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विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रेड इंडियन्स, माओरी वगैरह की बस्तर-त्रासदी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 13, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रेड इंडियन्स, माओरी वगैरह की बस्तर-त्रासदी

Kanak Tiwariकनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़

कोलंबस ने अमेरिका को ढूंढ़ा. वहां के मूल निवासियों उत्तर अमेरिकी इंडियन या लोकप्रिय नाम रेड इंडियन से यूरोपियों का हिंसक संघर्ष लगभग 400 वर्षों तक चला. आज रेड इंडियन संस्कृति, अस्तित्व और इतिहास गुमनाम हैं. कोलंबस ने ही 2.50 लाख आदिवासियों को हैती में बलपूर्वक गुलाम बनाया था. उस प्रजाति की संख्या घटकर 500 हो गई थी. वर्ष 1650 तक वे नेस्तनाबूद हो गए. कई मूल निवासी सभ्यता के आक्रमण झेलते इतिहास की खंदकों में दफ्न हो गए हैं.

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आदिवासियों को तबाह करने यूरोपीयों ने चिकन पाॅक्स, मीज़ल्स और बड़ी माता जैसी बीमारियां फैलाईं. इसका लेकिन बहुत चर्चा नहीं होता. कुदरत की सोहबत में रहते आदिवासियों के लिए यूरोपीय बीमारियां असह्य थी. कुछ प्रजातियों के लगभग 80 प्रतिशत लोग इन बीमारियों से मर गए. गोरों ने रेड इंडियन्स को मजबूर किया कि वे जंगलों और पहाड़ों की ओर चले जाएं. कई समझौते और संधियां भी हुईं लेकिन जल्लाद अमेरिकी कब ईमानदार होते हैं !

बचे खुचे आदिवासियों को सभ्य बनाने के शिगूफे छेड़े गये. बच्चों को स्कूलों में पढ़ाते उनकी मादरी जुबान और जातीय आदतों से महरूम कर दिया गया. आॅस्ट्रेलिया के मूल आदिवासियों की सामूहिक हत्या अंगरेज गोरों ने की. सीधे सादे आदिवासी सोच नहीं सकते थे कि विदेशी शत्रु उन्हें तबाह करने उनकी धरती और संसार पर हमला करेगा. जंगली जानवरों की तरह उनका शिकार किया गया. उन्हें गोलियां मारते ज़हरखुरानी भी की गई. बीसवीं सदी की शुरुआत में कई आदिवासी प्रजातियां समूल नष्ट हो गईं. प्रोफेसर कोलिन टैट्ज़ ने ‘जेनोसाइड इन आॅस्ट्रेलिया‘ पुस्तक में इस भयावह अत्याचार का वर्णन किया है. कुछ सदियों पहले तक आदिवासी पूरी दुनिया में अपनी वन्य-जीवन संस्कृति और सभ्यता के विन्यास तथा उत्कर्ष की ओर मुखातिब थे. वैश्वीकरण ने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में पूरी दुनिया को आर्थिक विकास की नई समझ दी.

जुल्म तो पहले से आदिवासियों पर ढाए जाते रहे. 1803 में तस्मानिया में विदेशी आ बसे. 1806 से हिंसक लड़ाइयां शुरू हुईं. बच्चों को बालश्रमिक बनाया. स्त्रियों के साथ बलात्कार किया. आदिवासियों को आधा जहरीला भोजन खाने मजबूर किया. 1824 से 1908 के दरम्यान क्वीन्सलैंड में करीब 10000 आदिवासी मार डाले गए. कथित सभ्य लोग ‘वन्य पशु’, ‘जहरीले नाग’, ‘अमानुष’, ‘मनुष्यता पर कलंक’, ‘घृणित’ और ‘पब्लिक न्यूसेंस’ शब्दों से सम्बोधित करते थे. कभी कभार आदिवासियों को बचाने सुरक्षात्मक कानून भी बने, लेकिन सब बरायनाम रहा. भूगोल और कानून के दो हथियारों से कथित सभ्य मनुष्यों ने मूल संस्कृतियों का निर्ममतापूर्वक वध किया है.

दक्षिण अमेरिका के ब्राजील की सरहदों पर करीब चालीस आदिवासी प्रजातियां रही बोलिविया, पराग्वे, इक्वेडोर और कोलंबिया में आदिवासियों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है. तेल उत्पादक पेरू के कुल भंडारों में करीब 75 प्रतिशत जंगलों में हैं. यहां बड़ी तेल उत्पादक कंपनियों को सरकार बुलाती रही है. इससे आदिवासी समाज में आक्रोश, शोषण और भय गहराता है. पापुआ न्यू गिनी में अलबत्ता मूल निवासियों में अधिकारों को लेकर जागृति और चेतना है. वहां भूमि का स्वामित्व निजी व्यक्ति में नहीं आदिवासी समुदाय में होता है. हर सदस्य को सामूहिक संपत्ति के उचित दोहन के लिए काम करना होता है. उनकी स्वीकृत मान्यता है कि धरती मनुष्य के स्वामित्व में नहीं हो सकती. मनुष्य धरती समेत पूरी कुदरत का न्यासी भर है.

मनुष्य धरती का मालिक है. पश्चिमी सभ्यता की पूंजीवादी अवधारणा है. उसकी बुनियाद रोमन कानून में है. आधुनिक सभ्यता सिखाती है अपने स्वामित्व की धरती का मनुष्य कैसा भी दोहन कर सकता है. भारत में आदिवासी इलाकों और विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में यही किया जा रहा है. विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का भारत सहित विकासशील देशों पर दबाव है. वैसी प्रयोगशाला बस्तर में भी खोली गई है जो साम्राज्यवादी विस्तार का ढकोसला है.

अमेरिका और यूरोप के कुछ देश अपने खनिजों और तेल का उत्खनन नहीं कर रहे. अमेरिका ने सद्दाम हुसैन पर झूठे आरोप लगाकर अरब मुल्कों के तेल उत्पादन पर अपना व्यापारिक शिकंजा कसा. हिन्दुस्तान भी उसके लिए ग्राहक देश है. वह अपनी खारिज दवाइयां नए रैपर लगाकर बेचता है. आतंकवादियों और आतंक पीड़ित देशों दोनों को चोरी और साहूकारी से हथियार बेचता है. विदेश नीति में दलाली, समझौता, संघर्ष और गुप्तचरी सबके लिए स्पेस रखता है. चीन जैसे मुल्क से संघर्ष करना चाहता है और गलबहियां भी. दक्षिण पूर्व एशिया यूरोप और दक्षिण अमेरिका और भारत वगैरह में अपने कुछ पिट्ठू पालता है.

भारत उसके लिए सौंदर्य का भी बाजार रहता है इसलिए लगातार भारत की ललनाएं विश्व सुंदरियां बनाता रहा. उसने भारत के कुशल इंजीनियरों, डाॅक्टरों और प्रबंधन विशेषज्ञों को बेहतर नौकरियां देने के प्रलोभन और अवसर देकर उनमें अपनी संस्कृति इंजेक्ट करता रहा. कम्युनिस्ट दुनिया के विघटन के बाद अमेरिका लोकतंत्रीय देशों का अधिनायकवादी नेता है. वैश्विक व्यापारिक दबावों के चलते भारत की मौजूदा भाजपा शासन-नीति भी अमेरिकी विचार की पिछलग्गू है.

सभी शोषक मिलकर चाहते हैं कि भारत की खनिज, वन और मानव संपदाएं लूट ली जाएं. गोरे तिजारतियों ने भारत के कारीगरों के हाथ काट डाले ही थे. कोहिनूर हीरा समेत तमाम बहुमूल्य रत्न इंग्लैंड ले गए ही थे. रेड इंडियन्स में कुछ हिंसक लोग भी थे. उनमें लड़ने का शायद ज्यादा माद्दा था. यही काम माओरियों ने भी किया होगा. भारत के आदिवासियों में अब इतनी हिम्मत नहीं बची. आदिवासियों के नेता ही प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों के खुशामदखोर और चाटुकार हैं.

आधुनिक सभ्यता का शोषक पूंजीवादी विचार मंत्रियों के ज़ेहन में उतर गया है. दौलत कमाने के अधिकारों पर बंधन नहीं बल्कि कानूनों का प्रोत्साहन है. मुनाफाखोरी, जमाखोरी और कालाबाजारी की रोकथाम करने वाले कानूनों को लाइसेंस परमिट राज की औरस संतानें कहकर दाखिल दफ्तर कर दिया गया है. लिहाज़ा महंगाई और मुद्रा स्फीति उफान पर हैं. उन्हें रोकने के प्रयत्न कथित पश्चिमी, आधुनिक, औद्योगिक, मशीनी दृष्टि के चलते सरकारें कर ही नहीं सकती.

बस्तर इसी आधुनिक विकास-दृष्टि का दंश झेल रहा है. बस्तर प्रतीक है. अमेरिका के मौजूदा गोरे चेहरे के पीछे काले इरादे हैं. उन्हें यदि इतिहास पढ़ने से कोताही करेगा तो याद रहे बस्तर में भी रेड इंडियन्स का इतिहास दोहराए जाने की कोशिशें हो रही हैं. बस्तर एक बीहड़ में तब्दील हो रहा है. आदिवासी और आदिवास नेस्तनाबूद होने की कगार पर हैं. केन्द्र और राज्य सरकारें खलनायक हैं.

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