भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के सामने बढ़ते राज्य दमन और राजनीतिक चुनौतियों के बीच, आंदोलन के भीतर अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के सवाल पर वैचारिक संघर्ष भी तेज़ हो रहा है. यह आलेख विश्वविजय और सीमा आज़ाद की राजनीतिक भूमिका और विचारों की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए क्रांतिकारी राजनीतिक लाइन, संगठनात्मक अनुशासन और मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के सिद्धांतों की रक्षा की आवश्यकता पर जोर देता है. शहीद सप्ताह के अवसर पर यह लेख शहीदों के संघर्ष और विरासत को याद करते हुए नवजनवादी क्रांति के उद्देश्य को आगे बढ़ाने का आह्वान करता है. यह आलेख वेबसाइट ‘माओइस्ट रोड‘ से लिया गया है, जिसका अनुवाद हमारा है – सम्पादक

वर्तमान समय में भारतीय क्रांतिकारी चारों ओर से तीव्र दमन और हमलों का सामना कर रहे हैं. इसके बावजूद, सच्चे कॉमरेड क्रांति की आत्मगत शक्तियों को सुरक्षित रखने और भारतीय क्रांति की निरंतरता सुनिश्चित करने के संघर्ष में डटे हुए हैं. इसी प्रक्रिया के तहत आंदोलन के भीतर मौजूद परिसमापनवादी, संशोधनवादी और अवसरवादी तत्वों को धीरे-धीरे अलग किया जा रहा है.
bsCEM के कॉमरेड, विश्वविजय और सीमा आज़ाद की आलोचना कर रहे हैं—ऐसे दो पूर्व क्रांतिकारियों की, जिन्होंने कई वर्षों तक संघर्ष से दूरी बनाए रखी और अपने व्यक्तिवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आंदोलन को अधिकतम सीमा तक परिसमाप्त करने तथा पार्टी की राजनीतिक लाइनों को नष्ट करने का प्रयास किया. जैसा कि bsCEM ने कहा :
क्रांतिकारी राजनीति को व्यक्तित्वों, मित्रताओं या लंबे समय के संबंधों तक सीमित नहीं किया जा सकता. जनता को राजनीतिक स्थितियों का मूल्यांकन उनके वर्गीय चरित्र और उनके व्यावहारिक परिणामों के आधार पर करना सीखना चाहिए. हमें राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत विवादों में बदलने की प्रवृत्ति को भी अस्वीकार करना चाहिए. क्रांतिकारी आंदोलन न तो व्यक्तित्व-पूजा पर निर्भर हो सकता है और न ही राजनीतिक आलोचना को व्यक्तिगत हमलों तक सीमित कर सकता है. साथ ही, हर आलोचक पर व्यक्तिगत शत्रुता से प्रेरित होने का आरोप लगाकर राजनीतिक आलोचना को चुप नहीं कराया जा सकता. सही तरीका राजनीतिक लाइन की जांच करना है.
अध्यक्ष माओ ने कहा था— ‘वैचारिक और राजनीतिक लाइन सही है या गलत, यही सब कुछ तय करती है.’
हम, जल-जंगल-जमीन, इस सत्य की पुष्टि करते हैं और भारत तथा विदेशों में सभी सच्चे मेहनतकश और उत्पीड़ित लोगों से आह्वान करते हैं कि वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और नवजनवादी क्रांति की सभी हमलों से रक्षा करें. इस शहीद सप्ताह में हम अपने शहीदों को याद करेंगे और क्रांति के लिए संघर्ष के अपने सिद्धांतों को पुनः दृढ़ता से स्थापित करेंगे.
- शहीद जनयोद्धाओं का रक्त जनयुद्ध को पोषित करेगा !
- विश्वविजय और सीमा आज़ाद को बेनकाब करो और अलग-थलग करो !
- अवसरवाद-परिसमापनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष करो !
- नवजनवादी क्रांति के उद्देश्य को आगे बढ़ाओ !
कॉमरेड चारु मजूमदार विश्व के महानतम कम्युनिस्ट नेताओं में से एक हैं. ऐसे समय में जब संशोधनवाद ने भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को वर्ग-सहयोगवाद तक सीमित कर दिया था, उन्होंने निर्भीकतापूर्वक मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद को बुलंद किया और नक्सलबाड़ी की गर्जना के माध्यम से जनयुद्ध का रास्ता पुनर्जीवित किया.
उन्होंने हमें सिखाया कि क्रांति शोषक वर्गों से भीख में नहीं मांगी जा सकती और न ही चुनावों के माध्यम से जीती जा सकती है; उसे एक सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सशस्त्र जनता द्वारा हासिल करना होता है. अवसरवाद के विरुद्ध उनका निरंतर संघर्ष, वैचारिक दृढ़ता पर उनका आग्रह और सबसे गरीब किसानों की क्रांतिकारी क्षमता में उनका अटूट विश्वास आज भी भारत में क्रांति के रास्ते को प्रकाशित करता है.
हालांकि प्रतिक्रियावादी भारतीय राज्य ने उन्हें गिरफ्तार किया और अपनी हिरासत में उनकी हत्या कर दी, लेकिन वह उनकी राजनीति को कभी दफना नहीं सका. उनका रक्त क्रांतिकारी आंदोलन को पोषित करता रहा और उनकी विरासत हर उस संघर्ष में जीवित है जो साम्राज्यवाद, सामंतवाद और दलाल नौकरशाह पूंजीवाद को चुनौती देने का साहस करता है.
कॉमरेड चारु मजूमदार की शहादत का सम्मान करने का अर्थ किसी व्यक्ति की पूजा करना नहीं, बल्कि उस क्रांतिकारी लाइन को आगे बढ़ाना है जिसके लिए उन्होंने जीवन जिया, संघर्ष किया और अपना जीवन न्योछावर कर दिया.
चारु मजूमदार और अनगिनत शहीदों ने जनता की सेवा में अपने प्राणों की आहुति दी. उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन के बाहर और भीतर—दोनों जगह मौजूद प्रतिक्रियावादी शक्तियों के हमलों के विरुद्ध संघर्ष किया. शहीदों को श्रद्धांजलि देते समय हमें उस अवसरवाद-परिसमापनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष को भी मजबूत करना होगा, जो भीतर से क्रांतिकारी आंदोलन को प्रभावित कर रहा है. केवल इसके विरुद्ध संघर्ष को मजबूत करके ही हम क्रांति के उद्देश्य को आगे बढ़ा सकते हैं.
विश्वविजय-सीमा आज़ाद के अवसरवाद-परिसमापनवाद-संशोधनवाद को बेनकाब करो !
भारत के क्रांतिकारी आंदोलन ने केवल शासक राज्य के प्रत्यक्ष बाहरी दमन का ही सामना नहीं किया है, बल्कि क्रांतिकारी खेमे के भीतर से वैचारिक और राजनीतिक हमलों का भी सामना किया है. इतिहास दर्शाता है कि जब भी क्रांतिकारी शक्तियां दमन, पराजय और अस्थायी पीछे हटने के दौर से गुजरती हैं, तब राजनीतिक लाइन का प्रश्न निर्णायक बन जाता है. ठीक ऐसे समय में अवसरवादी प्रवृत्तियां जोरदार ढंग से उभरती हैं, जो क्रांतिकारी दृढ़ता के स्थान पर समझौते, निराशावाद और समायोजन को स्थापित करना चाहती हैं.
आज क्रांतिकारी आंदोलन प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों के तीव्र हमले का सामना कर रहा है. क्रांतिकारी जनता और उसके संगठनों को सैन्य दमन, गिरफ्तारियों, निगरानी और घुसपैठ की कोशिशों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसी परिस्थितियों में क्रांतिकारियों का कार्य क्रांतिकारी सिद्धांतों को दृढ़ता से कायम रखना तथा अपनी समझ को गहरा करना, संगठित शक्ति को मजबूत करना और सफलताओं एवं असफलताओं—दोनों से सीखना है.
इसी संदर्भ में हमें विश्वविजय और सीमा आज़ाद द्वारा प्रस्तुत राजनीतिक स्थितियों की आलोचनात्मक जांच करनी चाहिए.
उनकी वर्तमान राजनीतिक दिशा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद पर आधारित क्रांतिकारी राजनीतिक लाइन से एक गंभीर विचलन का प्रतिनिधित्व करती है. उनकी स्थितियों ने क्रांतिकारी संगठन को मजबूत करने के बजाय क्रांतिकारी राजनीति, संगठन और संघर्ष के तरीकों की आवश्यकता को लेकर भ्रम पैदा किया है.
इसलिए क्रांतिकारियों के सामने प्रश्न व्यक्तिगत निष्ठा या व्यक्तिगत संबंधों का नहीं है. यह राजनीतिक लाइन का प्रश्न है. किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसके अतीत के योगदानों के आधार पर नहीं किया जा सकता. क्रांतिकारी इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के एक दौर में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन बाद में क्रांतिकारी सिद्धांतों को त्याग दिया.
महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति आज किस राजनीतिक लाइन को कायम रखता है और व्यवहार में लागू करता है. इसलिए यह तर्क कि किसी व्यक्ति की आलोचना नहीं की जा सकती क्योंकि उसने कई वर्षों तक क्रांतिकारी आंदोलन में योगदान दिया है, मूलतः गलत है. क्रांतिकारी राजनीति निरंतर आत्मालोचना, वैचारिक संघर्ष और सुधार की मांग करती है. अतीत के योगदान राजनीतिक आलोचना से स्थायी छूट नहीं दे सकते.
एक कथित ‘वामपंथी विचलन’ के खिलाफ संघर्ष के बहाने उन्होंने दक्षिणपंथी-अवसरवादी लाइन का प्रचार किया, जिसने गुप्त पार्टी को बनाए रखने की आवश्यकता को नकारा, दीर्घकालिक जनयुद्ध की केंद्रीयता को कमतर किया और क्रांतिकारी राजनीति की जगह कानूनीवाद और सुधारवाद को स्थापित करने का प्रयास किया.
उन्होंने लगातार जनवादी केंद्रीयता पर हमला किया, संगठनात्मक अनुशासनहीनता को प्रोत्साहित किया और एकता का भ्रामक दिखावा बनाए रखते हुए गुप्त रूप से पार्टी-विरोधी गुट संगठित करके गुटबंदी के तरीकों को बढ़ावा दिया. सर्वहारा अनुशासन के ऊपर व्यक्तिवाद को स्थापित करने और कम्युनिस्ट नैतिकता के विरुद्ध जाने वाली राजनीतिक स्थितियों को बढ़ावा देने सहित बुर्जुआ-उदारवादी अवधारणाओं का उनका प्रचार मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद पर एक वैचारिक हमला था.
उनकी गतिविधियों ने भ्रम पैदा किया, संगठनात्मक एकता को कमजोर किया और वस्तुगत रूप से संशोधनवाद तथा वर्ग-शत्रु के हितों की सेवा की.
अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास हमें सिखाता है कि राजनीतिक पराजय और पीछे हटने के दौर में अवसरवाद और परिसमापनवाद अक्सर सबसे अधिक शक्तिशाली रूप में उभरते हैं. विश्वविजय और सीमा आज़ाद द्वारा प्रस्तुत स्थितियां उन्हीं के समान हैं जिन्हें सोनू, देवजी और बलराज जैसे गद्दारों ने आगे बढ़ाया.
यद्यपि विश्वविजय और सीमा नाममात्र के लिए इन गद्दारों के विरोधी होने का दावा करते हैं, लेकिन वे समान प्रकार के भ्रम पैदा कर रहे हैं और परिसमापनवादी गतिविधियों में संलग्न हैं. वे कितनी भी प्रभावशाली भाषा में अपना बचाव करें, उनकी राजनीतिक अंतर्वस्तु और वर्ग-सहयोगवाद एक ही है.
जब दमन तीव्र होता है और क्रांतिकारी शक्तियां अस्थायी पराजयों का सामना करती हैं, तब कुछ लोग उन्हीं सिद्धांतों पर प्रश्न उठाने लगते हैं जिन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन का मार्गदर्शन किया है.
वस्तुगत परिस्थितियों का विश्लेषण करने और पराजयों के कारणों की पहचान करने के बजाय वे आसान रास्ता तलाशते हैं. क्रांतिकारी संगठन को अनावश्यक बताया जाता है. अनुशासन को अधिनायकवाद के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जनवादी केंद्रीयता को नौकरशाही नियंत्रण तक सीमित कर दिया जाता है. जिन परिस्थितियों के कारण भूमिगत कार्य आवश्यक होता है, उनका ठोस विश्लेषण किए बिना भूमिगत कार्य को खारिज कर दिया जाता है.
ऐसी प्रवृत्तियों का सामना वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष के माध्यम से किया जाना चाहिए. क्रांतिकारी आंदोलन व्यक्तिगत पसंद, व्यक्तिगत सुविधा या निम्न-मध्यवर्गीय आकांक्षाओं के आधार पर नहीं बनाया जा सकता. क्रांति मांग करती है कि व्यक्तिगत हितों को जनता और क्रांतिकारी उद्देश्य के सामूहिक हितों के अधीन रखा जाए.
उन्होंने जनवादी केंद्रीयता को स्वभावतः दमनकारी और क्रांतिकारी अनुशासन को ऊपर से यांत्रिक रूप से थोपी गई व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया है.
ऐसी समझ जनवादी केंद्रीयता के वास्तविक सार को विकृत करती है. जनवादी केंद्रीयता सामूहिक विचार-विमर्श और जनवादी भागीदारी को कार्रवाई की एकता के साथ जोड़ती है. जनवाद के बिना केंद्रीयता नौकरशाहीवाद में बदल जाती है. केंद्रीयता के बिना जनवाद विखंडन और व्यक्तिवाद का रूप ले सकता है. इसलिए क्रांतिकारी संगठन को दोनों की द्वंद्वात्मक एकता बनाए रखनी चाहिए.
माओ त्से तुंग ने जनवाद और केंद्रीयता तथा स्वतंत्रता और अनुशासन के संबंध को एक एकीकृत संपूर्ण के दो पक्षों के रूप में रेखांकित किया था. इनमें से किसी को भी यांत्रिक ढंग से दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता.
कोई क्रांतिकारी संगठन अपने सदस्यों की व्यक्तिगत इच्छाओं के अनुसार संचालित नहीं हो सकता. न ही राजनीतिक मतभेदों का समाधान व्यक्तिगत अभियानों, सोशल मीडिया पर लामबंदी या प्रतिस्पर्धी गुटों के निर्माण के माध्यम से किया जा सकता है. मतभेदों का समाधान सिद्धांतनिष्ठ वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष के माध्यम से होना चाहिए.
द्वि-लाइन संघर्ष की पद्धति इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि विरोधाभास हर जगह और अनिवार्य रूप से उत्पन्न होते हैं. इस संघर्ष का उद्देश्य सही और गलत राजनीतिक लाइनों के बीच अंतर करना, सिद्धांतनिष्ठ आधार पर एकता को मजबूत करना और क्रांतिकारी व्यवहार को आगे बढ़ाना है. इस पद्धति को त्यागकर राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत रूप देना क्रांतिकारी आंदोलन को कमजोर करना है.
अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अनुभव परिसमापनवाद के खतरों को प्रदर्शित करता है. जब भी क्रांतिकारी शक्तियां दमन का सामना करती हैं, परिसमापनवादी प्रवृत्तियां उभरती हैं जो तर्क देती हैं कि क्रांतिकारी ढांचों को त्याग दिया जाना चाहिए, राजनीतिक लाइन को कमजोर किया जाना चाहिए और क्रांतिकारी संगठन को उन रूपों में पीछे हट जाना चाहिए जो मौजूदा व्यवस्था को अधिक स्वीकार्य हों.
ऐसी प्रवृत्तियां स्वयं को ‘यथार्थवादी’, ‘व्यावहारिक’ या ‘आधुनिक’ कहकर प्रस्तुत कर सकती हैं. लेकिन क्रांतिकारी राजनीति का निर्धारण इस आधार पर नहीं हो सकता कि कौन-सा रास्ता सबसे आरामदायक या कम जोखिम भरा है. प्रश्न यह नहीं है कि क्रांतिकारी कार्य कब कठिन होता है; प्रश्न यह है कि क्रांतिकारी कठिन परिस्थितियों का जवाब कैसे देते हैं.
यदि दमन बढ़ता है, तो क्रांतिकारी शक्तियों को कार्य करने के उपयुक्त तरीके विकसित करने चाहिए. यदि शत्रु निगरानी तेज करता है, तो क्रांतिकारियों को अपने संगठनात्मक तरीकों को परिस्थितियों के अनुसार ढालना चाहिए. यदि राज्य क्रांतिकारी ढांचों को नष्ट करने का प्रयास करता है, तो उसका उत्तर केवल उन ढांचों को त्याग देना नहीं हो सकता.
कुछ भ्रम के कारण विश्वविजय और सीमा आज़ाद की राजनीतिक स्थितियों का यह कहकर बचाव भी किया गया है कि वे केवल ‘भ्रम’ का परिणाम हैं. लेकिन राजनीतिक स्थितियों का मूल्यांकन केवल व्यक्तियों के आत्मगत इरादों के आधार पर नहीं किया जा सकता.
यदि वास्तव में भ्रम मौजूद है, तो उसे वैचारिक संघर्ष, आलोचना और आत्मालोचना के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए. जो क्रांतिकारी अपनी गलती को पहचानता है, उसे उसकी जांच करने और उसे सुधारने के लिए तैयार रहना चाहिए.
इसलिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि कोई व्यक्ति ‘भ्रमित’ है या नहीं. प्रश्न यह है कि क्या वह गलत विचारों पर विजय पाने के लिए सिद्धांतनिष्ठ राजनीतिक संघर्ष में शामिल होने को तैयार है ? गलती करने और गलत राजनीतिक लाइन का बचाव करने के बीच एक बुनियादी अंतर है.
क्रांतिकारी राजनीति को व्यक्तित्वों, मित्रताओं या लंबे समय के संबंधों तक सीमित नहीं किया जा सकता. जनता को राजनीतिक स्थितियों का मूल्यांकन उनके वर्गीय चरित्र और व्यावहारिक परिणामों के आधार पर करना सीखना चाहिए.
हमें राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत विवादों में बदलने की प्रवृत्ति को भी अस्वीकार करना चाहिए. क्रांतिकारी आंदोलन न तो व्यक्तित्व-पूजा पर निर्भर हो सकता है और न ही राजनीतिक आलोचना को व्यक्तिगत हमलों तक सीमित कर सकता है. साथ ही, हर आलोचक पर व्यक्तिगत शत्रुता से प्रेरित होने का आरोप लगाकर राजनीतिक आलोचना को चुप नहीं कराया जा सकता. सही तरीका राजनीतिक लाइन की जांच करना है.
किसी विशेष राजनीतिक स्थिति से किन वर्गीय हितों की सेवा होती है ? क्या वह क्रांतिकारी संगठन को मजबूत करती है या कमजोर ? क्या वह क्रांतिकारी उद्देश्य को आगे बढ़ाती है या उससे पीछे हटती है ?
क्रांतिकारी आंदोलन का अर्थ है—ठोस परिस्थितियों में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद का प्रयोग, निरंतर वैचारिक संघर्ष, जनकार्य, आलोचना और आत्मालोचना तथा एक अनुशासित क्रांतिकारी संगठन.
हम सभी क्रांतिकारी लोगों, छात्रों, मजदूरों, बुद्धिजीवियों और जनवादी शक्तियों से आह्वान करते हैं कि वे इन राजनीतिक प्रश्नों का गंभीरता और आलोचनात्मक दृष्टि से अध्ययन करें.
आइए, हम अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद की राजनीति को अस्वीकार करें तथा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के क्रांतिकारी सिद्धांतों की रक्षा करें.
- विश्वविजय और सीमा आज़ाद को बेनकाब करो और अलग-थलग करो !
- अवसरवाद-परिसमापनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष करो !
- नवजनवादी क्रांति के उद्देश्य को आगे बढ़ाओ !
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उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)
उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)
उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी
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