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देश किस ओर ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 12, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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हमारे देश में झांकियों व शोभायात्राओं को निकालने की परम्परा है. हमें मालूम है कि इसके द्वारा खास चीजों पर प्रकाश डाला जाता है. इस साल की रामनवमी में भी यह परम्परा देखने को मिली. रामनवमी में निकलीं अशोभनीय शोभायात्राओं में हमारे आज के विषय ‘देश किस ओर’ की झलक मिल रही थी- एक तरफ तलवार, हॉकी स्टिक (!!) और भगवा झण्डा लिए उकसावेबाज, रक्तपिपासु भीड़ थी जो मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ नारा लगा रही थी तो दूसरी ओर इसी भीड़ में लम्बे बांसों पर हमारा राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहा था. प्रतीक एकदम फिट था- दंगाइयों के साथ, लोकतंत्र विरोधी हिन्दू राष्ट्र के पुरोधाओं के साथ, भारतीय राज्य की सांठ-गांठ का यह प्रतीक था. शायद यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तिरंगा लिए मवाली युवा बता रहे थे कि “यह तिरंगा इस बात का प्रतीक है कि हमने भारतीय राज्य का अपहरण कर लिया है” और खुलेआम इसका ऐलान करते हैं.

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रामनवमी की शोभायात्रा के नारों पर गौर फरमाइए – ‘पाकिस्तान में भेजो या कत्लेआम कर डालो’, ‘आस्तीन के सांपों को न दुग्ध पिलाकर पालो’, ‘टोपी वाला भी सर झुकाकर जय श्री राम बोलेगा’, ‘जय श्री राम– जय श्री राम’, ‘जलते हुए दिए को परवाने क्या बुझाएंगे – जो मुर्दों को नहीं जला पाते वो जिंदों को क्या जलाएंगे’, ‘जो छुएगा हिंदुओं की हस्ती को, मिटा डालेंगे उसकी हस्ती को’, ‘रहना है तो वहीं मुर्दास्तान बनकर रहो, औरंगजेब, बाबर बने तो खाक में मिला देंगे तुम्हारी हर बस्ती को’ (आज तक चैनल से)

और देखिए, आला देशभक्त हमारे वर्तमान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा जिन्होंने इसके पहले बॉलीवुड के घटिया फिल्मों के दर्शकों को भी देशभक्ति में सराबोर करने के लिए सिनेमा के अंत में राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने का फरमान जारी किया था, ने भी देश भर में हुए इस खेल में तिरंगा के इस अपमान का कोई संज्ञान न लिया, रामनवमी जुलूसों में आए ये बदलाव उन्हें भी पसंद हैं क्या ? रामनवमी जुलूसों से हमारी राज्य सरकारों व हाई कोर्टों को भी कोई दिक्कत नहीं थी. लोकतांत्रिक परम्पराओं में निहित विरोध की वैधानिकता पर चोट करते हुए जिस कोर्ट ने पटनावासियों के आवागमन में होने वाली बाधाओं को दूर करने के नाम पर शहर में जुलूस-प्रदर्शन को ही बंद कर दिया, उसी ने विभिन्न शहरों-कस्बों में बलवाईयों द्वारा पुलिस की अनुमति वाले रामनवमी जुलूस के रूट को बदलकर दंगा फैलाने के प्रयासों पर चुप्पी साध ली. पर ज्ञात हो कि प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटिज एक्ट या एस॰सी॰/एस॰टी॰ एक्ट को हलका किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध हुए बंद के दिन तोड़-फोड़ आदि की घटनाओं पर तुरंत हाई कोर्ट ने सक्रिय होकर बड़े पुलिस कप्तान को ही तलब कर लिया.

हम यहां इस बात पर जोर दे रहे हैं इसलिए कि कार्यपालिका, विधायिका के बाद न्यायपालिका भी देश के भगवाकरण के लिए काम करती प्रतीत होती है. मुसलमानों के बीच पाई जाने वाली तीन तलाक, हलाला व बहुविवाह प्रथा जैसी परम्पराओं के खिलाफ महिला अधिकारों के नाम पर सुप्रीम कोर्ट फैसले तो देती है लेकिन दूसरी ओर यही कोर्ट विरोधाभासी ढंग से सक्रिय होकर दहेज हत्या के आरोपियों के प्रति संवेदनशील होकर फैसला सुनाती है ? क्या यह एक समुदाय को लक्षित करना नहीं है ? हम पूछना चाहते हैं कि बहुविवाह प्रथा को हिन्दुओं के बीच खत्म करने के लिए उसे संज्ञेय जुर्म में क्यों नहीं शामिल करती है यह न्यायपालिका ? वाह! आप प्रगतिशील हैं मुस्लिम महिलाओं के लिए और प्रतिगामी हिन्दू महिलाओं के लिए ! स्त्री प्रश्न के लिए दो मापदंड हैं आपके पास ? इसमें अंतर्निहित बात क्या है ? साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण या महिला समानता ? न्यायालय क्या एक बार फिर से इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के दौरान किए गए अपने कारनामे को दुहराने वाला नहीं प्रतीत होती ?

मोदी सरकार न्यायालय को अपनी तरह का बनाने के लिए विधिवत कोशिश कर रही है. अपनी छद्म देशभक्ति को लादने के लिए और अपने अंधराष्ट्रवादी व साम्प्रदायिक एजण्डे के लायक व्यक्तियों की नियुक्ति के लिए भाजपा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ के नाम पर जजों के पदों पर खास व्यक्तियों की नियुक्ति पर रोक लगाने के प्रावधान की वकालत करती है. आज न्यायपालिका की स्थिति पर लगातार गम्भीर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं और ऐसा आरोप न्यायालय के अंदर से भी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जजों ने लगाया है.

लोकतंत्र का चौथा खंभा यानी मीडिया ? इसी बीच एक बेवसाइट ‘कोबरापोस्ट’ द्वारा किए गए ‘स्टिंग ऑपरेशन’ का वीडियो (ऑपरेशन 136) सामने आया है, जिसमें देश के प्रमुख चैनेलों के वरिष्ठ मैनेजर या पत्रकार पैसे के बदले साम्प्रदायिकता पक्षीय हिन्दुत्व के प्रचार के लिए रजामंदी देते नजर आ रहे हैं. इससे लोकतंत्र का चौथा पाया कही जानेवाली मीडिया की स्थिति साफ तरीके से उजागर होती है. जे॰एन॰यू॰-कन्हैया कांड के समय ही जिस तरह से देश के सामने झूठ को सच और सच को झूठ बनाकर पेश किया गया, वह मीडिया के रोल को उजागर करता है. पैसे के बदले हो, पद-रसूख के लोभवश हो या फिर ‘‘विचारधारा’’ के तहत हो आज सच्चाई है कि मीडिया का बड़ा और प्रभावी भाग झूठ-फरेब को सनसनीखेज ढंग से पेश करता है और जनमानस को प्रभावित करता है. यह एक वृहदाकार ऑपरेशन है जिसमें पूंजीपति से लेकर सरकार और संघ परिवार संलिप्त है. हम आज फिर जे॰एन॰यू॰ प्रकरण की बात कर रहे हैं क्योंकि इसने बहुत ही चालबाजी से पूरे विमर्श को देशभक्ति बनाम देशप्रेम में बदल दिया, जिसमें छद्म देशभक्त लोगों ने ऐसे झूठ बोले कि उसका दुष्प्रभाव आज भी देखने को मिलता है. भले ही बाद में इसकी सच्चाई सामने आ गई हो. पूरे तंत्र का फरेब नंगा हो गया हो लेकिन एक विमर्श तो चल पड़ा ही जिसने छद्म देशभक्ति को लोगों के बीच प्रतिष्ठित किया. गृह मंत्री राजनाथ सिंह तक ने एक फर्जी ट्वीट के आधार पर यह दावा किया कि कन्हैया आतंकी सरगना हाफिज सईद के इशारे पर अफजल गुरू का समर्थन कर रहे हैं.

पूरी वारदात की स्क्रिप्ट से यह लगता है कि सरकार ने एक बड़ा फ्रेमअप किया था. क्या इतिहास में शासकों की ओर से प्रतिक्रिया को सशक्त करने के लिए, जनतंत्र को कुचलने के लिए इस तरह के फ्रेमअप का इस्तेमाल नहीं हुआ है ? मीडिया तभी से सुनियोजित ढंग से एक छद्म राष्ट्रवादी, साम्प्रदायिकता पक्षीय उन्मादी वातावरण बनाए जा रही है. इन्होंने तो विरोधियों को ‘अफज़ल गैंग’ की संज्ञा ही दे दी है.

1975-77 के आपातकाल के दौरान प्रेस की भूमिका पर कहा गया था कि “प्रेस को झुकने के लिए कहा गया था लेकिन उसने तो रेंगना पसंद किया.” इस समय तो प्रेस सरकार के चियर लीडर का काम कर रहा है. हकीकत को सामने लाना तो दूर रोज सरकार और उसके साम्प्रदायिक व धुर दक्षिणपंथी एजण्डे के पक्ष में झूठ, फरेब और अंधराष्ट्रवादी व अंधविश्वासी बातों का प्रचार करता है, सनसनी फैलाता है. आज चित्र काफी भिन्न और खतरनाक नजर आता है लेकिन बात यहीं तक नहीं है. सरकार और उसके नजदीकी पूंजीपतियों और उनके घरानों की आलोचना करने वाले पत्रकारों को उनके पदों से मुक्त किया जाता है, निकाल-बाहर किया जाता है. ‘आज तक’ चैनल से पुण्य प्रसुन बाजपेयी, ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से बॉबी घोष और ‘ई॰पी॰डब्ल्यू॰’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के सम्पादन से प्राणजय गुहा ठाकुरता का निकाला जाना इसके चंद उदाहरण हैं. इतना ही नहीं गौरी लंकेश जैसे निर्भीक पत्रकारों की हत्या यह दिखाती है कि अभिव्यक्ति को रोकने के लिए यह घुर दक्षिणपंथी गिरोह किस हद तक जा सकता है.

लोकतंत्र के तथाकथित चौथे खंभे के पतन से उभरने वाले दो सवाल हैं – एक है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल और दूसरा जो बहुत ही महत्वपूर्ण है वह है इस साम्प्रदायिक, अंधराष्ट्रवादी जहर से प्रभावित आम जनता का एक हिस्सा जो सक्रियतापूर्वक या निष्क्रिय ढंग से ही सही इस झूठ को अमृत वाणी समझता है और जिसे सच की पड़ताल नहीं है.

याद हो कि ‘इमरजेन्सी’ के समय आम लोगों का सरकारी मीडिया पर या सत्तापक्षीय मीडिया पर भरोसा नहीं था. रेडियो सुनने वाले बी॰बी॰सी॰ सुनना पसंद करते थे न कि ऑल इण्डिया रेडियो और अंग्रेजी अखबार पढ़ने वाले ‘इण्डियन एक्प्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ सरीखे अखबारों पर भरोसा करते थे लेकिन आज आम जन के बीच झूठ-फरेब घर करता जा रहा है. हाल के दिनों में सोशल मीडिया के बढ़ते दायरे ने इसे अंजाम देने में कारगर भूमिका निभाई है. हम यहां अन्य दक्षिणपंथी प्रवृत्तियों से भिन्न इस चरम दक्षिणपंथी फासीवादी प्रवृत्ति की खासियत के बारे में बात करना चाहेंगे. वह दूसरी दक्षिणपंथी धाराओं जैसी जनता से कटी धारा नहीं होती बल्कि जनता के खास तबकों के बीच अपना पैठ बना लेती है और हमें इस बात का ख्याल कर आज के भारत की दिशा पर सोचना चाहिए और अपने संघर्षों में इसका ध्यान रखना चाहिए.

आज फेक या जाली न्यूज को लोग ध्रुव सत्य की तरह इसलिए भी लेते हैं क्योंकि टी॰वी॰ चैनेलों में आने वाली बातें गलत नहीं लगती, जाली विडियो देखकर हम सवाल नहीं करते. विडियो होना ही, टी॰वी॰ पर बात आना ही अपने आप उसकी विश्वसनीयता को बढ़ा देता है. इसके साथ ही आम लोग भी ‘व्हाट्सएप’ के द्वारा किसी स्रोत से फैलाए जा रहे इस तरह के समाचार को दूसरों को भेजते रहते हैं और इस जाल में फंसकर अंधकार के सिपाही बन जाते हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि भाजपा का आई॰टी॰ सेल बहुत बड़ा है और दिन-रात सोशल मीडिया पर गाली-गलौज से लेकर तरह-तरह के झूठ व अफवाह फैलाने के काम में संलग्न है.

हाल ही में कर्नाटक में जाली समाचार के वेबसाइट ‘पोस्टकार्ड न्यूज’ चलाने वाले को अफवाहों और जाली न्यूज के सहारे साम्प्रदायिक तनाव फैलाने पर जब गिरफ्तार किया गया तो भाजपा के नेतागण खुलेआम उसके पक्ष में आ खड़े हुए. जाली न्यूज का सबसे ज्यादा इस्तेमाल भाजपा व संघ परिवार करता है और वही इस नाम पर दूसरे के न्यूज पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश मेें है.

हाल ही में सूचना व प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी ने फेक न्यूज पर रोक लगाने के लिए एक कानून लायी, जो वास्तव में उसके फेक न्यूज के पक्ष में और सही लोगों के विरोध में था. खैर, इसे सरकार ने अभी लागू करने से परहेज किया है.

आज के दिन में शासक वर्ग के हाथ में यह एक सशक्त माध्यम है झूठ की बाढ़ से सच्चाई को तोप देने का और हमारे शासक इसका बखूबी इस्तेमाल करते हैं. यदि जर्मनी के हिटलर के कुख्यात मंत्री गोयबेल्स को हजार बार झूठ बोलना पड़ता था उसे सच बनाने के लिए तो आज झूठ सोशल मीडिया व इंटरनेट के जरिए एक क्लिक से सच में बदल जाता है. भाजपा के लिए पूंजीपतियों ने अपनी झोली खोल रखी है और वह अपने पूरे धन बल के साथ झूठ व अफवाह फैलाकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर अपने जनवाद विरोधी एजेण्डा को आगे बढ़ा रही है.

इंटरनेट के आने से यह सब आसान हो गया हैै और दुष्प्रचार करने की पूंजी की ताकत सहस्र गुना बढ़ गई है. जासूसी या सर्वेलांस करने के लिए भी जनता पर इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. आज फेसबुक-कैम्ब्रिज एनालिटिका कांड दिखाता है कि कैसे लक्षित प्रचार द्वारा चुनाव प्रभावित किए जा रहे हैं. जनता के बीच झूठे प्रचार कर जनमानस को प्रभावित करनेवाला यह तंत्र आज अतिशक्तिशाली बन गया है. पूंजी इसका भरपूर इस्तेमाल कर रही है और इससे इसका लोकतंत्र विरोधी चरित्र भी उजागर होता है.

इस अंधकार भरे माहौल की जड़ों को मजबूत बनाने के लिए पाठ्यक्रमों में फेर-बदल कर बच्चों के दिमाग को साम्प्रदायिक झूठ-फरेब से दूषित किया जा रहा है. आर॰एस॰एस॰ के दीनानाथ बतरा का न्यास जो संघ परिवार का ही हिस्सा है, इतिहास पुनर्लेखन कार्य में लगा हुआ है. यह तो गालिब, पाश से लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर तक को पाठ्यक्रम से हटाने की पैरवी करता है. दूसरी ओर पी॰एन॰ओक जैसे कुख्यात व घटिया ‘इतिहासकारों’ को प्रतिष्ठित किया जा रहा है.इन ‘इतिहासकारों’ के अनुसार ताजमहल तेजोमहल है और काबा में इनका शिवलिंग स्थापित है! इतिहास पुनर्लेखन के तहत मिथक को इतिहास और इतिहास में झूठ और तथ्यहीन बातों को डालकर बच्चों का दिमाग बरबाद किया जा रहा है. इतना ही नहीं जिनके पास अपना कहने लायक कोई नायक नहीं है स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जनांदोलनों तक का, केवल दंगाइयों और दूषित, कलुषित दिमागों का जमघटतंत्र है वह सामंती राजाओं और सामंती परम्पराओं को ही महिमामंडित कर सकता है, इसके इतिहास पुनर्लेखन की एक बानगी है.

महाराणा प्रताप को अकबर पर विजय का श्रेय दिया जा रहा है जबकि वास्तविक इतिहास दूसरी बात कहता है. इसके दो आयामों की चर्चा हम बाद में करेंगे. एक तो इससे ब्राह्मणवादी जातीय व्यवस्था का डंका बजता है और दूसरा, वैज्ञानिक सोच कुंठित होती है. आज विश्वविद्यालयों में विचार मंथन पर जो रोक लगाई जा रही है वह इस इतिहास पुनर्लेखन व पाठ्यक्रम बदलाव का सम्पूरक ही है. इस तरह की रोक के लिए कोई वाजिब तर्क नहीं दिया जाता, बस आरोप मढ़े जाते हैं और इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर पुलिस तक की मदद ली जाती है. किसी भी चीज पर सवाल उठाने पर देशद्रोही का नाम देकर ए॰बी॰वी॰पी॰ प्रशासन के सामने आपत्ति जताती है और आगे बढ़कर देशप्रेम के नाम पर इसे गुंडागर्दी द्वारा रोकने की कोशिश करती है. इस गुंडागर्दी का जब प्रतिरोध किया जाता है तो आम छात्रों को पुलिस तलब करती है, तंग करती है. विरोध के किसी भी स्वर को देशविरोधी करार दिया जाता है.

पिछले साल रामजस कॉलेज, दिल्ली में हुई वारदात हम सबके सामने है और ऐसी वारदातों का यही पैटर्न है. विश्वविद्यालयों में केवल आजादी और विरोध ही मुखर नहीं होते वरन् ये विद्यमान सामाजिक ढांचों पर हमलों के भी केन्द्र होते हैं. आज यदि सरकार इस मापदंड पर हमला कर रही है तो यह बहुत ही घातक प्रवृत्तियों को दिखाता है. एक विचारशून्यता की स्थिति बनाकर संघी फासीवादी एजेण्डे के लिए जगह बनाई जा रही है. यहां तक कि विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि कर व निजीकरण के माध्यम से विरोधी स्वर वालों, समानता चाहने वालों, गरीबों, मजदूरों-किसानों के लिए बोलने वालों को इन संस्थानों से दूर रखा जा रहा है. इनके थिंक टैंक का कहना कि ऐसी अावाजों को यदि विश्वविद्यालयों में स्थान पाने से रोकना है तो यह जरूरी है. निम्न मध्यम वर्ग व मजदूरों-किसानों के बच्चे इनमें नहीं पढ़ेंगे तो उनकी विचारधारा भी नहीं पनप पाएगी. संघ परिवार के विचारक राकेश सिन्हा ने तो बुद्धिजीवियों के खिलाफ मोर्चा ही खोला हुआ है. इन लोगों के मुताबिक बुद्धिजीवी जनता की चाहतों को आवाज देने की बजाय दूसरी बातें करते हैं. इसमें निहित है कि आम जनता में व्याप्त जातीय व धार्मिक पूर्वाग्रहों, पुरातन विचारों व परम्परागत कुरीतियों पर अपने को आधारित करने वाला व इनको प्रतिष्ठा देकर बढ़ावा देनेवाला आर॰एस॰एस॰ जनता के बीच व्याप्त अंधकार व अंधविश्वास की शक्तियों का इस्तेमाल कर अपना एजेण्डा लागू करना चाहता है. ये अंधकार के सिपाही हर उस चीज का जो प्रगतिशील है, सामाजिक बराबरी व समरसता को बढ़ावा देता है और कुरीतियों पर चोट करता है, के विरोधी हैं. ब्राह्मणवाद पर चोट हिन्दू धर्म पर चोट, सामंती हिन्दू शासकोें के जुर्म की दास्तान देश के गौरवशाली इतिहास को बदनाम करने की कोशिश, महिला स्वतंत्रता की बात, हिन्दू संस्कारों पर कुठाराघात — इनका तर्क ऐसा ही होता है. देश में हुए तमाम सामाजिक आंदोलनों चाहे वे महिला समानता के लिए हों या जातीय भेदभाव के खिलाफ हाें या फिर मेहनतकश वर्गों के आंदोलन हों, का वह विरोधी है. यह सती प्रथा का समर्थक है (राजस्थान की रूपकुंवर के सतीत्व का भाजपा के नेताओं द्वारा किया गया महिमामंडन हमें याद है), महिलाओं को चहारदीवारी के अंदर कैद रखना चाहता है (इनके नेताओं के समय-समय पर आने वाले बयानों को देख लें), जाति व्यवस्था का पैरोकार है (‘मनुस्मृति’ के समर्थक और क्या हो सकते हैं). इस तरह ये अंधकार के सिपाही हैं जो तमाम तरह की आजादी के विरोधी हैं और अपना सामाजिक आधार अंधविश्वास, रूढि़वाद व परम्परागत कुरीतियों में पाते हैं.

आज देशप्रेम के नाम पर हमारे यहां ब्रिटिश राज के खिलाफ खड़ा हुए आजादी के आंदोलन के मूल्यों पर ही हमला हो रहा है. हमारे आजादी के आंदोलन में मजदूरों, किसानों, आदिवासियों के भिन्न-भिन्न संघर्षों की अहम भूमिका रही है. जातीय उत्पीड़न और महिला उत्पीड़न के खिलाफ हुए संघर्ष भी इसका महत्वपूर्ण अंग रहे हैं. आखिर आजादी का मतलब ही तमाम तरीके के शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति होता है और देश के विभिन्न वर्ग और समुदाय मुक्ति चाहते थे. उस दौरान लोगों ने अन्य देशों में चल रहे मुक्ति संग्रामों से प्रेरणा ली. विश्व स्तर पर चल रही विचारधाराओं का भी गहरा असर रहा. तोल्स्टॉय और जॉन रस्किन के विचारों से यदि गांधी प्रभावित थे तो रूस की समाजवादी क्रांति और मजदूरों-किसानों की सत्ता से भगत सिंह. समाजवादियों पर विश्व समाजवादी विचारों का गहरा प्रभाव था तो मार्क्सवाद-लेनिनवाद के आधार पर कम्युनिस्टों ने मजदूरों-किसानों के क्रांतिकारी संघर्षाें का नेतृत्व किया लेकिन देश में एक ऐसी राजनीतिक धारा भी थी जिसने साम्प्रदायिक गोलबंदी को मुख्य माना. आर॰एस॰एस॰ का निशाना ब्रिटिश राज नहीं बल्कि इस्लाम था और उसने आजादी के आंदोलन से अपने को अलग रखा और ब्रिटिश राज की मदद की. प्राचीन भारत के गौरव का गुण गाने वाला यह संगठन वास्तव में विदेशी विचारधाराओं में से सबसे घटिया, घोर गैर-जनतांत्रिक, मानवद्रोही फासीवादी विचारधारा से प्रभावित रहा है. अपने को देशी साबित करने वाला यह संगठन जर्मनी के हिटलर और इटली के मुसोलिनी जैसे खूंखार जनविरोधी, मानवद्रोही नेताओं से गहरे रूप से प्रभावित है.

प्राचीन भारत का गुण यदि आर॰एस॰एस॰ गाता है तो ऐसा वह अपने पुरातनपंथी, पोंगापंथी एजेण्डे को लागू करने के लिए ही करता है. वह मनुवादी ताकतों का गढ़ है, वह हमारे समाज की हर बुराई को संस्कार के नाम पर हमारे ऊपर लादना चाहता है. आज संविधान का नाम लेते नहीं अघाने वाले संघ परिवार ने संविधान लागू होने के दिन मनुस्मृति को संविधान बनाने की मांग रखी थी. दलित आंदोलन ने अपने उत्पीड़न की संहिता के रूप में जिस मनुस्मृति को जलाया उसे यह संविधान बनाना चाहता है ! जातीय उत्पीड़न को संहिताबद्ध करने वाली मनुस्मृति से लगाव रखने वाला आर॰एस॰एस॰ क्या जाति व्यवस्था को खत्म करने का हिमायती हो सकता है ? इसीलिए जातीय उत्पीड़न से मुक्ति का संघर्ष हो या फिर महिला मुक्ति का संघर्ष सभी से इसे डर लगता है और इन आंदोलनों में शरीक लोग इसे देशद्रोही लगते हैं. ये इनकी कल्पना के हिन्दू राष्ट्र से विद्रोह करते दिखते हैं और इसलिए इन्हें देशद्रोही का नाम दिया जाता है.

फासीवाद घोर मेहनतकश विरोधी विचारधारा रहा है और फासीवादी राज्यों ने अपने यहां जनतंत्र को समाप्त कर गरीबों के अधिकारों को छीनने का काम किया. हिटलर और मुसोलिनी के ये अनुयायी यहां भी वैसा करने की ओर अग्रसर हैं और समय रहते यदि इसके खिलाफ संघर्ष नहीं किया गया तो आगे यहां भी हिटलरशाही चलने लगेगी. इनका हिन्दू राष्ट्र एक मनुवादी फासीवादी राज ही होगा. बार-बार यह भाजपा नेताओं द्वारा पुष्ट भी किया जाता है कि वे वर्तमान संविधान को नहीं मनुस्मृति को अपना संविधान मानते हैं.

केन्द्रीय मंत्री अनंतकुमार हेगडे का बयान यूं ही नहीं आया. संविधान लागू होने के समय से ही आर॰एस॰एस॰ मनुस्मृति को संविधान बनाए जाने की वकालत करता रहा है, भले ही ताकत बना लेने तक इसे यह ठंडे बस्ते में डाले रहा है लेकिन आज फिर ये स्वर मुखर हो रहा है, जो इनके दोमुंंहेपन और पाखंड को दर्शाता है. वहां मुसलमान तो क्या आम हिन्दू भी दोयम दर्जे के नागरिक होंगे.

आजादी के आंदोलनों में या फिर बाद के दिनों में जातीय गोलबंदी का एक बड़ा मकसद जातीय भेदभाव दूर करना भी रहा है लेकिन आज जिस तरह से हिन्दुत्व के नाम पर हो रहा है, वह बिल्कुल प्रतिगामी है और भारत के प्राचीन इतिहास के नाम पर न केवल मनुस्मृति का महिमामंडन है बल्कि उसके नाम पर ब्राह्मणत्व का, राजपूतों की वीरता का पूजन हो रहा है और इस नाम पर फिर दबंग जातियों की गोलबंदी की जा रही है. आखिर संघ परिवार अपना चेहरा दिखा ही देता है जब समाजवाद स्थापित करने वाले, भारत के ही नहीं सभी उपनिवेशों की राष्ट्रीय स्वाधीनता के पक्षधर लेनिन की मूर्ति गिराई जाती है.

आर॰एस॰एस॰ सभी प्रगतिशील चीजों का विरोधी है. तभी तो लेनिन की मूर्ति के टूटने के बाद स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ने वाले पेरियार से लेकर अम्बेडकर की मूर्ति भी तोड़ी गई. आज मेहनतकशों के संघर्षों में अग्रणी भूमिका निभानेवालों को यदि देशद्रोही करार दिया जाए तो कोई आश्चर्य नहीं. जमींदारी के खिलाफ लड़ने वालों को, ‘जमीन जोतने वालों को’ के लिए लड़ने वालों को, दलितों की इज्जत के लिए लड़ने वालों को, वोट देने के अधिकार के लिए लड़ने वालों को, जातीय उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने वालों को, मजदूरों के अधिकार के लिए लड़ने वालों को देशद्रोही करार दिया जाए तो कोई आश्चर्य नहीं.

रूसी क्रांति के समर्थक और समाजवादी विचारों से प्रभावित आजादी के आंदोलन के नायक शहीद भगत सिंह को भी देशद्रोही कह दिया जाएगा जब हिन्दू राष्ट्र बनेगा. हां, अभी ऐसा नहीं हुआ है लेकिन होने की गुंजाइश बनती लग रही है. जिन लोगों ने देश के नाम पर गांधी को गोली मारी क्या उनकी बढ़ती हेकरी उन्हें वहां तक नहीं ले जाएगी ? हम पाते हैं कि सर्वथा गैर-जनतांत्रिक संस्थान जाति प्रथा की सिरमौर जातियों की आज बन पड़ी हैं. आज लम्बी चुटिया विद्वता की निशानी बन गई है, हमारे देश में लड़े गए युद्धों के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर राजपूतों के गौरव की बात की जा रही है. पद्मावति के नाम पर राजपूतोंं की करणी सेना बनती है, जिसको भाजपा के नेताओं का वरदहस्त होता है, पेशवाई के घृणित ब्राह्मणत्व का महिमामंडन होता है और उसके खिलाफ की दलित दावेदारी के नेताओं पर देशद्रोह का मुकद्दमा चलता है. यह है हिन्दू राष्ट्र की बानगी और इसी राष्ट्र के लिए आर॰एस॰एस॰ और भाजपा कृतसंकल्प है. यह कैसा राज्य होगा यह समझा जा सकता है. आजकल मंत्रियों और संघियों के खुले प्रयासों से पूरा माहौल गरमाया जा रहा है.

आखिर गोरख पांडे ने बहुत सही लिखा है – ‘‘इस बार दंगा बहुत बड़ा था/ खूब हुई थी/ खून की बारिश/ अगले साल अच्छी होगी/ फसल/ मतदान की-’’ यह कोई अप्रत्याशित बात तो नहीं ही है. आखिर 1925 से इंतजार कर रहा यह संगठन आज नहीं तो कभी नहीं की तर्ज पर गोलबंदी किए जा रहा है. हथकंडे के रूप में जैसा हमने कहा तरह-तरह के पूर्वाग्रहों से ग्रसित जनता के सामने मीडिया द्वारा नफरत और अफवाहें परोसी जा रही हैं और सीधे सड़कों पर तांडव मचाया जा रहा है. इससे एक भीड़ तैयार हो रही है जो इनकी हिंसक गुंडा वाहिनी के पीछे चल दे और बलवा करे.

रामनवमी में जो देखा गया उसकी पृष्ठभूमि तथाकथित गोरक्षकों की गुंडावाहिनी की हिंस्र करतूतों, लव-जिहाद के आवरण के तहत हिंसा, खानपान के तौर-तरीकों पर हमला, फ्रीज में महज बीफ रखने के नाम पर हिंसा, हिंस्र भीड़ जो इशारे पर मारने की आतुरता (जैसे – ट्रेन में सफर कर रहे जुनैद की लिंचिंग) में दिखाई पड़ती है. मनुष्य किसी विवेक बुद्धि से चलकर कोई काम नहीं करे, तर्क व तथ्यात्मक परख की कोई जगह नहीं हो, बस वही गुजरात वाली हिंसक भीड़ – ‘मारो, काटो’ का नारा लगाते हुए. यह भीड़ गोरक्षा के नाम पर ऊना में ‘‘हिंदू’’ दलितों की चमड़ी उधेड़ती है, भीमा कोरेगांव में दलितों की रैली पर हमला करती है और ऐसे सभी कुकृत्यों में संघ परिवार की संलिप्तता जगजाहिर है.

यदि मुस्लिम औरतों से बलात्कार करने का आह्वान करने वाली सभा के योगी आदित्यनाथ मुख्य मंत्री पद को सुशोभित करते हैं तो समझा जा सकता है कि कैसा समय है. यदि कोरेगांव के दलितों पर हमला के सरगना साम्भाजी भी देश के प्रधानमंत्री के आराध्य हैं तो हम किस काली सदी में जी रहे हैं, समझा जा सकता है. यहां जनता की समस्याओं के विरोध में उठी आवाजों के लिए कोई स्थान नहीं है, बस अविवेकी उकसावेबाजी, छल-प्रपंच, झूठ व हिंसा सभी आवाजों को दबा दे रहे हैं.

विज्ञान पर मिथक को हावी बनाकर गैर-वैज्ञानिक सोच को प्रमुखता दिया जाना इनके लिए जरूरी है. विकास का ढिंढोरा पीटने वाली यह सरकार वैज्ञानिक शोध के लिए फंड में भारी कटौती करती है और हम पाते हैं कि वैज्ञानिकों को मजबूर होकर अपने शोधों को चलाए रखने के लिए सड़क पर आकर इसका विरोध करना पड़ता है. दूसरी ओर प्राचीन भारत के ज्ञान के नाम पर ज्योतिषशास्त्र जैसे पाठ्यक्रमों की पढ़ाई के लिए इनके पास पूरा फंड है. देश के सबसे नामी विज्ञान विश्वविद्यालय ‘इण्डियन इंस्ट्यिूट ऑफ सायंस’ में भी ये ज्योतिषशास्त्र जैसी जाली विद्या पर चर्चा आयोजित कर उसे प्रतिष्ठित करने की कोशिश करते हैं.

पूरे माहौल को विज्ञान विरोधी बना कर ये अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं और पूरे देश को सदियों पीछे धकेल देना चाहते हैं. इन्होंने समाज अध्ययन के क्षेत्र के संस्थानों में भी सेंध मारकर सर्वथा अनुपयुक्त लोगों को इसका सिरमौर बनाया है. आई॰एस॰एस॰आर॰ के हेड की केवल इतनी ही उपलब्धि है कि वे जाति प्रथा को वैज्ञानिक मानते हैं तो एनबीटी का हेड मानता है कि पृथ्वी गाय की सींग पर टिकी है इसीलिए गाय की पूजा होनी चाहिए. सभी संस्थानों में ऐसे लोगों को भरकर यह अपने पूरे फासीवादी एजेण्डे को लागू करने की तैयारी में है. आज जनतंत्र के खिलाफ माहौल को तेज करने के लिए अंधराष्ट्रवाद का सहारा लिया जा रहा है.

आप न्यूज चैनेलों पर आ रही बातों पर गौर करें- ये पाकिस्तान विरोधी जहर उगलते रहते हैं और इसी को राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है. राष्ट्र पर मरमिटने वाले भगत सिंह और उनके साथियों को यदि पढ़े तो पायेंगे कि वे साम्राज्यवादी शोषण-दमन का विरोध कर रहे थे और देश की स्वतंत्रता को वे इससे अलग कर नहीं देखते थे लेकिन हमारे हुक्मरान साम्प्रदायिकता को बल देने के लिए और साम्राज्यवादपरस्त अपनी नीतियों पर पर्दा डालने के लिए पाकिस्तान विरोध को ही राष्ट्रवाद का पर्याय बनाए हुए हैं. आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर मुसलमानों को लक्ष्य बनाया जा रहा है. इसके साथ ही साम्राज्यवादी षड्यंत्र में भागीदारी का रास्ता खोला जा रहा है.

संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ इसके सामरिक समझौते देश की सुरक्षा के लिए घातक हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संधियों में बंधा पाकिस्तान आज अपनी इस नीति का खमियाजा भुगत रहा है और पूरे विश्व में आतंकवाद की भूमि के रूप में जाना जा रहा है. वहां की सेना देश के अंदर इतनी ताकतवर हो गई है कि लोकतांत्रिक ढांचों को पनपने नहीं देती.

हम देख सकते हैं कि देशप्रेम की बात करते नहीं अघाने वाली भाजपा सरकार एक तरफ अमेरिका के सामने घुटनाटेकू नीति अपनाई हुई है, फ्रांस के साथ सौदेबाजी में देश के हितों की बलि देती है और देश को विदेशी कम्पनियों का चारागाह बनाने के लिए हर तरह से मदद देती है. दूसरी ओर बस पाकिस्तान पर जहर उगलकर राष्ट्रवाद का ढोंग करती है. पाकिस्तान विरोधी हुल्लड़बाजी को देशप्रेम का नाम दिया जाता है. सेना को देशप्रेम का पर्याय बना दिया गया है और सेना के नाम पर होनेवाली किसी भी कार्यवाही पर प्रश्न चिन्ह लगाना मना है. एक तरफ सैनिकों को बेमतलब के युद्ध में झोंका जाता है और दूसरी ओर खुद उनके द्वारा अपनी दुःस्थिति पर सवाल उठाने पर कड़ी कार्यवाही होती है. आतंकवादी कार्यवाहियों में क्षतिग्रस्त कैम्पों की सुरक्षा व्यवस्था की कमी पर भी सवाल नहीं किया जा सकता, केवल सेना का झूठा महिमामंडन हो रहा है और यह घातक है.

आखिर सैन्य शासन को विश्वभर में सबसे खराब शासन माना जाता है. भारत में खुद सुप्रीम कोर्ट ने सेना को नागरिकों पर असीम शक्ति देने वाला- AFSPA की ज्यादतियों को गिनाया है और उस पर सवाल किया है. ऐसे में कहा जा सकता है कि जनतांत्रिक मूल्यों पर चोट करने के लिए ही यह महिमामंडन हो रहा है.

गोरख पांडे ने तो ठीक ही कहा है, आखिर 2019 में आम चुनाव जो है. इनका तांडव बढ़ता ही जाएगा. फिर भी हम इन फासीवादी ताकतों की बढ़ती चुनौती को चुनावी हार-जीत व संसदीय चश्मे से नहीं देख सकते. राज्य सत्ता के विभिन्न अंगों का जिस तरह से भगवाकरण हो रहा है वह एक चुनावी हार से बदल जाने वाला नहीं है.

आर॰एस॰एस॰ 1925 से अस्तित्वमान है और लम्बे समय से अपनी ताकत संजो रहा है ऐसे दिन के लिए जब वह एक हिन्दू राष्ट्र बनाए जो सर्वथा गैर-जनतांत्रिक व जनविरोधी होगा. जहां न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी और न कोई और आजादी. यह धर्म की श्रेष्ठता के नाम पर सभी तरह के अधिकारों को खत्म करेगा और जनता के आंदोलनों को बूटों तले रौंदेगा. पूंजीपति द्वारा प्रायोजित यह फासीवादी ताकत और कर ही क्या सकती है.

याद रहे कि चरम दक्षिणपंथी ताकतों के प्रति हमारी राज्यसत्ता का रुख उदारता का ही रहा है, यदि प्रश्रय का नहीं कहा जाए तो. क्या गुंडागर्दी और फिरकापरस्ती वाले राम मंदिर आंदोलन जिसने भारत को सुनियोजित ढंग से दंगों में डूबो दिया, के साथ सख्ती से निपटा गया ? क्या तत्कालीन कांग्रेसी केन्द्र सरकार इसके लिए जिम्मेवार नहीं है ? क्या इसके लिए जिम्मेवार किसी बड़े नेता को सजा मिली ? हम थोड़ा गुजरात पर ध्यान दें-

सही में इसे हिन्दुत्व की प्रयोगशाला कहा जाता है. यहां केवल राज्य प्रायोजित दंगे ही नहीं हुए, वरन् तरह-तरह के षड्यंत्र हुए जो राज्य सत्ता के भीतर कार्यरत सत्ता (स्टेट विदिन स्टेट) को पुख्ता बनाते हैं. अक्षरधाम आतंकी कांड हुआ लेकिन पकड़े गए लोग निर्दोष साबित हुए. लम्बे कारावास के दौरान उनका तो अपना जीवन खराब हुआ ही साथ ही मुस्लिम समुदाय को आतंकी के रूप में चिन्हित करने में मदद मिली. गुजरात में सबसे ज्यादा आई॰पी॰एस॰ अफसर जेल में कैद हैं जो अपने आप में दिखाता है कि गुजरात की राज्य मशीनरी कैसी है.

कुछ और दृष्टांत हैं ‘बेस्ट बेकरी केस’ में गवाह जाहिरा शेख को फिक्स किया जाना और हाल का जस्टिस लोया केस जिसमें आरोप लगाया गया है कि हदय रोग से उनकी मौत नहीं हुई है बल्कि उनकी हत्या हुई है. इसमें सीधे शक की सूई भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर जाती है. गुजरात में राज्य ने इस तरह की कार्यवाइयों को व्यवस्थित रूप दिया है ऐसा लगता है.

इसी तर्ज पर सी॰बी॰आई॰ का इस्तेमाल कर पूर्व में सत्तासीन राजनीतिक विरोधियों का मुंह बंद किया जा रहा है. अब गुजरात पैटर्न भारत पर भी लागू हो रहा है. कन्हैया केस हो या अखलाक को मारने वाला दादरी कांड सुनियोजित ढंग से हर स्तर पर ऐसे कांडों को अंजाम दिया जा रहा है. महाराष्ट्र और राजस्थान में लाए गए बिल जो कानूनी ढंग से प्रतिरोध का मुंह बंद करना चाहते हैं दिखाते हैं कि राज्य सत्ता विरोध को बर्दाश्त करने को बिल्कुल तैयार नहीं है.

आज धन बल इस तरह से जनतंत्र पर हावी है कि उसका सर्वत्र बोलबाला दिखाई पड़ता है. यह भी हमें केवल संसदीय संघर्षों से इस ताकत को निपटाने की सोच पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है. जिस कदर भाजपा के पीछे बड़े पूंजीपति धन झोंक रहे हैं वह नरेन्द्र मोदी के 2014 के चुनाव प्रचार से ही स्पष्ट हो गया था.

पूरा का पूरा कांग्रेस त्रिपुरा में खरीदा गया. 0-03 प्रतिशत की बढ़त से भाजपा ने जीत हासिल की और यह बस संसदीय दंगल में पूंजी की ताकत को दर्शाती है. आज विश्वभर में पूंजीवादी जनतंत्र अपने विपरीत में बदल रहा है और फासीवादी ताकतों को सत्तासीन करने की ओर प्रवृत्त है. 2008 में आई पूंजीवाद-साम्राज्यवाद की विश्वव्यापी महामंदी निर्णयपूर्वक खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है.

बेरोजगारी का आलम ऐसा है कि ‘द इकॉनॉमिस्ट’ जैसी पत्रिका ने इसे दुनिया के शहरों में बढ़ती अपराध-हत्या का कारण बताया है. भारत में बेरोजगारी ऐसी है कि नए रोजगार सृजन तो क्या, रोजगार घट रहे हैं. ऐसे में अपराध बढ़ रहे हैं. अपराध की दुनिया को आसानी से मिल रहे ऐसे रंगरूट दंगा-फसाद के लिए प्रलोभनों द्वारा भर्ती किए जा सकते हैं और संघ परिवार ऐसे लम्पट तत्वों को अपने राजनीतिक एजेण्डा को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर्ती कर रहा है. रोजगार सृजन करने में, कृषि संकट से निपटने में अक्षम इस सरकार और व्यवस्था के पास कोई हल नहीं है- बस सर्वथा अतार्किकता और झूठ ही इसकी शक्ति है. वह बरबादी करेगी, दंगे करवाएगी, अंधराष्ट्रवाद व साम्प्रदायिकता की गोली देकर विरोध को शांत करेगी और भातृघातक युद्धों में जनता को धकेलेगी और यही आज हो रहा है, जिसे हमने ऊपर चिन्हित किया है. इस जनतंत्र विरोधी माहौल में जनता की शक्तियों पर तीखा विचारधारात्मक प्रहार हो रहा है. हम संघ परिवार द्वारा प्रचारित हिन्दुत्व के एकाश्मिक रूप को देखकर पता लगा सकते हैं कि किस तरह यह हिन्दू धर्म को भी एक फासीवादी रूप में ढालना चाहता है.

इसके नारे हैं एक सशक्त नेता और एक लौह अनुशासन वाला संगठन जिसमें सवाल नहीं पूछे जा सकते. हम समझ सकते हैं जो परोसा जा रहा है वह है हिन्दू राष्ट्र के नाम पर फासीवादी शासन. पहले जो एक पार्टी व संगठनविशेष की (भाजपा व उसका पितृसंगठन आर॰एस॰एस॰) साम्प्रदायिक व मजदूर-मेहनतकशविरोधी दक्षिणपंथी राजनीति के कारनामे लगते थे वो आज राज्य प्रायोजित शक्तिशाली धारा की सुविचारित, सुसम्बद्ध कार्यप्रणाली में बदल गए हैं. मरने-मारने की अलग-अलग घटनाएं हों, साम्प्रदायिक दंगे हों या अभिव्यक्ति पर इसके गुंडा गिरोहों के हमले हों, ये देखने में तो पागलपन लगते हैं लेकिन इन सब में एक सुनिश्चित कार्यप्रणाली काम करती है, जो पूर्व के फासिस्ट शासनों द्वारा भी इस्तेमाल की गई है.

सारे गैर-कानूनी गिरोहों को पुलिस-प्रशासन का तो समर्थन मिलता ही है, न्यायपालिका भी इन पर नरम नजर आती है. आज ये राज्य प्रायोजित गिरोह हैं कल राज्य अपना जनतांत्रिक चोला उतारकर खुद ऐसे गिरोहों का काम कर सकती है, इसके साफ आसार नजर आते हैं.

पूंजीवादी आर्थिक संकट के बीच समस्याओं की मार झेल रही जनता, अपनी स्वतंत्रता पर हमला को झेल रही जनता भी चुप नहीं है. जनता का प्रतिरोध आज सर्वत्र दिखाई पड़ता है. विश्वविद्यालयों में अधिकार छीने जाने के खिलाफ, गरीब बच्चों के स्कॉलरशिप छीने जाने के खिलाफ, पाठ्यक्रमों में प्रतिगामी बदलावों के खिलाफ, महिला प्रश्न पर प्रशासन के प्रतिक्रियावादी, पुरातनपंथी रवैये के खिलाफ और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए विश्वविद्यालयों में लगातार सशक्त प्रतिरोधात्मक आंदोलन हो रहे हैं.

प्रेस पर तमाम हमलों के बीच कुछ निर्भीक आवाजें भी बुलंद हैं. मजदूरों ने दिल्ली में महापंचायत के द्वारा अपना प्रतिरोध जाहिर कर इस शासन को धता बताया है. रोज नयी-नयी जगहों पर मजदूर आंदोलन की राह ले रहे हैं. किसान आंदोलनों की तो बाढ़ ही आ गई है. तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र व हिमाचल के किसान जुझारू आंदोलन की राह पर हैं.

बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं ने रेलवे प्रशासन के खिलाफ रोजगार को लेकर आंदोलन करने से लेकर एस॰एस॰सी॰ घोटाला के खिलाफ दिल्ली मार्च व आंदोलन का आयोजन किया है. कई बार रोजगार के लिए आंदोलनों ने उग्र रूप धारण कर लिया है. अपने अधिकारों को लेकर दलितों का संघर्ष भी मुखर है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा दलितों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ बने कानून को कमजोर बनाने के विरोध में हाल में 2 अप्रैल का बंद सफल रहा. मुस्लिम समुदाय पर हर हमले के खिलाफ आवाजें उठती रहती हैं. कवि से लेकर कलाकारों तक ने अभिव्यक्ति पर रोक लगाए जाने के, असहिष्णुता के माहौल के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है. छत्तीसगढ़ में आदिवासियों और मानवाधिकार कार्यकर्त्ताओं पर होने वाला पुलिसिया दमन हो या फिर नागरिक अधिकारों पर बंदिशें सब पर प्रतिरोध संगठित होते रहते हैं. जनता मर नहीं गई है. मुर्दास्तान नहीं बन गया है भारत. जनता सड़क पर फासीवादी ताकतों से लोहा ले रही है. ये अलग-अलग इंजजसम हैं, जरूरत है कि इनका एक ऐसा समन्वय बने जो एक जंग की शक्ल ले. फासीवादी ताकतों के खिलाफ जंग, जहां साझा तौर पर इन्हें चुनौती दी जा सके.

– संजय श्याम

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Comments 2

  1. Ramesh Pujari says:
    8 years ago

    ये हरामखोर देश को बर्बाद कर देंगे

    Reply
  2. Ramesh Sharma says:
    8 years ago

    रोहित भाई देश गड्ढे में जा रहा है

    Reply

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