Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 18, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन

Ravish Kumarरविश कुमार, मैग्सेसे अवार्ड विजेता अन्तर्राष्ट्रीय पत्रकार

सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन को मौजूदा जगह से हटाने को लेकर याचिकाकर्ता के वकील हरीश साल्वे और सरकार के वकील अटार्नी जनरल तुषार मेहता ने जो दलीलें रखीं हैं उनमें आंदोलनों के भविष्य की झलक देखी जा सकती है. ये वही दलीलें हैं जो शाहीन बाग़ के समय से पब्लिक स्पेस में औपचारिक रूप लेती जा रही हैं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एस. ए. बोबडे की बेंच में सुनवाई के दौरान कही गईं बातों पर आने से पहले अदालत से बड़ी ख़बर यही आई कि मामले की सुनवाई वेकेशन कोर्ट को सौंपी जा रही है. किसान संगठनों के पक्ष के सुने बग़ैर अदालत ने आंदोलन को मौजूदा जगह से हटाने के आदेश देने से इंकार कर दिया. और चलते चलते कोर्ट ने अटार्नी जनरल से एक सवाल पूछ दिया कि क्या सरकार भरोसा दे सकती है कि बातचीत के जारी रहने तक कानून लागू नहीं होगा ? यह ऐसा सवाल था जिसके लिए शायद सरकारी पक्ष के वकील तैयार होकर नहीं आए थे. अटार्नी जनरल तुषार मेहता ने कह दिया कि इस जवाब के लिए सरकार से निर्देश लेना पड़ेगा. कोर्ट ने भी कह दिया कि किसान संगठनों को सुने बगैर कोई फैसला नहीं देंगे.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

अदालत में चल रही बहस के दौरान दी जा रही दलीलें किसान आंदोलन के भविष्य से टकरा रही थीं. क्या उन्हें इस जगह पर प्रदर्शन करने दिया जाएगा, जब उन्होंने हिंसा नहीं की है तो फिर हिंसा की बात क्यों उठ रही है ? अगर अदालत ने आंदोलन को इस जगह से हटाने के आदेश दे दिए तो क्या होगा ? दूसरा कोर्ट जो कमेटी बना रही है क्या वाकई उनके हक में होगी ? याचिकाकर्ता के वकील हरीश साल्वे की तरफ से कहा गया कि विरोध करने का मौलिक अधिकार है लेकिन यह दूसरे मौलिक अधिकारों से संतुलित होना चाहिए. हरीश साल्वे ने कहा कि आप शहर को बंदी बना कर मांगें नहीं मनवा सकते. दूध फल और सब्जी के दाम बढ़ रहे हैं क्योंकि बॉर्डर के पार से आते हैं. मूल्य वृद्धि अपूरणीय क्षति है.

मूल्य वृद्धि अपूरणीय क्षति है. क्या मूल्य वृद्धि सिर्फ किसान आंदोलन के कारण हो रही है ? पेट्रोल डीज़ल के दाम बेतहाशा बढ़ने से क्या जनता को नुकसान नहीं हो रहा है ? क्या गैस के सिलेंडर के दाम किसान आंदोलन के कारण बढ़े हैं ? तालाबंदी के कारण लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं, सैलरी आधी हो गई, क्या वो अपूरणीय क्षति नहीं हैं. क्या इसके लिए किसान आंदोलन ज़िम्मेदार है ? किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले बहस के दौरान कही गई बातों को तो सुनिए.

चीफ जस्टिस के सवालों के जवाब में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि वकील अटार्नी जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह लोग 6 महीने की तैयारी के साथ आए हैं, इस तरह से रोड को ब्लॉक करने की इजाज़त नही दी जा सकती है. जो किसानों ने रास्ता ब्लॉक किया है उसे हटाया जाए ताकि लोगो को फ्री मूवमेंट का रास्ता मिले. तुषार मेहता ने कहा कि बिना मास्क या सोशल डिस्टेंसिंग के इस तरह के प्रदर्शन जारी रखने की अनुमति नहीं दी सकती है. चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या ये सही है कि अगर एक रास्ते पर बैठे हैं तो पूरा शहर प्रभावित हो रहा है? अटार्नी जनरल ने कहा कि किसानों ने सीमाओं को बंद कर रखा है.

कमाल की दलील थी. एक बार लगा कि इसकी कोई काट नहीं है. अगर कोविड की चिन्ता में इस आंदोलन को हटा देना चाहिए तो फिर क्या तुषार मेहता को पता नहीं होगा कि सरकार की तरफ से हो रहे किसान सम्मेलनों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो रहा है या नहीं ?

जब तक व्हाट्सएप में गुडमार्निंग मैसेज भेजने का अधिकार बचा है उसके जश्न में डूबे रहिए. इस खुशी में किसी को गुडमार्निंग मैसेज भेजने के बाद दो समोसे भी खा सकते हैं. इस सुनवाई के दौरान बीच बीच में चीफ जस्टिस की भी टिप्पणियां आती रहीं.

उन टिप्पणियों का संकलन इस प्रकार है –

  • चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें ये देखना होगा कि किसान अपना प्रदर्शन भी करें और लोगों के अधिकारों का उल्लंघन भी न हो.
  • हम स्वीकार करते हैं कि किसानों को विरोध का अधिकार है. इसमें हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे.
  • सरकार और किसानों के बीच बातचीत होनी चाहिए. इसलिए हम कमेटी के गठन के बारे में सोच रहे हैं.
  • हम स्वतंत्र और निष्पक्ष समिति के बारे में सोच रहे हैं. बातचीत भी चले और प्रदर्शन भी जारी रहे.
  • विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए पैनल सुझाव दे सकता है. लेकिन हम ये भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन न हो, न कोई हिंसा हो.

कमेटी बनाने की बात पर पंजाब सरकार की तरफ से पी चिदंबरम ने कहा कि सरकार को कमेटी बनाने से कोई आपत्ति नहीं है. बहस के दौरान एक जगह पर याचिकाकर्ता के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि कोई पब्लिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उससे नुकसान वसूला जाए.

सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की चिन्ता वाजिब है लेकिन किसान जब दिल्ली की तरफ आ रहे थे तब सार्वजनिक संपत्ति नाम की सड़क को बीच से किसने काटा था ? क्या सरकार जनता को रोकने के लिए सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान कर सकती है ? तब भी जनता की तरफ से कोई हिंसा न हो, उकसावा न हो? इस चर्चा के संदर्भ में चीफ जस्टिस ने कहा कि क्या आप जानते हैं कि जुर्माना अदा करने के लिए शिवसेना को बॉम्बे HC ने आदेश दिया था, उसका क्या हुआ तो साल्वे ने कहा कि कभी जुर्माना नहीं भरा गया. पी चिदंबरम ने कहा कि रास्ता किसानों ने नहीं पुलिस ने रोका है. कोर्ट ने कहा कि कानून व्यवस्था का मसला पुलिस पर छोड़ देना चाहिए.

भारतीय किसान यूनियन ग्रुप भानु की तरफ से वकील ए. पी. सिंह ने बहस की शुरूआत की और कहा कि देश कृषि प्रधान देश है. कोरोना और तालाबंदी के समय किसानों ने देश को बचाया है. रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए. चीफ जस्टिस ने यूनियन से कहा कि दिल्ली को ब्लॉक करने से दिल्ली के लोग भूखे हो जाएंगे. आपका उद्देश्य तब तक पूरा नहीं होगा जब तक बातचीत न हो. अगर ऐसा नहीं हुआ तो आप सालों तक प्रदर्शन पर बैठे रहेंगे लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलेगा. चीफ जस्टिस ने कहा कि जो लोग प्रदर्शन के लिए राम लीला मैदान जाएंगे वो शांति रखेंगे या नहीं ये नहीं कह सकते. हम आपको प्रदर्शन से नहीं रोक रहे हैं, आप प्रदर्शन करिए, प्रदर्शन का एक मक़सद होता है, आप सिर्फ प्रदर्शन पर नहीं बैठक सकते हैं, बात चीत भी करनी चाहिए. किसानों को बड़ी संख्या में दिल्ली में प्रवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, यह पुलिस का फैसला होगा, न अदालत का और न कि सरकार का जिसका आप विरोध कर रहे हैं.

इस तरह बहस चलती रही. अदालत ने याचिकार्ता से पूछा कि आपने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी किसको किसको दी ? याचिकाकर्ता ने कहा भारतीय किसान यूनियन, टिकैत आदि को दिया. तब चीफ जस्टिस ने पूछा क्या किसान संगठनों के आज सुनवाई में शामिल न होने पर भी हम कमिटी का गठन कर दें ? जवाब में अटार्नी जनरल ने कहा कि 42 संगठन हैं. तब कोर्ट ने कहा कि हम किसान संगठनों को सुन कर आदेश जारी करेंगे. वैकेशन बेंच में मामले की सुनवाई होगी.

किसानों की लड़ाई अब इस पर आकर सिमट जाएगी कि उनका सारा समय इसी में जाएगा कि वे किसान भी हैं या नहीं. 16 दिसंबर को किसान आंदोलन और किसानों की हालत से दुखी संत राम सिंह ने गोली मार कर आत्महत्या कर ली. किसान आंदोलन के मंच से संत राम सिंह को श्रद्धांजलि दी गई और दो घंटे तक शबद कीर्तन हुआ. आंदोलन के 12 प्रतिनिधि सन्त राम सिंह के डेरे पर भेजे गए हैं. सुखबीर सिंह बादल और हरसिमरत कौर बादल बाबा राम सिंह के दर्शन करने के लिए नानकसर, सिंगड़ा गांव पहुंचे हैं. मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने सन्त राम सिंह को श्रद्धांजलि दी है.

इस बीच जैसे-जैसे सरकार से बातचीत अनिश्चितता की दिशा में बढ़ रही है, किसान आंदोलन का मंच स्थायित्व की तरफ बढ़ने लगा है. शुरू में ट्रैक्टर की ट्राली पर ही अस्थायी मंच बना लिया गया था. उसके बाद पिछले हफ्ते मंच को व्यवस्थित स्वरूप दिया गया लेकिन अब इसे और बड़ा किया जाने लगा है और ठोस आकार दिया जा रहा है. यहां सर्द भरी हवाएं इतनी तेज़ हैं कि मंच के किनारे के पर्दे उड़ने लग जाते हैं. आज सुबह भी टिकरी बार्डर से एक किसान की मृत्यु की ख़बर आई. बठिंडा के गांव तुंगवाली के किसान जयसिंह की मौत हो गई. कहा जा रहा है कि ठंड से मौत हुई है. जयसिंह के तीन बच्चे हैं. कुरुक्षेत्र के पहवा में सलून है. लाभ सिंह आंदोलन की जगह अपनी दुकान लेकर आ गए हैं और फ्री में सेवा दे रहे हैं. अब जब आंदोलन लंबा चलेगा तो हजामत की ज़रूरत पड़ेगी ही.

एक तरफ कानून के नुकसान को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं तो दूसरी तरफ इसके फायदे बताने के लिए सरकार ने ख़ुद को प्रचार युद्ध में झोंक दिया है. गोदी मीडिया से लड़ने के बाद किसान आंदोलन अब डिजिटल स्पेस में लड़ने आ गया है. @kisanektamorcha के नाम से ट्विटर, फेसबुक और इंस्टा पर खाते खोला गए हैं. क्या किसान एकतामोर्चा के ट्विटर हैंडल से किसान आंदोलन प्रोपेगैंडा की लड़ाई लड़ लेगा, क्या वो काफी है ?

किसानों को अहसास होने लगा है कि उनकी लड़ाई मुद्दों से ज़्यादा प्रोपेगैंडा से है. किसान एकता मोर्चा के अलावा एक और ट्विटर हैंडल है जो आंदोलन का तो नहीं है मगर आंदोलन के बारे में ही है. इसका नाम है ट्रैक्टर टू ट्विटर. लुधियाना के भावजीत सिंह और उनके चार पांच दोस्तों ने फर्ज़ी और ग़लत ख़बरों से लोहा लेने के लिए 28 नवंबर को ट्विटर पर खाता खोला जिसे 12200 से भी ज्यादा लोग फॉलो कर रहे हैं. भावजीत सिंह पेशे से आईटी इंजीनियर हैं और किसान परिवार से आते हैं.

इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है कि देश में खुद को सत्तर करोड़ बताने वाले किसान इंस्टाग्राम और ट्विटर पर जब दस हज़ार बारह हज़ार लाइक्स की गिनती करें ? उधर सरकार किसानों के लिए किए गए काम को लेकर लेकर नए-नए बुकलेट जारी हो रहे हैं. आज भी एक बुकलेट जारी किया गया है. खेती किसानी को लेकर सरकार के मंत्री खूब ट्वीट कर रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी 18 दिसंबर की दोपहर मध्य प्रदेश के किसानों को संबोधित करेंगे. वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए 23 हज़ार ग्राम पंचायतों में सीधा प्रसारण किया जाएगा. विधायकों और मंत्रियों को ज़िला मुख्यालय पहुंचने के लिए कहा गया है. इस दौरान 35 लाख किसानों को 1600 करोड़ की राहत राशि भी दी जाएगी.

सरकार को बिल्कुल अपनी योजनाओं का प्रचार करना चाहिए और पक्ष रखना चाहिए लेकिन सरकार को यह भी बताना चाहिए जो अनुराग द्वारी अपनी रिपोर्ट में बता रहे हैं. सरकार कहती है कि मंडियां बंद नहीं होंगी. फिर क्यों कई किसानों को लगता है कि मंडिया पहले की तरह कारोबार नहीं कर रही हैं.

काश किसानों की हकीकत सरकारी पोस्टरों से अलग नहीं होती. दरअसल भारत की राजनीति से किसान शब्द का राजनीतिक महत्व खत्म हो चुका है, इस समय जो आप देख रहे हैं वो उसका औपचारिक समापन समारोह है. होप यू गेट माय प्वाइंट. अखबार पढ़ने से समाचार पढ़ना नहीं आता है और न्यूज़ चैनल देखने से समाचार देखना नहीं आता है. यह लड़ाई आपकी भी है. पाठक और दर्शक के रूप में बचाने की लड़ाई. वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने धान की खरीद को लेकर तीन ट्वीट किए हैं. वही ट्वीट बाकी मंत्रियों ने भी किए हैं लेकिन इसके ज़रिए आप समझ सकते हैं कि सूचनाओं को समझना कितना मुश्किल काम है.

5 दिसंबर को वाणिज्य मंत्री ट्वीट करते हैं कि देश में धान की खरीद 336 लाख मिट्रिक टन हुई है और इसमें पंजाब का हिस्सा 60 प्रतिशत है. 11 दिसंबर को ट्वीट करते हैं कि देश भर मे धान की कुल खरीद 369 लाख मिट्रिक टन हो चुकी है और पंजाब का हिस्सा 55 फीसदी है. 17 दिसंबर को ट्वीट किया है कि 16 दिसंबर तक भारत में धान की कुल खरीद 399 लाख मिट्रिक टन हुई है और इसमें पंजाब का हिस्सा 51 प्रतिशत है.

5 दिसंबर को पंजाब का हिस्सा 60 प्रतिशत था और 16 दिसंबर को 51 प्रतिशत हो गया. मंत्री जी ने अपने तीनों ट्वीट में यह नहीं बताया कि क्यों 11 दिन के भीतर कुल धान की खरीद में पंजाब का हिस्सा 60 से घट कर 51 प्रतिशत पर आ गया है. क्या वे तारीफ कर रहे हैं या उन्हें भरोसा है कि 60 परसेंट वाला ट्वीट किसी को याद नहीं होगा ? दरअसल यही प्रचार का जादू है. 15 दिसंबर तक पंजाब और हरियाणा में खरीद होती है. बाकी देश में आगे तक चलती रहती है. तो जैसे जैसे बाकी राज्यों से खरीद के आंकड़े बढ़ेंगे उसमें पंजाब का हिस्सा कम होता जाएगा. आम तौर पर सरकार की खऱीद में किसी भी साल पंजाब का हिस्सा 30-32 प्रतिशत से अधिक नहीं होता है. अंतिम आंकड़ों के आने का इंतज़ार कर लीजिए.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 17 दिसंबर की सुबह ट्वीट किया कि वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए मेघालय की लकडोंग हल्दी की अमरीका में लॉन्चिं की. मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि मेघालय जहां की 80 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आधारित है, वहां की प्रमुख फसलों में शामिल हल्दी की क्वालिटी इतनी बेस्ट है कि आज इसकी लॉन्चिंग अमरीका में हो रही है.

अच्छी बात है कि मेघालय की हल्दी अमरीकी में लांच हुई है. भारत के किसान निर्यात करते रहे हैं. क्या मेघालय से आई यह अच्छी खबर देश के हल्दी के किसानों की असली तस्वीर है? इंटरनेट में सर्च करना चाहिए कि पिछले दिनों तेलंगाना और कर्नाटक में हल्दी को लेकर क्या क्या खबरें छपी हैं.

हिन्दू अख़बार में हल्दी के दाम और किसानों की समस्या को लेकर कई रिपोर्ट छपी हैं. हमने 19 दिसंबर 2019 से लेकर 5 अक्तूबर 2020 तक की चार पांच रिपोर्ट देखी है. इससे पता चला कि भारत में हल्दी की खेती आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र में होती है लेकिन तेलंगाना हल्दी उत्पादन का केंद्र है. तेलंगाना के किसानों का बयान छपा है कि एक एकड़ में हल्दी की खेती करने पर डेढ़ लाख रुपये लग जाते हैं. सिर्फ लागत निकालने के लिए 7000 रुपये प्रति क्विंटल का भाव चाहिए. मगर 4500 से 6500 के बीच ही भाव मिल पाता है. किसान हल्दी के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की मांग करते रहते हैं. इन्हीं रिपोर्ट से पता चला कि हल्दी की किस्मों के नाम पितांबर, प्रभा, राजेंद्र सोनिया और रोमा हैं. सरकार ने टर्मरिक टास्क फोर्स कमिटी भी बनाई है.

क्या अमरीका में लांच होने से हल्दी उत्पादकों की समस्या खत्म हो गई, उन्हें दाम मिल गए? हल्दी उत्पादन का केंद्र है तेलंगाना लेकिन ट्वीट होता है मेघालय से. उसी तरह से जैसे आंदोलन हो रहा है दिल्ली की सीमा पर लेकिन सरकार मध्य प्रदेश के किसानों को संबोधित कर रही है. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने ट्वीट किया है कि वे 20 दिसंबर को नारनौल में किसानों को संबोधित करेंगे. आज दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था और किसान कानून की प्रतियां फाड़ दीं.

भारत के किसान भले 70 प्रतिशत होंगे लेकिन न्यूज़ चैनलों पर उन्हें 7 प्रतिशत जगह भी नहीं मिलती होगी पूरे साल में. वैसे आपको पता ही होगा कि भारत में एक किसान चैनल है. दूरदर्शन किसान जो 26 मई 2015 को शुरू हुआ था. क्या किसान चैनल किसान आंदोलन को कवर कर रहा है?

क्या इसे कवर करेगा जो हरियाणा के रायपुर रानी से मोहम्मद ग़ज़ाली ने भेजी है. यहां एक गांव है गणेशपुर. यहां के किसानों ने 80 एकड़ में धान की जगह बाजरे की खेती की. तीन महीने से बाजरा नहीं बिक रहा है. तब किसानों ने बाजरे को ट्रैक्टर पर लादना शुरू कर दिया कि बोरियों को मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और उपायुक्त के निवास के बाहर छोड़ आएंगे. राजनीतिक दलों के नेताओं से भी नाराज़ हैं. उनसे भी कहा है कि वे गांव में न आएं. ज़ाहिर है ये किसान अपनी समस्या से तंग आ चुके हैं. मोहम्मद ग़ज़ाली ने 16 दिसंबर के प्राइम टाइम में दिखाया था कि कैसे धान की खेती छोड़ मक्के की खेती करने वाले किसान दाम न मिलने से परेशान हैं. सरकार ने इन्हें प्रोत्साहन राशि के तौर पर 7000 रुपये साल का देने का एलान किया था, कई किसानों का कहना है कि पैसा नहीं मिला.

सरकार यहां वहां से किस्से खोज कर ला रही है कि खुले बाज़ार से किसान कमा रहा है. कभी बागबानी की खबर ट्वीट करती है तो कभी दूध बेचने वाले किसान की खबर. इन दिनों खेती लेकिन जहां समस्या सबसे बड़ी है, क्या उसका सामना इन इक्के दुक्के उदाहरणों से किया जा सकता है? बिहार के किसान तो कब से खुले बाज़ार में धान बेच रहे हैं. किसानों ने आंदोलन न किया होता तो बिहार के धान किसान भी अपनी इस समस्या पर बात नहीं करते कि वे कैसे साल दर साल लुटते रहे और पता भी नहीं चला. अब पता चला है तो बयान भेजे जा रहे हैं.

Read Also –

 

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Tags: किसान आंदोलनरविश कुमारसुप्रीम कोर्ट
Previous Post

जन विहीन लोकतंत्र में आपका स्वागत है

Next Post

भारत में लोकतंत्र बहुत है !

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

भारत में लोकतंत्र बहुत है !

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

कॉपरनिकस जिनकी आत्मा दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में जीवित है

May 24, 2021

युवाल नोआ हरारी की स्थापनाओं का संक्षिप्त पोस्टमार्टम

October 23, 2023

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.