Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

राजकीय हमलों पर शर्तें कैसी ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 12, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

राजकीय हमलों पर शर्तें कैसी ?

Rizwan Rahmanरिजवान रहमान, समाजिक कार्यकर्ता

यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा
मैं लिखना चाहता हूंं.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूंं वह धमाका
जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है.

– केदारनाथ सिंह

इस देश में न्याय तभी ध्वस्त हो गया, जब एक दंगाई संविधान की कसमें खाकर प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ ले रहा था. इस देश की आत्मा तभी मर गई जब कब्र से औरतों को खींच कर रेप करने की घोषणा करने वाला हत्यारा, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ गया.

लिखने, पढ़ने, बोलने वाले मुस्लिम एक्टीविस्ट को उठाने का काम नए फेज के साथ शुरु हो चुका है. इस सिलसिले में क्राइम ब्रांच ने कई एक्टीविस्ट को नोटिस भी दिया है. ये तमाम लोग मुसलमानों पर होने वाले दमन और हिंसा के खिलाफ लगातार बोल रहे थे. एएमयू के स्टूडेंट एक्टिविस्ट शरजील उस्मानी को आजमगढ़ से उठा लिया गया. हाल यह है कि इस देश में हर दिन कोई न कोई मुस्लिम एक्टिविस्ट सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है.

मुसलमानों को लेकर इस देश के बुद्धिजीवी वर्ग में अलग ही सलेक्टिव एप्रोच है. एक तरह से खतरनाक स्तर पर पुर्वाग्रह के शिकार पाए जाते हैं. किसी मुस्लिम एक्टीविस्ट पर होने वाले दमन के खिलाफ बोलना है या नहीं, यह सोचते-सोचते इन्हें 2, 4 दिन का समय लग जाता है. इतनी देरी के बाद भी कोई सपोर्ट में आएगा, कोई नहीं आएगा और ज्यादातर तो चुप्पी मार जाएंगे.

लेकिन यही लोग एक्टिव होते हैं जब मसला उच्च वर्ग और सवर्ण तबके से जुड़ा हो अथवा कुछ ऐसा कंटेंट हो जिस पर बोलते, लिखते लिबरल टाइप फील आए. सोशल मीडिया के धुरंधर भी तभी हाइपर एक्टिव होते हैं बशर्ते मुद्दा वंचित, शोषित, उपेक्षित समुदाय से जुड़ा न हो. अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर कदम ऐसे डगमगाए रहते हैं कि कभी तो आपको कोफ्त हो और कभी हंसी आ जाए. बहुत ही कम लोग मिलेंगे जो साफ और बगैर किसी दांव-पेंच लिए समर्थन में खड़े दिखे.

इन्हें भारतीय मुसलमान कट्टर लगता है. उनकी आवाज़-आंदोलन, फसाद लगता है. उनकी राजनीति इन्हें जिहाद लगता है. उनका एप्रोच मध्ययुगीन लगता है. आप बात करेंगे मुस्लिम आईडेंटिटी पॉलिटिक्स की, समझा जाता है धर्म की स्थापना की जा रही.

वे दुनिया की तमाम आईडेंटिटी की आवाज को किसी भी हद तक सपोर्ट कर सकते हैं, मुसलमानों की आवाज को नहीं. इसके लिए उनका एक फ्रेम है जिसमें वे नापते हैं, मापते हैं कि मुसलमान कहां तक जा सकता है. और अगर कोई सीमा से आगे बढ़ गया तो खौफनाक करार दिया जाना तय है. तुलना में वे तमाम शब्द लाए जाते हैं, जिनका भारतीय मुसलमान से दूर-दूर तक नाता नहीं है.

शरजील इमाम को लेकर लिबरल समुदाय का प्रोपगंडा ही अलग था. मैं यहीं बैठे-बैठे देख रहा था कि 3 दिन, 4 दिन तक वे किस प्रकार का डॉयलॉग नरेटिव बना रहे थे. कुछ ने कहा शरजील को डिसओन कर दो, सेकुलर इंडिया के फैब्रीक के लिए खतरनाक है. कुछ का तर्क था कि हमने फलां को नकार दिया तो मुसलमान भी शरजील को नकार दें.

दिलचस्प है शुरुआती कई दिनों तक हुआ भी यही, आम मुसलमान से लेकर ओवैसी साहब तक ने शरजील से किनारा कर लिया. लिबरल्स ने (इनमें मुसलमान लिबरल भी शामिल हैं) शाहीन बाग के मंच से घोषणा करवाई कि ANTI-CAA प्रोटेस्ट और शाहीन बाग का शरजील से कोई संबंध नहीं.

यह हाल है, जब स्टेट अटैक करता है किसी मुसलमान पर. समर्थन देने से पहले शर्तें रखी जाती है. इस Oppressed Identity को उन शर्तों को मंजूर करना पड़ता है. यही लिबरल हिप्पोक्रेट लोग अमेरिका के ब्लैक आंदोलन को सपोर्ट भी करते हैं, दिन में 10 ट्वीट और पोस्ट करते देखे गए, जिससे वहां के आंदोलन को मोरल सपोर्ट के अलावा कुछ भी नहीं मिला.

लेकिन इस जमीनी लड़ाई में एक-एक आवाज की अहमियत है. समर्थन में खड़े हर एक की गिनती मायने रखती है. और होता यह है कि ये लोग इस जमीनी लड़ाई को नो-मेंस लैंड में बदल देते हैं ! अजीब हिप्पोक्रेसी है, अजीब मक्कारी है. इस तबके को हॉंगकोंग में तो आजादी चाहिए लेकिन कश्मीर तक आते-आते कंडीसन लग जाता है. मुसलमान तक पहुंचते चार-पांच लेंस ऊपर से लगा लेते हैं.

Read Also –

शरजील इमाम : दिल्ली चुनाव की बैतरणी पार करने का मोदी-शाह का हथकण्डा
NRC – CAA : बात हिंदू मुसलमान की है ही नहीं
सेकुलर ‘गिरोह’ की हार और मुसलमानों की कट्टरता
मुसलमान एक धार्मिक समूह है जबकि हिन्दू एक राजनैतिक शब्द
अंग्रेजों के खिलाफ स्वाधीनता संघर्ष में मुसलमानों की भूमिका
कश्मीर समस्या और समाधन : समस्या की ऐतिहासिकता, आत्मनिर्णय का अधिकार और भारतीय राज्य सत्ता का दमन
आप कश्मीर के बारे में कितना जानते हैं ?

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

लॉकअप का बेताल शव

Next Post

कौन उजाड़ता है इन्हें ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

कौन उजाड़ता है इन्हें ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

BLACK DAY – 8 NOVEMBER

November 10, 2018

क्या मुहम्मद ने इस्लाम प्रचार के लिये किसी अन्य देश पर भी हमला किया था ?

August 7, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.