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2019 में आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा चुनावी मुद्दा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 9, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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2019 में आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा चुनावी मुद्दा है

Vinay Oswalविनय ओसवाल, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
अपने अपने राज्यों में खुदमुख्तियारी के लोभ से अधिसंख्य पार्टीयां ग्रसित है. सब अपने अपने तरीके से अपने अपने राज्यों में जिन कारणों से जितना विरोध भाजपा का कर रही हैं, उन्ही कारणों के चलते वह नही चाहती कि कांग्रेस फिर से मजबूत हो केंद्र में सत्ता की दहलीज पर पहुंचे.

अपने समर्थकों को संगठित रखने, विरोधियों को बांटने या उनको तरह तरह से भयाक्रांत करने के लिए सत्ता की सामर्थ का बेशर्म उपयोग करने, तरह तरह के प्रपोगण्डा का स्तेमाल कर उन्हें दिग्भ्रमित करने में फिलहाल तो भाजपा अजेय ही नजर आ रही है. उसकी इस सामर्थ को राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर चुनौती देती कोई पार्टी उभरती दिख नही रही. इस प्रयास में यूं तो कई पार्टियाँ विभिन्न राज्यों में गठबन्धन कर कुछ लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा को भले ही पीछे धकेल कर अपनी पीठ थपथपा खुश हो लें. पर वे भाजपा विरोधी हैं और समय आने पर उसके साथ सत्ता में भागीदार नही बनेंगी, ऐसा साफ सुथरा अतीत भी दो-तीन को छोड़ कर किसी का नही है.

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अपने अपने राज्यों में खुदमुख्तियारी के लोभ से अधिसंख्य पार्टीयां ग्रसित है. सब अपने अपने तरीके से अपने अपने राज्यों में जिन कारणों से जितना विरोध भाजपा का कर रही हैं, उन्ही कारणों के चलते वह नही चाहती कि कांग्रेस फिर से मजबूत हो केंद्र में सत्ता की दहलीज पर पहुंचे.

पिछले चुनावों में मतदाताओं की आंखों में जिन सपनो को सजा कर एक पार्टी सत्ता में आती है, वो जानती है कि अगले चुनावों में सत्ता हथियाने के लिए उसे फिर से दूसरे मुद्दे लेकर और हथकण्डे अपना कर चुनावों में उतरना आसान हैं. यही इस तंत्र की कमजोर नब्ज है जो पिछले सात दशकों में लोक सभा के लिए हुए 16 चुनावों में बदस्तूर कायम है. सत्ता कभी लोक के प्रति जबाब देह रही हो, मेरी जानकारी में नही है. 16वीं लोकसभा के लिए वर्ष 2014 में हुए चुनावों में सरकारी संरक्षण में पनपता भ्रष्टाचार, शिक्षित युवकों में बढ़ती बेरोजगारी, विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी, महगाई आदि मुद्दे थे. आज सभी गुजरे जमाने की बातों की तरह बेमानी हो चुके है. आज मुद्दा है आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा.




राफेल खरीद मामले में संस्थागत व्यवस्थाओं को पीछे ढकेल प्रधानमन्त्री के हस्तक्षेप के प्रमाण देश के सामने आजाने के बाद, राष्ट्रीय सुरक्षा की गूंज सुप्रीमकोर्ट तक में पहुंच गई है. सरकार वहां भी अपने प्रतिनिधि वकील के जरिये उसे समझाने का प्रयास कर रही है कि यह सारे प्रमाण उसकी गोपनीय फाइलों से चुराये गए है. (यानी सही है तैयार किये हुए नही है) यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है इन प्रमाणों को वह साक्ष्य के बतौर स्तेमाल न करे. इस मामले में उसकी टिप्पणियों से सरकार अस्थिर हो सकती है.




सुप्रीम कोर्ट के बाहर पूरे देश में पुलवामा में फिदायीन हमले में शहीद हुए 40 जवानों की शहादत और उसके बाद भारत की ओर से आतंकवादी ठिकानों पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर राष्ट्रभक्ति का उन्माद और शोर इस कदर हाबी है कि मतदाताओं के प्रति जबाब देह सरकार उल्टा उसी से सवाल पूंछ रही है कि इस मामले में उससे सवाल पूंछने वाले पाकिस्तान और आतंकवाद समर्थक हैं या नही ? इस उन्माद और शोर के वशीभूत देश का कम से कम 35% मतदाता (30 करोड़) 2014 की तरह मोदी-मोदी रटने लगा है. और भाजपा विरोध नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह कहीं सुनाई नही पड़ रहा. इतना सब होने के बावजूद 2019 में भाजपा अपनी सममर्थ पर नही अपने प्रपोगण्डा और विरोध के एक जुट न होने की बदौलत जीतेगी.




दिल्ली में कांग्रेस को केजरीवाल से समझौता करना अपमान जनक लग रहा है तो प. बंगाल में ममता को कांग्रेस के साथ. उ.प्र. में मायावती और अखिलेश के गठबन्धन को कांग्रेस को साथ लेना रास नही आ रहा. पूरे देश में माहौल ऐसा ही बना हुआ है. जो हर तरह भाजपा के अनुकूल है. भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए अलग अलग राज्यों में बने अलग अलग गठबन्धन मतदाता को ऐसा क्या देसकते हैं, जो उन राज्यों के अधिसंख्य मतदाताओं को चाहिए और उसे भाजपा अपने तमाम प्रपोगण्डा के माध्यम से भी दे नही पा रही ? फिलहाल यह प्रश्न विपक्ष के लिए पहेली बना हुआ है. प्रपोगण्डा झूठा है जब तक यह भेद खुलेगा तब तक तो चिडियां खेत चुग चुकी होंगी.

सम्पर्क नं. +91  7017339966




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Tags: गठबन्धनपुलवामाभाजपा
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