Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

छठ : धार्मिकता के लबादे के नीचे मांग-पत्रों की फेहरिस्त

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 25, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
छठ : धार्मिकता के लबादे के नीचे मांग-पत्रों की फेहरिस्त
छठ : धार्मिकता के लबादे के नीचे मांग-पत्रों की फेहरिस्त
राम अयोध्या सिंह

इधर धनतेरस और दीवाली मनी नहीं कि पीछे से छठ व्रत धकियाने के लिए लाइन में लग गया. लोग छठ व्रत को धार्मिकता का उच्च सीमा समझते हैं. नहाय-खाए से लेकर परना तक की सारी विधियां और कवायद इस तथ्य की पुष्टि करेंगे. जब हम बचपन में थे तो गांव में अधिक से अधिक पांच से दस घर के लोग ही इस व्रत का निर्वाह करते थे. तब कोई तामझाम नहीं था. सब कुछ बिल्कुल सीधा और सादा. मेला जैसा कुछ भी नहीं था.

शाम से लेकर सुबह तक घाट पर बिजली की चकाचौंध की तो कोई कल्पना भी नहीं करता था. तालाब, आहर या कुएं के पास थोड़ा गड्ढा खोदकर पोखरा का नाम दे दिया जाता था. भीड़ भाड़ भी नहीं होती थी. भीड़ के नाम पर अपने घर के अलावा अगल-बगल के दो-चार घर की महिलाएं शामिल होती थी. पुरुष में एक जवान जो घर से घाट और घाट से घर तक प्रसाद का दउरा ढ़ोता था और साथ में बच्चे होते थे. कोई खास गहमागहमी नहीं होती थी.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

लोग-बाग छठ से एक-दो रोज पहले से ही प्रसाद की तैयारी में लग जाते थे. उस समय तो गांव के नजदीक ही जितने फल उपलब्ध हो सकते थे, उतने ही फल आते थे. हां, ठेकुआ खूब बनता था. इनको बनाने के लिए आम की लकड़ी खास तौर पर मंगवाई जाती थी. शुद्धता तो थी, पर उसका प्रदर्शन नहीं था. फोटो और कैमरा तो उस समय सपना ही था.

लेकिन, बच्चों की खुशी परना तक गायब रहती थी, कारण उन्हें छठी मइया और सुर्य भगवान का ऐसा डर दिखलाया जाता था कि बेचारे सहमे-सहमे से रहते थे कि कहीं प्रसाद की कोशिश चीज उनसे छुआ न जाए. अब आप ही बताइए कि यह बच्चों के साथ अत्याचार था कि नहीं. जो देवी या देवता मासूम बच्चों को भी डरवाता हो, क्या वह भगवान हो सकता है ?

मैंने नहीं देखा कि कोई भी व्यक्ति इस पर्व को बिना शर्त मनाता हो. हर किसी के पास मांगपत्र होता था छठी मइया या सुर्य भगवान से मांगने के लिए. सबसे ज्यादा डिमांड में बेटा होता था. उसकी मांग सबसे ज्यादा थी. बढ़िया दामाद भी मांगों में शामिल होते थे. किसी को रोग से मुक्ति तो किसी को मुकदमे में जीत की जरूरत होती थी. बिना मांगपत्र के कोई भी नहीं जाता था छठी मइया या सुरुज भगवान के दरबार में.

पहले और आज भी कुष्ठ रोग या सफेद दाग के लिए समाज में यह मान्यता प्रचलित है कि सुर्य भगवान या छठी मइया के प्रकोप से ही किसी को ऐसे रोग होते हैं और ऐसे लोग स्वयं या किसी के माध्यम से यह पर्व अक्सरहां करते हैं. इन दिनों गांव से शहर तक सभी शोहदों की सक्रियता और धार्मिकता इस कदर बढ़ जाती है कि लगता है वे धर्म के रस में सराबोर हो गए हैं.

सचमुच ही वे धर्म के अवतार लगते हैं. घाटों की सफाई से लेकर उनकी सजावट और व्रतियों के लिए आवश्यक इंतजाम तथा सुबह में घाट पर चाय और घर में भोजनादि की व्यवस्था भी उन्हीं के कंधों पर होती है. घर से घाट तक प्रसाद का दउरा ढोने का महती काम भी उनके ही जिम्मे होता है, जिसे वे बखूबी निभाते हैं.

लेकिन, ऐसी सारे कवायदों के पीछे का भी एक सच है, और वह है कि अधिकतर किशोरवय और नए नवजवान बने नवहियों के बीच सबसे अधिक चर्चा होती है कुंवारी जवान लड़कियों के साथ छेड़छाड़ और फूहड इशारेबाजी की. घाट पर पतंगबाजी और पटाखों के कानफोडू शोर से फुरसत पाते ही ऐसे शोहदे अपने असली रंग में आ जाते हैं और अपने इस नए रूप का भौंडा प्रदर्शन वे डिस्को और डिजे पर फूहड़ और अश्लील भोजपुरी गानों पर फिल्मी डांस करते हुए करते हैं. हर कोई इसमें अपना फन दिखाने का भरसक प्रयास करता है.

सुर्य भगवान और छठी मइया न जाने कब कहां दबे पांव गायब हो जाते हैं. धार्मिकता के सारे लबादे उतर जाते हैं और वे अपने असली रूप में नजर आने लगते हैं. सुर्य और छठी मइया का प्रसाद खाते ही वे सारे बंधनों से मुक्त हो जाते हैं. दस-बीस के गिरोह में ऐसे लड़कों को अपनी काले कारनामे दिखाते हुए आसानी से देखा जा सकता है. तब इन्हें न देवी या भगवान का डर होता है और न ही पुलिस का. पुलिस भी अक्सर इनसे बचने में ही अपनी भलाई समझती है. कारण, वह इस बात को अच्छी तरह से जानती है कि इनके विरूद्ध कुछ भी करने का मतलब है कि थाने पर इनके नेता अपनी अकड़ और हैसियत दिखलाने के लिए जरूर हो मौजूद होंगे. अब कौन इनके मुंह लगे.

Read Also –

हिंदू धर्म का कलंकित चेहरा – देवदासी, धर्म के नाम पर यौन शोषण
कैसे निर्मित होता है व्यापारी, नेता और धर्मगुरु का त्रिकोणीय संश्रय ?
पूजा पांडाल में गांधी वध : गांधी को मारने का मायावी तरीका

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

मोदी का बद्रीनाथ दर्शन की प्रौपेगैंडा शैली हिटलर के प्रचार शैली का अंधानुकरण है

Next Post

अनकही

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

अनकही

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

करोना काल में प्रवासी मजदूर

May 24, 2022

फिजिक्स के नोबल

October 8, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.