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गोड्डा में जमीन की लूट व अडानी का आतंक

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 12, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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जैसा कि आप जानते हैं कि आज पूरे देश में ब्राह्मणीय हिन्दुत्व फासीवादी भाजपा की मोदी सरकार अपने मालिक पूंजीपतियों को औने-पौने दाम पर जमीन देने या कहा जाए तो किसानों से उनकी जमीन लूट लेने के लिए लगातार भूमि अधिग्रहण कानून में छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रही है. उसी के नक्शेकदम पर चलते हुए झारखंड की ब्राह्मणीय हिन्दुत्व फासीवादी भाजपा की रघुवर सरकार भी एक तरफ तो सीएनटी-एसपीटी कानून में संशोधन व भूमि अधिग्रहण कानून में लगातार संशोधन का प्रयास चला रही है. वहीं दूसरी तरफ अपने मालिकों को जमीन बांट भी रही है, जिसके खिलाफ जनता का लगातार आंदोलन जारी है. गोड्डा जिला में भी ऐसी ही जमीन लूट को अपने मालिक अडानी के लिए अंजाम दिया जा रहा है और किसानों पर लाठियां बरसायी जा रही है. इसी जमीन लूट व पुलिस-कम्पनी गठजोड़ के द्वारा आम जनता पर दमन को बयां करता चार रिपोर्ट हम यहां दे रहे हैं (चारों रिपोर्ट में जमीन के आंकड़े में कुछ अंतर है), जो कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से साभार लिया गया है – एक रिपोर्ट

गोड्डा में जमीन की लूट व अडानी का आतंक

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2016 में झारखंड सरकार ने बहुत जोर-शोर के साथ गोड्डा जिले में एक पावर प्लांट स्थापित करने के लिए अडानी समूह के साथ समझौता किया था. झारखंड जनाधिकार महासभा, जो कि 30 से अधिक संगठनों का एक मंच है, के एक दल ने हाल में ही इस परियोजना का तथ्यान्वेषण किया. जांच में पता चला कि पिछले दो सालों में परियोजना की कई उपलब्धियां हैं, जैसे- जबरन भूमि अधिग्रहण, भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की प्रक्रियाओं का व्यापक उल्लंघन, किसानों की फसलों को बर्बाद करना, संभावित लाभों के बारे में झूठ बोलना, प्रभावित परिवारों पर पुलिस बर्बरता, केस-मुकदमे करना तथा अन्य हथकंडों से डराना आदि रोज की बात हो गई है.

कंपनी की सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, थर्मल पावर प्लांट के लिए गो्यस्त्रा जिले के दो प्रखंडों के 10 गांवों में फैली हुई 1364 एकड़ भूमि को अधिग्रहित किया जाना है. इस प्लांट से 1600 मेगावाट बिजली की उत्पादन होगी. झारखंड सरकार और कंपनी का दावा है कि यह एक लोक परियोजना है, इससे रोजगार का सृजन और आर्थिक विकास होगा तथा इस परियोजना में विस्थापन की संख्या ‘शून्य’ है. कुल बिजली उत्पादन का 25 प्रतिशत झारखंड को दिया जाएगा.

जमीनी वास्तविकता इन दावों से विपरीत है. भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के अनुसार, निजी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण करने के लिए कम से कम 80 प्रतिशत प्रभावित परिवारों की सहमति एवं ग्राम सभा की अनुमति की आवश्यकता है लेकिन क्षेत्र के अधिकांश आदिवासी और कई गैर-आदिवासी परिवार शुरूआत से ही परियोजना का विरोध कर रहे हैं. 2016 और 2017 में सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (एसआईए) और पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) के लिए जनसुनवाई आयोजित की गई थी. कई जमीन मालिक जो इस परियोजना के विरोध में थे, उन्हें अडानी के अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन ने जनसुनवाई में भाग लेने नहीं दिया. प्रभावित ग्रामीण दावा करते हैं कि गैर प्रभावित क्षेत्र के लोगों को सुनवाई में बैठाया गया था. ऐसी ही एक बैठक के बाद जिसमें प्रभावित परिवारों को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया था, ग्रामीणों और पुलिस के बीच झड़प हुई थी और पुलिस द्वारा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार व उन पर लाठी चार्ज किया था.




कम्पनी की सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट में कई तथ्यात्मक व वैधानिक त्रुटियां है, जैसे प्रभावित गांवों में कोई तकनीकी रूप में कुशल और शिक्षित व्यक्ति न होना, शून्य विस्थापन, प्रभावित गांवों के सभी ग्रामीणों का धर्म हिन्दू बताना आदि. बटाईदार खेतिहर पर होने वाले प्रभाव का कोई जिक्र नहीं है. न ही इसमें वैकल्पिक जमीन की बात की गयी है. परियोजना से सृजित होने वाली नौकरियों की संख्या रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं है. साथ ही भूमि अधिग्रहण के लिए सहमति की वीडियो और जमीन मालिकों द्वारा हस्ताक्षरित सहमति पत्र उपलब्ध नहीं है.

यह गौर करने की बात है कि अधिनियम के अनुसार प्रभावित परिवारों का हिस्सा जमीन मालिक, मजदूर व बटाईदार खेतिहर होते हैं, सरकार ने चार गांवों में लगभग 500 एकड़ भूमि अधिग्रहित की है. इसमें से कम से कम 100 एकड़ जमीन संबंधित 40 परिवारों की सहमति के बिना जबरन अधिग्रहण किया गया है. कम्पनी ने स्थानीय पुलिस के सहयोग से माली गांव के मैनेजर हेम्ब्रम सहित अन्य पांच आदिवासी परिवारों की 15 एकड़ जमीन में लगी फसलों, कई पेड़-पौधों, श्मशान घाटों और तालाब को बर्बाद कर दिया. मोतिया गांव के रामजीवन पासवान की भूमि को जबरन अधिग्रहण करने के दौरान अडानी कंपनी के अधिकारियों ने उन्हें धमकी दी कि ‘जमीन नहीं दी, तो जमीन में गाड़ देंगे.’’

पुलिस ने अडानी के अधिकारियों के खिलाफ उनकी शिकायत दर्ज करने से इंकार कर दिया. जब माली के लोगों ने उनकी सहमति के बिना जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण के खिलाफ गो्यस्त्रा के उपायुक्त से शिकायत की तो उन्होंने कार्रवायी करने से इनकार कर दिया और कहा कि उनकी भूमि अधिग्रहित कर ली गयी है इसलिए उन्हें मुआवजा लेना चाहिए.

प्रभावित गांव के लोग दावा करते हैं कि अगर सभी दस गांवों में जमीन अधिग्रहित की जाती है तो 1000 से अधिक परिवार विस्थापित हो जाएंगे. इससे उनके आजीविका और रोजगार पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. साथ ही आदिवासी परिवारों के लिए जमीन उनकी संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व से जुड़ा है, जिसे वे गंवाना नहीं चाहते हैं. यह गौर करने की बात है कि संथाल परगना टेनेंसी अधिनियम की धारा 20 के अनुसार किसी भी सरकारी या निजी परियोजना (कुछ विशेष परियोजनाओं के अलावा) के लिए कृषि भूमि हस्तांतरित या अधिगृहित नहीं की जा सकती है.




पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, हर वर्ष प्लांट में 14-18 मिलियन टन कोयले का उपयोग किया जाएगा. इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह आस-पास के वातावरण को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा. प्लांट में प्रतिवर्ष 36 एमसीएम पानी की आवश्यकता होगी, जिसे स्थानीय चिर नदी से लिया जाएगा. यह वर्षा आधारित नदी इस जल-अभाव क्षेत्र के लिए जीवनरेखा समान है.

प्लांट से उत्पादित बिजली बांग्ला देश में आपूर्ति की जाएगी. हालांकि अडानी कंपनी को कुल उत्पादन का कम से कम 25 प्रतिशत बिजली झारखंड को उपलब्ध कराना है लेकिन इसके सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट में इस 25 प्रतिशत के स्त्रोत का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है. हाल के एक न्यूज रिपोर्ट ने यह खुलासा किया है कि झारखंड सरकार ने अडानी कंपनी से उच्च दर पर बिजली खरीदने के लिए 2016 में अपनी उर्जा नीति में बदलाव की थी. इस बदलाव के कारण सरकार से अडानी समूह को अगले 25 वर्षों में सामान्य भुगतान के अलावा 7000 हजार करोड़ रूपये का अतिरिक्त भुगतान भी मिल सकता है.

जांच से यह स्पष्ट है कि इस पूरी परियोजना में अभी तक कई कानूनों का घोर उल्लंघन हुआ है. इस परियोजना से स्पष्ट है कि सरकार लोगों का शोषण व उनके संसाधनों का दोहन करके कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे को प्राथमिकता दे रही है. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस परियोजना के भूमि अधिग्रहण से संबंधित अधिकांश दस्तावेज जिला प्रशासन की बेवसाइट पर उपलब्ध नहीं है, जैसा कि अधिनियम अंतर्गत अनिवार्य है. झारखंड जनाधिकार महासभा सभी संगठनों और कार्यकर्ताओं की ओर से निम्न मांग करता हैः

(क) अवैध तरीके से लगाई जा रही परियोजना को तुरंत रोका जाए. प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण को तुरंत बंद किया जाए और अवैध तरीके से अधिग्रहित की जा रही जमीन को वापस किया जाए,

(ख) चूंकि इस परियोजना में कानूनों का उल्लंघन हुआ है, इस परियोजना का न्यायिक जांच करवाया जाए तथा लोगों के शोषण के लिए अडानी कम्पनी और जिम्मेदार पदाधिकारियों के विरूद्ध कानूनी कारवाई की जाए व

(ग) सभी प्रभावित परिवारों को अभी तक हुए फसलों और आजीविका के नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाए.




माली गांव की लुखुमोयी मुर्मू का जन्म भारत की आजादी के बाद हुआ है. उन्होंने गुलामी नहीं देखी, सिर्फ इसकी कहानियां सुनी है. इसको लेकर उनकी जानकारी सिर्फ इतनी है कि तब अंग्रेजी हुकूमत अपनी बातों को मनवाने के लिए लोगों का दमन करती थी. अब आजाद भारत में वह कथित तौर पर उसी तरह के दमन को महसूस कर रही है. इसकी वजह बना है यहां बन रहा अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट.

आठ-आठ सौ मेगावाट के इन प्लांटों के निर्माण के लिए झारखंड सरकार और अडानी पावर (झारखंड) लिमिटेड ने फरवरी 2016 में एक करार किया था. इसके तहत इससे उत्पादित 1600 मेगावाट बिजली विशेष ट्रांसमिशन लाइन से सीधे बांग्ला देश को भेजी जानी है. इसके लिए अडानी समूह करीब 15000 करोड़ रूपये का निवेश करने वाला है. इसकी पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2015 में बांग्ला देश दौरे में की थी. बाद में बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के दिल्ली दौरे के दौरान इसपर आगे की सहमति बनी. इसके लिए अडानी पावर लिमिटेड और बांग्ला देश पावर लिमिटेड बोर्ड के बीच औपचारिक करार हो चुका है.




लुखुमोयी का दर्द

लुखुमोयी मुर्मू ने बीबीसी से कहा, ‘‘हमने पावर प्लांट के लिए अपनी जमीन नहीं दी है. फिर जाने कैसे मेरी जमीन का अधिग्रहण हो गया. 31 अगस्त को अडानी कम्पनी के लोग सैकड़ों पुलिसवालों और लठैतों के साथ मेरे गांव आए और मेरे खेत पर जबरन कब्जा करने की कोशिश की. उन लोगों ने मेरी धान की फसल बर्बाद कर दी और बुलडोजर चलाकर सारे पेड़-पौधे उखाड़ दिये. मैंने उनका पैर पकड़ा. फसल नहीं उजाड़ने की मिन्नतें की, लेकिन वे अंग्रेजों की तरह दमन पर उतारू थे. उन लोगों ने हमारी जमीन पर जबरन बाड़ लगा दिया. हमारे पुरखों के श्मशान को तोड़कर समतल कर दिया. ‘‘उन लोगों ने कहा कि अब यह जमीन अडानी कंपनी की है, मेरी नहीं. हमें बताया गया कि इन जमीनों का अधिग्रहण हो चुका है और इसका मुआवजा सरकार के पास जमा करा दिया गया है. आप बताइए कि अब जब हमनें जमीन ही नहीं दी, तो इसका अधिग्रहण कैसे कर लिया गया. हमको अपनी जमीन चाहिए, मुआवजे का रूपया नहीं.’’

कौन है लुखुमोयी मुर्मू ?

माली गांव में आदिवासियों के डेढ़ दर्जन घर है. 100 लोगों की आबादी वाले इस गांव में एक घर लुखुमोयी मुर्मू का भी है. पिछले दिनों जमीन पर कब्जे के वक्त अधिकारियों का पैर पकड़कर रोती उनकी तस्वीरें और फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे. वे और उनके गांव के आदिवासी पावर प्लांट के लिए जमीन के अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. इन आदिवासियों की यहां करीब पौने सत्रह बीघा पुश्तैनी जमीन है, जिसपर खेती कर वे अपनी आजीविका चलाते हैं.




कहां-कहां हुआ है अधिग्रहण ?

अडाणी समूह के प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए गो्यस्त्रा प्रखंड के मोतिया, गंगटा गोविंदपुर, पटवा और पोड़ैयाहाट के माली, गायघाट और सोनाडीहा गांवों की जमीनें अधिग्रहण की प्रक्रिया में है. सरकार का दावा है कि मोतिया, गंगटा गोविंदपुर, पटवा और माली गांवों के अधिकतर रैयतों ने अपनी जमीनें देकर उसका मुआवजा ले लिया है. जबकि इन गांवों के आदिवासियों का आरोप है कि सरकार ने उनकीजमीनें अवैध तरीके से अधिग्रहित की है. लिहाजा वे इसका मुआवजा नहीं ले सकते.

अडाणी समूह ने मोतिया गांव में अपने प्रस्तावित पावर प्लांट का बोर्ड लगाया है. यहां एस्बेस्टस और ईटों से दफ्तरनुमा कुछ शेड बनाए गए हैं. बाहर कुछ सिक्योरिटी गार्ड तैनात है, जो प्रारंभिक पूछताछ के बाद ही हमें इसकी तस्वीरें उतारने की इजाजत देते हैं. इन गांवों में घुमने के दौरान मैंने अडाणी फाउंडेशन द्वारा बनाए गये चबूतरे और कुछ और निर्माण देखे. जो इस बात की मुनादी करते हैं कि अडाणी समूह इन कोशिशों के जरिये स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल करना चाह रहा है.




फिर क्यों विरोध ?

मोतिया में मेरी मुलाकात रामजीवन पासवान से हुई. वे रिटायर्ड शिक्षक है. उन्होंने अपनी जमीन के जबरन अधिग्रहण और मारपीट के आरोप में अडाणी समूह के कुछ अधिकारियों पर मुकदमा किया है. वे मानते हैं कि अडाणी समूह की झारखंड सरकार से मिलीभगत है. उन्होंने आरोप लगाया है कि झारखंड की सरकार ‘प्रो पीपुल’ न होकर ‘प्रो अडाणी’ हो चुकी है और उसे अवैध तरीके से मदद कर रही है.

रामजीवन पासवान ने बीबीसी से कहा- ‘‘ सरकार झूठ बोल रही है. गलत तथ्य के आधार पर हमारी जमीनों का अधिग्रहण कर लिया गया है. जबकि हमने अपनी सहमति का पत्र सौंपा ही नहीं है. वे लोग दलालों (बिचौलिया) की मदद से लोगों को डराकर जमीनें अधिग्रहित करा रहे हैं.’’ वे रोते हुए कहते हैं- ‘‘फरवरी महीने में अडाणी समूह के कुछ लोग मेरे खेत पर आए. मुझे मेरी जाति (दुसाध) को लेकर गालियां दी और कहा कि इसी जमीन में काटकर गाड़ देंगे. मेरी जिंदगी में पहले किसी ने ऐसी गाली नहीं दी थी. मैं इस घटना को भूल नहीं पाता हूं. मेरे घर में ईट-पत्थर से हमला कराया गया और अब पुलिस इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रही है.’’




मरा बताकर जमीन ले ली

इसी गांव के गणेश पंडित का अलग दर्द है. सरकार द्वारा जमीन के अधिग्रहण के लिए बनाई गई रैयतों की सूची में उन्हें मृत बताकर उनकी जमीन अधिग्रहित कर ली गई. उन्होंने बीबीसी से कहा, ‘‘मुझे कम्पनी अडाणी के लोगों ने मार दिया. तीन बेटा है, दो का ही नाम दिखाया और मेरी जमीन को मेरी सहमति के बगैर अधिग्रहित कर लिया. मैंने मुआवजा का पैसा नहीं लिया है. इसके बावजूद मेरी जमीन पर बाड़ लगाकर घेराबंदी कर दी गई है.’’ गंगटा गोविंदपुर गांव के सूर्यनारायण हेम्ब्रम की भी ऐसी ही शिकायत है.

उन्होंने बताया कि जुलाई में धान का बिचड़ा लागते वक्त अडानी कम्पनी के कथित मैनेजरों ने उन्हें अपना खेत जोतने से रोक दिया. उन्होंने मुआवजा नहीं लिया है, क्योंकि वे पावर प्लांट के लिए अपनी जमीन देना नहीं चाहते हैं. सरकार ने उनकी जमीन का जबरदस्ती अधिग्रहण कर लिया है. सूर्यनारायण हेंब्रम (गंगटा), राकेश हेंब्रम, श्रवण हेंब्रम, मैनेजर हेंब्रम, अनिल हेंब्रम, बबलू हेंब्रम, चंदन हेंब्रम, मुंशी हेंब्रम, पंकज हेंब्रम (सभी माली गांव के) और रामजीवन पासवान व चिंतामणि साह (मोतिया) ने आरोप लगाया कि दिसंबर 2017 में जनसुनवाई के वक्त अडाणी समूह के अधिकारियों ने कथित तौर पर फर्जी रैयतों को खड़ा कर खानापूरी कर ली.

गांधीवादी एक्टिविस्ट चिंतामणि साह ने कहा- ‘‘इसमें प्रवेश के लिए कभी पीला कार्ड तो कभी सफेद गमछा जारी किया गया. जनसुनवाई के दौरान ऐसे ही लोग अंदर ले जाए गए, जिनके पास ये पहचान थी. असली रैयत अपना आधार कार्ड और राशन कार्ड लिए रह गए लेकिन उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया. बाद में उसी कथित जनसुनवाई और मुंबई के एक कम्पनी द्वारा कथित तौर पर किये गये सोशल इंपैक्ट सर्वे के आधार पर जमीनें अधिग्रहित कर ली गई.’’




सरकार का पक्ष

गोड्डा के अपर समाहर्ता (एसी) अनिल तिर्की ने मीडिया को बताया कि सरकार ने अडाणी पावर (झारखंड) लिमिटेड के गो्यस्त्रा प्लांट के लिए 517 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया है. अडाणी समूह को 900 एकड़ से कुछ अधिक जमीन चाहिए. इसके लिए पोड़ैयाहाट प्रखंड के सोनडीहा और गायघाट गांवों की करीब 398 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की गई थी. तय समय सीमा में अडाणी समूह उसकी प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका, लिहाजा उस जमीन के अधिग्रहण के लिए उन्हें पूरी प्रक्रिया फिर से दोहरानी होगी.

जमीनों के जबरन अधिग्रहण और आदिवासियों और दूसरे ग्रामीणों के अन्य आरोपों के संबंध में पूछे गए सवालों पर उन्होंने यह कहकर जवाब नहीं दिया कि वह इसके लिए अधिकृत नहीं है. वहीं, गोड्डा की डीसी कंचन कुमार पासी ने मीडिया के समक्ष दावा किया कि जमीनों के अधिग्रहण में भूमि अधिग्रहण कानूनों का पालन किया जा रहा है. अडाणी समूह के एक अधिकारी से मेरी मुलाकात गोड्डा में हुई, तो उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया. हालांकि अडाणी समूह के रांची स्थित हेड (कॉर्पोरेट अफेयर्स) अमृतांशु प्रसाद ने एक मीडिया बयान में कहा कि गोड्डा में पावर प्लांट का विरोध करने वाले लोग विकास विरोधी है. उन्हें नहीं पता कि उस प्लांट के खुल जाने से कितने लोगों को रोजगार मिलेगा. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी कुछ महीने पहले कहा था कि अडाणी समूह के पावर प्लांट से रोजगार के नए अवसर सृजित करेंगे. बहरहाल, विवादों में चल रहे अडाणी समूह को अपने पावर प्लांट के लिए बाकी की जमीनों के अधिग्रहण में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.




झारखंड सरकार पर गरीब आदिवासियों की जमीन बलपूर्वक उद्योगपति अडानी के हवाले करने का आरोप है. आरोप के मुताबिक झारखंड की सरकार ने नियमों की अनदेखी करते हुए गोड्डा जिले के माली (आदिवासी गांव) और उसके आस-पास के गांवों की खेती योग्य भूमि अडानी समूह की एक कम्पनी को दे डाली. इस दौरान संशोधित भूमि अधिग्रहण कानून का बड़े स्तर पर उल्लंघन किया गया. 2016 से शुरू हुआ यह मामला आज की तारीख में ज्वलंत हो चुका है.

इस केस को लेकर मई 2016 में प्रदेश की बीजेपी सरकार द्वारा आदिवासियों से संबंधित कानून में संशोधन भी सवाल के घेरे में है क्योंकि अडानी ग्रुप ने जिन जमीनों का अधिग्रहण किया है, वे सभी आदिवासी बहुल गांवों की है. गांव वाले आज भी अपनी खोई हुई खेतिहर जमीन को पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. इंडियास्पेंड समेत तमाम मिडिया रिपोर्ट्स में प्रशासनिक मिलीभगत के जरिये ग्रामीणों की जमीन हथियाने की बात कही गयी है.

बिजनेस स्टैंडर्ड ने इंडियास्पेंड के हवाले से गांवों के किसानों की पूरी दास्तान अपनी रिपोर्ट में बताई है. रिपोर्ट के मुताबिक माली गांव के किसानों का कहना है कि पुलिस बल के साथ कम्पनी के लोग अपने साजो-सामान के साथ गांव में दाखिल हुए और खेतों पर कब्जा जमा लिया. इस दौरान उनके विरोध को पुलिस ने बल-पूर्वक दबा डाला. संथाल आदिवासी समाज से ताल्लुक रखने वाले किसानों ने बताया कि अधिग्रहण के वक्त गांव में एक आदमी पर तकरीबन 10-10 पुलिस बल तैनात किये गये थे. इस दौरान फर्जी तरीके से उनकी सहमति के बगैर खेतों पर कब्जा जमाया गया. जब गांव में कम्पनी के कर्मचारी कंटीले तारों से अधिग्रहित जमीन को घेर रहे थे, तब उन्होंने जिला के एसपी और जिला अधिकारी से भी संपर्क किया. लेकिन इस दौरान एसपी ने स्थानीय थाना से संपर्क करने के लिए कहा (जबकि स्थानीय पुलिस जमीन खाली कराने में पहले से ही जुटी हुई थी).




वहीं जिला अधिकारी ने कहा कि जमीन के बदले आर्थिक मुआवजा जिला कार्यालय में रखा हुआ है और प्रभावित किसान वहां से अपना हिस्सा ले सकते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक जमीन अधिग्रहण के दौरान ग्रामीण औरतों ने रोते हुए कम्पनी के अधिकारियों के पैर तक पकड़ लिये लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गयी और पुलिस ने उन्हें बलपूर्वक हटा दिया. इस दौरान एक शख्स ने पूरा वाकया अपने मोबाइल फोन से रिकॉर्ड भी कर लिया लेकिन पुलिस ने सारे फुटेज मोबाइल से डिलीट करा दिये.

गांव वालों का आरोप है कि उनके दर्द को कोई नहीं महसूस कर रहा है. कम्पनी के कर्मचारियों ने उनकी खड़ी फसलें तबाह कर दी. जबकि, उन्होंने कई महीनों तक दिन-रात मेहनत करके उसे सींचा और बोया था. फसल उजड़ जाने से वह दाने-दाने को मोहताज है. 31 अगस्त, 2018 को जमीन को लेकर हिंसक विरोध-प्रदर्शन भी हो चुके हैं. गांव वालों का कहना है कि वे अपनी आवाज उठाते रहेंगे, क्योंकि यहां पैसे की बात नहीं है, बल्कि जमीन की है और जमीन ही उनके लिए सब कुछ है.




मामले का इतिहास

अडानी समूह के साथ माली और इससे जुड़े प्रभावित गांवों की लड़ाई 2016 से शुरू होती है. राजधानी रांची से करीब 380 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में अडानी समूह ी ‘अडानी पावर (झारखंड) लिमिटेड’ ने करीब 2000 एकड़ जमीन पर कोल फायर प्लांट लगाने का फैसला किया. भारत के धाकड़ उद्योगपतियों में शुमार गौतम अडानी की कम्पनी ने इस बाबत जमीन की मांग झारखंड सरकार के सामने रखी. अडानी इस जगह पर आस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से आयात किये हुये कोयले से 1,600 मेगावाट का विद्युत प्लांट लगाने का मसौदा प्रदेश सरकार को भेजा, जिसे हरी झंडी दे दी गयी. अडानी की कम्पनी का लक्ष्य इस प्लांट से 2022 तक विद्युत का उत्पादन शुरू कर देना है. यहां से पैदा हुई सारी बिजली बांग्लादेश को बेची जाएगी. गौरतलब है कि अगस्त 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश दौरे के दौरान बिजली बेचने का मसौदा तैयार हुआ था. इस दौरान पीएम मोदी के साथ बांग्लादेश गये उद्योगपतियों में अडानी भी शामिल थे.

जमीन अधिग्रहण में नियमों की अनदेखी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आदिवासी बहुल माली समेत मोतिया, नयाबाद और गंगटा गांव की जमीनों का अधिग्रहण नियमों को ताक पर रखकर किया गया है. सितम्बर 2013 में संसद के पास नये जमीन अधिग्रहण कानून ‘राइट टू फेयर कंपनसेशन एंड ट्रांसपैरेंसी इन लैंड एक्यूजिशन रिहैब्लिटेशन एंड रिसेटलमेंट एक्ट (एलएआरआर)’ का यहां पूरा उल्लंघन किया गया. दरअसल, नंदीग्राम, कलिंगनगर समेत देश के तमाम हिस्सों में अधिग्रहण के दौरान हुए खूनी विद्रोह को देखते हुए पुराने ब्रिटिश काल से चले आ रहे विवादित कानून ‘भूमि अधिग्रहण कानून, 1894’ को खत्मकर दिया गया था.




संशोधित हुए कानून में गांव की बहुसंख्यक आबादी की रजामंदी सुनिश्चित की गयी लेकिन आरोपों के मुताबिक अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया ही गलत तरीके से हुई. जो किसान जमीन अधिग्रहण के खिलाफ थे, उन्हें संज्ञान में ही नहीं रखा गया, जबकि इक्का-दुक्का लोगों की रजामंदी को दिखाकर पूरी प्रक्रिया को वैध ठहराने की कोशिश की गई. इंडियास्पेंड का कहना है कि उसने इस संदर्भ में जिला अधिकारी किरण पासी से जब सवाल पूछे तो उन्होंने लिखकर
भेजने की बात कही. मगर उन्होंने एक भी पड़ताल भरे सवालों के जवाब नहीं दिया. जमीन गंवाने वाले आदिवासी और दलित किसानों समेत प्रभावित ग्राम सभाओं ने बकायदा सभी सरकारी विभाग को चिट्ठी लिखी. यहां तक कि राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू से भी पत्र लिखकर गुहार लगाई लेकिन किसी ने भी उनकी समस्याओं पर गौर नहीं फरमाया जबकि राज्य के पास आदिवासी समुदाय से जुड़े मामलों में दखल देने का विशेषाधिकार प्राप्त है.




अडानी का बिजनेस और सरकार की भूमिका

जब भूमि अधिग्रहण का नया कानून (एलएआरआर) बना था, तब तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि कॉरपोरेट सेक्टर को जमीन चाहिए, तो सीधे किसान के पास जाएं और खरीद लें लेकिन, इंडियास्पेंड के हवाले से बताया गया है कि गोड्डा में अडानी के पावर प्लांट को लगाने में राज्य सरकार की भूमिका काफी अहम रही है।

मई 2016 और अगस्त 2016 को अडानी ग्रुप ने झारखंड सरकार को चिट्टी लिखी. इसे गोड्डा जिले के दस गांवों से 2,000 एकड़ भूमि अधिग्रहित करने की मांग की गयी। (मई 2016 में ही झारखंड सरकार ने आदिवासी कानून में संशोधन किया था, जिसके मुताबिक आम जन के हितों को देखते हुए कामर्शि्यल इस्तेमाल के लिए आदिवासियों की जमीन खरीदी जा सकती है.) जिसके बाद मार्च 2017 में राज्य सरकार ने छः गावों से 917 एकड़ जमीन अधिग्रहित करने
की बात कही, जिसमें संथाल आदिवासी बहुत माली, मोटिया, गंगटा, पटवा, सोनडीहा और गायघाट गांव शामिल है.

प्रशासन ने तब तक चार गांवों से 519 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर लिया लेकिन, अधिग्रहण का नोटिस अगस्त 2018 में लैप्स कर गया, क्योंकि इस दौरान दो गांवों से अधिग्रहण का काम पूरा नहीं हो पाया. अपनी रिपोर्ट में इंडियास्पेंड ने अडानी समूह के इस प्रोजेक्ट के उद्देश्य पर भी सवाल खड़े किये हैं. बताया गया है कि इस प्लांट से पैदा होने वाली सारी बिजली अडानी समूह बांग्लादेश को बेच देगी.




आपको याद होगा कि 31 अगस्त 2018 को अर्थमूविंग उपकरण के साथ अडाणी के लोग गोड्डा के एक संथाल गांव माली पहुंचे थे और एक खेत के मूल्यवान ताड़ के पेड़ों को उखाड़ना और धान के खेत को रौंदना शुरू कर दिया था. खेतों में धान कुछ दिन पहले ही लगाए गये थे, संथाली किसान अनिल हेम्ब्रम बताते हैं, ‘‘हमने अडाणी के लोगों से रूक जाने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने कहा कि हमारी जमीन अब उनकी है. सरकार ने उन्हें हमारी जमीन दे दी है.

ग्रामीणों ने गोड्डा के डिप्टी कमिश्नर (डीसी) और पुलिस अधीक्षक (एसपी) से मदद मांगने के लिए तत्काल फोन कॉल किये. एसपी ने हमें बताया कि स्थानीय थाना (पुलिस स्टेशन) पर जाएं और शिकायत दर्ज कराएं. ग्रामीणों ने उनसे कहा, हम थाने में शिकायत कैसे दर्ज कर सकते हैं, जब वहां की पुलिस अडाणी के साथ यहां है. डीसी का कहना था, आपका पैसा (जमीन के लिए मुआवजा) सरकारी कार्यालय में पड़ा है, जाओ इसे ले लो.’’

इस बीच अडाणी के लोग, खेत और तालाब में बाड़ लगाने के लिए कॉन्सर्टिना तार लगाते रहे. संताली समाज में मरे हुओं को अपनी ही भूमि में दफन करने की प्रथा है. अर्थमूवर ने कबीले के उन जमीनों को खोद दिया, जहां संतालों के परिजन दफन थे. इस विनाश लीला को देखकर कई महिला किसान अडाणी के लोगों के चरणों में गिर गयी और उनकी जमीन छोड़ देने के लिए उनसे अनुरोध किया, वे रो रही थी, कह रही थी कि जमीन बिना वे जीवित नहीं रह
सकती. कई लोगों ने उन दृश्यों को अपने सेलफोन पर फिल्माया और कहानी गोड्डा स्थित हिन्दी न्यूज आउटलेट द्वारा चलाई गयी, लेकिन भारत के बड़े मीडिया संस्थानों की ओर से इस पर कोई चर्चा नहीं हुई. महिलाओं के विरोध से नाराज अडाणी टीम और पुलिस ने उस दिन अंततः भूमि अधिग्रहण के प्रयास को बंद कर दिया.




अडाणी समूह के खिलाफ ग्रामीणों की लड़ाई वर्ष 2016 में शुरू हुई, जब राज्य कि राजधानी रांची से 380 किमी पूरब गोड्डासे सटे माली और इसके आसपास के नौ अन्य गांवों में विवाद शुरू हुआ था. यही वह समय था, जब अडाणी समूह की सहायक कंपनी अडाणी पावर (झारखंड) लिमिटेड ने. झारखंड में बीजेपी सरकार से कहा कि वह इन गांवों में 2,000 एकड़ भूमि (निजी खेत और आम जमीन) पर कोयले से चलने वाले प्लांट का निर्माण करना चाहता है.

अडाणी समूह का नेतृत्व भारत के सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली पूंजीपतियों में से एक, गौतम अडाणी कर रहे हैं. गोड्डा में प्रस्तावित 1,600 मेगावाट (मेगावाट) प्लांट के आस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से कोयला आयात होगा. संयंत्र के पूरा होने पर (पूरा होने का वर्ष 2022 है) बांग्लादेश को हाई वोल्टेज तारों के माध्यम से बिजली बेचा जाएगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश की यात्रा के बाद प्लांट के लिए प्रस्ताव अगस्त 2015 में आया था. मोदी के साथ जाने वाले उद्योगपतियों में से एक अडाणी थे और एजेंडे में पावर ट्रांसमिशन शामिल था लेकिन माली, मोतिया, नयाबाद और गंगटा के गांवों के किसानों का अनुभव है कि प्लांट के लिए भूमि का जबरन अधिग्रहण हो रहा है – भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम (एलएआरआर अधिनियम) में उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार हैं, जिससे किसानों को निवार्सित किया जा रहा है, एलएआरआर अधिनियम पर भारत के ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने तर्क दिया था कि राज्य को कानून द्वारा दिये गये प्रतिष्ठित डोमेन की शक्ति का शायद ही कभी आह्नान करना चाहिए और इसके बजाय, बाजार तंत्र का चयन करना चाहिए, यह सिद्धांत विशेष रूप से निजी निगमों के लिए भूमि अधिग्रहण पर लागू होता है.

उस समय उद्योग को संबोधित करते हुए रमेश ने कहा था, ‘‘आप जमीन चाहते हैं ? जाइए जाकर खरीद लीजिए.’’ इंडियास्पेंड द्वारा समीक्षा किये गये दस्तावेजों के अनुसार, हालांकि गोड्डा में अपने प्रस्तावित बिजली प्लांट के लिए अडाणी समूह ने 6 मई, 2016 और 2 अगस्त 2016 को झारखंड राज्य को लिखा था, जिसमें जिले के दस गांवों में 2,000 एकड़ भूमि अधिग्रहण करने के लिए कहा गया था.




मार्च 2017 में सरकार ने कहा कि वह छह गांवों में 917 एकड़ जमीन अधिकृत करेगा. मोतिया, गंगटा, पटवा, माली, सोनडीहा और गायघाट. पहले चार गांवों में प्रशासन ने अभी तक 519 एकड़ निजी भूमि अधिग्रहण की है. प्लांट के लिए अगस्त 2018 में शेष दो गांवों में अधिग्रहण नोटिस समाप्त हो गया। गोड्डा की चीर नदी को जल स्त्रोत के रूप में उद्धृत करते हुए कंपनी ने अगस्त 2017 में प्लांट के लिए पर्यावरण मंजूरी हासिल की. अब यह कहता है कि वह पास के साहिबगंज जिले में गंगा से पानी खींचना चाहता है और पानी के परिवहन के लिए 92 किलोमीटर की पाइप लाइन के लिए 460 एकड़ जमीन का अधिकार चाहता है.

कम्पनी कोयला परिवहन के लिए रेलवे लाइन के लिए 75 एकड़ भी चाहता है. अगर सरकार ने अडाणी समूह के अनुरोध को नहीं माना होता, तो कम्पनी को जमीन खरीदने के लिए किसानों से संपर्क करना पड़ता था और मुर्मू, हेंब्रम और ऐसे ग्रामीण तय करते कि अपनी जमीन बेचनी है या नहीं. लेकिन 24 मार्च 2017 को एक 11 पेज के नोट में जिसका खुलासा झारखंड सरकार ने नहीं किया है, गोड्डा डीसी ने प्रस्तावित बिजली प्लांट को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए घोषित किया जिसका अर्थ है कि सरकार किसानों की जमीन का अधिग्रहण अडाणी समूह के लिए करेगी.

एलएआरआर अधिनियम के तहत, भले ही सरकार एक निजी परियोजना को ‘‘सार्वजनिक उद्देश्य के रूप में घोषित करें, फिर भी इसे कम से कम 80 फीसदी भूमि धारकों की ‘‘सहमति’’ चाहिए. 7 मार्च और 8 मार्च, 2017 को जिला अधिकारियों ने नौ गांवों में एक के बाद एक नौ सहमति बैठकें निर्धारित की, जहां भूमि अधिग्रहण की जानी थी. प्रशासन के अनुसार इन बैठकों में और 15 दिनों की ‘‘अनुग्रह अवधि’’ के दौरान 84 फीसदी भूमि मालिक अपनी जमीन सरकार को देने के लिए सहमत हुए. इस तरह सरकार ने सहमति प्रक्रिया एक पखवाड़े के भीतर समाप्त कर दी.




अगले दिन 23 मार्च, 2017 को गोड्डा के सरकारी वकील ने जिला प्रशासन को कानूनी राय प्रदान की. चूंकि 80 फीसदी से अधिक भूमि मालिकों ने सहमति दी थी, इसलिए संथाल परगना टेनेंसी अधिनियम (एक कानून जो आदिवासियों की रक्षा करता है) का ‘‘प्रभाव खत्म हो गया है’’ और ‘‘क्षेत्र एसपीटी अधिनियम के तहत आने के बावजूद भूमि अधिग्रहित की जा सकती है.’’ 24 मार्च 2017 को गोड्डा प्रशासन ने 11 पेज का नोट जारी किया कि सरकार अडाणी के लिए 917 एकड़ भूमि अधिग्रहित करेगी. 24 मार्च और 25 मार्च 2017 को उसने अधिग्रहण के लिए एलएआरआर नोटिफिकेशन जारी किया. 1949 में संताल परगना टेनेन्सी अधिनियम (एसपीटी) का उद्देश्य तत्कालीन संताल परगना जिले में कई तरह के प्रतिबंध लगाकर आदिवासियों की जमीन पर हो रहे कब्जे को रोकना है.

संताल परगना जिला अब गोड्डा समेत छः जिलों में बंटा हुआ है. जमीन संबंधित मामलों के विशेषज्ञ और रांची के वकील लक्ष्मी कात्यायन बताते हैं, ‘‘सरकार की ओर से किसी कम्पनी को हस्तांतरित करने का कोई प्रावधान एसपीटी एक्ट में नहीं है. गोड्डा के सरकारी अधिवक्ता का यह कहना गलत होगा कि इस अधिनियम का प्रभाव खत्म हो गया है. ऐसा कहना एक कानूनी झूठ था, जो अडाणी को फायदा पहुंचाने के लिए कहा जा रहा था. एसपीटी अधिनियम के तहत गांव की आम सम्पत्ति (गैर-मजरूआ) भूमि जैसे कि गांव में गोचर भूमि पर गांव के प्रधान को हक दिया गया है न कि सरकार को. लेकिन ऐसी आम भूमि भी प्रशासन द्वारा ली गई है और 30 साल के पट्टठ्ठे पर अडाणी समूह को दिया जा रहा है, जबकि किसानों की भूमि कम्पनी के नाम पर स्थानांतरित किये जा रहे है.’’




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