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मोदी का बद्रीनाथ दर्शन की प्रौपेगैंडा शैली हिटलर के प्रचार शैली का अंधानुकरण है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 25, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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मोदी का बद्रीनाथ दर्शन की प्रौपेगैंडा शैली हिटलर के प्रचार शैली का अंधानुकरण है
मोदी का बद्रीनाथ दर्शन की प्रौपेगैंडा शैली हिटलर के प्रचार शैली का अंधानुकरण है
‘देश में जब ऐसी आर्थिक दशा फैली हुई है कि करोड़ों मनुष्यों को एक वक्त सूखा चना भी मयस्सर नहीं, दस हजार का घी और सुगन्ध जला डालना न धर्म है, न न्याय है. हम तो कहेंगे यह सामाजिक अपराध है.’

– प्रेमचन्द

राहुल गांधी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक की तीन हजार किलोमीटर की भारत जोड़ों यात्रा कांग्रेस ने क्या शुरू की, आरएसएस-भाजपा के खेमों में पागलपन का दौरा पड़ गया है. आरएसएस का भागवत मस्जिद-मस्जिद नवाज पढ़ने दौड़ रहा है तो भाजपा ऐजेंट नरेन्द्र मोदी मंदिर-मंदिर भटक रहा है. यानी राहुल गांधी की इस भारत जोड़ों यात्रा को मिले विशाल जनसमर्थन ने आरएसएस-भाजपा के राजनीतिक खोखलेपन को उजागर कर दिया है.

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अंग्रेजों से देश की आजादी और उसके बाद के भारत के विकास में जिस परिवार ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उसमें नेहरु परिवार सबसे महत्वपूर्ण हैं. 1947 से पहले मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी समेत उनके परिवार के अनेक सदस्यों ने अपने-अपने जीवन का महत्वपूर्ण वर्ष जेलों में बिताया है, तो वहीं 1947 के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी ने इस देश की सुरक्षा और विकास के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे दी. यानी, भारत के आर्थिक-राजनीतिक विकास में नेहरु परिवार का सीधा संबंध है.

इसके ठीक उलट आरएसएस-भाजपा का इतिहास देश से गद्दारी और दंगाइयों का रहा है, जिसने न केवल महात्मा गांधी की हत्या की बल्कि भारत से अमर शहीद भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी के तख्ते पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश विभाजन से लेकर अब तक हजारों प्रायोजित दंगों में सक्रिय भूमिका निभाकर लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा है. आज वही आरएसएस-भाजपा देश की सत्ता पर झूठ-सच बोलकर काबिज होने के बाद देश को 1947 से पूर्वकाल में ले जाने की अथक कोशिश कर रहा है.

आरएसएस-भाजपा इसी कोशिश में मस्जिद-मस्जिद, मंदिर-मंदिर की यात्रा कर रहा है. कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी मोदी के बद्रीनाथ मंदिर यात्रा पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखते हैं –

आपको गलतफहमी है कि मोदी बद्रीनाथ भगवान के दर्शन करने गए थे, सच यह है कि वे अपनी फोटो शूटिंग के लिए गए हैं. भगवान बहाना है असल में हिंदुत्व के नायक के रुप में अपना प्रौपेगैंडा करना है. यह प्रौपेगैंडा हमेशा किसी न किसी मंदिर की यात्रा और भव्य आयोजनों से शुरु होता है. प्रौपेगैंडा की यह शैली हिटलर की प्रचार शैली का अंधानुकरण है. हिटलर अपने को नायक बनाने के लिए चर्च पर भव्य सजावट कराता था. चर्च की भव्य सजावट ने उसे महानायक बना दिया. मोदी ठीक वही पद्धति अपना रहे हैं.

बद्रीनाथ केदारनाथ गंगा सोमनाथ करते-करते देश की समूची अर्थव्यवस्था मोदी ने चौपट कर दी. करोडों लोगों की नौकरी चली गई लेकिन नौकरियां बचाने का कोई काम मोदी ने नहीं किया. रिजर्व बैंक खाली पड़ी है. देश को नहीं मालूम कि कितने का कर्ज है, कितने बेकार हैं, कितने लोग भुखमरी के शिकार हैं. आप इतने पर ही खुश हैं कि मोदी गंगा गए, सोमनाथ गए, राममंदिर गए, गंगा गए, दीपदान करने गए. ये काम तो वे बिना प्रधानमंत्री बने भी कर सकते थे. ये सब काम करने के लिए ही प्रधानमंत्री बने थे तो बकबास भाषण क्यों किए ? बोगस वायदे क्यों किए ?

यही कहते कि प्रधानमंत्री बनूंगा तो तीर्थाटन करूंगा, दीपदान करूंगा, बद्रीनाथ केदारनाथ जाऊंगा, जनता से झूठ बोलना, जनता के जीवन में हस्तक्षेप करके उसकी अर्थव्यवस्था को चौपट करना क्या यही भगवान से सीखा ? भगवान ने कभी किसी को यह सीख नहीं दी कि जनता की आर्थिक रक्षा न करो. जनता के रोजगार पर हमले करो. जनता से अहर्निश झूठ बोलो. जनता में नफरत पैदा करो. ये सब भगवान के किसी ग्रंथ में नहीं लिखा.

सवाल यह है यह कैसा पीएम है जिसे जनता की पीडाएं और तबाही नजर नहीं आती ? सिर्फ अपनी गद्दी बचाने की अहर्निश चिन्ता लगी रहती है. दीपदान, भगवान की पूजा आदि से आम जनता को नौकरियां मिलने वाली नहीं हैं, किसानों को इनकी फसल के वाजिव दाम मिलने वाले नहीं हैं, यह साधारण सी बात आपके भी दिमाग में नहीं आ रही.

भगवान के मंदिरों और दीपदान से लोकतंत्र पैदा नहीं हुआ. लोकतंत्र का जन्म आम जनता को संगठित संघर्ष में उतारकर, नीतिगत कार्यक्रम पर एकमत करके हुआ है. उसके लिए हजारों लोगों ने जान दी, लाखों जेल गए, यातनाएं झेली, फांसी पर चढ़े.

लोकतंत्र का मललब भगवान पूजा नहीं है. भगवान पहले भी था पर लोकतंत्र नहीं था, मंदिर पहले भी थे,पर लोकतंत्र नहीं था. लोकतंत्र का जन्म हुआ आम जनता को धर्म के आभामंडल से बाहर लाकर, यथार्थ देखने का नजरिया विकसित करके.

नरेन्द्र मोदी सुनियोजित ढ़ंग से यथार्थ मत देखो, भगवान देखो. इस लाइन पर आम जनता को ठेल रहे हैं और राष्ट्र-राज्य और आम जनता की आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक क्षति कर रहे हैं. उन्होंने आम जनता में यथार्थ मत देखो, मोदी देखो. जनता के कष्ट मत देखो, भगवान देखो, यह धारण पैदा करके दिमागी और आर्थिक कंगाली पैदा की है और यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है.

पूजा का प्रदर्शन उसके धार्मिक मर्म को रुपांतरित कर देता है. अब पूजा, धर्म की बजाय राजनीति का अंग बन जाती है. राजनीति में वह क्या पैदा करेगी, इस पर अलग अलग राय है. मोदी के लिए हिंदू की पहचान महत्वपूर्ण है और इसीलिए वे उसका चुनाव के पहले इवेंट बनाते हैं. केदारनाथ शो उसका एक पहलू है.

बदरीनाथ मंदिर के गर्भगृह में मोदी का प्रवेश

श्याम सिंह रावत लिखते हैं – गंभीरतापूर्वक विचार करने से यह साफ समझ आता है कि यहूदियों से हिंदू बने चितपावनों के एक वर्ग द्वारा द्वारा तथाकथित ‘हिंदू धर्म’ और उनके द्वारा आरोपित ‘हिंदुत्व’ को नष्ट-भ्रष्ट किया जा रहा है. वह चाहे सनातन धर्म को नये सिरे से वैदिक ऋषियों की शिक्षाओं के एकदम विरोधी हिंदुत्व के रूप में पारिभाषित करना हो या फिर भक्तिभाव का राजनीतिकरण, भगवा वस्त्र की तौहीन, परंपराओं की अवहेलना और तीर्थों की मर्यादा को भंग कर उन्हें पर्यटक स्थलों में रूपांतरित करना हो, सब प्रकार से सनातन परंपरा को नष्ट-भ्रष्ट किया जा रहा है.

कुछ ही दिनों में शंकराचार्य परंपरा भी खत्म कर उनकी जगह पर सरसंघचालक बैठ जायेगा, जिसकी शुरुआत अयोध्या में राम मंदिर निर्माण प्रारंभ करते समय ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य की अवहेलना कर की जा चुकी है और किसी एक भी हिंदू ने इस पर आपत्ति नहीं की क्योंकि उन सबका बौद्धिक बधियाकरण पहले ही किया जा चुका है.

आपको याद होगा कि केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित ऐतिहासिक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रबंधन एवं प्रशासन में त्रावणकोर के पूर्ववर्ती शाही परिवार के अधिकार को जुलाइ 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने परंपरा के कारण बरकरार रखा था. आदिगुरु शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों में चार धार्मिक पीठों की स्थापना करते समय कुछ नियम और परंपराओं का श्रीगणेश किया था.

उसी परम्परा के अनुसार इन चारों वैष्णव पीठों से सम्बद्ध चार भिन्न-भिन्न धामों के गर्भगृह में मुख्य पुजारी (रावल) के अतिरिक्त कोई अन्य प्रवेश नहीं कर सकता है, न वहां की तस्वीर ली जा सकती है और न ही पेंटिंग व स्कैच बनाये जा सकते हैं. किन्तु सत्ता के नशे में चूर नरेंद्र दामोदर दास मोदी धार्मिक वर्जनाओं को लतिया कर श्री बदरीनाथ मंदिर के गर्भगृह में अपने साथ एएनआइ के फोटोग्राफर को भी ले गये और खूब फोटोशूट भी कराया.

तीर्थ की मर्यादा भंग करने की इस ऐतिहासिक घटना पर देश के राष्ट्रपति को एक प्रसिद्ध मंदिर में पूजा-अर्चना करने के लिए प्रवेश करने से रोकने वाले देश के धर्मधुरंधर पंडा समाज और तीर्थ पुरोहितों ने मौन धारण कर लिया है. बहरहाल, इस घटना से कुछ सवाल जरूर पैदा हो गये हैं जिनके उत्तर बदरीनाथ धाम के तीर्थ पंडों-पुरोहितों, हिंदू समाज और शंकराचार्यों को देना चाहिए –

  • क्या श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति ने इस घटनाक्रम पर आपत्ति दर्ज की थी ?
  • यदि नहीं, तो क्या वह मानती है कि मंदिर के गर्भगृह में किया गया यह प्रवेश नियमानुसार ही था ? और यदि नियमानुसार ही था तो क्या वह ‘श्री बदरीनाथ केदारनाथ अधिनियम-1939’ अंतर्गत सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित अथवा तदोपरांत किसी संशोधन में विधिसम्मत नियम के तहत अभिलिखित है ?
  • क्या भविष्य में किसी भी भक्त को बदरीनाथ मंदिर के गर्भगृह की फोटो लेने से रोका नहीं जायेगा और वह यहां की फोटो ले सकेगा ?
  • यदि नहीं, तो क्या भगवान के दरबार में भक्तों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव न्यायपूर्ण होगा ?

श्रद्धालुजन श्री बदरीनाथ मंदिर के गर्भगृह की इस पहली ऐतिहासिक तस्वीर को हिंदुओं के बौद्धिक बधियाकरण के प्रमाणस्वरूप सहेजकर रख सकते हैं.

मोदी की उज्जैन यात्रा पर करोड़ों खर्च

मोदी के उज्जैन यात्रा का खर्च

मोदी केदारनाथ बद्रीनाथ के दौरे पर है. कुछ दिनों पहले वे उज्जैन आए थे. मोदी की उज्जैन यात्रा के लिए आसपास के जिलों से 1300 बसे और 100 मैजिक से कुल 68 हजार लोगों को आसपास के जिलों से ढोकर लाया गया. कुल दो करोड़ सात लाख़ 38 हजार सात सौ सिर्फ इस आवाजाही में खर्च हुए. इन 68 हजार लोगों के भोजन पानी के लिए एक करोड 32 लाख़ की रकम दी गई. यानि कुल 3 करोड़ 39 लाख़ 38 हजार सात सौ की राशि ऐसे धत करम पर हम जैसे टैक्सपेयर्स से लेकर खर्च की गई है. और ये तो ऑफिशियल है अन ऑफिशियल रूप से तो कहीं ज्यादा खर्च किए गए होंगे.

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Comments 1

  1. Rajiva Bhushan Sahay says:
    4 years ago

    “प्रतिभा एक डायरी” में दर्ज अब तक के सर्वश्रेष्ठ कृतियों में एक। क्योंकि आज के अंधभक्तों को भी आश्वस्त करने वाली शैली में लिखी गई है यह लेख।
    इसे और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए मेरे कुछ विचार निम्नलिखित हैं:-
    (1) शीर्षक में “प्रोपेगैंडा शैली” बदलकर “अधार्मिक प्रोपेगैंडा” कर दिया जाए। आशा है लेखक-संपादक इस सुझाव को अपने अधिकार क्षेत्र में अवैध हस्तक्षेप नहीं मानेंगे।
    (2) परम आदरणीय मुंशी प्रेमचंद का उद्धरण जहां से लिया गया है उस कालजयी कृति का नाम दिया जाए तो आने पीढ़ियों के लिए विचारोत्तेजक होगा।
    (3) देश-समाज की चिंता करने वालों को चाहिए कि इस लेख को डाउनलोड कर अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार अनगिनत पम्फलेट बनवाकर जब-जब उचित मौका मिले अधिकाधिक धार्मिक समारोहों में, ग्राम-सभाओं, आदि, में बाँटें। जो लोग पढ़ना नहीं जानते या पढ़ना नहीं चाहते उन्हें पढ़कर सुनाया जाए। अहिंदीभाषी लोगों के बीच भी उनके भाषा में अनुवाद करके या करवाकर बांटा जाए, पढ़वाया जाए।
    धन्यवाद। शुभकामनाएं।

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