NRC : क्या हम अपने हाथों से अपनी कब्र खोद रहे हैं ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 21, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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NRC : क्या हम अपने हाथों से अपनी कब्र खोद रहे हैं ?

जाबेदा बेगम 15 दस्तावेज देकर अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाईं

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जाबेदा बेगम 15 दस्तावेज देकर अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाईं. पैन कार्ड, बैंक अकाउंट, भू-राजस्व रसीद, 1966 से 2015 तक की वोटर लिस्ट में बाप का नाम, मां का नाम, दादा का नाम, दादी का नाम, गांव मुखिया के बनाए प्रमाण पत्र आदि इत्यादि. गुवाहाटी हाईकोर्ट ने जाबेदा बेगम का दावा खारिज कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा है कि पैन, वोटर लिस्ट में नाम, मुखिया का प्रमाण पत्र ये साबित नहीं करते कि जाबेदा बेगम उन्हीं मां-बाप की बेटी हैं, जिन्हें अपना मां-बाप बता रही हैं.

जाबेदा बेगम के भाई-बहन जिंदा हैं, प्रमाण पत्र देने वाला मुखिया भी जिंदा है. मुखिया ट्रिब्यूनल के सामने गवाही भी दे आया है कि ये फलाने की बेटी हैं और फलाने से शादी हुई है. तब भी जाबेदा विदेशी घोषित कर दी गई हैं.

जाबेदा बेगम ने ट्रिब्यूनल के सामने अपने पिता जाबेद अली से 1966, 1970, 1971 की मतदाता सूचियों को पेश किया, जिसमें उनका नाम था. अगर नाम था तो जाहिर है कि 1966 में जाबेद अली भारत में मौजूद थे, लेकिन ट्रिब्यूनल का कहना है कि जाबेदा अपने पिता के साथ उनके लिंक के संतोषजनक सबूत पेश नहीं कर पाई.

बुधवार सुबह इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पढ़ी थी. दिन में और कुछ जगह यह खबर देखी और सोचता रहा कि कोई यह कैसे साबित करेगा कि वह अपने बाप का ही बेटा है ? क्या जज साहब को साबित करना हो तो कर पाएंगे ? मेरे ख्याल से मैं तो नहीं कर पाऊंगा.

अपने बाप का बच्चा साबित करने के लिए वह कौन-सा दस्तावेज है, जिसकी भारत में जरूरत आन पड़ी है और जो आज तक इस दुनिया में बना ही नहीं ? अगर जाबेदा बेगम और उनके शौहर का लैंड रिकॉर्ड, वोटर लिस्ट, पैन, बैंक डिटेल्स आदि नागरिकता का आधार नहीं हैं, जिंदा लोगों की गवाही सबूत नहीं है तो कौन-सा कोहिनूर लोग पेश कर देंगे जिसके आधार पर उन्हें नागरिक मान लिया जाएगा ?

अगर 15 दस्तावेज पेश करके भी कोई अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पा रहा है तो क्या भारत के प्रधानमंत्री अपने माता-पिता से अपना संबंध साबित कर पाएंगे ? किस आधार पर ? वह कौन-सा कागज होगा ?

जाबेदा बेगम 50 साल की हैं. उन्होंने खेत बेचकर ट्रिब्यूनल में और हाइकोर्ट में केस लड़ा. अब उनके पास खाने तक को पैसे नहीं हैं. जाबेदा 150 रुपये रोज पर दिहाड़ी मजदूरी करती हैं और बीमार पति समेत पूरा परिवार पालती हैं. एक बेटी लापता है दूसरी अभी 5 साल की है.

जाबेदा बेगम जितना भी रो लें, नागरिकता साबित करने के लिए आंसुओं की बाढ़ पर कोई विचार नहीं होगा. उनके पिता को ब्रम्हपुत्र की बाढ़ में विस्थापित होना पड़ा था, उस पर भी कहां विचार किया गया !

आप जाबेदा को विदेशी कहकर फांसी दे दीजिए, लेकिन मैं सोच रहा हूं कि ऐसे बेसहारा और मजबूर लोगों को खून के आंसू रुलाकर भारत जैसे शक्तिशाली देश को क्या हासिल होगा ? कौन हिंदू है जो भारत देश को ऐसा क्रूर साम्राज्य बनाना चाहता है और जिसे खुश करने के लिए यह कानून लाया गया है ?

असम में जाबेदा जैसे 19 लाख लोग एनआरसी से बाहर हैं और इनमें 15 लाख हिंदू भी हैं. क्या हम अपने हाथों से अपनी कब्र खोद रहे हैं ?

  • कृष्णा कांत

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