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दक्षिण अफ़्रीका में हिंसा और लूट-पाट की घटनाएं : भूख-बेरोज़गारी से त्रस्त ग़रीबों के ग़ुस्से का इज़हार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 26, 2021
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तत्कालिक रूप से दक्षिण अफ़्रीका में व्यापक स्तर पर हुईं लूट-पाट, तोड़-फोड़, और हिंसा की इन घटनाओं के पीछे जैकब ज़ूमा के राजनीतिक हित नज़र आ सकते हैं लेकिन वास्तव में यह एक बहाना था, जिसके ज़रिए लंबे वक़्त से ग़रीबी और भूख से जूझ रहे लोगों के ग़ुस्से और बैचेनी का अराजकता के रूप में विस्फोट हुआ.

दक्षिण अफ़्रीका में हिंसा और लूट-पाट की घटनाएं : भूख-बेरोज़गारी से त्रस्त ग़रीबों के ग़ुस्से का इज़हार

दक्षिण अफ़्रीका के आर्थिक रूप से सबसे अहम माने जाने वाले दो राज्यों कवाज़ुलू-नाटाल और गौटैंग में 9 जुलाई से लेकर 17 जुलाई तक बड़े स्तर पर हिंसा और लूट-पाट की घटनाएं हुईं. पहले पूर्व राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा को सज़ा सुनाए जाने के ख़िलाफ़ उसके समर्थकों द्वारा कवाज़ुलू-नाटाल राज्य में प्रदर्शन कि‍ए गए. जैकब ज़ूमा को भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम में चल रही जांच से संबंधित अदालत के आदेश की अवहेलना करने पर 7 जुलाई को सज़ा सुनाई गई थी.

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9 जुलाई को ज़ूमा की रिहाई की मांग कर रहे उसके समर्थकों द्वारा हिंसा शुरू कर दी गई. ज़ूमा के समर्थकों की एक भीड़ द्वारा प्रमुख शाही-मार्ग एन-3 और एन-2 को बंद कर दिया गया और 28 ट्रकों को आग लगा दी गई. दक्षिण अफ़्रीका का सबसे अहम और रणनीतिक महत्व वाला मार्ग, जो इसकी डरबन बंदरगाह तक जाता था, को भी बंद कर दिया गया, इसके अलावा जलघरों, मोबाइल टॉवर को भी तबाह कर दिया गया.

इन घटनाओं की शुरुआत ज़ूमा के समर्थकों द्वारा की गई थी लेकिन 11 जुलाई को जब जैकब ज़ूमा की ही पार्टी के मौजूदा राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा की सरकार ने दमनकारी कोरोना लॉकडाउन से संबंधित नए निर्देशों का ऐलान किया तो पहले ही भूख और बेरोज़गारी से जूझ रही, बहुसंख्यक ग़रीब आबादी भी सड़कों पर उतर आई. इसके बाद हिंसा और तोड़-फोड़ की घटनाओं का चरित्र भी बदल गया.

बड़े स्तर पर शॉपिंग मॉल, परचून का सामान और गोदामों को लूटने, तोड़-फोड़ करने और आग लगाने की घटनाएं शुरू हो गईं. मौजूदा राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा द्वारा सेना तैनात कर दी गई. हिंसा और लूट-पाट की ये घटनाएं लगभग एक हफ़्ते तक चली. इस दौरान क़रीब 337 लोगों की मौत हुई और हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार किया गया. इसके अलावा स्वास्थ्य और भोजन सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं. इस अराजक माहौल में विभिन्न समूहों ने ख़ुद को हथियारबंद कर लिया है और उन्होंने अपने-अपने इलाक़ों में बाहरी व्यक्तियों के दाख़िले को रोकने के लिए नाकाबंदी कर ली है. इस माहौल ने अवाम में नस्लीय हिंसा भड़कने का डर भी पैदा किया है.

तत्कालिक रूप से दक्षिण अफ़्रीका में व्यापक स्तर पर हुईं लूट-पाट, तोड़-फोड़, और हिंसा की इन घटनाओं के पीछे जैकब ज़ूमा के राजनीतिक हित नज़र आ सकते हैं लेकिन वास्तव में यह एक बहाना था, जिसके ज़रिए लंबे वक़्त से ग़रीबी और भूख से जूझ रहे लोगों के ग़ुस्से और बैचेनी का अराजकता के रूप में विस्फोट हुआ.

दक्षिण अफ़्रीका की आधी से अधिक आबादी भयंकर ग़रीबी की हालतों में रह रही है. बेरोज़गारी दर 32.6 फ़ीसद है, जो कोरोना काल के पहले भी लगभग 30 प्रतिशत थी. काम करने योग्य उम्र के 3.6 करोड़ लोगों में से 2 करोड़ से अधिक लोग बेरोज़गार हैं. नौजवान आबादी में हर 4 में से 3 नौजवान बेरोज़गार हैं. इन आर्थिक हालतों के अलावा पुलिस दमन भी दक्षिण अफ़्रीका में एक व्यवस्थागत समस्या है. 2019-20 के दौरान पुलिस द्वारा 629 क़त्ल किए गए.

दक्षिण अफ़्रीका के मज़दूरों-मेहनतकशों ने पहले अंग्रेज़ उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ और बाद में अल्पसंख्यक गोरे शासकों के नस्लीय शासन, जो 1948 से 1994 तक क़ायम रहा, के ख़िलाफ़ दशकों लंबा और क़ुर्बानियों भरा संघर्ष लड़ा. दक्षिण अफ़्रीका में काली आबादी बहुसंख्यक है, इसके अलावा एक अल्पसंख्या जिन्हें बहुनस्लीय (कलर्ड) कहा जाता है और भारतीय मूल के लोगों की है. इन तीन जनसमुदायों ने दक्षिण अफ़्रीका के अल्पसंख्यक डच मूल के गोरे शासकों के ख़िलाफ़ एकजुट संघर्ष लड़ा, जो राजनीति और अर्थव्यवस्था पर क़ाबिज़ थे.

1994 तक दक्षिण अफ़्रीका के काले लोगों को वोट का हक़ नहीं था, क़ानूनन 87 फ़ीसद ज़मीन पर अल्पसंख्यक गोरों को ही मालिकी हक़ था. गोरे और काले लोगों के अलग-अलग रिहायशी इलाक़े थे और कोई भी काले व्यक्ति गोरों के इलाक़े में बिना इजाज़त दाख़िल नहीं हो सकता था. अंतर-नस्लीय विवाह ग़ैर-क़ानूनी थे. काले मज़दूरों को यूनियन बनाने का हक़ नहीं था. ‘अफ़्रीकी नैशनल कांग्रेस’, कम्युनिस्ट पार्टी और ‘साउथ अफ़्रीकन कांग्रेस ऑफ़ ट्रेड यूनियनज़’ (साकटू) के संयुक्त मोर्चे ने अफ़्रीकी लोगों की नस्लीय हुकूमत के ख़िलाफ़ हथियारबंद संघर्ष में अगुवाई की.

1994 में ‘अफ़्रीकी नैशनल कांग्रेस’ और गोरे शासक वर्ग के बीच समझौता हो गया. नया संविधान तैयार किया गया और वोट के हक़ समेत अफ़्रीकी लोगों को कई जनवादी हक़ मिले. 1994 में चुनाव हुए, ‘अफ़्रीकी नैशनल कांग्रेस’ इन चुनावों में विजयी हुई और नेल्सन मंडेला पहले काले राष्ट्रपति बने. नस्लवाद पर आधारित व्यवस्था का अंत कर दिया गया और पूंजीवादी जनतंत्र स्थापित किया गया.

काले लोगों को सीमित अधिकार भी हासिल हुए, लेकिन सत्ता के चरित्र में कोई बुनियादी तब्दीली नहीं आई. यहां तक कि ‘फ़्रीडम चार्टर’ की मुख्य मांग ज़मीनी सुधारों को भी सीमित रूप में ही लागू किया गया. इसके अलावा खदानों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण, जो इस चार्टर की मुख्य मांगों में से एक थी, के साथ भी ग़द्दारी की गई. कुल मिलाकर कहा जाए तो लूट-दमन आधारित आर्थिक व्यवस्था को जैसे का तैसा रखा गया और गोरे शासकों के साथ एक छोटी-सा काला पूंजीपति वर्ग सत्ता में भागीदार बन गया.

दक्षिण अफ़्रीका पूंजीवादी रास्तों पर आगे बढ़ा और आज बाक़ी अफ़्रीकी देशों के मुक़ाबले में विकसित अर्थव्यस्था और आधुनिक इंफ़्रास्ट्रक्चर वाला देश है. यह सोना, प्लैटिनम आदि धातुओं का सबसे अधिक निर्यात करने वाले देशों में से एक है लेकिन इसके साथ ही दक्षिण अफ़्रीका दुनिया के सबसे अधिक असमानता वाले देशों में से भी एक है.

यदि केवल आमदनी की बात करें तो देश की कुल आमदनी में से 20 प्रतिशत सिर्फ़ ऊपर के एक प्रतिशत पूंजीपतियों की तिज़ोरियों में जाती है और सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोग कुल आमदनी में से 65 प्रतिशत हिस्सा हड़प जाते हैं. जहां निचली 10 प्रतिशत आबादी की वास्तविक तनख्वाहें सिर्फ़ 4 सालों में 25 फ़ीसद घटी है, वहीं इस दौरान ऊपर से दो प्रतिशत धनपशुओं की आमदनी में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

कुल धन की बात करें तो दक्षिण अफ़्रीका के कुल धन के 65 प्रतिशत हिस्से पर ऊपर के एक प्रतिशत अमीरों का क़ब्ज़ा है और ऊपर के 10 प्रतिशत लोग देश की 93 प्रतिशत धन-दौलत पर क़ाबिज़ हैं जबकि शेष 90 प्रतिशत आबादी के पास कुल धन-दौलत का सिर्फ़ 7 प्रतिशत हिस्सा ही है, ये वे विस्फोटक हालात हैं, जिनमें कोरोना के बहाने पिछले साल से थोपी जा रही पाबंदियों ने आग भड़काने का काम किया है.

दक्षिण अफ़्रीका में पिछले दिनों जो घटनाएं हुईं, वे ग़रीब आबादी के रोष का स्वयंस्फूर्त और अराजक विस्फोट थी, जिसमें मज़दूर वर्ग लगभग नदारद था. लूट-पाट और अराजकता ग़रीबी, बदहाली का अंत नहीं कर सकती, जब तक शोषण आधारित असमानता वाली पूंजीवादी व्यवस्था, जो समस्याओं की वास्तविक जड़ है, को ख़त्म नहीं किया जाता. इस पूंजीवादी व्यवस्था को इसकी क़ब्र में आधुनिक मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में अन्य दबे-कुचली और उत्पीड़ित जनता के साथ एकता के ज़रिए ही दफ़नाया जा सकता है.

एक अखबारी रिपोर्ट के अनुसार भारतीय समुदाय के लोगों का कहना है कि भारतीय मूल के लोगों को जोहानिसबर्ग और क्वाजुलु नटाल में जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है. उनका कहना है कि दक्षिण अफ्रीका में रह रहे 13 लाख भारतीयों को अभी खतरा नहीं है लेकिन स्थितियां उस ओर ही बढ़ती दिख रही हैं. इन्होंने सरकार से आग्रह किया था कि वह मदद के लिए सुरक्षाबलों को भेजे, लेकिन किसी को भी नहीं भेजा गया है. यहां रहने वाले भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के साथ आगजनी और लूटपाट की घटनाएं हो रही हैं.

दक्षिण अफ्रीका में जारी इस पूरे विवाद से यूपी के रहने वाले गुप्ता ब्रदर्स का भी करीबी संबंध रहा है. भ्रष्टाचार के इन मामलों में मूल रूप से भारत के उत्तर प्रदेश के रहने वाले गुप्ता ब्रदर्स भी आरोपी हैं. ये लोग इस समय यूएई में रह रहे हैं. जिस पचास अरब रैंड के भ्रष्टाचार के मामले में जुमा को आरोपी बताया गया है, उसी में गुप्ता ब्रदर का नाम भी शामिल है. इन भाइयों की जुमा के साथ काफी निकटता थी, जिसके चलते इन्होंने बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार को अंजाम दिया. गुप्ता परिवार ने कथित तौर पर जुमा के बच्चों को भी फायदा पहुंचाया था.

2017 में एक लाख से अधिक ई-मेल लीक हुए, जिनमें ब्यौरा था कि किस प्रकार गुप्ता बंधुओं ने अपना प्रभुत्व दिखाकर दक्षिण अफ्रिका के खजाने और उसके संसाधनों को जमकर लूटा. गुप्ता बंधु का सम्बन्ध उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से है. ये तीन भाई हैं – अतुल गुप्ता, राजेश गुप्ता और अजय गुप्ता. 1990 के दशक में ये दक्षिण अफ्रीका गये थे और वहां कम्प्यूटर के व्यापार से शुरू होकर खनन, तकनीकी कम्पनियां, मीडिया यहां तक की सरकार को भी अपने नियंत्रण में ले लिया. अब दक्षिण अफ्रीका की सरकार इंटरपोल से इस बंधु के खिलाफ रेड नोटिस मांग रही है. माना जाता है कि ये भ्रष्टाचारी गुप्ता बंधु यूएई में कहीं छिपकर बैठे हैं.

‘द गार्डियन’ अख़बार में दक्षिण अफ़्रीका में हुई घटनाओं से संबंधित एक लेख छपा है जो पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों की चिंताओं और डर को बयान करता है. इस लेख का निचोड़ यह था कि व्यापक स्तर पर असमानता ने दक्षिण अफ़्रीका में हिंसा को जन्म दिया और यह सभी के लिए ख़तरे की घंटी है. यहां सभी का अर्थ है मेहनतकश-मज़दूर आबादी के शोषण पर पल रहे पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासक.

आज लगातार बढ़ रही ग़रीबी, असमानता और बेरोज़गारी आदि विश्वव्यापी समस्याएं हैं, जिसके परिणामस्वरूप वक़्त-वक़्त पर अलग-अलग देशों में इसके ख़िलाफ़ जनाक्रोश का विस्फोट होता रहता है. कोरोना पाबंदियों के दौरान यहां ग़रीब मज़दूर-मेहनतकश आबादी की बदहाली में भयंकर इज़ाफ़ा हुआ है, वहीं पहले से ही अमीरी के शिख़र पर बैठे पूंजीपतियों का धन कई गुणा बढ़ा है. ग़रीबी-बदहाली के सागर में पूंजीपतियों की अय्याशी का टापू लंबे वक़्त तक क़ायम नहीं रक सकता. लाज़िमी ही आने वाले समय में ये हालतें बड़े जन-उभारों के तुफ़ानों को जन्म देंगी.

  • तजिंदर (सम्पादित स्वरूप)

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