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निशाने पर कलम का सिपाही

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 21, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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निशाने पर कलम का सिपाही

14 जून को कश्मीर में कलम के जांबाज सिपाही सत्य और सौहार्द्ध के पक्षधर ‘राइजिंग-कश्मीर’ के सम्पादक शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई. शुजात बुखारी की हत्या महज एक पत्रकार की हत्या नहीं है बल्कि एक ऐसी सोच की हत्या है, जो जीवन के अन्तिम क्षण तक घाटी में अमन-चैन और जनवाद का पैरोकार रहा. उल्लेखनीय है कि शुजात बुखारी ‘राइजिंग-कश्मीर’ के सम्पादक के अलावा कश्मीरी भाषा के अखबर ‘संगरमाल’ और उर्दू दैनिक ‘बुलंद कश्मीर’ के भी सम्पादक व पत्रकार थे. हलांकि शुजात की मौत के बाद उनके सहयोगियों ने ‘राइजिंग-कश्मीर’ का अंक निकालकर उनकी कलम की ताकत को सलामी दिया है.

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विगत वर्षों से पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं. विश्व में प्रेस की आजादी के मामले में भरत 140वें स्थान पर है. पड़ोसी देश चीन और अफगानिस्तान क्रमशः 175वें तथा 158वें स्थान पर है. गत वर्ष पत्रकारों की सुरक्षा पर निगरानी रखनेवाली प्रतिष्ठित अन्तराष्ट्रीय संस्था कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) ने 42 पन्नों की एक रिपोर्ट में कहा था कि ‘भारत में काम के दौरान रिपोर्टरों का जीवन असुरक्षित रहता है. इस रिपोर्ट के अनुसार 1992 ई. के बाद से भारत में 92 ऐसे मामले दर्ज हुए हैं, जब पत्रकारों का उनरके काम के सिलसिले में कत्ल कर दिया गया. लेकिन बिडम्बना यह है कि इनममें से सिर्फ चार प्रतिशत मामलों में ही आरोपियों को सजा मिली है. रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारों की सर्वाधिक हत्या राजनीतिक कारणों से होती है.

आंकड़ों के मुताबिक निशाना बनाये गये पत्रकारों में 88 फीसदी पत्रकार प्रिंट मीडिया से जुड़े रहे हैं. 12 फीसदी टीवी पत्रकारों की हत्या की गई है. 8 प्रतिशत रेडियों और इंटरनेट पत्रकारिता करनेवालों को निशाना बनाया गया है. आंकड़ों के अनुसार 36 फीसदी पत्रकारों की की हत्या में राजनीतिक दलों के हाथ होने की आशंका जतायी गयी.

गौर करें तो साफ होता है कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जहां पत्रकारों की हत्या के बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिलता है, उनमें भारत भी एक है. गत वर्ष ही बिहार में पत्रकार राजदेव रंजन की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई. हत्या का कारण पूर्णतः राजनीतिक था, जिसमें बिहार के एक बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन का नाम सामने आया. नाम सामने आने पर राजदेव के परिजनों को भी धमकी दिया गया. वर्ष, 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान टी वी पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई.

इसी तरह वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश के शाहजांपुर में भी पत्रकार को जलाकर मार दिया गया. इस जघन्य कांड में तत्कालीन सपा सरकार के एक विधायक का नाम सामने आया था. मई, 2017 ई. में मध्यप्रदेश में व्यापम घोटालों को कवरेज करने गये पत्रकार की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. इसी राज्य के भिंड जिले के पत्रकार की वाहन से कुचलकर हत्या कर दी गई. इसी तरह बिहार के आरा जिला में भी एक पत्रकार को वाहन से कुचलकर मार डाला गया.

26 नवम्बर, 2014 को आन्ध्र प्रदेश में वरिष्ठ पत्रकार एवीएन शंकर की गोली मारकर हत्या कर दी गई. महाराष्ट्र के पत्रकार एवं लेखक नरेन्द्र दाभोलकर को कट्टरपंथी विरोधियों ने 20 अगस्त, 2013 ई. को गोलियों से भून डाला. डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम-रहीम के खिलाफ आवाज बुलन्द करनेवाले पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति की हत्या कर दी गई. 11 जून, 2011 ई. को प्रसिद्ध पत्रकार ज्योतिर्मय-डे को मौत की नींद सुला दिया.

साल 2017 तो पत्रकारों की हत्या के मामले में सबसे खराब साल रहा. गौरी लंकेश और शांतनु भौमिक समेत नौ पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी. गत वर्ष सितम्बर महीने में वरिष्ठ पत्रकार जे. जे. सिंह और उनकी मां को घर में ही मार डाला गया. अन्तराष्ट्रीय संस्था ‘रिपोर्ट बिदाउट बॉडर्स’ का कहना है कि ‘दुनिया भर में पत्रकारों एवं स्वतंत्र मीडिया पर दबाब बढ़ रहा है. एक आंकड़े के मुताबिक गत 1 वर्ष में दुनिया भर में 87 पत्रकारों की हत्या हुई है. इसी कड़ी में अंधविश्वास पर प्रहार कर तार्किक बहस के लिए मशहूर लेखक कलबुर्गी की हत्या भी मर्माहत करनेवाली है.

सच तो यह है कि एशिया हो या यूरोप अथवा अफ्रीका कहीं भी पत्रकार सुरक्षित नहीं है. उनके लिए काम करने की स्थिति लगातार जानलेवा साबित हो रही है. गत वर्ष लंदन की इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीच्यूट (आई.एन.एस.आई.) ने एक रिपोर्ट पेश किया जिसमें कहा गया है कि ‘वर्ष 2013 में रिपोर्टिंग के दौरान दुनियाभर में 134 पत्रकार और मीडिया को सहायता देनेवाले कर्मी मारे गये. इनमें 65 पत्रकारों की मौत सशस्त्र संघर्ष के कवरेज के दौरान हुई जिन्हें सोच-विचारकर निशाना बनाया गया.

आई.एन.एस.आई. की ‘कीलिंग द मैसेन्जर’ रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि वर्ष 2012 में 152 पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया. इराक, सोमालिया, फिलीपिंस, श्रीलंका, सीरिया, अफगानिस्तान, मैक्सिको, कोलम्बिया, पाकिस्तान और रूस जैसे देशों को पत्रकारों के लिए खतरनाक बताया गया है. इस सर्वे की शुरूआत 2008 ई. में हुई थी. सर्वे ने अपने शुरूआती अध्ययन से ही पाया कि इराक पत्रकारों की हत्या के एक सैकड़ा मामलों में एक में भी सजा नहीं दिलाने के कारण सूची में शीर्ष पर है. पिछले साल अमेरिका की ‘वाच डाग संस्था’ कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) की रिपोर्ट में कहा गया कि ‘सीरिया पत्रकारिता के लिए सबसे खतरनाक देश है. गौरतलब है कि वहां राष्ट्रपति बशर-उल-असद तथा विद्रोहियों के बीच छिड़े जंग के कारण वहां के हालात बिगड़े हुए हैं.

एक आंकड़े के मुताबिक सीरिया में विगत 10 सालों में 60 से ज्यादा पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. पिछले साल ही काफी दबाब के बाद 10 माह से कैद फ्रांस के चार पत्रकारों को कुछ भी भी न बताने की धमकी के साथ रिहा किया गया. पिछले साल ही रूस में यूक्रेन पर प्रतिबंध को लेकर सवाल पूछने पर एक गर्भवती रूसी महिला पत्रकार को वहां के संसद के डिप्टी स्पीकर ब्लामीदिर जिरोनस्की ने अपने समर्थकों को उस महिला रिपोर्टर का रेप कर देने का फरमान दिया. ये आंकड़ें भयावह सच्चाई को दर्शाते हैं.

पत्रकारों पर हो रहे लगातार हमले इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि अगर पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं किया जाता तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाना मुश्किल होगा और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले लोग निराशा के गहरे समुद्र में धंस जायेंगे, जो आने वाली पीढ़ियों को एक गहरे खाई में धंसा महसूस हो.

– संजय श्याम

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