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ये शब्द क्या कर रहे हैं ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 27, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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ये शब्द क्या कर रहे हैं ?

Kanak Tiwariकनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़

21वीं सदी के दूसरे दशक से कुछ शब्द दसों दिशाओं के द्वारपाल बने मूंछें ऐंठने लगे हैं. ये शब्द बारी-बारी से ‘राम नाम सत्य है’ की तर्ज पर ‘विकास नाम सत्य है’ का नारा लगाते रहते हैं. विकास के दादा का विरोध करने की कोई हिमाकत नहीं कर सकता. विकास झोपडि़यां तोड़कर एंटीलिया की गुलाम झोपडि़यां बनाने, पगडंडियां नेस्तनाबूद कर प्रधानमंत्री की रहायशी ऐशगाह बनाने, नागर संस्कृति की कस्बाई को रफू कर सीमेंट कांक्रीट के ‘स्मार्ट सिटी’ उगाने, जनसुलभ मोटर और रेलगाडि़यां उखाड़कर ‘बुलेट ट्रेन’ का ठप्पा चिपकाने और जनसुलभ अखबारों को ‘गोदी मीडिया’ नया नाम देकर नेताओं की ड्योढ़ी पर नाक रगड़ने का मौसम उगा चुका है.

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‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ कहते प्रधानमंत्री की ‘श्मशान, कब्रिस्तान’ जुगलबंदी के कारण ‘बीफ’ नामक शब्द हिंसक रोमांचकारी हो गया है. गोदान करता हिन्दुत्वमुग्ध हिंदू गोमाता की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार कर स्वर्ग पहुंचने का दिवास्वप्न देखता है. गोमांस के बड़े निर्यातक लेकिन मुसलमान नहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के हिन्दू भाजपाई हैं. मुसलमान या ईसाई गोमांस छुएं तो मरना पड़ेगा. मीडिया ने ‘गोगुंडे’ शब्द का आविष्कार भी कर लिया. श्वेत क्रांति का जनक लेकिन कोई हिन्दुत्व का लाल नहीं है.

प्रधानमंत्री ने गोमांस व्यापार को गुलाबी क्रांति अर्थात ‘पिंक रेव्यूलेशन’ कहकर कटाक्ष भले किया. बेचारा भगवा रंग रोमांटिकता को भूलकर ‘बीफ’ बेच रहा है. ‘लिव इन रिलेशनशिप’ और ‘मी टू’ के बीच राष्ट्रवादी संस्कृति झूला झूल रही है. जो खुद ब्याह करने के लायक नहीं रहे उनके द्वारा स्थापित मजनू ब्रिगेड भी है. ‘देशद्रोही’ शब्द तूफान मचा रहा है. हर सच्चा भारतीय देशद्रोही हो रहा है, भले ही यह शब्द गैरकानूनी और गैरसंवैधानिक है. ‘फतवा’ देने वाले ‘भक्त’ बन जाते हैं, गोडसे ‘भगवान’ हो गए हैं. ‘माफी वीर’ ‘भारत रत्न’ हो सकते हैं.

सेनाध्यक्ष रहे वी. के. सिंह ने वेश्यावृत्ति अर्थात ‘प्रोस्टीट्यूट् से तरन्नुम बिठाते ‘प्रेस्टीट्यूट’ अर्थात बौद्धिक वेश्यावृत्ति कहकर अपनी पीठ ठोंकते जन्मतिथि का झूठा हलफनामा दिया ? ज्यादा मारक हिन्दी अनुवाद मीडिया ने ‘खबरंडी’ कर दिया. नफासत और अभिजात्य की बलात्कारी पुरुष वहशी आदतें ‘वेश्या’ और ‘रंडी’ शब्दों में भेद करती रहती हैं.

क्या वेश्या शब्द में सामन्ती नफासत और सांस्कृतिक अभिजात्य लगता होगा ! ‘रंडी’ गरीबनुमा फूहड़ अभिव्यक्ति है. अत्याचारी पुरुष समाज स्त्री के प्रति इससे ज्यादा घिनौना संबोधन कर भी नहीं सकता. गांधी ने सोच समझकर कहा ही था कि अंगरेजी नस्ल की पार्लियामेन्ट तो वेश्या है. प्रधानमंत्री के इशारे पर नाचती है. आज क्या हो रहा है ? रिंग मास्टर के इशारे पर शेर भी नाचते ही तो रहते हैं.

बेचारे प्रधानमंत्री के लिए इतने विशेषण रच लिए गए हैं कि व्याकरण रोने लगा है. प्रधानमंत्री ने विकलांगों के लिए शब्द ‘दिव्यांग‘ ढूंढ़ा. वह सरकारी हुक्म के कारण लोकचलन में आता भी गया. अब दिव्यांग कोटा खत्म कर देने से क्या उन्हें लूला, लंगड़, अंधा, बहरा, पागल लोग फिर कहेंगे ? नौजवान लड़के लड़कियां प्रेम विवाह करें तो उन्हें ‘खाप‘ प्रमाणपत्र जिंदा रहने के लिए छाती से लगाना होता है. खाप जल्लाद दहेज लुटेरे बहू की हत्या को भी ‘आनर किलिंग‘ या इज्जतदार हत्या कहते हैं.

अमित शाह ने तो प्रधानमंत्री के वायदे के लिए ‘जुमला’ नामक जान बचाऊ शब्द गढ़ा है. दोनों नेता पहले 2002 में गुजरात में मुसलमानों को जन्नत भेजने वाली तदबीरें गढ़ ही रहे थे. अब अंगरेजी शब्दों ‘सी.ए.ए., सी.बी.आई., एन.आई.ए., ई.डी., आई.टी. से इश्क करने लगे हैं.

अहमदाबाद मुंबई के बीच सबसे तेज अमीर ‘बुलेट ट्रेन’ की मृगतृष्णा चल रही है. अहमदाबाद याने कर्णावती से गौतम अडानी और मुंबई से मुकेश अंबानी हरी झंडी दिखाकर ट्रेन कब रवाना करेंगे ? वे दोनों देश को डुबाने लाल झंडी दिखा ही रहे हैं. अमीरी में जय और वीरू की इतिहास की सबसे ‘झकास’ जोड़ी है. बढि़या शब्द झकास के एक के पास ‘एंटीलिया’, दूसरे के पास ‘मुंदरा’ है. देने वाले के पास ‘सेन्ट्रल विस्टा’ है.

अंगरेजी का ‘विस्टा’ हिन्दी के ‘विष्ठा’ से मिलता जुलता है. ‘भाभी’ नामक शब्द रामायण की सीता ने पवित्र किया. बाॅलीवुड में निरुपा राय ने इसे अमर बना दिया. भाभी की रक्षा करने में लक्ष्मण तो असफल रहे. भाभी शब्द को नीता अंबानी ने अमरता प्रदान की. उन्हें जेड प्लस सुरक्षा प्रदान करके देवर ने रामायण के इतिहास को धराशायी कर दिया. ‘पचास करोड़ की गर्ल फ्रैंड’ और ‘बार बाला’ शब्द भी ईजाद किए. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में उनके प्रोफेसर बनने से ‘प्रोफेसर’ शब्द धन्य हो गया. वरना ‘प्रोफेसर’ तो भीमाकोरेगांव प्रकरण के अभियुक्त ही समझे जाते हैं.

‘पीएमओ’ शब्द भारत के दिल की नई धड़कन है. गृहमंत्री तक सचिव और चपरासी भी ‘पीएमओ’ से पूछे बिना नियुक्त नहीं कर सकते. प्रशासन धृतराष्ट्र होता है, सत्ता ‘दुर्योधन’ के हाथ ही रहती है. ‘पीएमओ’ को अपनी संजय की भूमिका पर लगातार फख्र है. रिमोट बटन दबने से सभी विभाग कठपुतलियों की तरह पीएमओ नट की उंगलियों की तरफ देखते नाचना शुरू करते हैं.

‘भाइयों, भैनों, मित्रों’ कहते ‘मन की बात’ वाले प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल में गुजराती लटके झटके में बंग नायिका को ‘दीदी ओ दीदी’ क्या कह दिया, दूकान ही उलट गई. जवाब में ‘खेला’ नामक शब्द ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का रक्तचाप ठिकाने लगा दिया. अब उनका भरोसा ‘हाई कोर्ट’ नामक शब्द पर भले हो क्योंकि ‘सुप्रीम कोर्ट’ नाम का शब्द साथ नहीं दे रहा है. ‘गवर्नर’ जगदीप धंकड़ भी फुस्स फटाका की तरह हो गए लगते हैं.

इधर ‘कोविड’ और ‘वैक्सीन’ घर-घर तक पहुंचाने में सरकार की छीछालेदर हो ही रही थी. ससुरा ‘पेगासस’ इजराइल से आ गया ! इस बीमारी का तो मलहम ही नहीं मिल रहा, ऊपर से ‘तालिबान‘ शब्द सांप छछूंदर बनाकर उगलत निगलत के बीच सरकार को फंसा गया है. फिर भी तुर्रा यह कि ‘माॅब लिंचिंग’ नामक अंगरेजी शब्द ‘जयश्रीराम’ से अपनी बिरादरी में शामिल करने की मिन्नतें करते उन्हें ‘मानववध’ को करने को पवित्र बता रहा है.

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