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डिजिटल गुफा में कैद पीएम मोदी और धर्म की धंधाखोरी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 19, 2024
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डिजिटल गुफा में कैद पीएम मोदी और धर्म की धंधाखोरी
डिजिटल गुफा में कैद पीएम मोदी और धर्म की धंधाखोरी
जगदीश्वर चतुर्वेदी

प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस की त्रासदी यह है कि वे मीडिया प्रस्तुतियों, सोशलमीडिया प्रस्तुतियों में व्यक्त संसार पर मुग्ध हैं और उसे लेकर अंधे हैं. वे देश के अंदर, आम जनता के जीवन में जो कुछ चल रहा है उसे देख ही नहीं रहे. यही वजह है उनके बयानों में नेताओं के चेहरों पर आम जनता का दुख-दर्द गायब है. वे कभी दुखी-परेशान, हताश नहीं लगते. उनको जब भी देखो डिजिटल-डिजिटल नजर आते हैं ! वे भारत के यथार्थ से डिजिटल गुफा में कैद नजर आते हैं.

डिजिटल और गरीबी का बुनियादी अंतर्विरोध है. इसमें बार बार डिजिटल हारा है. इराक, अफगानिस्तान को देख लो और समझ लो. डिजिटल मीडिया ने जितना समझाया इराक-अफगानिस्तान एकदम विलोम नजर आए. यही हाल मोदी-आरएसएस के प्रचारतंत्र का है. वे डिजिटल इंडिया का जितना बिगुल बजा रहे हैं उतना ही गरीबी को छिपा रहे हैं. गरीबी ठोस हकीकत है, जनता की अकथनीय परेशानियां ठोस हकीकत है, डिजिटल कैमरा छद्म है.

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डिजिटल युग में बेशर्म आरएसएस

पहले आरएसएस वाले कम से कम अटलबिहारी बाजपेयी के जरिए अपना मुंह ढ़ंक लेते थे. थोड़ी बहुत लाज-शर्म व्यक्त करते थे लेकिन डिजिटल युग में संघ ने सारी लाज-शर्म ताक पर उठाकर रख दी है. निर्लज्ज अविवेकवादियों की तरह उनके चिन्तक-नेता टीवी और यूट्यूब में बोलते रहते हैं, सच में वे जोकर लगते हैं ! जो भी टीवी देखता है वह सिर धुनता है कि इतने जोकर कहां से आए. यही वजह है टीवी को अब जोकर टीवी कहते हैं. यह इडियट टीवी का नया संस्करण है.

RSS-BJP के लोग आज तक भारत को नहीं जान पाए, अपने देश के संविधान को नहीं समझ पाए, वे पाकिस्तान को क्या समझेंगे. मूर्ख शासक पीड़ादायक होता है, और भारत की त्रासदी यही है कि सत्ता में मूर्ख शासक बैठा है. विभिन्न अदालतें कई हिंदुत्ववादियों को हाल के वर्षों में हिंसा-असहिष्णुता के लिए सजाएं सुना चुकी हैं, इसके बाद भी शिक्षितों के एक बड़े वर्ग का भाजपा-मोदी प्रेम इस बात का प्रतीक है कि उनमें विवेक मर गया है. गुजरात दंगों का सच इन लोगों ने आज तक नहीं बताया.

मसलन्, नरौदा जनसंहार में 97 मुसलमान कत्ल हुए हैं, इसमें 82 लोग दोषी पाए गए हैं. ज्यादातर भाजपा के लोग हैं या उनके खरीदे भाड़े के हत्यारे ! देश मान लेता है गुजरात के दंगों में भाजपा निष्पाप-निष्कलंक है. पर, यह तो बताओ कि दंगे किसने किए ? मुसलमानों के हत्यारे कौन थे ? आरएसएस जैसा विशाल संगठन गुजरात में आज तक यह नहीं बता पाया कि दंगे किसने किए, यह तो आश्चर्य की बात है. दंगाईयों को पकड़वाना भी देश सेवा है.

आश्चर्य की बात है मोदी जैसा बलिष्ठ नेता आजतक एक दंगाई का नाम नहीं ले पाया. अमित शाह जैसा नेता किसी दंगाई का नाम नहीं जानता, लेकिन यह जानता है कि माया कोदनानी कहां पर थी. सवाल यह है दंगे किसने किए, हत्यारे कौन हैं ? आरएसएस को ठोस सबूतों के साथ सामने आना चाहिए या फिर अदालतों ने जो कहा है उसे खुलकर मानना चाहिए. अपनी गलती माननी चाहिए.
भारत को बचाना है तो आरएसएस को वैचारिक-राजनैतिक शिकस्त दो. संघ से प्रेम रखकर देश नहीं बचेगा. भारत प्रेम की पहली शर्त है हर रंगत की साम्प्रदायिक ताकतों का हर स्तर पर प्रतिवाद करो.

हिंदुओं में संस्कृति और कु-संस्कृति की अलग अलग एकाधिक परंपराएं हैं. शिक्षित युवाओं का एक वर्ग अपने को कु-संस्कृति की परंपरा से जोड़ता है. मज़ेदार बात यह है मोदी सरकार सिर्फ़ आरएसएस के सुझावों पर काम करती है जबकि संघ का लोकतांत्रिक संरचनाओं में कोई वैध स्थान नहीं है. विपक्षी दलों के सुझावों की ओर मोदी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया. सवाल यह है कि विपक्षीदल लोकतंत्र के मुख्याधार हैं या संघ ? संघ तो चुनाव लड़ता नहीं है. लोकतंत्र में उसकी कोई शिरकत नहीं है. ऐसे में लोकतंत्र को कैसे बचाएं ? क्या लोकतंत्र की रक्षा विपक्ष के बिना संभव है ?

हम मोदी सरकार से मांग करते हैं कि वे आधिकारिक तौर पर बताएं देश में एक सौ पैंतीस करोड़ से अधिक की आबादी में हिन्दू-मुस्लिम जबरिया शादी के विगत दस सालों के आंकड़े क्या हैं ? यूपी में इस मुद्दे को जिस तरह उछाला गया उसमें झूठ और अफ़वाह के अलावा कुछ भी नहीं है. यूपी सरकार को भी पहल करके विगत दस साल के कम से कम हिन्दू-मुस्लिम जबरिया शादी के आंकड़े जारी करने चाहिए. इससे संघ की मुहिम को बेनक़ाब करने में मदद मिलेगी.

‘लव जेहाद’ का संघी मतलब

अब हिन्दू लड़के-लड़कियों के दुर्दिन आने वाले हैं. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने ‘लव जेहाद ‘का मतलब समझाने के लिए संघ के कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है. आयरनी है यह संगठन समाज में ‘लव’ का अर्थ आज तक नहीं समझ पाया. यह संगठन हमेशा ‘लव’ के विलोम यानी ‘सामाजिक घृणा’ के लिए कार्य करता रहा है. ‘लव’ से संघ का तीन-तेरह का सम्बन्ध है. हां, ‘जेहाद’ का प्रेमी जरुर है ! ‘जेहाद’ का डिक्शनरी अर्थ संघ नहीं मानता है क्योंकि ज्ञान-विज्ञान इसके ठेंगे पर है !

संघ के लिए ‘जेहाद’ का मतलब है अनुदार – रुढिवादी बनो, हिन्दूओं को पुरानी बेड़ियों में जकड़ो. ‘लव’ से घृणा करो. समाज में हर स्तर पर चल रही मिश्रण की प्रक्रियाओं का विरोध करो. बहुलतावादी मूल्यों, जाति मिश्रण, धार्मिक मिश्रण, प्रान्तीय मिश्रण आदि का विरोध करो. यह मूलत: हिन्दुत्ववादी फंडामेंटलिज्म है.

भारत को हिन्दुत्ववादी फंडामेंटलिज्म में धकेलकर संघ किस तरह का विकास माॅडल देना चाहता है, यह बात अब सामने आ गयी है. ‘लव’ निजी मामला है, यह दो के बीच का मामला है. इसमें किसी तीसरे के हस्तक्षेप को हमारा संविधान और भारतीय दण्ड संहिता ग़ैरक़ानूनी मानता है. ‘लव’ में हस्तक्षेप करना क़ानूनन अपराध है. लेकिन संघ यह अपराध करने के लिए अपने बंदों को सीधे उकसाता रहा है. इससे यह पता चलता है कि संघ अपनी शक्ति लगाकर हिन्दू -मुस्लिम तनाव और विद्वेष को बढ़ावा देना चाहता है, जातिवाद को बढ़ावा देना चाहता है. साथ ही युवाओं की स्वतंत्रता पर हमला करना चाहता है.

‘लव’ युवाओं का हक़ है और यह हक़ उन्होंने सैंकडों क़ुर्बानियां देकर हासिल किया है. ‘लव’ में जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि नहीं देखे जाते, वहां तो ‘लव’ देखा जाता है. ‘लव जेहाद’ के नाम पर संघी हंगामे का मतलब है हिन्दुत्ववादी रुढियों में समाज के युवाओं को बांधना और यह सीधे उनकी स्वाधीनता पर हमला है. ‘लव’ युवाओं का मूलभूत मानवाधिकार है. युवा तय करे कि वह किसको प्यार करेगा ? यह कोई अन्य तय नहीं कर सकता. ‘लव’ में अन्य तो शैतान है.

धंधेखोरी से धर्म की मुक्ति

हम यह नहीं कहते धर्म का नाश हो. हम तो यह कहते हैं धर्म के नाम पर चल रही धंधेखोरी खत्म हो. धर्म रहेगा. धर्म जाने वाला नहीं है. वह तब तक रहेगा, जब तक ये तीन अभाव रहेंगे. ये अभाव हैं- शिक्षा का अभाव, ज्ञान का अभाव और सामाजिक अस्तित्व की दैनंदिन वस्तुओं का अभाव. इन तीनों अभावों को धर्म अपने यूटोपिया से ढंके रखता है, साथ ही इन तीनों अभावों से बाहर निकलने की आशा बनाए रखता है.

मसलन्, जब कोई व्यक्ति नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रहा होता है तो बेहद निराश होता है. ईश्वर के पास इसी निराशा की अवस्था में आता है, प्रार्थना करता है और आशा का संचार लेकर जाता है. यह सच है भगवान उसकी कोई मदद नहीं करते लेकिन भगवान के दर्शन करके उसके मन ही मन आशा का संचार होता है और यही चीज उसे बल देती है और वह अपने प्रयास में सफल हो जाता है. सफल होने पर वह मानता है भगवान की उसने प्रार्थना की इसलिए इसे सफलता मिली. जबकि सच यह है भगवान की इसमें कोई भूमिका नहीं है.

भारतीय समाज की समस्या यह है कि हमारे यहां धर्म है लेकिन शास्त्रों और पंडितों के गल्पशास्त्र में बंधा हुआ. इससे धर्म ने धर्मविज्ञान की शक्ल ही अख्तियार नहीं की. उसने धर्म को पूजा-पाठ, भाग्यवाद, धर्मशास्त्र और आचारशास्त्र तक सीमित रखा, धर्म को आधुनिक समाज की विसंगतियों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया.

धार्मिक सुधारों की प्रक्रिया

धार्मिक समाज सुधार आंदोलनों के समय 19वीं सदी में धर्म में सुधार की यह परंपरा कुछ सालों तक नजर आती है लेकिन बाद में धार्मिक सुधार के कामों को तिलांजलि दे दी गयी. पौरोहित्यवाद, कर्मकांड, जातिभेद, लिंगभेद आदि के खिलाफ 19वीं सदी में कुछ आवाजें उठीं, बाद में सब कुछ त्यागकर स्वाधीनता आंदोलन में लग गए.

मन में कहीं न कहीं डर था कि धार्मिक सुधारों की प्रक्रिया को यदि जारी रखते हैं तो उससे ब्रिटिश शासकों के खिलाफ पैदा हुई सामाजिक एकता टूट सकती है. इसके कारण धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों में युगानुरूप परिवर्तन की प्रक्रिया कहीं बहुत दूर छूट गई. विभिन्न धर्मों में सामाजिक-वैचारिक जड़ता आ गयी. कायदे से धर्मों में युगानुरूप परिवर्तन वैसे ही जरूरी होते हैं, जैसे समाज के अन्य क्षेत्रों में होते हैं. सामाजिक जड़ता की तरह ही धार्मिक जड़ता भी सामाजिक विकास में अवरोध पैदा करती है. धार्मिक जड़ता समूचे व्यक्तित्व निर्माण को प्रभावित करती है.

धर्म को नए सिरे से वहां से देखें जहां से संविधान देखता है. संविधान जिन चीजों का निषेध करता है धर्म को भी उन निषेधों को मानना चाहिए. मसलन्, अंधविश्वास और बालविवाह से मुक्ति सबसे पहली जरूरत है. यह धर्म को धर्मशास्त्र के पुलिंदे से बाहर लाने की पहली सीढ़ी है. धर्म को धर्मविज्ञान में रूपान्तरित करने की दूसरी सीढ़ी है स्त्री और जाति असमानता के सभी रूपों का हर स्तर पर खात्मा. धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों में लिंगभेद और जातिभेद है. इस तरह के भेदों का खात्मा करने के लिए सभी धर्मों में एक राय कायम करने की जरूरत है.

धर्मविज्ञान बनाने की तीसरी सीढ़ी है, हर तरह के मातहत भाव से धर्म को मुक्त किया जाए. धर्म का पुराना रूप मातहत भावबोध पर टिका है. मातहत भावबोध ही है जो सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक असमानता बनाए रखने में मदद करता है. धर्मविज्ञान की चौथी सीढ़ी है धर्म में निर्धारित हर तरह के निषेधों को खत्म किया जाय. निषेधों के कारण ही मनुष्य का भविष्य की ओर ध्यान नहीं जाता. निषेध हमेशा अतीत की ओर खींचते हैं.

धर्म को धर्मविज्ञान बनाने की पांचवीं सीढ़ी है मंदिर-देवालय-मसजिद-चर्च आदि सबके लिए खुले हों. इनमें सबका अबाध प्रवेश हो. सबको पूजा-अर्चना-उपासना का समान हक हो. इसके साथ ही धार्मिक आचारशास्त्र की जगह संवैधानिक आचारशास्त्र को स्थापित किया जाय. व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखा जाय, न कि धार्मिक प्राणी तरह.

व्यक्ति की निजता, इच्छा और मतादर्श को धार्मिक संस्थान सम्मान की नजर से देखें, उनमें हस्तक्षेप न करें. धर्म मानने वाले और धर्म को न मानने वाले के बीच में भेदभाव न किया जाय. ईश्वर के प्रति आस्था और अनास्था को समान नजरिए से देखा जाए. धर्म को संविधान और विज्ञान की संगति में काम करने की शिक्षा दी जाय.

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