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भ्रष्ट सिस्टम के भेंट चढ़ा रामगुलाम का परिवार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 10, 2019
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देशभर में पुलिसिया जुल्म का शिकार होते आमजन थाने के लाॅकअप में दम तोड़ रहे हैं. देश की राजधानी दिल्ली में मजदूरी कर अपना जीवन यापन करने वाले रामगुलाम का बड़ा बेटा गोविन्द भी इसी पुलिसिया जुल्म का शिकार होकर पुलिस लाॅकअप में दम तोड़ दिया, जिसका कही कोई सुनवाई नहीं हो रही है. सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कुमार रामगुलाम की व्यथा जानने की कोशिश की है, पाठकों के सामने प्रस्तुत है. उम्मीद की जाती है दिल्ली सरकार इस मामले में यथासंभव सुनवाई कर रामगुलाम को न्याय दिला पायेगी.

भ्रष्ट सिस्टम के भेंट चढ़ा रामगुलाम का परिवार

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रामगुलाम और उनका परिवार

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव के रामगुलाम यादव 14 साल की उम्र में दिल्ली आये थे. उन्होंने सोचा था कि दिल्ली में मेहनत-मजदूरी करके परिवार की स्थिति ठीक करेंगे. 14 साल की उम्र से मेहनत करते हुए रामगुलाम परिवार के साथ हंसी-खुशी में जीवन व्यतीत करने लगे थे. रामगुलाम बच्चे से बड़े हुए, शादी हुई और फिर उनके तीन बच्चे हुए, जिनका नाम वे गोविन्द, गौतम और गोपाल रखते हैं.

हंसी खुशी से परिवार का समय कटता है लेकिन जिन्दगी में एक दिन ऐसा आता है कि पत्नी की मौत हो जाती है. छोटे-छोटे बच्चों के परवरिश की जिम्मेवारी अकेले रामगुलाम पर आ जाती है. कुछ समय बाद रामगुलाम की नौकरी चली जाती है. बाप की माली आर्थिक हालत देखते हुए बड़ा बेटा गोविन्द मजदूरी करने लगता है, जिससे घर की गाड़ी खींची जा सके. गोविन्द बड़ा होता है.

बाप की चाहत है कि बेटे कि शादी कर दूं, लेकिन 6 जून, 2019 को गोविन्द को नन्दनगरी थाने की पुलिस उसे शराब सप्लाई के आरोप में पकड़ लेती है. घरवाले उसे छुड़वाने के लिए जाते हैं तो पुलिस उनसे 50 हजार रुपया की मांग करती है. सौदेबाजी कर 15 हजार रुपये में पुलिस राजी हो जाती है. पुलिस पैसा ले लेती है पर गोविन्द को छोड़ने में आनाकानी करती है. इसी दौरान हो-हल्ला में मीडियाकर्मी के द्वारा गोविन्द की मौत का पता चलता है. बेटे की मौत के बाद रामगुलाम की दुनिया उजड़ जाती है और एक पिता इंसाफ पाने के लिए तीन माह से अपनी नौकरी छोड़ घर पर बैठा है.

तीन माह बाद भी बेटे के पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक नहीं मिली है और ना ही उनके घर कोई भी प्रशासनिक अधिकारी, नेता उनको संत्वना देने या पूछताछ के लिए आते हैं. रामगुलाम के अन्दर अंधेरा छाया हुआ है, उनकी न्याय की आशा धूमिल होती जा रही है.

पूर्वी दिल्ली में बसे ताहिरपुर के इलाके में दस बाई सात फीट का एक कमरा है, जिसमें तीन लोग हैं. इसमें से एक बीमार आदमी बेड पर लेटा हुआ है. इस कमरे में सामान के नाम पर एक टूटा-फूटा बेड, 4 कि.ग्रा. का सेलेण्डर, दो-चार बर्तन और टीन के दो-तीन डब्बे हैं. इस कमरे में रामगुलाम (56) और उनके बेटे गोविंद (27), गौतम (25), गोपाल (23) रहते थे. मैं जब इस कमरे में गया तो इस कमरे में तीन लोग थे और एक अजीब-सी उदासी कमरे में छाई हुई थी.

मेरी नजर कमरे में एक कोने में गई जहां पर एक ओर कुछ मुकुट रखे थे तो दूसरी ओर श्रीकृष्ण की एक मुरली वाली बड़ी फोटो. एक छोटी फोटो लक्ष्मी का था जो कि किसी भी घर में हो सकता है. इन फोटो के पास एक फोटो और थी जिस पर ‘‘Late Sh. Govind, 07.06.2019’’ लिखा हुआ था. कृष्ण के साथ गोविन्द का फोटो के रखे जाने का कारण पूछने पर गोविन्द के पिता रामगुलाम अपने जीवन कि एक-एक कहानी बताने लगते हैं.

रामगुलाम यादव के पिताजी धार्मिक व्यक्ति रहे होंगे, तभी वह अपने बेटे का नाम रामगुलाम रखे होंगे. इसी तरह रामगुलाम भी बेटों के नाम बड़े प्यार से गोविंद, गौतम और गोपाल रखा. 1999 ई. में पत्नी के निधन के बाद रामगुलाम ने बच्चों को पाला. गोविन्द  बचपन से घरेलू कामों से लेकर आर्थिक रूप से अपने पिता का साथ देने लगा था. तीन भाईयों में गोविन्द ही दसवीं तक पढ़ पाया था, जबकि गौतम और गोपाल तीसरी और चौथी कक्षा तक के बाद ही पढ़ाई छोड़ दिये. गौतम संगत में आकर नशे का आदी हो गया और वह अपनी कमाई को नशे में खत्म कर देता है.

रामगुलाम बताते हैं कि गोविंद पढाई के साथ-साथ रंग-पेंट के कामों में दिहाड़ी मजदूरी किया करता था. दसवीं के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी और रंग-पेंट काम के साथ-साथ विडियोग्राफी का काम करने लगा. वह एक अच्छा विडियोग्राफर बन गया था. गोविन्द की पहचान मुहल्ले में एक तेज-तर्रार लड़के के रूप में होती थी.

रामगुलाम बताते हैं कि वह खाली बैठे नहीं रहना चाहता था. जो भी काम मिल जाये, वह कर लेता था. गोविन्द मोहल्ले में कृष्ण-जन्माटमी कमेटी का अध्यक्ष था और जन्माष्टमी में वह सुदामा का रोल किया करता था. इस बार गोविन्द के नहीं रहने पर कृष्णलीला में उसका फोटो रखा गया था और उसकी याद में उसका भाई गोपाल काली का नृत्य किया था, जिसका मुकुट उनके घर के एक कोने में रखा हुआ है.

रामगुलाम यादव अमेठी जिले के मोती सिंह पुरवा गांव के निवासी हैं, जिनकी स्कूली शिक्षा पाचवीं तक ही हो पाई थी. रामगुलाम के पिता किसान थे, जो कि अपनी थोड़ी जमीन के साथ दूसरे की जमीन भी बटाई पर लेकर खेती किया करते थे. रामगुलाम 14 साल कि उम्र में गांव के चाचा के साथ दिल्ली आ गये. चाचा दिल्ली के मल्लकागंज में कागज के लिफाफे बनाने का अपना काम करते थे. इसी काम पर रामगुलाम को भी लगा दिया, जिसके लिए खाने-पीने के साथ 15 रुपया महीने का देते थे.

धीरे-धीरे समय बीतता गया और रामगुलाम भी बड़े होते गये। चाचा मलकागंज से 1980 में सीमापुरी आ गये. रामगुलाम सेल्स मैन बन गये, जिससे उनकी तनख्वाह बढ़कर 150 रुपया हो गई. आमदनी बढ़ाने के लिए 1981 में साहनी टायर फैक्ट्री में 240 रुपया पर काम करने लग गये.

साहनी टायर में उन दिनों बहुत जुल्म हुआ करता था। जनरल मैनेजर की बूट की आवाज सुनते ही मजदूर सिर झुका कर ही काम करते थे. कोई भी दुर्घटना हो जाने पर मजदूरों को भट्ठी में डाल दिया जाता था. मजदूरों के अन्दर रोष था लेकिन वह संगठित रूप नहीं ले पा रहा था.

1996 ई. में मजदूरों ने यूनियन बनाने में सफलता हासिल कर लिया. मजदूर यूनियन के नेताओं पर मालिक प्रशासन के संरक्षण में गुंडों के द्वारा हमला करवाता रहा. मजदूरों ने मालिक के सामने घुटने नहीं टेके और संघर्ष को जारी रखा. मजदूरों की एकता को देखते हुए मालिक मजदूरों को ट्रांसफर करने लगा. रामगुलाम का भी जुलाई 2000 ई. में ट्रांसफर कर नजफगढ़ में भेज गया.

रामगुलाम बताते हैं कि वहां छोटी-सी जगह थी. 10 लोगों की बैठने की जगह पर 100 लोगों को भेज दिया. साहनी फैक्ट्री के मालिक ने बाद में शिफ्ट बदलने लगा, जिससे परेशान होकर उन्होंने सन् 2000 ई. में साहनी फैक्ट्री छोड़ दिया. उसके बाद बेकोलाइट ताहिरपुर में ही 12 घंटे में 1200 रुपया पर पैकिंग का काम करने लगे. कुछ समय बाद वह करावल नगर बेकोलाईट में चले गये, जहां पर अभी उनको 6000 रुपया मिलता है.

वह करावल नगर में ही रहते थे और हफ्ते-दस दिन पर अपने घर बच्चों से मिलने ताहिरपुर आते थे. 7 जून की सुबह 5 बजे उनके पास उनके बेटे गोपाल का फोन आया, जिसने उनकी जिन्दगी को बदल दिया. तब से अभी तक वह एक विक्षिप्त हालत में अपने घर ताहिरपुर में ही रह रहे हैं. उनके पास आमदनी का अभी कोई जरिया नहीं है. गोविन्द के जाने के बाद गोपाल कमाने वाला था लेकिन वह कुछ दिनों से बीमार है.

रामगुलाम के भविष्यनिधी के 19 साल का पैसा भी अभी तक नहीं मिला है. वह चाहते हैं कि इस दुख की घड़ी में उन्हें यह पैसा किसी तरह से मिल जाये. वह बताते हैं कि उन्होंने साहनी फैक्ट्री पर केस भी किया था लेकिन वह केस हार गये. 2004 में ट्रेड यूनियन के एक नेता ने 150 मजदूरों से दो-दो हजार रुपया लिया था, हाईकोर्ट में केस लगाने के लिए लेकिन वह केस लगाया नहीं.

गोविन्द की मौत आकस्मिक, बीमारी या दुर्घटनावश नहीं हुई थी. उसकी मृत्यु पुलिस हिरासत (कस्टोडियल डेथ) में हुई थी. अपने पिता का होनहार बेटा इस भ्रष्ट सिस्टम के भेंट चढ़ गया. 6 जून की सुबह में मोहल्ले का एक लड़का गोविन्द के पास आया और कहा कि कुछ शराब की पेटी है, इसको सुन्दर नगरी में उतार देना है, तुम को पूरे दिन की मजदूरी मिल जायेगी. गोविन्द कुछ घंटे के काम में पूरे दिन की मजदूरी के लालच में खुश हो गया और सुबह-सुबह नईम के ऑटो में बैठकर पड़ोसी लड़कों के साथ डीएलफ मोड़ से सुन्दर नगरी के लिए चल दिया.

सुन्दर नगरी एसडीएम दफ्तर के पास पुलिस (ऊधम सिंह, योगेश, विशाल) ने उसे घेरा डालकर गोविन्द और ऑटो चालक नईम को पकड़ लिया. दो लड़के भाग गये. पुलिस ऑटो के साथ नईम और गोविन्द को थाने ले गई, जहां पर उन्हें अलग-अलग मंजिल पर रखा गया. गोविन्द की मुंंहबोली बहन रेशमा जो कि उसकी पड़ोसी थी, दो-तीन लोगों के साथ थाने गई तो ऊधम सिंह ने छोड़ने के लिए 50 हजार रुपया की मांग की. मोलभाव करते-करते ऊधम सिंह पन्द्रह हजार रुपया लेकर छोड़ने के लिए राजी हो गया.

शाम होती गई. धीरे-धीरे रात होने लगी लेकिन पैसे लेने के बाद भी गोविन्द को छोड़ा नहीं गया और ना ही किसी से मिलने की इजाजत दी गई. गोविन्द के मोहल्ले के लोग भी काफी संख्या में थाने के बाहर इकट्ठे हो गये और गोविन्द को छोड़ने की मांग करने लगे. पुलिसवालों ने कहा कि पर्चा बनेगा और सुबह कोर्ट में पेश किया जायेगा. सिपाही विशाल, गोविन्द के छोटे भाई गोपाल को बाईक पर बैठाकर ले गया और पूछने लगा कि गोविन्द को कोई बीमारी थी ? वह नशा करता था ? गोपाल ने कहा कि उसको कोई बीमारी नहीं थी और वह कभी-कभी शराब पिता था.

गोपाल को एक सादे कागज पर हस्ताक्षर करने को कहा गया लेकिन उसने मना कर दिया. ऊधम सिंह ने उसके सिर पर पिस्तौल रखकर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया लेकिन गोपाल ने हस्ताक्षर नहीं किया. इन सभी कारणों से गोपाल के मन में संदेह उत्पन्न हुआ तो उसने मोहल्ले के लोगों को बताया. लोग शोर मचाने लगे तो मीडिया आ गई. एक मीडियाकर्मी द्वारा ही लोगों को जानकारी दी गई कि गोविन्द कि मृत्यु हो गई है.

गोविन्द के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद पुरानी सीमापुरी में गोविन्द की अंत्योष्ठी कर दी गई. गोविन्द के अंत्योष्ठी के लिए पैसा गोविन्द के पड़ोसी दिलीप ने दिया. गोविन्द की पोस्टमार्टम रिपोर्ट या मृत्यु से संबधित कोई भी कागजात परिवारवालों को अभी तक नहीं मिला है.

गोविन्द की मृत्यु के बाद परिवार के ऊपर और भी संकट के बादल मंडराने लगे. पुलिस पड़ोसियों के माध्यम से लगातार दबाव बना रही थी कि कोई कानूनी कार्रवाई नहीं किया जाये. गोविन्द के पिता को पड़ोसियों द्वारा 1 लाख रुपयाा भिजवाया गया और कहा गया कि बाद में और पैसा मिलेगा लेकिन उन्होंने पैसा लेने से मना कर दिया और कहा कि हमें न्याय मिलना चाहिए.

रामगुलाम तीन महीने से काम छोड़कर विक्षिप्त हालत में घर पर बैठे हैं. वो चाहते हैं कि उनके दूसरे बेटे को पुलिस द्वारा परेशान नहीं किया जाये और गोविन्द को न्याय मिले. रामगुलाम के परिवार को आज देखने वाला कोई नहीं है.

एक व्यक्ति जो बचपन में घर से दिल्ली आया था कि परिवार को खुशहाल रखेगा, आज वह मुनाफाखोरों और भ्रष्ट सिस्टम के भेंट चढ़ कर बरबाद हो गया. पहले तो मुनाफाखोरों ने नौकरी ली, दूसरे बेटे को माफियाओं ने ड्रग्स का शिकार बना दिया और एक बेटे भ्रष्ट पुलिसिया सिस्टम के हाथों मारा गया. इस देश का सिस्टम ऐसे लाखों रामगुलाम को गुलाम बना रखा है. आखिर कब तक रामगुलाम जैसे करोड़ों लोगों को इस स्थिति में रखा जायेगा ? कब इन लोगों को न्याय मिल पायेगा ?

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