Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

दिसम्बरी उभार के मायने…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 22, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

दिसम्बरी उभार के मायने...

2019 में भाजपा सरकार के सत्तानशीन होने के बाद से एक के बाद एक कई अत्यंत गम्भीर व खतरनाक कदम उठाए गए हैं. धारा 370 को खत्म करने के बाद से लेकर NRC और CAA तक को लाने तक की जो कवायद की गई है, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि यह सरकार भारत में हिन्दुत्ववादी फासीवादी शासन को और पुख्ता बनाने की राह पर चल पड़ी है. आज के CAA ने तो साफ साबित कर दिया कि यह सरकार भारत को खुल्लम-खुल्ला एक हिन्दू राष्ट्र बनाने पर आमादा है. अपने इन कदमों के जरिए वह जहां एक ओर भारत का हिन्दूकरण के रही है, वहीं दूसरी ओर, इस सांप्रदायिक धुव्रीकरण के जरिए वह बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान हटा रही है और इसकी आड़ में शासक-शोषक वर्ग द्वारा जनता के सभी तबकों के शोषण, लूट-खसोट व उत्पीड़न को बढ़ाते जा रही हैं. इस तरह ये तरह-तरह के कानूनों और प्रावधानों व अन्य कदमों के जरिए जन समुदाय पर आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सैनिक आक्रमण बढ़ाते जा रहे हैं.

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

पर आज भारत का सच जनता पर इन फासीवादियों का सभी क्षेत्रों में बढ़ता आक्रमण नहीं, बल्कि इनके इन हमलों के खिलाफ बढ़ता, तीव्र होता और एक हद तक एकताबद्ध होकर सामने आता जनता का प्रतिवाद और प्रतिरोध है. इधर शिक्षा और खासकर उच्च शिक्षा के काॅरपोरेटीकरण और पब्लिक फंडेड शिक्षा व्यवस्था के खात्मे तथा शिक्षा को और भी महंगे करते जाने जैसे इनके कदमों के खिलाफ जेएनयू के छात्रों से जिसकी शुरुआत हुई, उस जन विक्षोभ ने पूरे देश में पांव पसार लिए हैं. इसके साथ मजदूरों के एकताबद्ध आंदोलन व कार्यवाईयां, किसानों का अखिल भारतीय प्रतिरोध, सरकारी कर्मचारियों के आंदोलन, युवाओं के आंदोलन आदि भी जुड़ गए हैं. इन सारे आंदोलनों की नदियों को एक विशाल सागर का रूप लेते हम देख रहे हैं, दिसम्बर के करीब मध्य से शुरू दतब और सीएए के खिलाफ समूचे देश में जारी जन प्रतिवादों और प्रतिरोधों में.

स्मृतियां ताजी हो उठती हैं. 1974 के जयप्रकाश आंदोलन का दौर आज एक बार फिर उभरता दिख रहा है. एक तरफ हम मजदूरों, किसानों, छात्रों, युवाओं, मध्यवर्ग के विभिन्न तबकों, छोटे व्यापारियों और व्यवसाइयों, दलितों, मुस्लिमों, महिलाओं आदि को सड़कों पर पूरे जुझारू तेवर के साथ उतरते देखते हैं, वहीं दूसरी ओर सत्ता को भी उतनी ही निर्ममता से उन पर पूरे हमलावर तेवर के साथ प्रहार करते देखते हैं. सचमुच में कई दशकों बाद आज युवाओं और युवतियों को इतने फौलादी संकल्पों व लड़ने-मरने को तैयार तेवर के साथ जूझते देखना एक काफी सुकूनदायक अनुभव है.

उपरोक्त परिदृश्य आने वाले समय का संकेत देते हैं. फासीवादी हमले जनसमुदाय पर और अधिक बढ़ेंगे, उतनी ही तीव्रता और तेवर के साथ बढ़ेगा, फैलेगा और कुछ हद तक स्वयंस्फूर्त रूप से ही एकताबद्ध होता चला जाएगा जनविक्षोभ, जनप्रतिवाद और जनप्रतिरोध. ऐसे में उन सचेत शक्तियों का दायित्व काफी बढ़ जाता है, जो प्रगति जनवाद, धर्मनिरपेक्षता और क्रांतिकारी बदलावों की हिमायत करती हैं. ऐसी ताकतों को आज सचमुच पूरी शक्ति से पहल लेने की जरूरत है और तुरन्त क्षेत्रीय स्तर से लेकर जिले और प्रांत स्तर तक एवं विभिन्न सस्थानों और शहरों के स्तर तक संयुक्त मोर्चों का गठन कर संयुक्त, एकताबद्ध व समन्वित कार्यवाइयों को आगे बढ़ाने की जरूरत है.

जरूरत इस बात की भी है कि इन समन्वित व एकताबद्ध जनसंघर्षों का विकास करने और उन्हें क्रांतिकारी बदलाव की दिशा में ठोस रूप से उन्मुख करने के लिए इस आंदोलन की नेतृत्वकारी ताकतों के बीच से एक क्रांतिकारी आत्मगत शक्ति को सामने लाया जाए, जो एक दीर्घ-मियादी कार्यक्रम के मुताबिक क्रांतिकारी आंदोलन को व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई की दिशा में ले जा सके. साथ ही हमें अवश्य ही यह याद रखना होगा कि यदि प्रगति और क्रांति की वाहक शक्तियां इस कार्यभार को ठीक-ठीक पूरा नहीं कर सकीं, तो निःसन्देह यह जनसैलाब एक बार फिर शासक वर्ग के इस गुट या उस गुट की गोद मे जा पड़ेगा और फिर एक बार आंदोलन के शहीदों की लाशों की सीढ़ी बनाकर सत्तानशीन होंगी वही प्रतिक्रिया की ताकतें.

आवें, हम इस कार्यभार के साथ इस जन-ऊभार की अगली कतार में मजबूत व दृढसंकल्पित कदमों के साथ डटकर खड़े हो.

  • बच्चा प्रसाद सिंह

Read Also –

आखिर क्यों और किसे आ पड़ी जरूरत NRC- CAA की ?
प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक आम नागरिक का पत्र
हिटलर की जर्मनी और नागरिकता संशोधन बिल
‘एनआरसी हमारी बहुत बड़ी गलती है’

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

आखिर क्यों और किसे आ पड़ी जरूरत NRC- CAA की ?

Next Post

CAA और NRC देश के हर धर्म के गरीबों के विरुद्ध है

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

CAA और NRC देश के हर धर्म के गरीबों के विरुद्ध है

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

शराबी बुजुर्ग – ‘अब कोई बांझ नहीं कहेगा’

November 8, 2021

रूस-यूक्रेन युद्ध से सीखे गए सबक को अमेरिकी सेना के सिद्धांत में शामिल करने का एक दृष्टिकोण

December 9, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.