Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

स्वाधीनता और समानता जुड़वां बहनें होती हैं !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 15, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
प्रियदर्शन

क्या आज़ादी को शराब की तरह होना चाहिए जो जितनी पुरानी होती जाए, उतनी ही नशीली होती जाए ? या आज़ादी को किताब की तरह होना चाहिए, जिसमें जितने पन्ने जुड़ते जाएं, उसके उतने ही अर्थ खुलते जाएं ? पचहत्तर बरस पहले जो आज़ादी मिली थी, वह न शराब थी, न किताब थी, वह बस एक गुलाब थी- उम्मीदों का गुलाब जो तीसरी दुनिया की मिट्टी में रोपा हुआ था और एक स्वप्नशील राजनेता की ऊपरी जेब से किसी बड़े प्रतीक की तरह झांकता था. उस वक़्त बहुत सारे कांटों और ज़ख़्मों के बावजूद वह गुलाब यह तसल्ली और भरोसा दिलाता था कि हिंदुस्तान नाम का जो बागीचा है, वह तरह-तरह के फूलों से महमहाता रहेगा और इस मुल्क की मिट्टी को जरख़ेज़ बनाता रहेगा.

लेकिन 75 साल बाद आज़ादी की बगिया में जितने फूल हैं, उससे ज़्यादा कांटे हैं और ऐसी ज़िद्दी हवाएं हैं, जो चाहती हैं कि हर तरह का फूल इसमें न खिलें. बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में आज़ादी की लड़ाई के लिए जो औजार हमने विकसित किए उनमें गोले-बंदूक नहीं थे, उनमें शांति, अहिंसा, सद्भाव का हल था, जिससे हिंदुस्तान की पूरी मिट्टी जोत दी गई थी. महात्मा गांधी ख़ुद को जुलाहा मानते थे, उन्होंने चरखे को आज़ादी का प्रतीक बनाया था, लेकिन वे किसी किसान की तरह इस देश के मिट्टी-पानी को अपने पसीने से सींचते और नरम बनाते रहे. यह सच है कि उनके देखते-देखते बंटवारे की राजनीति कामयाब हुई और दो मुल्कों में बंटे एक देश ने पाया कि वह आज़ाद तो हो गया है, मगर घायल है.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

इस देश को बहुत संजीदगी से संभालने की ज़रूरत थी. गांधी के बाद नेहरू यह काम करते रहे. कोशिश करते रहे कि जो स्वाधीनता मिली है, वह सार्थक भी हो. तब इस सार्थकता की कई कसौटियां थीं- देश में सबके लिए खाने, कपड़े, आवास की व्यवस्था का सवाल था, शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में नई संस्थाएं बनाने की चुूनौती थी- और इन सबसे बढ़ कर उस गंगा-जमुनी तहजीब को बचाने का संघर्ष था, जिसने बीते एक हज़ार साल में हिंदुस्तान का चेहरा गढ़ा था, जिसने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी लेकिन जो सबसे ज़्यादा लहूलुहान था. इसके अलावा एक चुनौती उस संविधान को लागू करने की थी, जो ढाई हज़ार साल की तमाम असंगतियों-विसंगतियों को पाट कर एक समतामूलक समाज बनाने के सपने से बना था.

पश्चिम के बहुत सारे तथाकथित राजनीतिक जानकारों को तब लगता था कि यह हिंदुस्तान टिकेगा नहीं- वह अपने अंतर्विरोधों से टूट जाएगा- इतने सारे धर्म, इतनी सारी भाषाएं, इतनी सारी जातियां, तरह-तरह के नियम क़ायदे- लगता ही नहीं था कि यह एक देश है. एक आवेग ने भले इसे एक कर दिया था, लेकिन यह बना रहेगा- इस पर बहुत सारे लोगों को संदेह था. इस बात का भी संदेह था कि यहां लोकतंत्र टिकेगा नहीं. लेकिन भारत ने सबको गलत साबित किया.

उसने लोकतंत्र को नई रंगत दी. इस देश की करोड़ों की निरक्षर आबादी ने अपने शासक चुनने के अधिकार को बिल्कुल हार्दिकता से अंगीकार किया. पश्चिम में दो रंगों के राजनीतिक दलों की प्रतिद्वंद्विता वाले इकहरे लोकतंत्र के मुक़ाबले भारतीय लोकतंत्र कहीं ज़्यादा रंगीन और बहुदलवादी साबित हुआ. इसमें संदेह नहीं कि इस लोकतंत्र पर भारत की सामाजिक संरचनाओं की भी छाप पड़ी और इनकी कई विसंगतियां हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी चली आईं.

धर्म और जाति के नाम पर जो सामाजिक खेमेबंदियां थीं उन्होंने बिल्कुल राजनीतिक शक्ल अख्तियार कर ली और हमारी चुनावी पद्धति को बुरी तरह प्रभावित किया. मगर इसके बावजूद हमने लोकतंत्र का एक बिल्कुल भारतीय भाष्य तैयार किया है, जिसमें अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों से सत्ता पर काबिज़ रहना लगभग असंभव है. लोकतंत्र रिसता हुआ लगातार ऊपर से नीचे गया है और समाज के लगभग हर तबके में चुनावी राजनीति के समीकरण ससझे जाते हैं और उसी ढंग से वोटों की राजनीति होती है.

तो आज़ादी का सबसे बड़ा हासिल तो यही है कि हमारे शासक हमारी मुट्ठी में हैं लेकिन इस प्रत्यक्ष दिखने वाली सच्चाई की अपनी विडंबनाएं भी हैं. सत्ता लगातार जनता को बदल रही है. उसे अपने अधिकारों के प्रति सजग, समानता के मूल्य के प्रति सतर्क और सवाल पूछने वाले सचेत नागरिक नहीं चाहिए, उसे वैसे लोग चाहिए जिन्हें वह जनता का नाम देकर एक भीड़ में बदल सके और अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सके.

यह हमारी आज़ादी की एक बड़ी चुनौती है कि कैसे हम अपनी संविधान प्रदत्त नागरिकता को बचाए रखें और भीड़ का हिस्सा न होकर सत्ता द्वारा इस्तेमाल किए जाने से बचें. दूसरी चुनौती हमारे आधुनिक इतिहास की विडंबना से निकली है जो इस पहली चुनौती से मिलकर कहीं ज़्यादा संकट पैदा कर रही है. अंग्रेजों ने भारत तो छोड़ा लेकिन उसके पहले देश को बांट दिया. क़ायदे से भारत नाम का जो राष्ट्र है वह इस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को नकारता है.

जो धर्म के आधार पर अपना अलग देश चाहते थे, वे पाकिस्तान गए, लेकिन जिन्हें यह धार्मिक बंटवारा मंज़ूर नहीं था, उन्होंने हिंदुस्तान को अपना मुल्क माना. मगर इस तथ्य को कुछ इस तरह प्रचारित किया गया और लोकप्रिय बनाया गया कि पाकिस्तान तो मुसलमानों का है और हिंदुस्तान हिंदुओं का. इस देश की 80 फ़ीसदी से ज्यादा हिंदू आबादी को लगातार इसी आधार पर आक्रामक बनाने की कोशिश हुई. बीते दो दशकों से इस देश में बहुसंख्यकवाद की राजनीति को लगातार बढ़ावा दिया गया. आज जो लोग सत्ता में हैं वे इस बहुसंख्यकवाद की राजनीति के नुमाइंदे हैं.

यहां भी मोटे तौर पर यह दलील दी जाती है कि लोकतंत्र में जिसके ज़्यादा वोट होते हैं उसी की हुकूमत चलती है लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक और ज्यादा संवेदनशील परिभाषा यह है कि सच्चा लोकतंत्र अपने अल्पसंख्यकों का खयाल रखकर ही बड़ा होता है. इस कसौटी पर भारतीय लोकतंत्र की राजनीतिक नुमाइंदगी पिछले दिनों अविश्वसनीय साबित हुई है. उसने लगातार अल्पसंख्यकों को निशाने पर रखा है. दिलचस्प यह है के अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाली यह राजनीति बहुसंख्यकों के वैध अधिकारों की भी रक्षा करने में विफल है.

दरअसल इस बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने में नकली मुद्दों का ही हाथ रहा है- ऐसे भावनात्मक मुद्दों का जिनका रोटी, रोज़गार और खुशहाली से कोई वास्ता नहीं है. बहुसंख्यकों को बार-बार बताया गया कि अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण हो रहा है, उनके लिए विशेष कानून हैं, उनकी मस्जिदों और उनके चर्चों को कोई हाथ नहीं लगा सकता जबकि मंदिर टूट रहे हैं. इस नकली शिकायत को एक पूरा वैचारिक जामा पहनाने के लिए पुनरुत्थानवाद का एक अभियान चलाया गया जिसके तहत बार-बार बताया गया कि प्राचीन भारत कितना श्रेष्ठ था और कैसे बाहर से आने वाले आक्रांताओं ने उसे विकृत कर दिया. उस प्राचीन भारत को फिर से खड़ा करने की ज़रूरत है.

राम मंदिर आंदोलन और काशी-मथुरा में नए सिरे से खड़े किए जा रहे विवाद दरअसल इसी वैचारिक पृष्ठभूमि के जघन्य प्रमाण हैं. इन दिनों सरकारें समान नागरिक संहिता का एजेंडा आगे बढ़ा रही हैं- निश्चय ही इसके अपने संवैधानिक पक्ष हैं- लेकिन जिस आक्रामकता से इसे आगे बढ़ाया जा रहा है, उससे अल्पसंख्यकों के भीतर यह स्वाभाविक अंदेशा है कि कहीं इसमें उनके रीति-रिवाजों को चोट तो नहीं पहुंचेगी, कहीं इससे भारत की विविधता पर नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ेगा.

इस प्रसंग की इतने विस्तार से चर्चा का एक मक़सद और है- इस बात की ओर ध्यान खींचना कि प्राचीन भारत को अपने आदर्श की तरह प्रस्तुत कर रही यह वैचारिकी आधुनिक भारत में बन रही नई विडंबनाओं के प्रति बिल्कुल लापरवाह है, बल्कि वह उन्हें बढ़ाने में अपना योगदान दे रही है. इन दिनों भारत के विकास की दुंदुभि बजाई जा रही है. भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होने की प्रतीक्षा की जा रही है. हवाई अड्डों, बाज़ारों और तमाम तरह के आलीशान उपक्रमों के जरिए एक शक्तिशाली देश की छवि बनाई जा रही है.

लेकिन इसका एक बड़ा सच यह भी है कि इन्हीं वर्षों में देश में विषमता कई गुना बढ़ गई है. एक तरफ 30-40 करोड़ का इंडिया है जो यूरोप-अमेरिका को टक्कर देने को बेताब है तो दूसरी तरफ 80-90 करोड़ का एक भारत है जो दो जून की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहा है. सरकार बार-बार दावा करती है कि कोविड काल से अब तक वह हर महीने 80 करोड़ लोगों को मुफ्त का अनाज मुहैया कराती रही है. यह गरीबों के प्रति उसकी संवेदनशीलता का प्रमाण है. लेकिन इस देश में 80 करोड़ लोग ऐसे क्यों हैं जिनको इस तरह का मुफ्त अनाज चाहिए ? उनकी मुफ़लिसी का ज़िम्मेदार कौन है ?

इस सवाल को हमारी आज़ादी के 75 साल का सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए. ऐसा लगता है जैसे आज़ादी बस चंद लोगों की है- बाकी लोग अलग-अलग आधारों पर इससे दूर हैं. बल्कि भारत की विषमता इतनी प्रत्यक्ष पहले कभी नहीं थी. जिन फ़्लाई ओवरों के ऊपर से इस इस देश के खाते-पीते लोगों की नई चमचमाती गाड़ियां गुज़रती हैं उन्हीं के नीचे एक बेबस और बदहाल भारत सोया रहता है.

दरअसल एक छोटे से भारत ने एक बहुत बड़े भारत को अपना उपनिवेश बना रखा है. इस उपनिवेश से आने वाले लोग अपने शासक भारतीयों के सबसे ज़रूरी काम सबसे सस्ते में निपटाते हैं- वे सुबह सुबह उन्हें अखबार दे जाते हैं, उनकी गाड़ियां साफ करते हैं, उनका कूड़ा उठाते हैं, उनके कपड़े इस्त्री करते हैं, इनके घरों की महिलाएं उनके यहां घरेलू सहायिकाओं का काम करती हैं.

यह लोग सिर्फ आर्थिक तौर पर लाचार नहीं हैं, इनकी गरीबी पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर इन्हें वेध्य बनाती है, इनके हिस्से का न्याय छीन लेती है. इन पंक्तियों के लेखक ने पहले भी यह लिखा है कि स्वाधीनता और समानता बिल्कुल जुड़वां आती हैं- स्वाधीनता न हो तो समानता का सवाल नहीं उठता और समानता न हो तो स्वाधीनता बेमानी हो जाती है.

निःसंदेह हमारी आज़ादी की चुनौतियां और भी हैं – जो औपनिवेशिक मानस हमने बना रखा है, उससे मुक्ति पाने की कोशिश कहीं नहीं दिखती, ज्ञान-विज्ञान के स्रोतों पर हमारी पकड़ ढीली पड़ती जा रही है, हम उपभोक्ता होकर ही खुश हैं और इस बात पर प्रमुदित कि दुनिया हमें बहुत शक्तिशाली बाज़ार समझती है. हम अपनी शिक्षा का सत्यानाश करते जा रहे हैं, हमने बेहतर मनुष्य बनाने की प्रविधि समझने की कोशिश ही नहीं की, हम बस लोकलुभावन नारों में उलझे रहे हैं, आपस में लड़ते रहे हैं.

इन सारी चुनौतियों का सामना लेकिन तभी हो सकेगा जब हम समानता और सामाजिक न्याय में अपनी निष्ठा बनाए रखेंगे और अचूक ढंग से इस बात को पहचानेंगे कि विकास का एक समग्र चेहरा होता है और आज़ादी तब सार्थक होती है, जब वह सबके लिए हो, सबको आश्वस्त कर सके. क्या हम आजादी की इस नई लड़ाई के लिए तैयार हैं ?

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

24 अगस्त को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में होगा संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय श्रमिक संगठनों का संयुक्त सम्मेलन

Next Post

दिहाड़ी

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

दिहाड़ी

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

जनता के स्वाद का बादशाह : हलवाई इकसार स्वाद का मास्टर तो फुचकावाला स्वाद का नियंत्रक और लोकतांत्रिक होता है

June 19, 2022

निपूतों के गैंग को आपके बच्चे चाहिए…

December 2, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.