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प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ शब्द हटाने का बिल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 7, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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42वें संविधान संशोधन के जरिए प्रस्तावना में जोड़े गए ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग लगातार उठती रही है. बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यन स्वामी ने आज कहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाल रखी है, जिसमें संसद की शक्ति पर सवाल उठाते हुए प्रस्तावना में किए गए बदलाव को निरस्त करने की मांग की गई है. एक अन्य बीजेपी सांसद केजे अल्फोंस ने राज्यसभा में प्राइवेट मेंबर बिल लाकर प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ शब्द हटाने का प्रस्ताव पेश किया. हालांकि, नियम के मुताबिक राष्ट्रपति की पूर्व सहमति के अभाव में बिल पर चर्चा की अनुमति नहीं दी गई और उपसभापति हरिवंश ने इसे रिजर्व रखने की व्यवस्था दी.

स्वामी की सुप्रीम कोर्ट से अर्जी

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राष्ट्रवाद के प्रखर पैरोकार सुब्रमण्यन स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका का जिक्र जिस ट्वीट में किया, उसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पंकज मित्तल के बयान से जुड़ी एक खबर को भी रीट्वीट किया है. जस्टिस मित्तल ने एक कार्यक्रम में ‘धर्म और भारतीय संविधान’ विषय पर बोलते हुए कहा है कि भारत युगों-युगों से आध्यात्मिक राष्ट्र रहा है, लेकिन संविधान में ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़कर इसकी विराट आध्यात्मिक छवि को संकुचित कर दिया गया. उन्होंने कहा कि हमारे देश का संवैधानिक नाम ‘आध्यात्मिक गणतंत्र भारत’ होना चाहिए था.

मूल संविधान से छेड़छाड़ क्यों ?

दरअसल, समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्दों को संविधान की प्रस्तावना से हटाने के पक्ष में सबसे बड़ी दलील यह दी जाती है कि संविधानसभा ने इसकी जरूरत महसूस नहीं की थी. उनका कहना है कि प्रस्तावना में अंग्रेजी के सोशलिस्ट (Socialist) और सेक्युलर (Secular) शब्द जोड़ तो दिए गए, लेकिन इनकी व्याख्या नहीं की गई. ऐसे में सेक्युलर की व्याख्या ‘धर्मनिरपेक्ष’ के रूप में की जाती है और इस शब्द का राजनीतिक दुरुपयोग किया जाता रहा है. उनकी दलील है कि 1976 में संविधान संशोधन के जरिए प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जुड़ने के बाद से मुस्लिम तुष्टीकरण की बयार बहने लगी जो धीरे-धीरे देश के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट का रूप लेने लगी.

क्यों जोड़ा गया समाजवादी शब्द ?

इसी तरह, ‘समाजवादी’ शब्द को लेकर भी आपत्ति जताई जाती है कि समाजवाद का रास्ता ही देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति सुनिश्चित कर सकता है, इसकी क्या गारंटी है ? समाजवाद की आंतरिक खामियों की ओर इशारा करते हुए लोग कहते हैं कि यह समाज में आर्थिक प्रगति के लिए उचित प्रतिस्पर्धा के माहौल की निर्माण-प्रक्रिया को बाधित करता है. विरोधियों का कहना है कि इंदिरा गांधी सरकार ने तब वामपंथी ताकतों और रूस को रिझाने के लिए प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द जुड़वाया था. यह भी दलील दी जाती है कि यूं भी भारतीय समाज का आंतरिक चरित्र समाजवादी ही है. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के चीफ जस्टिस पंकज मित्तल ने भी कहा, ‘भारत अपने सभी नागरिकों की देखभाल करने में सक्षम है और इसमें समाजवादी प्रवृत्ति अंतर्निहित है.’

भारतीय संविधान में प्रस्तावना की कहानी

बहरहाल, भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग कितनी जायज है और क्या संविधान इसकी अनुमति भी देता है या नहीं ? ऐसे सवालों का जवाब ढूंढने से पहले संविधान में प्रस्तावना के जुड़ने से लेकर भारतीय गणतंत्र के धार्मिक चरित्र को लेकर संविधानसभा में हुई बहसों पर गौर कर लेते हैं. दरअसल, जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 दिसंबर, 1946 को एक उद्देशिका पेश की थी जिसमें संविधान की आत्मा कैसी हो, उसकी एक झलक मिलती थी. नेहरू की इसी उद्देशिका से जुड़ा प्रस्ताव को संविधान निर्माण के अंतिम चरण में प्रस्तावना के रूप में शामिल कर लिया गया. यही कारण है कि प्रस्तावना को उद्देशिका भी कहा जाता है.

यह तो रही, संविधान में प्रस्तावना को शामिल करने की बात. अब बात करते हैं इस फैसले पर पहुंचने से पहले संविधान सभा में हुई बहसों की. 17 अक्टूबर, 1949 को संविधान की प्रस्तावना पर बहस हुई थी. संविधान सभा के सदस्य एचवी कामत, शिब्बन लाल सक्सेना और पं. गोविंद मालवीय ने प्रस्तावना की शुरुआत ईश्वर के नाम के साथ करने का प्रस्ताव रखा जिसे मंजूरी नहीं मिली. उसी दिन एक अन्य सदस्य ब्रजेश्वर प्रसाद ने ‘सेक्युलर’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्द जोड़ने का प्रस्ताव रखा.

तब सदस्यों के बीच हुई बहस में दो प्रमुख बातें सामने आईं कि अगर भारत को ‘सेक्युलर’ घोषित किया गया तो नागरिकों को पूजा-पाठ करने का अधिकार तो मिलेगा, लेकिन उसे अपने धर्म के प्रचार की अनुमति नहीं होगी. दूसरी बात यह कि धर्मनिरपेक्ष भारत में मजहब के आधार पर ‘पर्सनल लॉ’ बनाने जैसी कई विषय पेचीदा हो जाएंगे. तब देश में समान आचार संहिता बनाकर सभी धर्मों के लिए समान कानून की व्यवस्था करनी पड़ेगी. ध्यान रहे कि प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर भी समान आचार संहिता की पुरजोर वकालत की थी, लेकिन सदस्यों के बीच सहमति नहीं बन पाई थी. सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 25 मई 1949 को कहा था कि सब यह भूल जाएं कि देश में कोई अल्पसंख्यक है या बहुसंख्यक है. भारत में एक ही समुदाय है और वो है- भारतीय.

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बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यन स्वामी का ट्वीट

इंदिरा सरकार ने संशोधित कर दी प्रस्तावना

संविधान सभा के 299 सदस्यों ने सर्वसम्मति से जिन दो शब्दों से दूरी बनाई थी, उसे इंदिरा गांधी की सरकार ने 42वां संविधान संशोधन विधेयक संसद से पारित करवाकर प्रस्तावना में शामिल कर लिया. 11 नवंबर, 1976 को विधेयक पारित हुआ और 3 जनवरी, 1977 से ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द प्रस्तावना का हिस्सा हो गए. अंग्रेजी में ये शब्द क्रमशः ‘सोशलिस्ट’ और ‘सेक्युलर’ लिखे गए. फॉरवर्ड ब्लॉक के सांसद जामबंतराव धोटे और जनसंघ के प्रकाश वीर शास्त्री समेत कई सदस्यों ने इंदिरा सरकार के तत्कालीन कानून मंत्री एचआर गोखले से आग्रह किया जब संशोधित प्रस्तावना का हिंदी में अनुवाद किया जाए तब सेक्युलर को ‘धर्मनिरपेक्ष’ या ‘निधर्मी’ नहीं लिखा जाए. फिर सहमति बनी कि सेक्युलर का अनुवाद ‘पंथनिरपेक्ष’ होगा.

हालांकि, विरोधी संविधान की प्रस्तावना में संशोधन के पीछे इंदिरा सरकार की मंशा पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं. विरोधियों की मानें तो इंदिरा गांधी ने समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्दों को प्रस्तावना में इसलिए जुड़वाया ताकि इसका राजनीतिक लाभ लिया जा सके. उनका आरोप है कि इंदिरा ने मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए यह पासा फेंका जिसे क्षेत्रीय पार्टियों के उभार दौर में काफी तवज्जो मिली और देश में सांप्रदायिक आधार पर चुनावी समीकरण साधने की परिपाटी मजबूत होती गई.

Preamble
संविधान की प्रस्तावना

केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट का वो ऐतिहासिक फैसला

विरोधियों को प्रस्तावना में संशोधन की आलोचना को कानूनी आधार तब मिला जब ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. दरअसल, केरल सरकार ने दो भूमि सुधार कानून बनाए जिसके जरिए धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन पर नियंत्रण किया जाना था. उन दोनों कानूनों को संविधान की नौंवी सूची में रखा गया था ताकि न्‍यायपालिका उसकी समीक्षा न कर सके. साल 1970 में केशवानंद ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो ऐतिहासिक हो गया. सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की बेंच बैठी, जो अबतक की सबसे बड़ी बेंच है. इस पीठ ने 68 दिन की रेकॉर्ड सुनवाई की और 703 पन्‍नों में फैसला लिखा.

इसमें सात न्यायाधीशों के बहुमत ने फैसला दिया कि संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया जा सकता और कोई भी संविधान संशोधन प्रस्तावना की मूल भावना के अनुरूप ही होना चाहिए. फैसले में संविधान को सर्वोपरि ठहराते हुए न्यायिक समीक्षा, पंथनिरपेक्षता, स्वतंत्र चुनाव व्यवस्था और लोकतंत्र को संविधान का मूल ढांचा बताया गया. पीठ ने साफ किया कि संसद के पास संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित करने की शक्ति नहीं है, संविधान की प्रस्तावना इसकी आत्मा है और पूरा संविधान इसी पर आधारित है. फिर 1994 में भी सर्वोच्च न्यायालय की ही नौ सदस्यीय पीठ ने इसे बरकरार रखा.

आज तक लागू नहीं हो पाया सुप्रीम कोर्ट का फैसला

विडंबना देखिए कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि संसद के पास संविधान की मूल प्रस्तावना को बदलने का शक्ति नहीं है, फिर भी 1976 के 42वें संविधान संशोधन के तहत संशोधित प्रस्तावना को खारिज नहीं किया गया. दूसरी तरफ, इसकी मांग भी उठती रही. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 1998 में संविधान की समीक्षा के लिए कमीटी बनाई तो तुरंत एक वर्ग हंगामा करने लगा कि सरकार संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ करने की फिराक में है. तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने एक लंबे लेख में केशवानंद भारती केस के हवाले से लिखा था सेक्युलरिजम तो भारत की संस्कृति में है.

फिर, तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 2015 में बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर लोकसभा में कहा था कि बाबासाहेब ने संविधान की प्रस्तावना में ‘सोशलिजम’ और ‘सेकुलरिजम’ शब्दों का प्रयोग शायद इसलिए नहीं किया क्योंकि वे यह मानकर चलते थे कि भारत की मूल प्रकृति, मूल स्वभाव में ही ये भाव समाहित हैं. प्रस्तावना में अलग से इसका उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने कहा, ‘आज की राजनीति में सर्वाधिक दुरुपयोग किसी शब्द का हो रहा है, तो वह है सेक्युलर. यह दुरुपयोग रुकना चाहिए.’

फिर मजबूत हो रही है आवाज

संशोधित प्रस्तावना से सोशलिस्ट (समाजवादी) और सेक्युलर (पंथनिरपेक्ष) शब्दों को हटाने की मांग आज भी उठ रही है. जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट के पास चला गया है. दूसरी तरफ, संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से भी इस मकसद को अंजाम तक पहुंचाने का प्रयास हो रहा है. बीजेपी के राज्यसभा सांसद केजे अल्फोंस के प्राइवेट मेंबर बिल इसी प्रयास का एक हिस्सा है. जो लोग केशवानंद भारती केस का हवाला देकर दलील रखते हैं कि संविधान की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं हो सकता है, वो आखिर इंदिरा गांधी सरकार के 42वें संविधान संशोधन के उस हिस्से को जायज कैसे ठहरा सकते हैं, जिसके तहत प्रस्तावना को बदला गया था ?

  • नवीन कुमार पाण्डेय 

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