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डरपोक प्रधानमंत्री का ‘प्रधानमंत्री राज्यमंत्री विस्तार परियोजना’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 8, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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डरपोक प्रधानमंत्री का 'प्रधानमंत्री राज्यमंत्री विस्तार परियोजना'

रविश कुमार, मैग्सेसे अवार्ड विजेता अन्तर्राष्ट्रीय पत्रकार

यह एक सूत्र वाक्य है जिसमें पूरे मंत्रिमंडल विस्तार की कथा समाहित है. जो भी जहां से दिखा, राज्य मंत्री विस्तार योजना में शामिल कर लिया गया. तभी तो 36 नए मंत्री बने हैं जिनमें से ज़्यादातर राज्य मंत्री बनाए गए हैं. कुछ पुराने राज्य मंत्रियों को बर्ख़ास्त कर दिया गया है. राज्य मंत्रियों की संख्या के कारण ही मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों की संख्या 54 से बढ़ कर 78 होती है इसलिए मै इसे प्रधानमंत्री राज्यमंत्री विस्तार योजना कह रहा हूं. मोदी दौर में पहली बार मंत्रिमंडल का आकार इतना बड़ा बना है, जो किसी मज़बूत प्रधानमंत्री का कम मजबूर प्रधानमंत्री का ज़्यादा लगता है.

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मजबूरी इस अर्थ में कि मार्च, अप्रैल और मई के महीने में लाखों भारतीयों की मौत जिस तरह से हुई है, उसके कई कारण सरकार की वजह से भी हैं. इसके कारण दुनिया भर में भारत की छवि अच्छी नहीं रही. प्रधानमंत्री मोदी के बारे में हर बड़े अख़बार में लिखा गया कि ये झूठ बोलते हैं. जनता को मरने की हालत पर छोड़ चुनाव में व्यस्त रहते हैं. फ्रांस में रफाल की जांच और ब्राज़ील में कोवैक्सीन विवाद के कारण दुनिया भर में भारत की छवि को धक्का पहुंचा है और अब प्रधानमंत्री मोदी को एक उभरते हुए नए निरंकुशवादी नेता के रुप में देखा जा रहा है. स्टैन स्वामी के निधन के कारण और भी इसे मज़बूती मिली है.

आप याद करें कि विदेशों में छवि बनाने में प्रधानमंत्री मोदी ने कितने पैसे फूंक दिए और भारतीय दूतावासों को योगा सेंटर में बदल दिया. इस संदर्भ में मंत्रीमंडल के विस्तार को देखिए तो लगेगा कि झटका देने की कोशिश के बाद भी यह कोई बड़ा झटका नहीं है. चुनावी और जाति समीकरण को सेट करने के लिए राज्य मंत्री बनाने की कवायद है इसलिए मैंने आज के विस्तार को प्रधानमंत्री राज्यमंत्री विस्तार परियोजना कहा है.

राज्य मंत्रियों को अभी तक चुनावी राज्यों के दौरों पर बूथ प्रबंधन के काम और अनाप-शनाप बयान देते हुए देखा गया था. किसी ने आज तक इस बात का मूल्यांकन नहीं किया कि मोदी दौर में राज्य मंत्री मंत्रालय में कितने दिन रहते हैं और चुनाव क्षेत्र में प्रबंधन हेतु मंत्रालय के बाहर कितने दिन रहते हैं ? आज थोक मात्रा में राज्य मंत्रियों के शपथ लेने को बड़ी रणनीति के रुप में पेश किया जा रहा है. अभी तक राज्य मंत्रियों का काम मंत्री बनने के बाद अपने-अपने राज्यों के अख़बारों में छपने और अपनी जाति के समीकरण को सेट करने का ही रहा है.

आप आज बर्ख़ास्त किए गए राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो के ट्वीट से देख सकते हैं. हालांकि उन्होंने प्रधानमंत्री को मौका देने के लिए धन्यवाद तो दिया है लेकिन उन्होंने यह भी लिखा है कि बंगाल चुनाव में अपने इलाके में पार्टी के गढ़ को संभाले रहे. यह भी ताना मार दिया है कि इतने दिन मंत्री रहा और मुझे गर्व है कि भ्रष्टाचार के किसी दाग़ के बग़ैर बाहर आए हैं.

बाबुल सुप्रियो भोले सज्जन हैं. उन्हें नहीं पता है कि सरकार को फंसाने के लिए भ्रष्टाचार की ज़रूरत नहीं है. अगर उन्हें इतना यकीन है तो एक बार पार्टी बदल लें. ED से लेकर CBI तक पांच मिनट में साबित कर देंगे कि बाबुल सुप्रियो से करप्ट कोई नहीं और गोदी मीडिया दस मिनट में यह फैसला भी सुना देगा. खैर, कहने का मतलब है कि बाबुल सुप्रियो का ट्वीट बता रहा है कि राज्य मंत्री किसलिए बनाए जाते हैं.

पिछले कई दिनों से बिना किसी पुख़्ता सूचना के मंत्रिमंडल के विस्तार की कथा को मीडिया में चलाया जा रहा था. ख़बर खड़ी करने के लिए चंद नाम बताए जा रहे थे. लेकिन जब विस्तार की सूचना आई तो थोक के भाव में लोग मंत्री बनाए गए. मेरा मतलब राज्य मंत्री बनाए गए. इसमें से भी कई नाम ग़लत चल रहे थे – जैसे वरुण गांधी का मंत्री बनाया जाना.

किसी ख़बर में इसका संकेत तक नहीं था कि रविशंकर प्रसाद हटाए जा रहे हैं. एक कबीना मंत्री जो पिछले कई दिनों से ट्विटर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में एक मैनेजर रखवाने के लिए संघर्ष कर रहा था, हर दिन ट्वीटर को धमका रहा था, उस कबीना मंत्री का बर्ख़ास्त किया जाना अच्छा नहीं है. दुनिया की नज़रों में ऐसा लगेगा कि मंत्री जी कंपनी में मैनेजर रखवा रहे थे, कंपनी ने मंत्री जी को ही हटवा दिया.

रविशंकर प्रसाद को हटाया जाना दु:खद है. उनके बिना राहुल गांधी की आलोचना सुनसान हो जाएगी लेकिन ट्विटर से लड़ने के कारण रविशंकर प्रसाद को इनाम मिलना चाहिए था ताकि अमरीका तक को संदेश जाता कि मोदी के मंत्री किसी से डरते नहीं हैं. कोविड के दौर में अदालतों के मुखर होने की वजह से तो नहीं हटाए गए ? ये रविशंकर प्रसाद ही बता सकते हैं और वे ED के दौर में दूसरे दल में जाने की हिम्मत भी नहीं करेंगे.

उसी तरह, डॉ. हर्षवर्धन का हटाया जाना उन सवालों की पुष्टि करता है कि वे एक नकारा स्वास्थ्य मंत्री थे और सरकार ने कोरोना से लड़ने की कोई तैयारी नहीं की थी. तैयारी की होती तो न लाखों लोग मरते और न ही स्वास्थ्य मंत्री को हटाना पड़ता. ये अलग बात है कि मई महीने में मैंने स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखा था कि इस्तीफा दे दें. उसमें यह भी लिखा था कि प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सचिव को भी बर्खास्त करें. इतने लोगों का नरसंहार हुआ है, कोविड प्रबंधन से जुड़े किसी को अभी तक जेल नहीं हुई, न मुकदमा चला है, यह केवल भारत में हो सकता है. कई बड़े देशों में बकायदा जांच हो रही है. संसद की कमेटी सुनवाई कर रही है जिसका सीधा प्रसारण हो रहा है.

सरकार हर मोर्चे पर फेल है. आप युवाओं से शिक्षा को लेकर पूछ लीजिए. सवाल है कि जिस मंत्री के निर्देशन में नई शिक्षा नीति लांच हुई उसे ही हटा कर सरकार क्या संदेश देना चाहती है ? रमेश पोखरियाल निशंक के भाषणों को अगर प्रधानमंत्री मोदी आधे घंटे बैठ कर सुन कर दिखा दें तो मैं मान जाऊं. निशंक को लेकर मैंने दो चार प्राइम टाइम किए हैं, जिनमें उनके भाषणों को सम्मानपूर्वक दिखाया था ताकि भारत की जनता जान ले कि उनके बच्चों की शिक्षा का प्रभारी मंत्री किस तरह शिक्षा से वंचित हैं. उसे विश्वविद्यालय की नहीं, स्कूल की ज़रूरत है. प्रधानमंत्री ने इन्हें बना कर भी ठीक नहीं किया था और हटा कर भी कोई महान काम नहीं किया है.

यह सत्य है और तथ्य है कि सात साल के उनके कार्यकाल में शिक्षा की हालत बदतर हुई है. मेरी बात से भड़क जाएंगे लेकिन प्रधानमंत्री को पता है कि मैं सही बात कर रहा हूं, तभी तो मेरे इस्तीफा मांगने के बाद डॉ. हर्षवर्धन हटाए गए और निशंक पर किए गए प्राइम टाइम से आंखें खुली होंगी. मेरे पास प्रमाण नहीं है लेकिन दोनों का हटाए जाने का संयोग यही कहता है. जब बिना सूचना के मंत्रिमंडल के विस्तार पर घंटों डिबेट हो सकते हैं तो मैं तो केवल संयोग की बात कर रहा हूं. बाकी दोनों मंत्रियों के बारे में मेरी राय तो सही ही है.

देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है. यह भी प्रधानमंत्री जानते हैं. वित्त मंत्री बदल नहीं सकते क्योंकि बाज़ार को ग़लत संकेत जाएगा. आपको जानकर हैरानी होगी कि इसी 12 जून को कई अखबारों में ख़बर छपी कि वित्त मंत्रालय ने सरकार के मंत्रालयों से कहा है कि अपने ख़र्चे में 20 प्रतिशत तक की कटौती करें. जो सरकार एक महीना पहले मंत्रालयों के ख़र्चे कम करने को कह रही हो वही सरकार झोला भर-भर कर राज्य मंत्री बनाने लग जाए तो मैसेज समझ नहीं आता है.

मंत्रियों की संख्या 54 से 78 करने का तुक समझ नहीं आता है. आने वाले पांच राज्यों में कितने राज्य मंत्रियों की ड्यूटी लगेगी ? फिलहाल यह विस्तार प्रधानमंत्री राज्यमंत्री विस्तार योजना से कुछ कम नहीं है. मंत्रियों के आने और जाने से सरकार का काम नहीं बदलता है. नेतृत्व अपनी नाकामी से बचने के लिए यह सब करता रहता है. बाकी आप जानें और आपकी नियति जाने. मेरी राय में आईटी सेल जो कहे वही मानते रहिए.

मई महीने में स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को रविश कुमार द्वारा लिखा पत्र

डॉ. हर्षवर्धन
स्वास्थ्य मंत्री, भारत सरकार

आशा है आप सकुशल होंगे. बस इतना पूछना चाह रहा हूं कि आप इस्तीफ़ा कब दे रहे हैं ? क्या वाक़ई आपको अपनी सरकार के काम पर इतना भरोसा है ? इतने लोगों की वेंटिलेटर, ऑक्सीजन, दवा, इंजेक्शन और इलाज न मिलने के कारण जो हत्या हुई है, क्या उसके बाद भी आपको नींद आती है ? आपके स्वास्थ्य सचिव को भी इस्तीफ़ा देना चाहिए.

जब आप लोगों के होने से कुछ नहीं हुआ तो इस्तीफ़ा देकर चले जाने से भी कुछ नहीं होगा. अब आपके सहयोगी मंत्री फ़ोटो ट्वीट कर रहे हैं कि यहां बेड लगा दिया, वहां लगा दिया. अब तो वैसे भी संक्रमित मामलों में कमी आएगी और अस्पतालों में कुछ दिनों के लिए जगह बनने लगेगी. संक्रमित मामलों में कमी आने में किसी सरकार का कोई योगदान नहीं है.

ख़ैर मैं बस चाहता हूं कि आप इस्तीफ़े पर विचार करें. ऐसा नहीं है कि आरएसएस और बीजेपी से जुड़े विधायकों, नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौत नहीं हुई है. यह मौत नहीं है, हत्या है. उन्हें भी अस्पताल में बिस्तर और इलाज नहीं मिला. जिन लोगों के साथ आप एक राजनेता के रूप में जीवन भर काम करते हैं, आप उन्हें नहीं बचा सके. पार्टी के भीतर आप कैसे अपने सहयोगियों से नज़र मिला पाएंगे.

प्रधानमंत्री को तो फ़र्क़ नहीं पड़ता. उनके लिए फिर से कोई भाषण तैयार हो जाएगा. कोई डेटा आ जाएगा कि उन्होंने ये किया, वो किया. वो हमेशा ही महान रहेंगे. इतनी लाशें बह गईं गंगा में, उससे भी उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ा. वो इतना नहीं कर सके कि मरने वालों की संख्या ही गिनी जाए. तो आप उन्हें देखकर कोई निर्णय न लें. मेरे इस पत्र को पढ़कर निर्णय लें. वैसे भी स्वास्थ्य मंत्रालय के कर्मचारी जब इस पत्र को पढ़ेंगे तो वे भी सहमत होंगे. पता नहीं आप पढ़ सकेंगे या नहीं.

आप एक विधायक या सांसद बनने से पहले एक डॉक्टर रहे हैं. आपकी राजनीतिक सफलता में इस विश्वास का बहुत योगदान रहा है कि आप एक डॉक्टर है और आप जैसे लोगों को राजनीति में होना ही चाहिए. जो करेंगे दूसरों के हित के लिए करेंगे. लेकिन आप तो रामदेव का कोरोनिल का लांच कर रहे थे. तो फिर आप टीकाकरण क्यों कर रहे हैं ? सबको कोरोनिल ही खिलाते. इस्तीफ़ा देने के बाद आप एक ठेला ख़रीद लें और उस पर कोरोनिल बेचा करें.

मैं जानता हूं कि तल्ख़ हो रहा हूं लेकिन क्या आप नहीं जानते कि मैं सही बात कर रहा हूं ? आप इतनी बार सांसद और विधायक रह चुके हैं कि आपको दो-दो पेंशन तो (आजीवन) मिलती ही होगी. हम लोगों के पास तो पेंशन की भी सुरक्षा नहीं है. तब भी बोलने का रिस्क उठाते हैं.

डॉ. हर्षवर्धन आप इस साल जनवरी के आख़िर में विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक में कह रहे थे कि भारत कोरोना से जीतने के क़रीब पहुंच गया है, जो बताता है कि आप एक डॉक्टर के रूप में भी महामारी की गति को समझने की क्षमता नहीं रखते हैं. आप एक डॉक्टर के रूप में इस वक़्त ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहे थे. एक नेता का काम कर रहे थे इसलिए यह वक़्त है कि आप शर्म के साथ इस्तीफ़ा दे दें.

इस्तीफ़ा देने से पहले जिन डाक्टरों की टीम बनाई थी, टास्क फ़ोर्स वाली, उन सबको बर्खास्त कर दें. कौन कितना बड़ा है और कितना पढ़ा है उनका बायोडेटा मत देखिए. आपकी टीम के सारे लोग असफल रहे हैं। औसत से भी ख़राब और असफल साबित हुए हैं।

मेरी राय में आपको इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. सच बोलने से डर लग रहा हो तो गीता का पाठ करें, उससे बल मिलेगा. अपनी सरकार का झूठ सामने रख दीजिए. इस वक़्त जो नरसंहार हुआ है, उसमें मारे गए लोगों के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी. हर बात में पुलिस केस की मदद मत लीजिए. कोई फ़ायदा नहीं है। आप इस्तीफ़ा देंगे तो आपके राजनीतिक सहयोगी और समर्थक जो इस वक़्त अपने परिवार में और अपनी जनता से आंखें नहीं मिला पा रहे हैं, उन्हें भी कुछ बल मिलेगा.

हां, इस्तीफ़ा वाले पत्र में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ़ में एक पन्ना ज़रूर लिखें वरना आपके ही ख़िलाफ़ केस हो जाएगा. आपके घर में आयकर और ईडी के छापे पड़ने लग जाएंगे. वैसे भी बंगाल चुनाव के बाद ईडी के लोग ख़ाली बैठे हैं. ख़ाली ईडी और ख़तरनाक होती है. दो मिनट में आपके घर आ जाएगी.

आपके इस्तीफ़े से यह संदेश जाएगा कि आपने ही फेल किया है, प्रधानमंत्री मोदी तो हमेशा महान हैं. अब आप समझ गए. मैं प्रधानमंत्री मोदी की छवि के लिए आपके इस्तीफ़े की मांग कर रहा हूं. मैं इतना भोला नहीं हूं कि नरसंहार से व्यथित होकर आप इस्तीफ़ा दे देंगे. अगर आप इस्तीफ़ा नहीं देंगे तो हो सकता है कि प्रधानमंत्री आपको मंत्रालय से हटा दें और अपनी छवि बचा लें. भले लाखों लोग तड़प कर मर जाएं, प्रधानमंत्री की छवि सुप्रीम है. उसे बचाने के लिए आप इस्तीफ़ा दे दीजिए.

मेरी बात का ध्यान रखिएगा. आपके प्रति आदर है लेकिन आपकी लापरवाहियों के प्रति कोई आदर नहीं है. do you get my point, hence resign.

रवीश कुमार
दुनिया का पहला ज़ीरो टीआरपी एंकर

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