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कोरोना संकट : लॉकडाउन और इंतजार के अलावा कोई ठोस नीति नहीं है सरकार के पास

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 21, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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कोरोना संकट : लॉकडाउन और इंतजार के अलावा कोई ठोस नीति नहीं है सरकार के पास

गुरुचरण सिंह

कोरोना की विपदा ने न केवल हमारे सिस्टम को नंगा कर दिया है बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की पैरवी करते बुद्विजीवियों के लिजलिजे मानवतावाद का मुखौटा भी नोच कर रख दिया है, जो कहते हैं कि आपदा के समय हमेशा की तरह सरकार के साथ खड़े दिखना चाहिए, उसके हाथ मजबूत करना चाहिए. ठीक यही बात तो दबी ज़ुबान में विपक्ष भी कहता है क्योंकि वह भी सरकारी प्रयासों का विरोध करते हुए नहीं दिखना चाहता. कृपया नोट करें ‘दिखना नहीं चाहता.’

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सच कहें तो मैं खुद इसी विचार का समर्थक हूं युधिष्ठिर की तरह – ‘आपस में लड़े अगर हम, वो सौ और हम बेशक पांच हैं लेकिन शत्रु से सामना होने पर तो हम एक सौ पांच हैं.’ लेकिन जब साफ-साफ दिख रहा हो कि हमारी इसी ‘चारित्रिक कमजोरी’ का लाभ सत्तारूढ़ दल अपने ही एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उठा रहा है तो भी क्या ऐसा ही करना चाहिए ? देश की अर्थव्यवस्था तो पहले ही तबाह हो चुकी है और हमारी आबादी का बंटवारा भी इंडिया और भारत में हो चुका है. सरकार भी कई बार साफ कर चुकी है कि वह इंडिया के साथ है, भारत के तो सिर्फ वोट चाहिए उसे, मगर उसकी चिंता का विषय तो इंडिया ही है, उसका यही नज़रिया इस संकट के समय भी उजागर हुआ है.

यही वजह है कि ‘भारत’ को महज़ चार घंटे का नोटिस देकर लॉकडाउन लागू कर दिया गया. सारे काम धंधे ठप्प हो जाने से अगर मजदूर-किसान भूखे मरते हैं तो मरते रहें, फिर भी कोई बस या रेलगाड़ी नहीं चलेगी जिसमें भूसे की तरह भर कर वे गांव तक पहुंच सकें अपनों के बीच. जाना जरूरी हो तो पैदल चले जाएं. इस बीच ‘इंडिया’ ताली थाली बजा कर, मोमबत्तियां जला कर ‘गो कोरोना, गो ‘ के नारे बुलंद करके जश्न मनाता रहता है.

कोरोना के लिए तय बजट से कई गुना अधिक राशि तो गैर-ज़रूरी मदों पर खर्च कर रही है सरकार। एक दिखने के लिए ही अगर साथ खड़े रहे तो उससे इसके बारे में सवाल कब पूछेंगे आप ? नहीं भैया, देख कर तो मक्खी नहीं निगली जाती. इधर धारा 144 लागू है, लॉकडाउन के चलते लोगों के लिए सड़क पर आना तक मुहाल है और उधर वह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और शाहीन बाग जैसे आंदोलन से जुड़े लोगों को जेल भी भेज रही है और मुस्लिम आबादी के रोजगार के सारे रास्ते बंद करने का एक बडी मुहिम भी चलाई जा रही है. फिर भी यह उम्मीद कि हम सरकार के हर गलत-सलत काम के साथ खड़े दिखाई दें ? हमसे तो न होगा ऐसा दिखावा.

WHO की चेतावनी के बावजूद सुरक्षा-किटोंं आदि के निर्यात पर सरकार जान-बूझकर कर खामोश बनी रही. जांच किट तो दूर अस्पतालों में डॉक्टरों / नर्सों के पास सर्जिकल मास्क तक नहीं थे. ‘इतनी गंभीर’ महामारी और उससे निपटने के लिए बजट तय हुआ 15 हज़ार करोड़ रु. यानि दिल्ली के राजपथ पर सरकारी कार्यालयों के पुन: निर्माण (सेंट्रल विस्टा) के लिए तय बजट बीस हजार करोड़ से भी कम !

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनाने के लिए ही सरकार ने 3000 करोड़ खर्च कर दिए थे !! पैसे की किल्लत का रोना रोने वाली सरकार एक NGO के तहत PM Care Fund बना कर तो लाखों करोड़ों जुटा सकती है लेकिन इस ‘राष्ट्रीय आपदा’ के समय सेंट्रल विस्टा के निर्माण और NPR को स्थगित करके उसके लिए निर्धारित बजट को इस्तेमाल नहीं कर सकती !

भले ही एक अमरीकी कंपनी का सीईओ इतनी आबादी को लक्षित करते हुए इसे ‘आपदा प्रबंधन का बेहतरीन नमूना कहता हो, अपने कर्मचारियों के सामने लेकिन हमारे लिए तो अव्यवस्था और सब कुछ ‘राम भरोसे’ छोड़ देने का इससे बेहतर उदाहरण हो ही नहीं सकता.

आपको अजीब नहीं लगता कि सरकार ही प्राइवेट लैब में इसकी जांच के लिए 4500 रुपये की फीस वसूलने की पैरवी सुप्रीम कोर्ट में करती है और सुप्रीम कोर्ट भी ‘सबके लिए फ्री जांच’ का अपना पिछला फैसला पलट देता है और ‘कुछ लोगों तक’ ही इसे सीमित रखता है ?

आपको अजीब नहीं लगता कि राज्य सरकारों को तो लोगों को रियायती दर पर गेहूं और चावल देने के लिए कहा जाता है लेकिन केंद्र सरकार उन्हीं राज्यों से कहती है कि उन्हें केंद्रीय भंडार से सरकार के खरीद मूल्य पर ही गेहूं और चावल लेने होंगे ? बता दें कि राष्ट्रीय आपदा कानून कहता है कि आपदा के समय देश की सरकार पूरे देश को भोजन आदि उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी निभाएगी.

आपको अजीब नहीं लगता कि लॉकडाउन बढाने के अलावा, सरकार के पास इंतज़ार के अलावा और कोई कारगर रणनीति है ही नहीं ?

आपको अजीब नहीं लगता कि इस कोरोना के चक्कर में
सभी सरकारी अस्पतालों में दूसरे सभी काम ठप्प पड़ गए हैं, ओ पी डी बंद पड़े हुए हैं. इसका मतलब यह हुआ कि जैसे अब बेरोजगारी के आंकड़े दिखने बंद हो गए हैं, वैसे ही इन अस्पतालों में दूसरे काम बंद होने के चलते भूख और कुपोषण से हुई मौतों के आंकड़े कभी भी सामने नहीं आएंंगे और न ही इलाज के अभाव में सामान्य और गंभीर बीमारियों से मरनेवालों के आंकड़े ही अब कभी सूर्य की रोशनी देख पाएंगे.

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