Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

भारत में इस्लामोफोबिया के ख़तरे

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 20, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

भारत में इस्लामोफोबिया के ख़तरे

जगदीश्वर चतुर्वेदी, प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता

भारत में इस्लामोफोबिया के जन्मदाता हैं हिन्दुत्ववादी. ग्लोबल जन्मदाता सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ और सीआईए. इन दोनों में वैचारिक याराना है. इस्लामोफोबिया के लोकप्रिय होने का प्रधान कारण है – सामाजिक अज्ञानता और प्रतिगामिता. इसका लक्ष्य है मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा करना, नफरत फैलाना और भारत विभाजन करना.

यह भारत में मुसलमानों को सामाजिक तौर पर अलग-थलग डालने का सुनियोजित, संगठित प्रयोग है. यह स्वतःस्फूर्त्त या दंगे से उपजा विचार नहीं है, बल्कि संगठित और सुनियोजित प्रचार अभियान है. अफसोस की बात है कि इसके ख़िलाफ़ राज्यसत्ता चुप है. केन्द्र और राज्य की सरकारें और न्यायपालिका मूकदर्शक की तरह इस्लामोफोबिया को देख रही हैं.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

भारत में इस्लामोफोबिया लंबे समय चल रहा है. पहले यह दंगों के समय दिखता था, अब 24घंटे दिखता है. इसके संदेशों से सोशल मीडिया भरा पड़ा है. इस्लामोफोबिया के ज़रिए मुसलमानों को विभिन्न तरीक़ों से कलंकित करने की कोशिशें हो रही हैं, जबकि उनकी समाज में हर क्षेत्र में शानदार भूमिका रही है. मुस्लिम विद्वेष का साइड इफ़ेक्ट है मुसलमानों का सोशल आइसोलेशन. उन्हें भारत की मुख्यधारा में अछूत बनाकर, नफरत के पात्र बनाकर चित्रित किया जा रहा है.

इस्लामोफोबिया का जहां एक ओर मुसलमानों पर मनोवैज्ञानिक-राजनीतिक दवाब पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर यह फिनोमिना सेना के लिए परेशानी पैदा कर रहा है और पुलिस-सैन्य उद्योग के लिए मुनाफ़े की खान साबित हुआ है।मुसलमानों को लेकर मीडिया से लेकर विभिन्न सामाजिक- फंडामेंटलिस्ट संगठन अहर्निश असत्य के प्रचार का फ्लो बनाए हुए हैं। मुसलमानों के प्रति भय, आशंका, संदेह का वातावरण बनाए हुए हैं। इसके साथ ही काल्पनिक ख़तरे और भय का गॉसिप संसार खड़ा कर दिया गया है।मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत पैदा करने के लिए बार-बार मुसलिम औरतों की दुर्दशा को पेश किया जाता है।जबकि हक़ीक़त यह है हिन्दुओं में भी औरतों की स्थिति बहुत ख़राब है।प्रतिदिन दर्जनों हिन्दू औरतें दहेज की बलि चढ़ती हैं।सामूहिक बलात्कार की शिकार होती हैं।अन्य तबकों में भी स्थिति सुखद नहीं है।लेकिन मुसलिम औरत और मुसलिम औरतों की दुर्दशा का न्यूज़ फ्लो एक विचित्र मुसलिम विरोधी आक्रामक माहौल बना रहा है।

इस्लामोफोबिया के प्रचारक प्रतिदिन मुसलमानों के साथ भेदभाव करते हैं,परेशान करते हैं, उनके ख़िलाफ़ हिंसा करते हैं।साथ ही मुसलमानों को सामाजिक पिछड़ेपन के लिए दोषी ठहराने की कोशिश करते हैं।जबकि हक़ीक़त एकदम विपरीत है।तमाम दवाबों, नौकरियों और शिक्षा में भेदभाव और हज़ारों दंगों में अकल्पनीय आर्थिक -मानवीय क्षति उठाने के बावजूद मुसलमानों में एक बड़ा मध्यवर्ग पैदा हुआ है।एक खुशहाल शिक्षित तबका पैदा हुआ है।उसने शांतिपूर्ण ढंग से भारतीय समाज और अपने आसपास के परिवेश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

यह मिथ है कि मुसलमान पिछड़े हुए हैं. सवाल यह है क्या समाज के अन्य तबकों में पिछड़ापन नहीं है ? मुसलमानों के पिछड़ेपन या भारत के पिछड़ेपन के लिए कौन सा वर्ग और किस तरह की राजनीतिक ताक़तें ज़िम्मेदार हैं ? हमारे अनुसार भारत और मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए देशी कारपोरेट घराने, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और असमान पूंजीवादी विकास बुनियादी तौर पर ज़िम्मेदार है.

मुसलमानों या भारत के पिछड़ेपन का इस्लाम या किसी धर्म विशेष से कोई संबंध नहीं है. इसका गहरा संबंध है केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों से. इन नीतियों के कारण समाज में पिछड़ापन बढ़ा है. पिछड़ापन एथनिक समस्या नहीं है बल्कि आर्थिक समस्या है. भारत में इस्लामोफोबिया गैर-सत्ता केन्द्रों और दक्षिणपंथी संगठनों, खासकर आरएसएस की करतूत है, जिसे केन्द्र और राज्य सरकारें रोकने में असफल रही हैं.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत में ही इस्लामोफोबिया है, यह ग्लोबल फिनोमिना है. यह उन देशों में भी है जहां अधिकांश आबादी मुसलमान है और इस्लाम का समूचे समाज पर असर है, वहां पर सत्ताधारी और कमजोर मुसलमानों के बीच भेदभाव और उत्पीड़न साफ़ देख सकते हैं. इसका अर्थ यह है कि सामाजिक उत्पीड़न से धर्म का कम और राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था का अधिक संबंध है.

इस्लामिक देशों में कमजोर और ताकतवर मुसलमान के बीच इस स्थिति और भेदभाव को साफ़ देखा जा सकता है. वहीं पर ऐसे भी देश हैं जिनमें मुसलमान अल्पसंख्यक हैं और गैर-मुसलिम बहुसंख्यक हैं. बहुसंख्यकों की राजनीति करने वालों ने अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के भेद को बनाए रखा है और मुसलमानों को खदेड़कर हाशिए के बाहर फेंक दिया है. म्यांमार इस मामले में आदर्श उदाहरण है.

वहां रोहिंग्या मुसलमानों के साथ बर्बर और अमानवीय व्यवहार वहां के शासकों, खासकर सेना ने किया. इसके कारण हज़ारों मुसलमान नरसंहार में मारे गए, लाखों को देश छोड़कर पड़ोसी देशों में शरण लेनी पड़ी. ठीक यही स्थिति चीन की है. वहां बड़े पैमाने पर मुसलमानों को यातना शिविरों में बंद करके रखा गया है. भारत में मुसलमानों को विगत 75 वर्षों में लगातार दंगों और नफ़रत के ज़रिए शिकार बनाया गया, इसमें हज़ारों मुसलमानों की हत्या हुई और उनकी अरबों की संपत्ति नष्ट हुई.

अकेले कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने के बाद आठ महिने तक अघोषित लॉकडाउन रहा, जिससे वहां के व्यापारियों, जिनमें अधिकांश मुसलमान हैं, उनको 27000 हजार करो़ड रुपए से अधिक की क्षति उठानी पड़ी. यूरोप के शांत देश यूगोस्लाविया में बोस्निया-हस्बगोवनिया में हज़ारों मुसलमान मौत के घाट उतारे गए. कनाडा, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी आदि में मुसलमानों पर आए दिन हमले होते रहते हैं.

ये हमले हो रहे हैं इस्लामिक आस्था को लक्ष्य करके, जबकि हक़ीक़त यह है समाज की केन्द्रीय समस्या इस्लामिक आस्था नहीं है. इन देशों में ग़रीबी, माइग्रेशन और बेकारी की समस्या है, इनसे मुसलिम समाज भी परेशान है लेकिन इस्लामिक आस्था और मुसलिम पिछड़ेपन के सवाल उठाकर असल में उनको राष्ट्रवादी राजनीति की चक्की में पीसा जा रहा है. इस्लामीकरण का बोगस हौव्वा खड़ा किया जा रहा है, जिससे उनको सब समय भयभीत रखा जा सके.

पश्चिमी देशों से लेकर भारत तक एक ही तर्क दिया जा रहा है इस्लाम धर्म और मुसलमान पश्चिमी मूल्यों को नहीं मानते, उनके साथ सामंजस्य बिठाकर चलना मुश्किल है जबकि हक़ीक़त यह है कि मुसलमानों से पश्चिम को कोई ख़तरा नहीं है और भारत को भी कोई ख़तरा नहीं है. अनेक पश्चिमी देशों में मुसलमानों की आबादी बहुत कम है. मसलन्, पूरे यूरोप में मात्र 5 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं. अमेरिका में मात्र 1.1 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं. आस्ट्रेलिया में 2.6 फीसदी, फ्रांस में 8.8 फीसदी, स्वीडन में 8.1 फ़ीसदी आबादी मुसलमानों की है. इतनी कम आबादी के बावजूद इन देशों में मुसलमानों पर हमले बढ़े हैं.

इस्लामोफोबिया की आंधी चल रही है. मुसलमानों पर सार्वजनिक स्थानों पर हमले हो रहे हैं. मुसलमानों पर हमले करते हुए यह भी तर्क दिया जाता है कि वे इन देशों के मूल निवासी नहीं हैं, विदेशी हैं, इनको इन देशों में रहने का कोई हक़ नहीं है. यही तर्क भारत में संघियों के द्वारा दिया जा रहा है और उन पर हमले किए जा रहे हैं. यूरोप से लेकर भारत तक एंटी मुसलिम प्रौपेगैंडा के स्टीरियोटाइप रुपों की यही बुनियादी विशेषता है.

इस क्रम में हिन्दू बनाम मुसलमान, श्वेत बनाम मुसलिम का बोगस अंतर्विरोध निर्मित और प्रचारित किया जा रहा है. मुसलमान को हमलावर और समाज के लिए समस्या बनाकर पेश किया गया है. उनके राष्ट्रीय योगदान, सांस्कृतिक-राजनीतिक योगदान, साझा संस्कृति के विकास में उनकी भूमिका और इससे भी बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय विकास में उनकी भूमिका की एकसिरे से अनदेखी की गई है.

इस्लामोफोबिया का लक्ष्य है मुसलमानों के साथ समानता, एकता और भाईचारे का व्यवहार न किया जाय. उनको उपनिवेश बनाकर रखा जाय, द्वितीय श्रेणी के नागरिक की तरह रखा जाय. उनको अन्य लोगों के बराबर हक़ न दिए जाएं. मुसलमानों को भयानक, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा, सेना के लिए विध्वंसक आदि रुपों में चित्रित किया जा रहा है. उनको माइग्रेशन या शरणार्थी समस्या के कारक के रुप में चित्रित किया जा रहा है. हकीकत यह है मुसलमान जहां भी रहते हैं, सामाजिक एकीकरण कर चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक एकता के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका है. इस एकीकरण में उनका मुसलमान होना या इस्लाम कहीं पर बाधाएं खड़ी नहीं करता.

इस्लामोफोबिया के चक्कर में मुसलमानों को राष्ट्र और राष्ट्रवाद दोनों से बहिष्कृत कर दिया गया है. इन क्षेत्रों पर जब भी बातें होती हैं तो मुसलमानों को निकालकर बातें होती है. मुसलमानों के अनुभवों, अनुभूतियों और संवेदनाओं को दरकिनार करके बातें होती हैं. इस क्रम में एक ख़ास क़िस्म का मुसलिम नस्लवाद निर्मित किया गया है. संक्षेप में, इस्लामोफोबिया विशुद्ध रुप से निर्मित असत्य प्रौपेगैंडा है. यह ग्लोबल सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ की विचारधारा का महत्वपूर्ण प्रौपेगैंडा है, इसका लक्ष्य है मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम करना और मुसलमानों को अधिकारहीन बनाना.

Read Also –

एंटी मुसलिम कॉमनसेंस में जीने वाले लोग संविधान के शासन को नहीं मानते
मुगलों ने इस देश को अपनाया, ब्राह्मणवादियों ने गुलाम बनाया
साम्प्रदायिकता की जहर में डूबता देश : एक दास्तां

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

कैम्प बनाना, जनता पर दमन करना, फर्जी एनकाउंटर, गरीब आदिवासियों को आपस में लड़ाना बंद करो

Next Post

बदतर होता जा रहा है सार्वजनिक शिक्षा का क्षेत्र

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

बदतर होता जा रहा है सार्वजनिक शिक्षा का क्षेत्र

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

विद्यासागर की मूर्त्ति को तोड़कर भाजपा ने भारत की संस्कृति पर हमला किया है

May 20, 2019

राक्षस और नृशंसता का प्रतीक हिटलर का अंधविश्वास

August 6, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.