Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

किसान क्या अंबानी-अडानी से लड़ पाएंंगे ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 10, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

सवाल है किसान क्या अंबानी-अडानी से लड़ पाएंंगे ? जवाब है बिल्कुल और पूरी तरह सेे लड़ सकेंगे. अंबानी-अदानी जैसे दलाल कॉरपोरेट घरानों ने जिस तरह भारतीय राजसत्ता को अपनी खूंखार मुट्ठी में जकड़ लिया है, किसान आंदोलन के किसानों ने अंबानी-अदानी के बहिष्कार का ऐलान कर एक सही और शानदार रणनीति का प्रदर्शन किया है. कुछ चुनौतियां हैं, जिसका विश्लेषण वरिष्ठ अन्तर्राष्ट्रीय पत्रकार रविश कुमार ने किया है – सं.

किसान क्या अंबानी-अडानी से लड़ पाएंंगे ?

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

Ravish Kumarरविश कुमार, मैग्सेसे अवार्ड विजेता अन्तर्राष्ट्रीय पत्रकार

सरकार के प्रस्ताव को ठुकराने वाले किसान क्या अंबानी-अडानी से लड़ पाएंंगे ? किसान आंदोलन मुद्दों के प्रति समझ और समझ के प्रति घोर ईमानदारी का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है. किसान संगठनों को बातचीत के नाम पर फूट पड़ने के कच्चे माल के रूप में पेश किया गया, मगर किसान उतने ही एकजुट हुए जा रहे हैं. अभी किसान संगठनों के ढांंचे को भीतर से समझा जाना बाक़ी है.

आख़िर वे टूटे क्यों नहीं जबकि बातचीत करने वाला फूट डालने और तोड़ देने का ही मास्टर खिलाड़ी माना जाता है ? किसानों ने रिलायंस और अडानी के विरोध का एलान कर बता दिया है कि गांंवों में इन दो कंपनियों की क्या छवि है. किसान इन दोनों को सरकार के ही पार्टनर के रूप में देखते हैं. जनता अब बात बात में कहने लगी है कि देश किन दो कंपनियों के हाथ में बेचा जा रहा है. विपक्षी दलों में राहुल गांधी ही अंबानी अडानी का नाम लेकर बोलते हैं बाक़ी उनकी पार्टी और सरकारें भी चुप रहती हैं।

किसानों ने रिलायंस और अडानी के प्रतिष्ठानों के बहिष्कार का एलान किया है. हो सकता है व्यावहारिक कारणों से सारे किसान रिलायंस जियो का सिम वापस न कर पाएंं लेकिन जिस जियो के ज़रिए उन तक व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी मुफ़्त में पहुंंची है, अब वे उसके ख़तरे को समझने लगे हैं. यहांं जियो एक प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि सिर्फ़ एक कंपनी के विरोध के रूप में.

तालाबंदी के दौर में जब छोटे से लेकर बड़े उद्योग धंधे बिखर रहे थे, अंबानी-अडानी के मुनाफ़े में कई गुना वृद्धि की ख़बरों का जश्न मनाया जा रहा था. अब वही अंबानी और अडानी किसानों के निशाने पर हैं. यह कोई छोटी घटना नहीं है. हो सकता है इससे दोनों घरानों को फ़र्क़ न पड़े लेकिन जनता का एक हिस्सा अपने जनजीवन पर कोरपोरेट के राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव को समझने लगा है.

किसान देख रहे थे कि इस क़ानून के आने के पहले ही बिहार से लेकर पंजाब तक में भारतीय खाद्य निगम अडानी समूह से भंडारण के लिए करार कर चुका है. अडानी ने बड़े-बड़े भंडारण गृह बना भी दिए हैं. अगर एफसीआई की मंशा ठीक होती तो वह भी अडानी की कंपनी की ही तरह इस तरह के भंडार गृहों का निर्माण करती. तब फिर वह कह सकती थी कि सारा भंडारण एफसीआई नहीं कर सकती है, प्राइवेट पार्टी की भागीदारी ज़रूरी है.

भंडारण को लेकर बजट की घोषणा कहांं जाती है, पता नहीं. कृषि मंत्री क्यों नहीं ट्वीट करते हैं कि उनकी सरकार ने भी अडानी की तरह भंडार गृह बनाए हैं ? और अड़ानी के भंडार गृह एफसीआई की ज़मीन पर नहीं बने हैं ?

पंजाब और बिहार में अडानी ने जिस तरह के भंडार गृह का निर्माण किया है और एफसीआई ने तीस साल तक किराया देने की गारंटी दी है, इसे लेकर पब्लिक में व्यापक रूप से सफ़ाई आनी चाहिए. अडानी की नई कंपनी ने नए क़ानून से कितने दिन पहले भंडारण का काम शुरू किया है और भंडारण को लेकर उनकी कंपनी किस तरह का विस्तार कर रही है ?

राजनीति में परिवारवाद ख़त्म करने के नाम पर तथाकथित नैतिक बढ़त का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में उनकी अपनी ही पार्टी में परिवारवाद मज़बूत हुआ है. यही चीज़ आप औद्योगिक घरानों के संदर्भ में भी देख सकते हैं.

स्टार्ट अप इंडिया के झांंसों से निकल कर देखेंगे तो साफ दिखता है कि वे आर्थिक जगत में घरानों को कैसे मज़बूत कर रहे हैं. पुराने औद्योगिक घरानों को ख़त्म करने के नाम पर इन घरानों की संख्या सीमित की जा रही है और उनके कारोबार और प्रभाव का विस्तार किया जा रहा है. किसान अब देखने लगे हैं.

यह सारा कुछ नए क़ानून आने के समय के साथ क्यों होता दिखता है ? ऐसा क्यों लगता है कि तैयारी पहले कर ली गई है और क़ानून बाद में आया है ? ऐसा क्यों है कि अंबानी और अडानी के विस्तार का संबंध सरकार के किसी नीतिगत फ़ैसले से दिखता है ? क्या बीएसएनएल के लाखों कर्मचारी नहीं जानते या कहते कि रिलायंस के जीयो के लिए बीएसएनएल-एमटीएनएल को बर्बाद कर दिया गया ? मोदी सरकार के दौर में एक नवरत्न कंपनी मिट्टी हो गई ?

किसानों ने अंबानी और अडानी के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों का एलान कर बहुत बड़ा जोखिम लिया है. इनके प्रभाव में गोदी मीडिया किसान आंदोलन को लेकर और हमलावर होगा. किसानों को गोदी मीडिया से तो लड़ना ही होगा, अब उन्हें बग़ैर मीडिया के अपने आंदोलन को चलाने की आदत भी डालनी होगी. मीडिया कारपोरेट का है. किसान का नहीं. गोदी मीडिया के लिए किसान आतंकवादी है. खालिस्तानी है. किसान इस लड़ाई में चारों तरफ़ से निहत्थे घेर लिए गए हैं. बात क़ानून की नहीं है, उसके वजूद की है.

Read Also –

मोदी सरकार के गलत निर्णयों से देश भर का कामगार परेशान
एकांगी नाटक : कुत्ते की मौत
भारत के अर्थव्यवस्था की सच्ची तस्वीर
नोटबंदी के चार साल बाद भारतीय अर्थव्यवस्था : मोदी ने भारत को कपोल-कल्पनाओं का देश बना दिया है
APMC मंडी सिस्टम पर मक्कार मोदी का आश्वासन कितना भरोसेमंद
मोदी सरकार के तीन कृषि अध्यादेश : किसानों के गुलामी का जंजीर
जनता अपने सपनों को ढूंढने में लगी है और प्रधानमंत्री नई जनता

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

 

Previous Post

भात दे हरामजादे

Next Post

मंगलेश डबराल : जब हवा ने सूचना दी – मर गया वो

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

मंगलेश डबराल : जब हवा ने सूचना दी - मर गया वो

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

जनगणना में मातृभाषाओं का प्रश्न

July 23, 2023

डर

March 29, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.