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क्या मुहम्मद ने इस्लाम प्रचार के लिये किसी अन्य देश पर भी हमला किया था ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 7, 2020
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क्या मुहम्मद ने इस्लाम प्रचार के लिये किसी अन्य देश पर भी हमला किया था ?

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

एक पूर्व लेख के संदर्भ में एक पाठक का प्रश्न आया है : क्या मुहम्मद ने इस्लाम प्रचार के लिये किसी अन्य देश पर भी हमला किया था ? तो इसका प्रत्युत्तर ये है कि – अहो पृच्छक. सबसे पहले ये जान लें कि मुहम्मद के समय देश नहीं हुआ करते थे. देशों का यह विभाजन द्वितीय विश्वयुद्ध यानि 1945 के बाद हुआ है. अतः उस समय अरब देश नहीं बल्कि प्रायद्वीप कहलाता था, जहांं कबीलाई संस्कृति थी.

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मुहम्मद के समय इस्लाम या मुसलमान शब्द का नामकरण नहीं हुआ था बल्कि मुहम्मद की मौत के बाद राशिदून खलीफा के समय इसका नामकरण किया गया, जिसमें इस्लाम को ‘उम्मत’ शब्द में परिभाषित किया गया. अर्थात जो कबीले मुहम्मद के विश्वासपात्र थे (इसका अर्थ है विश्वासियों का समूह). और ऐसे अनेक जातिगत समूहों का नामकरण बाद में इस्लाम रूप में किया गया (इस्लाम का वास्तविक अर्थ भी यही है अर्थात अनेक समुदायों का संघ = इस्लाम) और जो लोग मु (मुहम्मद) सल्ल (विश्वास) मान (ईमान) रखने वाले थे, उनका नामकरण ‘मुसलमान’ के रूप में हुआ.

खलीफा असल में इस्लाम का राजनैतिक तथा धार्मिक प्रधान होता है और मुहम्मद के बाद पहला खलीफा राशिदून था. अतः ये भी अच्छे से समझ लेवे कि मुहम्मद कभी मुसलमान नहीं बना था बल्कि दुसरों को अपना अनुयायी बनाया, जो बाद में मुसलमान कहलाये. मुहम्मद ने सिर्फ आयतें सुनाकर शुरूआत में एक मत शुरू किया था, जो बाद में इस्लाम में परिवर्तित हुआ.

आपके मूल प्रश्न का प्रत्युत्तर दूं, उससे पहले ये समझ लेवे कि इस्लाम का प्रचार हथियारों और हत्यायों के बल पर किया गया और शुरू में लोगों ने डर से इसे स्वीकार किया. बाद में समय के साथ खलीफाओं ने इसमें कई तब्दीलियांं की, जिससे गरीब और प्रताड़ित लोगों ने इसे स्वेच्छा से भी स्वीकार किया. मगर वे बेचारे नहीं जानते थे कि जिस प्रताड़ना से बचने के लिए उन्होंने स्वेच्छा से इस्लाम स्वीकार किया, वह तो इस्लाम में भी अनवरत चलने वाली है. आज पंथों और समुदायों के भेद की लड़ाईयांं जगजाहिर है जिसमें प्रताड़ित वर्ग आज भी प्रताड़ित है.

मूल रूप से जो भी अरब प्रायद्वीप में बसे लोग हैं, उनके बारे में दो तीन मतान्तर है. जैसे हिन्दू ग्रंथों में कौरवों की हारी हुई सेना के वंशज को कुरैश कहा गया है, जो कि तथ्यपरक नहीं लगता क्योंकि अरब प्रायद्वीप ही नहीं, पकिस्तान के सिंध प्रान्त में भी प्राचीन किरात वंशी रहते थे, जो मूल रूप से जैन धर्म के अनुयायी थे.

आदिनाथ ने जब विशिष्ट केवल ज्ञान की प्राप्ति के लिये संसार को त्यागा तब अपने सभी पुत्रों को अपने राज्य में विभाग कर उन्हें अलग-अलग क्षेत्र प्रदान किये थे, और उसी कड़ी में बाहुबली को किरात प्रदेश मिला था अर्थात किरातों के प्रथम राजा के रूप में बाहुबली ही विराजित हुए थे, जिससे आज भी किरातों के प्राचीन शास्त्रों और मान्यताओं में बाहुबली को देवस्वरूप माना जाता है.

अरब प्रायद्वीप में भाषायी अपभ्रंश के कारण बाहुबली को हुबल देवता रूप में पुकारा जाता था और जमजम कुंवे के पास में आज भी उनकी चरणपादुकायें प्रस्तर चिन्ह के रूप में मौजूद है, जिसे जैन भाषा में ‘पगलिये’ शब्द में प्रयुक्त किया जाता है. यही किरात कालांतर में कुरैश कहलाये.

एक दूसरा मतांतर जो खुद इस्लाम की मान्यतानुसार है वो हिन्दू ग्रंथों में वर्णित नहीं है लेकिन उससे सत्यापित जरूर होता है. यथा – मुसलमानों में अरब का प्रथम पैगम्बर हजरत दाउ त अरीसलाम को माना गया है, जो असल में यदुवंशी दाऊ ही है अर्थात वासुदेव कृष्ण का भाई. क्योंकि हदीसो से ये साबित होता है – यथा – ‘जब बाढ़ आने पर हजरत दाउ त अरीसलाम अपने काफीले के साथ सुरक्षित स्थान पर जाने के लिये निकले तो अचानक चक्रवात आने पर अन्धे बूजुर्ग के कहने पर विशालकाय मछली पर फन्दा डालकर मछली के जॊर से चक्रवात से बाहर आये और अपने काफीले के साथ सुरक्षित जमीन पर पहुंंचकर वहांं पर अरब संस्कृति की नींव डाली, जिसे बाद में हजरत मुस, हजरत इशा और दूसरे पैगम्बर समेत मुहम्मद ने आगे बढ़ाया … आदि-आदि.

अब इसी संदर्भ को हिन्दू ग्रंथों से मिलाया जाये तो विष्णुपुराण में ठीक ऐसा ही उल्लेख मत्सावतार का भी है. और चूंंकि इस्लाम से हिन्दू धर्म पुराना है, अतः या तो ये माना जायेगा कि इस्लाम को जस्टीफाय करने के लिये मुस्लिम विद्वानों ने ये संदर्भ हिन्दू ग्रंथों से चुराया है अथवा ये माना जायेगा कि आज के अरबी असल में यदुवंशीयों के वंशज हैं. और ये जो शिया-सुन्नी इत्यादि के भेदा-भेद है, वो उनका जातिगत प्राचीन भेद (किरात और यदुवंशी होने की वजह से) है.

संभवतः इस्लाम में जो अनेक समुदायों का भेद निरंतर चल रहा है, वो मेरे नजरिये में डीएनए को अलग रखने वाली मानसिकता जातिवाद ही है. और इसी वजह से इस्लाम में अलग-अलग समुदाय अपने-अपने डीएनए को अलग रखने के लिये अनेक समुदायों और पंथों में बंटे हुए हैं ताकि उनका मूल डीएनए सुरक्षित रहे. (ये यदुवंशी ही द्वारिका के नाश के बाद में कालांतर में यहूदी कहलाये, जो ईसा के समय ईसाई बने और मुहम्मद पर सल्ल (विश्वास) और मान (ईमान) रखने वाले मुसलमान बने.

अब कोई ये कहे कि यादव तो हिन्दू थे तो मैंने जैनों का संदर्भ क्यों लिखा ? तो यहांं स्पष्ट कर देता हूंं कि जैनों के 22वें तीर्थंकर और वासुदेव कृष्ण आपस में चाचा-ताऊ के कजन भाई थे. और कृष्ण का हिन्दुकरण कैसे हुआ, ये अलग कहानी है जो विस्तारित होने से यहांं नहीं लिख रहा हूंं लेकिन इतना बता देता हूंं कि असल में कृष्ण हिन्दुओं में यहूदियों की ही परम्परा से लाये गये हैं. और ये तो स्पष्ट ही है कि हिन्दू धर्म से पुराना यहूदी धर्म है और यहूदियों के देवता हेलियोस ही आज के कृष्ण भगवान् बने और हिन्दुओं को आनंद प्रदान कर रहे हैं. (हिन्दुओं के पास भारत में कृष्ण की कोई भी मूर्ति 500 साल से प्राचीन नहीं मिलेगी, जबकि यहूदियों के देवता हेलियोस की मूर्ति कई हजार साल पुरानी भी दुनिया में है).

बहरहाल, आपको ये भी समझना जरूरी है कि भौगोलिक तौर पर अरब में पहला राज्य 1744 में बना था. और तब तक कबीलाई संस्कृति ही थी. अतः ये तो स्पष्ट ही है कि इस्लाम की उत्पति और उसके विस्तार में कई लड़ाइयों का योगदान तो है ही. 613-622 तक मुहम्मद काफी कबीलों को अपनी मीठी-मीठी वाणी से प्रभाव में ले चुके थे, खासकर गरीब कबीलों को क्योंकि धनवान कबीले तो उस समय मुहम्मद को पाखंडी कहते थे.

खुद उसके सगे चाचा जिसने उसका पालन-पोषण किया था, उसने भी मुहम्मद को पाखंडी कहा था और अंत तक मुसलमान नहीं बना. मुहम्मद के परिवार में 14 सगेवाले थे, जिसमें से सिर्फ तीन उसके अनुयायी बने बाकी सबने उसके आयत वाले प्रचार से आहत होकर रिश्ता तोड़ लिया था.

उस समय जो मक्का के कबीले थे वो मुहम्मद के विश्वासपात्रों में नहीं थे. अतः सबसे पहले मक्का के कबीलों को ही हथियारों के बल पर अंत किया गया ताकि मक्का पर मुहम्मद काबिज हो सके. उस समय के इतिहास के अनुसार अरब पर तातायनी या तातानी कबाइली राजवंशों का शासन था, जो ईरानीयों (आर्योंं) के मिश्रित वंशज थे, जो अनेक कबीलों के रूप में अनेक मान्यताओं और धर्मों को मानने वाले थे और रोम के साथ शत्रुता रखते थे. अतः उनमें आपस में हमेशा युद्ध और झगड़े चलते ही रहते थे.

सबसे पहले मुहम्मद ने जैनों के मंदिर पर हमला कर उसकी 360 जैन तीर्थंकरों की मुर्तियों को तोड़ा और शैतान पर कंकड़ मारने वाला पाखंड चलाया. उसी मंदिर को बाद में मस्जिदुल हराम के रूप में परिवर्तित किया. आज भी दो मुख्य चरण पादुकायें (जैनों के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ और उनके पुत्र बाहुबली की) मक्का में है, जिसे आज के मुसलमान मुहम्मद के पैरों का निशान कहकर पूजते और चूमते हैं.

बहरहाल, आक्रमणों का ये सिलसिला जो शुरू हुआ तो लगातार चलता रहा और इसकी लपेट में कितने ही पुराने मंदिर और स्थान आये थे. कितने ही देशों और संस्कृतियों को मिटाकर इस्लाम का विस्तार हुआ है, जिसमें मक्का के ही कई काबा शामिल हैं. आप में से बहुत से लोग नहीं जानते होंगे कि अरब में इस्लाम से पूर्व अरब में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 20 काबा मौजूद थे और सभी में उपासना होती थी, जिनमें कुछ प्रसिद्ध काबाओं के बारे में हदीसों में भी उल्लेख है जैसे — नजरान काबा (यह मक्का से दक्षिण में था), सिंदाद काबा (यह कूफा में था), जुल खलश काबा (यह मक्का के पूर्व में था). ऐसे ही शद्दाद काबा, गफ्तान काबा (इसे सन 624 में मुहम्मद द्वारा तुड़वा दिया गया) इत्यादि अनेक काबा थे.

मक्का में कई काबे तो कुरैश लोगों ने बनवाये थे. इनमें कुछ ऐसे भी थे जिनमें मूर्ति पूजा नहीं होती थी, फिर भी मुहम्मद ने उन्हें तुड़वा दिया (असल में काबा अरबी में बैतुल अतीक بيت العتيق” यानि ‘पुराना घर’ होता है. अर्थात इस्लाम की उत्पति से पहले पूर्ववर्ती धर्म का स्थान और इसलिये इसे मस्जिदुल हराम مسجد الحرام यानि ‘वर्जित मस्जिद’ भी कहा जाता है.

उस समय अरब कबीलों में एक समुदाय बदो समुदाय रहता था, जिसे आज की भाषा में सेकुलर भी कहा जा सकता है और आज के पुजारियों की तरह पारिश्रमिक के बदले सभी धार्मिक स्थानों को संभालते थे. और इसी से वे जैनों से लेकर ईसाइयों तक के धार्मिक स्थलों की देख-रेख करते थे. जैनों में जो बदो समुदाय देख-रेख करता था, वो मूर्तिपूजा करने लगा जबकि ईसाइयों के काबे देख-रेख करने वाले मूर्तिपूजा नहीं करते थे. मगर जो यहूदी के धार्मिक स्थल की सार-संभाल करते थे, वे दोनों तरह के थे. क्योंकि उस समय तक यहूदियों में दो भेद बंट चुके थे, जिसमें एक मूर्ति दर्शन करता था मगर पूजा नहीं करता था और दूसरा मूर्तिपूजा करता था.

मुहम्मद ने सभी तरह के काबों को न सिर्फ तोड़ा बल्कि उस कबीले की जनसंख्या को भी मौत के घाट उतार दिया और इसी से मुहम्मद और उसके उम्मत वाले कबीलों की हथियारगत लड़ाईयो में वे बेचारे बदो ही सबसे ज्यादा पिसते थे, क्योंकि मुहम्मद के अनुयायी न सिर्फ रात के अंंधेरे में भी बदो को मार देते थे बल्कि मंदिर रुपी काबा को लूटकर उनकी स्त्रियों को भी उठा ले जाते थे और बाद में मुहम्मद से ही पूछते थे कि ‘इनका क्या करेंं ?’ तो मुहम्मद कहता था कि ‘अल्लाह से पूछकर बताऊंगा’ और फिर गुफा में जाकर नोफल से पूछकर उन्हें बता देता कि ‘लुटा धन आधा तुम रख लो और आधा हमें दे दो और लूटी हुई स्त्रियांं तुम्हारी कनीज है. अतः तुम इसे रखो और जो चाहे वो करो.’ इसी से इस्लाम में दासी प्रथा और बलात्कार की प्रथा चली, जो आज तक अरब देशों के कट्टर समुदायों में प्रचलित है. इन सबका वर्णन इस्लाम के धार्मिक ग्रंथों में है, मगर यहां हमारा संदर्भ मुख्यतः हमले संबंधी है, अतः इसका ज्यादा विस्तार न करते हुए मुख्य मुद्दे पर लौटता हूंं यथा –

नजरान काबा : जब्ल तसल की पहाड़ी पर एक ईसाई कबीला था और वहां के काबा (आज के चर्च) में मूर्तिपूजा भी नहीं होती थी. मुहम्मद ने सन 631 में वहां हमला किया और लोगों को इस्लाम कबूल करने को कहा. मगर जब उन लोगों ने इंकार किया तो मुहम्मद वहां के सभी 2000 लोगों को क़त्ल करा कर उनकी लाशें जलवा दीं.
(सही मुस्लिम – किताब 4 हदीस 1003 2-)

गफ्तान काबा : अरब के नज्द शहर के पास गफ्तान यहूदी कबीला रहता था, जहांं पर उनकी इबादतगाह के रूप में एक काबा था. वह लोग भी मूर्ति पूजक नहीं थे लेकिन भारत से जाने वाले व्यापारी श्रेष्ठिवर्ग के साथ अरब के लोग भी उस काबा को भेंट चढ़ाते थे. जब मुहम्मद को इस बारे में पता चला तो उसने इस्लामी महीने जमादुल ऊला हिजरी 4 सन 624 को मदीना से आकर वहां हमला किया और लोगों को क़त्ल करके वह काबा नष्ट करा दिया.
(बुखारी – किताब 8 हदीस 630 3-)

यमनी (जिल खलश और शम्शीया) काबा : जरीर बिन अब्दुल्लाह ने कहा मैंने रसूल को बताया कि यमन में एक और काबा है, जिसे लोग ‘जिल खलश’ (ذي هلسا) या ‘काबा अल यमनिया’ और ‘काबा अश शम्शिया’ (الكعبة الشامية) कहते हैं और वहां ‘अहमस’ कबीले के लोग रहते हैं. यह सुनते ही रसूल ने कहा ‘तुम तुरंत फ़ौज लेकर वहां जाओ और उस काबा को तोड़ दो और वहां मौजूद सभी लोगों को क़त्ल कर दो क्योंकि दुनिया में एक ही काबा रह सकता है.’ (बुखारी -जिल्द 5 किताब 58 हदीस 160)

जुल खलश काबा : जबीर ने रसूल से कहा कि इस काबा के उत्तर में यमन में अहमस कबीले का एक और काबा है जिसे ‘जुल खलश’ काबा कहते हैं. फिर रसूल के कहने से हम 350 घुड़सवारों की फ़ौज लेकर गये और वहां के सभी लोगों को क़त्ल करके और उस काबा को नष्ट करके वापस आ गये. (सही मुस्लिम किताब 31 हदीस 6052)

यमन का काबा : इस तरह मुहम्मद के आदेश से अप्रैल सन 632 यानि हिजरी 10 में यमन का काबा नष्ट कर दिया गया और वहां मौजूद सभी लोगों को क़त्ल कर दिया गया. (बुखारी -जिल्द 5 किताब 59 हदीस 6413-)

ये तो सिर्फ मैंने आज के मक्का के इलाके के उस समय के सिर्फ उन कबीलों का वर्णन किया है जो खुद इस्लाम की धार्मिक पुस्तक तस्कीद करती है. इसके अलावा अरब के इतिहास और रोमन इतिहास और ईरानी इतिहास से बहुत लम्बा विस्तार है, जिसे एक लेख में नहीं बताया जा सकता. अतः आज सिर्फ इतना ही. वैसे भी इतने से भी आपके प्रश्न का समाधान तो हो ही चुका है.

(यह आलेख एक पाठक के प्रश्न के जवाब में लिखा गया है.)

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Comments 1

  1. indu bhushan says:
    4 years ago

    जैन साहब का दिमाग ख़राब हो गया है जो कुछ भी लिखे जा रहे है इस पोस्ट के कुछ अंश झूठे है उन्हें हटाया जाय | मुहम्मद इस्लाम की बात में अपना अजेंडा न घुसाए न ही कृष्णजी को घसीटे: “कृष्ण का हिन्दुकरण कैसे हुआ, ये अलग कहानी है जो विस्तारित होने से यहांं नहीं लिख रहा हूंं लेकिन इतना बता देता हूंं कि असल में कृष्ण हिन्दुओं में यहूदियों की ही परम्परा से लाये गये हैं. और ये तो स्पष्ट ही है कि हिन्दू धर्म से पुराना यहूदी धर्म है और यहूदियों के देवता हेलियोस ही आज के कृष्ण भगवान् बने और हिन्दुओं को आनंद प्रदान कर रहे हैं. (हिन्दुओं के पास भारत में कृष्ण की कोई भी मूर्ति 500 साल से प्राचीन नहीं मिलेगी, जबकि यहूदियों के देवता हेलियोस की मूर्ति कई हजार साल पुरानी भी दुनिया में है). “

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