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Home गेस्ट ब्लॉग

यूएपीए यानी खच्चर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 18, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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यूएपीए यानी अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट. वही यूएपीए जिसके दुरुपयोग पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार को जमकर आड़े हाथों लिया है. साल 1967 में इंदिरा सरकार अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन बिल लेकर आई थी और पारित होने से पहले संसद की संयुक्त प्रवर समिति ने इसके प्रारूप में कुछ बदलाव किए थे.

उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बिल का जमकर विरोध किया था और इसकी तुलना एक ऐसे ‘गधे’ से की थी जिसे ‘घोड़ा’ बनाने की कोशिश की गई हो लेकिन वो ‘खच्चर’ बन गया हो. तब अटल बोले थे –

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संयुक्त प्रवर समिति को एक गधा सौंपा गया था और समिति का काम था उसे घोड़ा बनाना, लेकिन परिणाम यह निकला है कि वह खच्चर बन गया है. अब गृह मंत्रालय का भार ढोने के लिए तो खच्चर ठीक है, लेकिन अगर गृहमंत्री यह समझते हैं कि वह खच्चर पर बैठकर राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता की लड़ाई लड़ लेंगे, तो उनसे मेरा विनम्र मतभेद है.

आज 54 साल बाद इतिहास जैसे ख़ुद को दोहरा रहा है. देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री असहमति को दबाने के लिए खच्चर पर बैठे हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में यूएपीए को लेकर जो बातें कही हैं, उससे साफ है कि खच्चर सवार सरकार अपना चेहरा बचाने के लिए किसी को भी आतंकी बता सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 1978 में ‘स्टेट ऑफ़ राजस्थान बनाम बालचंद’ मामले के अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में कहा था – ज़मानत नियम है और जेल अपवाद. इस साल फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यूएपीए के मामलों में भी अगर मूल अधिकारों का हनन हो रहा है तो अभियुक्त को ज़मानत मिलनी चाहिए.

इन दिनों अदालतें कई सामान्य मामलों में भी अभियुक्तों की ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज कर देती हैं जबकि ज़मानत हर नागरिक का अधिकार है. हालिया संशोधन से पहले यूएपीए के तहत आतंकी गतिविधियों से जुड़े संदिग्ध समूहों या संगठनों पर ही मुक़दमा चलाया जा सकता था लेकिन अब एक अकेले शख़्स को भी इसकी गिरफ़्त में लिया जा सकता है.

एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखने से लेकर पर्यावरण या कृषि से जुड़े प्रस्तावित क़ानूनों का विरोध करने तक की वजह से लोगों पर यूएपीए के तहत केस दर्ज किए गए हैं. देवांगना, नताशा और तन्हा को जमानत तो मिली है, लेकिन उन दर्जनों बेकसूरों का क्या, जो आज भी इसी काले कानून के तहत जेल में बंद हैं ?

क्या अदालतों में इतने प्रगतिशील जज हैं कि सबको इंसाफ दे सकें ? इस सवाल का सीधा जवाब हमारे समाज की प्रगतिशीलता से जुड़ता है, हमारे सिस्टम और राजनीति की प्रगतिशील दिशा से जुड़ता है. क्या हम ख़ुद प्रगतिशील रास्ते पर बढ़ रहे हैं ? नहीं.

  • सौमित्र राय

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Comments 1

  1. हृदय नाथ says:
    5 years ago

    एक प्रासंगिक प्रश्न : देश के विभिन्न जेलों में वर्षों से बन्द साधन रहित ऐसे हज़ारों कैदियों की क्या कभी सुनवाई होगी ?वैसे भी आज की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है और तीनों के ऊपर तलवार अभी भी लटक रही है ! कोर्ट की यह टिप्पणी ,”It cannot be precedent for such other cases” चिंतन और चिंता का विषय है !

    Reply

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